बूढ़ी काकी कहती है-‘‘बुढ़ापा तो आना ही है। सच का सामना करने से भय कैसा? क्यों हम घबराते हैं आने वाले समय से जो सच्चाई है जिसे झुठलाना नामुमकिन है।’’.

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Sunday, December 20, 2009

बर्दाश्त करने की हद

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मैंने सादाब से पूछा कि उसके अब्बा को पुलिसवालों ने कब तक थाने में रखा। इसपर सादाब का चेहरा लाल हो गया, वह बोला,‘‘कमबख्तों ने बहुत मारा अब्बा को। गालियां दीं, जो जी में आया वह कहा। पुलिसवाले शराब पीते रहे, सिगरेट सुलगाते रहे। अब्बा के बालों को पकड़कर एक सिपाही बोला कि अब खुश है तू। अब्बा के मुंह से खून बह रहा था। उनकी पीठ चमड़े की बेल्ट की चोट से छिल गयी थी। ऐड़ियां सूज गयी थीं और पैर की तलियां खून से लथपथ थीं। ऐड़ी से खून पैर के किनारे होता हुआ अंगूठे के सहारे जमीन पर टपक रहा था। अब्बा बेहोश हो चले थे। पुलिसवालों ने अब्बा की पीठ पर शराब की आधी बोतल उडेल दी। अब्बा तिलमिला उठे। फिर बेहोश हो गये। शायद वह समय कठिन था। कठिन इतना कि सहना मुश्किल था। हम बर्दाश्त करते हैं, लेकिन हर किसी की हद होती है। हद तक उतना खराब नहीं रहता। हद पार होने पर बहुत कुछ बदल जाता है। अब्बा को सड़क किनारे बेहोशी की हालत में फेंक दिया गया। अम्मी बेखबर थी। अब्बा रात में रिकशा चलाते थे। दिन में कुछ घंटे मजदूरी करते थे। परिवर का पेट पालने के लिए क्या नहीं कर रहे थे हमारे अब्बा।’’

सादाब की बातें दिल को झकझोर रही थीं। मैं भावुक हो गया था। सादाब के परिवार को कितना कष्ट हुआ होगा। कष्ट हमें जीवन से रुसबा होने पर विवश कर देते हैं। आंखों के गीलेपन में एक गहराई थी जिसे मैं देख रहा था। फिर कई बूंदें छलकीं जिनसे कुछ तसल्ली मिली। अक्सर घने दर्द के बाद इसी तरह राहत मिलती है। हृदय की वेदना सिमटी रहती है- उसका बाहर आना जरुरी है। पिघलती हुई कोई चीज बूंद बनकर ही तो गिरती है। विचार पिघलते हैं ताकि मन हल्का हो सके, हृदय का भार कम हो सके।

-harminder singh

to be continued........

Saturday, December 19, 2009

गलतियों की गुंजाइश रह ही जाती है




समंदर गहरा है और पानी खारा। यहां मछलियां नहीं मचलतीं क्योंकि वक्त ने इसे अभिशापित कर दिया। मुझे मालूम नहीं मैं कितना हंसा हूं, लेकिन इस समुद्र में नहाया नहीं। लगता है स्नान का समय करीब है क्योंकि मुझे इसका एहसास हो रहा है।

मेरी मर्जी आजतक नहीं चली। किसी ने सुनी नहीं मेरी। हालात पहले भी वही थे, आज भी वैसे ही हैं। फर्क पड़ा है तो उन्हें झेलने की क्षमता का। नहीं झेल पा रहा इस दर्द को मैं। यह दर्द जितना अपनों ने दिया है, लगभग उतना ही दर्द खुद का शरीर दे रहा है।

चाहता हूं जल्द विदाई हो। आखिर बुढ़ापे में विवशता के सिवा मुझे मिला क्या? अंगुलियों की उभरी हुई नसों को देखता हूं तो पीड़ा होती है। खुद से कहता हूं कि अच्छा होता मैं जन्म ही न लेता। न होती यह दशा, न दर्द का साथ होता, न अपनों की झिड़क, न परायों सा व्यवहार।

क्या जीवन का सिला मिला। कुछ भी तो नहीं। मैं वाकई डर कर सिमट जाता हूं। कई दिनों से पता नहीं क्यों भयभीत सा रहने लगा हूं। अंधेरा पहले भी डराता था, अब खुद से डर जाता हूं।

‘जल्द आओ मुझे मुक्ति दो इस शरीर से’ - यही दुआ मनाता हूं। दुआ करता हूं भगवान से कि मुझे माफी दो किये पापों की जिनका प्रायश्चित मैं न कर सका। शायद बुढ़ापा इसलिए ही है ताकि इंसान को प्रायश्चित का मौका मिल सके।

जितना स्वाद जवानी ने लिया उतना कष्ट बुढ़ापे में भोगना पड़ता है। ऐसा मैंने कई जगह सुना है। अच्छे कर्म हम कितने ही क्यों न करते हों, गलतियों की गुंजाइश रह ही जाती है।

-harminder singh

Friday, December 18, 2009

खराब समय





मां अभी बाजार से आयी नहीं थीं। बता गयी थीं कि चाबी पड़ोस में रहने वाली सावित्री को दे कर जाऊंगी। खाना बनाकर गयी थीं, सिर्फ मुझे दूध गरम करना था। पुष्पा आंटी भी उनके साथ बाजार गयी होंगी। उन्हें घंटों घूमने की आदत है। वे सब्जी घरीदे हुए मोल-भाव इतना करती हैं कि सब्जी वाला पक जाता है। भीड़ होती है तो एक-आध सब्जी यूं ही चुपके से उठकर थैले में रख लेती हैं। मैंने अपनी मां से कई बार कहा कि वे पुष्पा के साथ न जाया करें। वह किसी दिन उन्हें भी बाजार के भाव पिटवा देगी। मगर मां को मेरी बात सुननी ही नहीं है। बस मैं उनका कहना मानता रहूं।

  मैंने स्कूल की ड्रेस निकाल कर रिमोट अपने हाथ में ले लिया। नेत्रा बैठकर प्रोजेक्ट तैयार करने लगी। मैंने उसे फिर टोका, बोला,‘‘अभी स्कूल से आयी है। अरे, छुट्टियां लंबी हैं, टी.वी. देखते हैं साथ बैठकर।’’

  ‘‘मैं दूसरे कमरे में जा रही हूं। आप टी.वी. देखो। फिर स्कूल खुलने से दो दिन पहले होमवर्क करते हुए इधर-उधर दौंड़ना।’’ नेत्रा ने कहा।

  ‘‘मैं आज मौज करुंगा। कल से टाइम-टेबल बनाकर पढ़ाई शुरु होगी।’’ मैंने कहा।

  ‘‘ऐसा शायद कभी हो।’’

  ‘‘क्यों?’’

  ‘‘शायद आप कहते ही रह जाओ और छुटि~टयां बीत जाएं।’’

  ‘‘नहीं, ये सच नहीं है।’’

  ‘‘तो, फिर सच क्या है भैया?’’

  ‘‘सच यह है कि मैं पहले वाला स्टूडेंट नहीं रहा। बदल गया हूं।’’

  ‘‘हां, तुम्हारी लाल नाक से तो यही लगता है।’’

  ‘‘ज्यादा मत बोलो नेत्रा।’’

  ‘‘ठीक ही कह रही हूं प्यारे भैया।’’

  ‘‘नेत्रा।’’ मैं चिल्लाया।

  ‘‘भैया।’’ नेत्रा आंखें घुमाते हुए बोली।

   ‘‘तुम सिर पर चढ़ती जा रही हो। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम्हारा बड़ा भाई हूं। भाई का सम्मान करना सीखो।’’

   ‘‘ओह, मैं भूल गयी थी। पर तुम्हारी नाक.......।’’ नेत्रा मुझे चिढ़ाती हुई दूसरे कमरे में दौड़ गयी। मैं सोफे पर खिसयाया सा बैठा रहा।

   ‘‘मां ने इसे बिगाड़ कर रखा है। पिताजी कुछ कहते नहीं।’’ मैंने खुद से कहा।

  ‘‘भैया दूध गरम कर दो।’’ नेत्रा की आवाज आयी।

  तभी मैं रसोई की ओर दौड़ा। मां आ गयी और दूध गरम नहीं हुआ तो खैर नहीं। टी.वी. को आन छोड़ आया। उधर दूध गरम हो रहा था, इधर मैं रिमोट लेकर टी.वी. का आनंद ले रहा था।

  नेत्रा फिर चिल्लायी,‘‘भैया टी.वी. मत देखते रह जाना। कहीं दूध उबल न जाए।’’

  मैंने उसकी कही अनसुनी कर दी। कुछ ही देर में मां आ गयी। मैं तब भी टी.वी. पर नजरें गढ़ाये था। मानो खो गया था मैं कहीं।

  ‘‘नालायक, एक भी काम ढंग से नहीं करता।’’ मां  मेरे कान पर चिल्लायी।

  मां ने पीछे से मेरा कान पकड़ कर कहा,‘‘तू कब सुधरेगा। दूध आखिर उबाल की दिया। यहां बैठकर टी.वी. देख रहे हैं साहब।’’

  टी.वी. शो का आनंद मां की डांट ने पल भर में स्वाह कर दिया। मुझे बिखरा दूध पोछे से साफ करना पड़ा। लगातार तीन दिन से मेरे दिन खराब थे।

  उसी वक्त मेरी दादी आ गयीं। नेत्रा ने उनसे कहा,‘‘देखो, भैया रोज कोई न कोई ऊटपटांग हरकत कर रहे हैं। आज दूध उबाल बैठे।’’

  ‘‘बच्चा है।’’ दादी ने मुस्कराकर कहा।

  मां बोली,‘‘आप नहीं जानती अम्मा, इसकी नासमझी भरी हरकतों में तंग आ चुकी।’’ मां ने मेरी नाक की तरफ देखा और बोलीं,‘‘यह देखो, फिर किसी टीचर से मार खा कर आया है।’’

  ‘‘कोई बात नहीं जानकी। बच्चे ज्यादा दिन ऐसे नहीं करते।’’ दादी ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

  ‘‘मैं इसे गांव ले जाऊंगी। तू एक महीने आराम से रहना।’’ दादी बोली। ‘‘क्यों बेटा चलेगा न।’’

  मैं दादी से लिपट गया। दादी मुझे बहुत लगाव करती थीं। नेत्रा से उन्होंने ज्यादा बात नहीं की। इसका कारण यह भी रहा कि मां ने नेत्रा को कभी खुद से अलग नहीं होने दिया और मुझे दादी के साथ गांव जाने से मना नहीं किया।

  शाम को विनय हमारे घर आया। उसने मुझे अपना नया बल्ला दिखाया। मेरी आंखें बड़ी हो गयीं। मैंने विनय से कहा,‘‘कितने का है?’’

  विनय बोला,‘‘पैसों की फिक्र मत कर। मामा आये थे। मैंने जिद की, दिलवा दिया। वैसे उतना सस्ता भी नहीं है। चल खेलने चलते हैं।’’

   मैंने गेंद को बल्ले से उछालना शुरु किया।

  ‘‘बल्ला काफी अच्छा है। वजन काफी कम है।’’ मैं बोला।

  ‘‘आंटी से मुझे भी पिटवायेगा क्या?’’ विनय ने कहा।

  ‘‘रुक, कुछ गेदें और उछाल कर देखूं।’’ मैंने कहा।

  अचानक गेंद बल्ले से छिटक कर मेज पर रखे कांच के फूलदान से जा टकराई।

  मेरे मुंह से निकल पड़ा,‘‘मर गए।’’

  फूलदान फर्श पर गिरकर टुकड़े-टुकड़े हो गया। विनय मेरी मां के गुस्से को जानता था। वह तुरंत बल्ला मुझसे छीनकर वहां से रफूचक्कर हो गया। मैंने तेजी से टुकड़ों को इकट्ठा किया और एक पोलीथिन में भरकर खिड़की से बाहर फेंक दिया। मैं निश्चिंत था कि किसी को पता नहीं चला कि फूलदान का क्या हुआ? तभी मां दौड़ी आयी और मुझसे पूछा,‘‘कांच टूटने की आवाज कहां से आयी थी? और विनय दौड़कर घर से बाहर क्यों भागा?’’
 
  मैं चुप्पी साध गया। तभी मां को कांच के टुकड़े मेज पर गिरे दिख गये। जल्दी में मैं मेज साफ करनी भूल गया था। मां का पारा गर्म हो गया।

  ‘‘फूलदान कहां है?’’ मां चिल्लाई।

  ‘‘टूट गया।’’ मैं मरी आवाज में बोला।

  ‘‘ओह! क्या किया तूने?’’

  ‘‘धोखे से.........हो गया।’’

  ‘‘धोखा, तुझे उसकी कीमत पता थी? कितना महंगा था वह। कहता है, धोखा हो गया।’’ मां का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। उनके हाथ में झाड़ू थी। उन्होंने मेरे दो-तीन झाड़ू जड़ दीं। मैं रोने लगा।

   शोर सुनकर दादी आ गयीं। मेरे पास आकर खड़ी हो गयीं और बोली,‘‘जानकी कांच ही तो टूटा है। बेटे से कीमती था क्या?’’

  मां ने कहा,‘‘अम्मा, इसने जानकर तोड़ा है। इसे आज मैं कड़ी सजा देकर रहंूगी।’’

  ‘‘बच्चों से चीजें नहीं टूटेंगी तो क्या हम तोड़ेंगे। अरे, बच्चे छोटी-छोटी गलतियां कर देते हैं। उन्हें नजरअंदाज करना सीखो। मारपीट से क्या फायदा? समझाकर देखो तो सही।’’ दादी बोली।

  ‘‘समझा ही रही हूं। पूरी जिंदगी कहीं समझाती न रह जाऊं इसे। समझाने से सुधर गया होता, तो आज कांच न टूटता अम्मा।’’ मां बोली। ‘‘जब देखो, तब नुक्सान ही करता रहता है। क्या भगवान आसमान से आकर इसे समझाए?’’

  मुझे दादी पुचकार रही थी। मैं अभी तक आंसू बहा रहा था। मुझे दुख इस बात का हो रहा था कि मैं ही क्यों नुक्सान की जड़ बन रहा हूं। शायद मेरी किस्मत मेरा साथ नहीं दे रही। लगता है मैं बद-किस्मती हो गया था, लेकिन कुछ समय के लिए। दादी मुझे गांव ले गयीं। किताबों को मैं साथ नहीं ले जाना चाह रहा था, मगर मां के कहने को टालना नामुमकिन था। मैं सोच रहा था कि मां मुझे अपने से दूर रखकर सुकून से रह सकेगी और पिताजी भी।

  गांव में तीन दिन बीत गये, पता ही नहीं चला। मां का दोपहर फोन आया, बोलीं,‘‘तेरी याद आ रही है।’’ मां की आवाज भर्रायी थी। मैं मां को कठोर हृदय समझता था, लेकिन मां के हृदय की वेदना समझने में युग बीत जाएं, वह भी कम हैं। जितने दिन मैं गांव में रहा, मां मुझे रोज फोन करतीं। शायद मां का प्यार ऐसा ही होता है।

-harminder singh



अगले अंक में पढ़िये:
दुलारी मौंसी

Thursday, December 17, 2009

मुसीबतें हौंसला देती हैं

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मैंने काकी से पूछा,‘‘विपत्ति का भी कोई मतलब होता है। मुसीबतें क्या हमें हौंसला देती हैं?’’

इसपर काकी बोली,‘‘तुम्हारे प्रश्न सुनने में मामूली लगते जरुर हैं, लेकिन उनमें गहराई छिपी होती है। परेशानियां जीवन से जुड़ी हैं। अब हर काम आसान होता जो जीना बिल्कुल नीरस हो जाता। अगर स्वाद एक-सा हो तब आम और अमरुद में फर्क ही क्या रह जायेगा? इसी तरह जीवन कई रंगों से भरा है। इसके स्वाद निराले हैं। जब हम खुशी से रह सकते हैं तो दुख होने पर घबराहट कैसी? मुसीबतें रास्तों को कठिन जरुर बनाती हैं। लेकिन इनसे काफी कुछ सीख मिलती है।’’

‘‘विपत्ति के समय इंसान कोई अपने-पराये का भेद पता लगता है। उसे इस कारण कई मसलों को खुद सुलझाना पड़ता है। तब वह सोचता है कि उसे अकेले मैदान में मुकाबला करना है। इसलिए वह हौंसले से लड़ता है। हौंसला हममें होता है, और मुश्किल के वक्त हमें खुद की पहचान अच्छी तरह हो जाती है। हमारी क्षमता का ज्ञान जब हम जानने लगेंगे तो जीना उतना कठिन नहीं होगा।’’

‘‘परेशानियों को अपने नजदीक पाकर हम खुद में जस्बा पैदा करते हैं ताकि उनसे पार पा सकें। इरादे मजबूत हैं तो परेशानियां उतनी कमजोर नहीं बनातीं। मैं यह जरुर कहना चाहूंगी कि हम यदि हर बात का मायना समझें तो विपत्ति का मतलब भी यकीनन समझ आ जायेगा।’’

काकी पुराने दिनों को याद करती है। वह कहती है,‘‘हमारा परिवार बुरे दौर से गुजरा। मैं उन दिनों पढ़ रही थी। पिताजी बीमार हो गये। उनकी नौकरी चली गयी। मेरी फीस को पैसा नहीं था। एक और पिताजी की महंगी दवाईयां, उसपर से घर का खर्च। मां ने रिश्तेदारों से मदद मांगी। एक-दो बार किसी ने मुंह नहीं सिकोड़ा। बाद में हम अकेले पड़ गए। तब मां ने छोटी नौकरी की। उसका हौंसला बढ़ता गया और उसने घर की चौखट में न रहकर बाहर कदम बढ़ाये। मां को रिश्तेदारों ने ताने दिये। पर वह घबराई नहीं। न होने से अच्छा, कुछ होना होता है। मेरी मां अगर उस समय पीछे हट जाती तो कहानी कुछ और होती। उसने परेशानी में जाना कि वह खुद क्या कर सकती है? उसका हौंसला समय के साथ मजबूत हुआ। लेकिन जो व्यक्ति बुरे वक्त को नियति मानकर चलते हैं, वे पीछे छूट जाते हैं। उनकी स्थिति खराब से भी बेकार हो जाती है। मैंने पाया कि हमारे जीवन में विपत्ति का बड़ा हाथ होता है क्योंकि वह हमें जीने का मतलब सिखाती है, अच्छे-भले का ज्ञान कराती है और हौंसले से लड़ना सिखाती है। तभी इंसान को जीवन की कीमत का पता लगता है।’’

काकी के सफेद बालों में फीकापन था। यह बुढ़ापे की देन है और बुढ़ापा अपने साथ बहुत कुछ परिवर्तित करता है। काकी को खैर कोई मलाल नहीं। वह जीवन की सच्चाई का सामना मुस्करा कर कर रही है।

वह आगे कहती है,‘‘मैंने संकट को कभी संकट नहीं माना। मुझे पता है यह लंबा नहीं होता। इसकी उम्र कम होती है। लेकिन सुख-दुख का अनुभव भी इसी समय हो जाता है। अगली बार के लिए मुकाबला करने की क्षमता को हम अपने अनुभव के आधार पर विकसित करते हैं। जो गलतियां पूर्व में हो चुकी होती हैं, उन्हें न दोहरा कर हौंसले के साथ आगे बढ़ते हैं। हौंसला जीवन का आधार भी है। बिना इसके जीवन की जंग नहीं जीती जा सकती। तो जीवन यह कहता है कि वह असंख्य उतार-चढ़ाव से भरा है। उसमें गोते खाने पड़ते हैं और नाव किनारा मांगती है चाहें वह उसे पहचानती न हो। संघर्ष हर पल मौजूद है। इसके बिना जीवन संभव भी तो नहीं।’’

-harminder singh

Wednesday, December 9, 2009

पुलिस की बेरहमी




सादाब की कहानी अभी पूरी कहां हुई थी। यह उसके जीवन का सच था जो शब्दों के द्वारा बयान किया जा रहा था। उसके एक-एक शब्द को मैंने सहेज कर रखा है ताकि उन्हें अपनी यादों के साथ मिला सकूं। सादाब ने आगे कहा,‘‘उस समय मैंने सोचा था कि मैं बड़ा आदमी बनूंगा। अब्बा रिक्शा चलाते थे। जितनी मेहनत, जितनी सवारियां, उतने पैसे नसीब होते। गरीबों का जीवन दुश्वारियों से भरा होता है। गरीब होना संसार का सबसे बड़ा दुख है। एक-एक पैसे की कीमत कितनी होती है, यह भला गरीब से ज्यादा कौन जान सकता है। हम भूखे कई बार सोये हैं। अम्मी ने हम बच्चों को गोद में बिठाया, कहानी सुनाई, थपका और सो गये। आदत हो गयी थी भूख से लड़ने की भी। भूख संघर्ष करना सिखाती है, जीवन से लड़ना सिखाती है, हताशा और निराशा को अपनाना सिखाती है। हम भी धीरे-धीरे सीख रहे थे।’’

आज रात बहुत हो गई। मैं बहुत कुछ लिख चुका हूं। मन करता है सादाब के बारे में उसका कहा और लिखूं। उसने कहा,‘‘पुलिस वालों ने मेरे अब्बा को एक बार बहुत मारा था। अम्मी उस रात अब्बा के पास बैठी रही थी। अब्बा से एक पुलिस वाले ने माचिस मांगी। उनके पास नहीं थी। वे बीड़ी-सिगरेट-शराब से दूर रहते थे। पांच वक्त की नमाज छोड़ते नहीं थे। लोग उन्हें सच्चा मुसलमान कहते। अब्बा से उस पुलिसवाले ने कहा कि सामने पान की दुकान से माचिस लेकर आ। सीधे-स्वभाव वे एक माचिस ले लाए। फिर उसने कहा कि सिगरेट कौन लाएगा? उसने एक भद्दी गाली दी। अब्बा बोले कि तुमने माचिस को कहा था। इसपर उस पुलिसवाले ने उनके एक चांटा जड़ दिया। अब्बा कमजोर थे, पीछे के बल गिर पड़े। कुछ देर बाद रिक्शा का हैंडल पकड़ उठ खड़े हुए। नीचे मुंह कर रिक्शा ले जाने लगे। पुलिसवाले ने उनकी पीठ पर हाथ मारकर कहा कि अब सिगरेट लेकर आ। अब्बा ने इंकार कर दिया। वे ऐसी नशे की चीजों को हाथ नहीं लगाते थे। न ही उन लोगों के पास बैठते थे जो नशा करते। उस पुलिसवाले ने अब्बा का रिक्शा एक किनारे खड़ा करवा दिया। अब्बा के मुंह पर जोर का थप्पड़ फिर जड़ दिया। अबकी बार अब्बा खड़े रहे। उनका चेहरा लाल हो गया था। उन्हें भी बहुत गुस्सा आ रहा था। उन्होंने अपनी दोनों मुट्ठियां भींच ली थीं। अब जैसे ही पुलिसवाले ने उनपर हाथ उठाया उन्होंने उसे रोक लिया। पुलिसवाला सन्न रह गया। तभी पुलिस की जीप वहां आकर रुक गयी। अब्बा वैसे ही खड़े रहे। पुलिसवाले ने जीप के अंदर झांका और थोड़ी देर बात की। अब्बा उन्हें देखते रहे। कुछ देर में अब्बा को पुलिसवाले जबरदस्ती जीप में डालकर ले गये। आखिर वर्दी के सामने एक गरीब आदमी कर ही क्या सकता है? थाने में ले जाकर उन्हें एक बड़ी टेबल पर उलटा लिटा दिया गया। उनके हाथ-पैर कस कर बांध दिये गये। अब्बा बार-बार उनसे रहम की भीख मांगते रहे। मगर जालिम हंसते रहे, ठहाके लगाते रहे। वे चार पुलिसवाले थे। उनके चेहरे को अब्बा कभी नहीं भूल सकते थे। यह गरीब की किस्मत थी कि वह मजबूर था। इंसान की मजबूरी का कुछ इंसान ही फायदा उठा रहे थे। कैसी बीत रही होगी अब्बा पर? मुझे उस वाकये को अपनी अम्मी से सुनकर बड़ा गुस्सा आता था। अम्मी कई बार अब्बा के बारे में हमें बताती थी।’’

जारी है....

-harminder singh

Monday, December 7, 2009

राज पिछले जन्म का




मैं पिछले जन्म में क्या था? यह मैं नहीं जानता। शायद इसके लिए मुझे एनडीटवी इमेजिन के शो में जाना होगा जहां रवि किशन हमारे पिछले जन्म का राज खोल रहे हैं। मुझे इन बातों पर हंसी भी आती है और कई बार गंभीर भी हो जाता हूं।

  सच मैं क्या मेरा कोई इससे पहला जन्म भी था? मैं क्या था? पशु, पक्षी या इंसान। मैं जब लोगों से पिछले जन्म के बारे में पूछता हूं, तो अधिकतर इस पर यकीन करते हैं। वे सहज भाव से कहते हैं,‘हां, पिछला जन्म होता है।’ वैसे बूढ़ी काकी इस बात से सहमत है, लेकिन मुझे कन्फ्यूजन है और आगे भी रहेगा। अरे, भई मैं कई किताबें इस बारे में पढ़ चुका हूं। मैं किसी भी तरह के ‘भूत’ को नहीं मानता। हां, मजाक में यह जरुर कहता हूं कि मेरे पांव उल्टे बिल्कुल नहीं।

  जब कोई बच्चा अधिक चंचल होता है तो हमारे परिवार में अक्सर कहा जाता है,‘जरुर पिछले जन्म में हंगामेबाज रहा होगा।’ माता-पिता जब अपने बच्चे से अधिक परेशान हो जाते हैं तो खीज कर कहते हैं,‘जरुर पिछले जन्म के बदले लेने आया है।’

  मेरा भाई बचपन में मेरे पास जब सोता था, तो वह सोते-सोते लात मारता था। तब मेरी मां कहती थी,‘’शायद पहले यह घोड़ा या गधा रहा होगा।’ हमारी हरकतों के कारण भी हमें पिछले जन्म से जोड़ा जाता है। हमारा शरीर खत्म हो जाता है, फिर आत्मा मंडराती रहती है, बिना दिमाग के। उसे कोई शरीर मिल गया उसमें घुस गयी और हम फिर से वापस आ गये, नये रुप में। ये बातें मुझे बिल्कुल वकवास लगती हैं।

  मैंने पिछले जन्म की कहानी बताने वाली कई फिल्में देखी हैं। ‘ओम शांति ओम’ को कोई कैसी भूल सकता है। एक बेबस ‘फिल्मी’ मां कहती है,‘बेटा तू आ गया।’ उसके बेटे का चेहरा पहले जैसे ही था। उसका बेटा ‘ओमी’ से ‘ओम कपूर’ बन चुका था। वह ‘शांति’ की मौत का बदला लेता है, हमशक्ल ‘शांति’ के साथ मिलकर। ‘कर्ज’ पुरानी हो या नयी, उसमें भी कहानी पिछले जन्म की थी। फिर तो मुझे भी काफी घूमना चाहिए क्या पता मुझे पिछला जन्म याद आ जाए।

  शायद खंडहरों में घूमा जाए या फिर गांवों में। क्योंकि हमारी फिल्मों में तो पिछले जन्म की यादों को ताजा करने का सबसे बेहतर तरीका ये ही हैं।

  हम कहते हैं कि इंसान के सात जन्म ही होते हैं। इसलिए विवाह में फेरे भी सात होते हैं ताकि बंधन सात जन्मों तक बना रहे। बूढ़ी काकी ने कहा था,‘शायद पिछले जन्म के अधूरे कामों को पूरा करने के लिए हमें फिर से जन्म लेना पड़ा। इस बार जरुर आयें हैं हम इस वादे के साथ कि कोई बात अधूरी न रहे।’


जंग जारी है

मच्छरों से बचने की हमारी कोशिशें नाकाम होती जा रही हैं। मच्छर पहले से अधिक शक्तिशाली होते जा रहे हैं। उनके डंक से तिलमिलाहट पहले से ज्यादा हो रही है।

  काफी साल गुजर गये, जब हम ‘कछुआ छाप’ जलाते थे और मच्छर भगाते थे। साल बीते, मच्छरों ने उसका मुकाबला किया। जीत मच्छरों की हुई, कछुआ चल बसा। कछुए की मैयत में शायद कुछ नरम दिल मच्छर शामिल हुए होंगे।

  मार्केट में इंसान नये हथियार लाया जो इस पैने डंक वाले ‘पिद्दी जीव को खत्म कर सके। इंसान की लड़ाई मच्छर से जारी है। आगे भी जारी रहेगी क्योंकि हम इन्हें खत्म नहीं कर पायेंगे। हांलाकि कुछ इंसान भी मच्छरों की तरह हैं जो मौके-मौके पर हमें डंक मारते रहते हैं। इसका मतलब है कि जब इंसान खत्म होगे, मच्छर तभी विदा लेंगे। तब तक यह जंग जारी रहेगी।

-harminder singh

Friday, December 4, 2009

क्या पता यह आखिरी किनारा हो?

रेत को बहते हुए देखा है मैंने इन नंगी आंखों से। देखा है मैंने पानी को जबरदस्ती करते हुए। तब रेत संघर्ष करती है, पानी उसपर चोट। परिचय होता है यर्थाथ का। कमल की पंखुड़ियां फिसल कर किनारे आ जाती हैं। रेत वहां भी चिपकी है। पानी सूख गया, रेत अभी भी वहीं है।

शांत लगती है, मगर उथलपुथल है कितनी। स्वीकार करना होगा कि उलझन पुरवाई में कभी नहीं खोती। समझना होगा कि एक दिन सब कुछ बह जाएगा, तब न पुरवाई होगी, न पानी लड़ेगा।

किनारों की असमंजस स्थिति मुझे नासमझ बना रही है। पर मैं साफ नहीं धुंधला देखता हूं। क्या पता यह आखिरी किनारा हो?

-harminder singh

Thursday, December 3, 2009

गर्मी की छुट्टियां

कक्षा में शोर मच रहा था। मैं विनय से बातों में मग्न था। तभी शोर थम गया, मैंने ध्यान दिया। विनय अपनी सीट पर जाकर बैठ गया। मैं सिर झुकाये बोले जा रहा था। अचानक मेरे गाल पर किसी ने तमाचा जड़ा। सामने प्रिंसिपल खड़ी थीं। मैंने गाल पर हाथ लगाया और सकपकाया खड़ा रहा।

  ‘मेरे आफिस आओ।’ प्रिंसिपल ने कहा।

  मैं पीछे-पीछे चल दिया। अबतक गाल काफी लाल हो चुका था। प्रिंसिपल ने मुझे खरी-खरी सुनाई। कर क्या सकता था,  चुपचाप सुनता रहा। घर में माता-पिता की डांट, स्कूल में भी डांट।

  विनय ने पूछा,‘क्या कहा प्रिंसिपल ने?’

  ‘मम्मी-पापा को बुलाकर लाना होगा।’  मैं बोला।

  ‘फिर तो समस्या हो गई।’

  ‘घर में पता लगेगा, खैर नहीं आज मेरी।’

  ‘मैं तेरे घर जाकर अंकल-आंटी को समझाने की कोशिश करुं।’

  ‘नहीं रहने दे। मैं खुद संभाल लूंगा।’

  रास्ते भर मैं यही सोचता रहा कि कल मां को बहुत गुस्सा आ रहा था। पिताजी भी कम नाराज नहीं थे। लगता है आज खाने के भी लाले पड़े जाएं। ऊपर से पिताजी की पिटाई का डर बराबर सता रहा था। चिंता ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा था। बस में नेत्रा मुझसे पूछती रही,‘तुम घबराये हुए क्यों लग रहे हो भईया?’ उसने मेरा गाल देखा जो हल्का सूजा था। मैंने बहाना कर दिया कि खेलते हुए गिर गया था। मगर घबराने की वजह नहीं बताई। मैं चाहता नहीं था कि नेत्रा को मालूम पड़े क्योंकि वह घर तक हजार सवाल पूछ लेगी। दो दिन बाद गर्मी की छुटिट्यां होने जा रही थीं। जब मैं छुटिट्यों का विचार अपने दिमाग में लाता तो प्रसन्न हो जाता। लेकिन प्रिंसिपल की बात बार-बार मुझे चिंतित करती जा रही थी। दो चीजें एक साथ हो रही थीं- एक मैं सोच कर मुस्करा रहा था और दूसरा, मैं सोचकर इतना ही दुखी हो रहा था।



घर से स्कूल-3
बचपन की मजेदार कहानियां


 
  शाम को नेत्रा सहेलियों संग खेलने चली गयी। पिताजी अभी आये नहीं थे। मां सब्जी काट रही थीं।

  मैंने कहा,‘स्कूल में आपको और पिताजी को बुलाया है।’

  मैंने कह तो दिया, लेकिन मन में अजीब सी उथुलपुथल हो रही थी कि कहीं मां को क्रोध न आ जाए। मां ने मेरी तरफ देखा और बोलीं,‘क्यों, क्या हुआ?’

  मैंने पूरी कहानी एक सांस में बता दी।

  ‘तू नहीं सुधरेगा।’ मां गुस्से में बोलीं।

  ‘इसमें मेरी कोई गलती नहीं है। वो अचानक प्रिंसिपल आ गयीं। मैं क्या करता?’ मैंने सफाई देनी चाही।

  मां पर कोई असर नहीं होता दिख रहा था। वह तमतमाई हुई थी।

  ‘मुझे लगता है तुझे स्कूल में पढ़ना ही बंद कर देना चाहिए। लगातार दो दिन से स्कूल में सजा मिल रही है।’ मां ने कहा।

  ‘आने दे तेरे पापा को। आज तेरा फैसला करेंगे।’ मां ने कहा।

  ‘पर मैं तो......।’ मैं आगे बोला।

  मां ने सब्जी काट ली थी। तभी नेत्रा भी आ गयी। उसने मुझे मां की डांट खाते सुन लिया था।

  वह बोली,‘भईया आज बस में परेशान था। मैंने पूछना चाहा तो इतना ही बताया कि खेलते हुए गिर गया था। गाल पर मामूली सूजन थी।’

  ‘गाल पर सूजन।’ मां को हैरानी हुई। ‘लगता है बुरी तरह पिटा है नालायक।’ मां का पारा बढ़ता जा रहा था।

  तभी नेत्रा बोली,‘मां, पानी लाऊं।’

  ‘रहने दे। इसने मेरा जीना मुहाल कर दिया है।’ लंबी सांस लेते हुए मां बोली। ‘तू मन लगाकर पढ़ रही है और यह निकम्मा....बस क्या कहूं.....कुछ नहीं।’

  ‘अब बैठा हुआ यहां क्या कर रहा है? जाकर पढ़ ले।’ मां ने कहा।

  मैंने प्रण किया कि पढ़ाई में मेहनत करुंगा। नेत्रा की तरह स्कूल से आकर पहले अपना होमवर्क समाप्त करुंगा। सभी विषयों का टाइम-टेबल बनाकर पढ़ा करुंगा। इन छुटिट्यों में आधा कोर्स निबटा कर ही चैन आयेगा मुझे। विचारों की पुड़िया खुल चुकी थी। पर मैंने ऐसा पहले भी अनेकों बार सोचा है। मेरी योजनायें अमल में आने से पूर्व ही धराशायी हो गयीं। यह मैं अच्छी तरह जानता था। पर इस बार मैंने निश्चय किया कि मैं पीछे नहीं हटने वाला।

  पिताजी थके हुए घर आये। उनके चेहरे पर गुस्सा था। मेरी हालत पतली हो गई। मुझे काटो तो खून नहीं। मां ने पिताजी को कदम रखते ही कहानी बतानी शुरु कर दी। फिर क्या था, पिताजी ने मुझे कमरे में बुलाया। मैं रात भर करवट बदलता रहा। शरीर दुख रहा था। टांगों में उतना दर्द नहीं था क्योंकि दो बार ही वहां छड़ी घूमी थी। नेत्रा ने मेरी पीठ पर ‘बाम’ मसला था। वह बातें कैसी भी करती हो, पर है मेरी सबसे प्यारी बहन। हम प्रेम के बल पर ही एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। रिश्ते वाकई मायने रखते हैं और खून के रिश्ते ऐसे ही होते हैं।

  छुटिट्यां होने में अब एक दिन शेष था। पिताजी ने प्रिंसिपल से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि आगे से यदि मेरी कोई हरकत आती है तो मुझे बिना झिझक के स्कूल से निकाल दें। मुझे पिताजी से यह उम्मीद नहीं थी। शायद उनके कहने की वजह यह थी कि उन्हें भी मुझसे कोई उम्मीद नहीं थी। दोनों तरफ उम्मीदों का खेल था।

  मैडम मौली ने कहा,‘छुट्टी में मौज-मस्ती होगी, मगर पढ़ाई को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। रोज गणित के सवाल करने हैं। इससे अभ्यास बना रहेगा।’

  आखिरी दिन मैं काफी प्रसन्न नजर आ रहा था। मैंने कुछ दिनों से चिंतित मन को ठीक खुद ही कर लिया था।

  मैडम मौली ने एक बार कहा था,‘खराब बातों को याद नहीं रखना चाहिए। उन्हें भुलाना ही बेहतर है। अच्छी बातें जिंदगी भर भी याद रह जाएं तो कोई बुराई नहीं।’ मैंने उन पक्तियों को दिमाग में बैठा रखा था।

  विनय स्कूल के गेट के बाहर खड़ा मेरा इंतजार कर रहा था। वह बोला,‘तुमने बड़ी देर लगा दी। कहां रह गये थे?’

  वह चौंककर बोला,‘अरे! यह क्या? तुम्हारे चेहरे को क्या हुआ? फिर किसी टीचर ने तुम पर हाथ उठाया क्या?’

  ‘कुछ मत पूछ।’ मैं दुखी मन से बोला।

  ‘तेरी नाक से खून बह रहा है। ला साफ कर दूं।’ विनय ने रुमाल निकालते हुए कहा।

  ‘मैं पानी पी रहा था कि पीछे से किसी ने जोर का धक्का दिया। मेरा मुंह पानी की टोटी पर जाकर लगा।’ मैंने बताया। ‘लेकिन घर जाकर मां-पिताजी का फिर लेक्चर सुनने को मिलेगा।’ मेरी चिंता बढ़ गयी।

  ‘लगता है इस बार पूरी छुटि~टयां बेकार जाने वाली हैं।’ मैंने कहा।

  ‘मैं शिमला जा रहा हूं।’ विनय बोला।

  तभी पीछे से विमल ने मेरे कंधे पर हाथ मारकर कहा,‘छुटिट्यों में किधर घूमने का इरादा है?’

  ‘’शायद इस बार नहीं।’ मैंने कहा।

  विमल ने मेरी नाक देखकर कहा,‘यह तुम्हारी नाक लाल हो गयी है। किसी टीचर की बुरी नजर लग गयी क्या?’

  मैं चुप रहा। कंधे पर बस्ता टांग बस में चढ़ गया। मैं नाक पर हाथ लगाकर खिड़की की तरफ बैठा था। तभी नेत्रा ने कहा,‘तुम्हें काफी होमवर्क मिला होगा। मुझे तीन प्रोजेक्ट दिये हैं। साइंस में नदियों के प्रदूषण के बारे में प्रोजेक्ट तैयार करना है। तुम मेरी इस बार मदद कर देना। हरबेरियम फाइल के लिए पत्ते जमा खुद कर लूंगी।’

  नेत्रा नन्हीं सी जान और इतने काम। हद है स्कूल वालों से भी है। कम से कम छुटिट्यां तो चैन से मनाने दें।

  ‘नेत्रा, तुम्हें लगता नहीं कि तीसरी क्लास के हिसाब से इतने प्रोजेक्ट कुछ ज्यादा हैं।’ मैंने कहा। तबतक मैंने खिड़की की तरफ मुंह किया हुआ था।

  ‘लेकिन यह मुझे लंबी छुटिट्यों के लिए कम लगता है। मैं फिर बोर हो जाऊंगी’ नेत्रा गंभीर होकर बोली।

  उसने आगे कहा,‘तुम्हारे क्या प्रोजेक्ट हैं, बताओगे।’

  आखिर कब तक मुंह छिपाने की कोशिश करता। गर्दन में भी दर्द शुरु हो गया था। नेत्रा की ओर देखकर कहा,‘घर जाकर बात करना।’

  ‘पर भईया तुम्हारी नाक कितनी लाल हो रही है।’ वह बोली हैरानी से।
  ‘कुछ नहीं, बस ऐसे ही मामूली चोट है।’ मैंने कहा।
  वह नीचे मुंह कर मुस्करा रही थी।

-harminder singh

-अगले अंक में पढ़िये- खराब समय

Monday, November 30, 2009

विदाई बड़ी दुखदायी








पिता की आंखें भर आयीं,
रीत है कैसी आयी,
डोली उठ रही बेटी की,
मां भी आंसू में नहायी,
.........................................
विदाई बड़ी दुखदायी......

जी भर रोने दो,
बेटी है मेरी,
तू रहे सदा खुश,
किस्मत है तेरी,
पल-पल निहारे भाई,
मुन्नी हुई पराई,
.........................................
विदाई बड़ी दुखदायी......

यादों में सिमटेगी,
मिलन घड़ी है आयी,
पिया घर जा रही,
जोड़ी राम ने बनायी,
याद बाबुल अंगना की,
लाल चुनर उढाई,
.........................................
विदाई बड़ी दुखदायी......


-harminder singh

Friday, November 27, 2009

फिर लुट रहा छोटा किसान







गन्ना आंदोलन चला रहे किसान संगठन और उनका सहयोगी रालोद किसानों को लाभ के बजाय क्षति ही पहुंचा रहे हैं। इससे लघु और सीमांत किसान बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। छोटी जोत वाले किसान 70 फीसदी से भी ज्यादा हैं। उन्हें नवंबर में अपना कुछ खेत खाली करना मजबूरी होता है। कुछ तो रबी की बुवाई और कुछ सरदी के लिए कपड़े और दूसरी जरुरत की चीजों को उसे पैसा चाहिए। साथ ही पशुओं को चारे की समस्या भी छोटे किसानों के सामने होती है। इन सारी समस्याओं का एक ही समाधान उसके पास होता है। वह जल्दी चले क्रेशर या मिलों पर अपना गन्ना डाले। मिलों को आंदोलनरत बड़े किसान चलने नहीं दे रहे। जिससे क्रेशर और कोल्हुओं पर गन्ना आशा से अधिक पहुंच रहा है। इससे क्रेशर वालों ने जहां सीजन के शुरु में गन्ना दो सौ रुपये खरीदना शुरु किया था उन्होंने घटाते-घटाते डेढ़ सौ रुपये पर ला दिया। फिर भी गन्ना उन्हें मिल रहा है। उधर आंदोलनकारी किसान नेताओं को देखिये वे 195 रुपये पर भी मिलों को गन्ना नहीं देने दे रहे। छोटा किसान लुट रहा है। वह हर बार इसी तरह लुटता है। किसान नेता यदि समय से मिलों को चल जाने देते तो पूरा गन्ना न मिलने से मिलों को मूल्य बढ़ाना पड़ता। हो सकता है अभी तक वह दो सौ रुपये तक पहुंच जाता। इस बार गन्ना कम है। ऐसे में उसका उचित मूल्य स्वत: ही मिल जाता। जब मिल चलते तो क्रेशरों को भी मूल्य बढ़ाना पड़ता अन्यथा उन्हें गन्ना ही नहीं मिलता। मिल चलने में देरी कराकर आंदोलनकारी छोटे किसानों का ही गला घोंट रहे हैं। बड़े किसान तो आराम से बाद में भी महंगे मूल्य में अपना गन्ना बेच लेंगे। उन्हें गेहूं बोने को भी खाद उपलब्ध हो रहा है। बेचारे छोटे किसान को वह भी नसीब नहीं। कई समितियां पर तो छोटे किसानों को यदि खाद मिल भी रहा है तो उन्हें मनमानी दवाईयां और बीज खरीदने को बाध्य होना पड़ रहा है। ऐसे में वह मजबूरी में या तो ब्लैक से खाद ले रहा है अथवा बिना खाद के ही गेहूं बोने को मजबूर है। किसानों के हितों की लड़ाई लड़ने वाले किसान नेता और राष्ट्रीय लोकदल के नेताओं को गरीब किसान से कोई सरोकार नहीं उन्हें तो अपनी नेतागीरी चमकाने का बहाना चाहिए। गन्ने पर हो हल्ला मचाने वालों को खाद की समस्या दिखाई नहीं दे रही जिससे आम किसान परेशान है। उसके खेत बुवाई को तैयार हैं और वह बेचारा सुबह से शाम तक भूखा प्यासा खाद मिलने की उम्मीद में रात को खाली हाथ वापस लौटता है।

  आंदोलनकारी नेताओं को चाहिए कि वे गन्ना मूल्य से पहले खाद दिलाने की लड़ाई लड़ें। चीनी संकट से खाद्य संकट खतरनाक है। समय रहते खाद समस्या नहीं सुलझी तो देश में खाद्य समस्या उत्पन्न हो जायेगी।

-harminder singh

Wednesday, November 25, 2009

आखिर कितना भीगता हूं मैं

टूटते सपनों को बिखर जाने दो,
चुनने की फर्सत कहां है?
रंगीन स्याही को फर्श से लिपट जाने दो,
परत ही से स्पर्श किया है,
छिटक गया कुछ, टुकड़ों में बंटा है,
कहीं ख्वाब थे, कहीं बूंदें स्याही की,
डुबोकर देखना है खुद को,
आखिर कितना भीगता हूं मैं।

-harminder singh

Tuesday, November 24, 2009

प्यास अभी मिटी नहीं

अहिस्ता-अहिस्ता,
जाने दो मुझे,
भुलाने दो मुझे,
लम्हे जो मैंने जिए,
जब मैं हंसा,
ठिठोली की,
थे कुछ अपने,
आज अपनापन नहीं,
मैं अकेला हूं,
घेरे है मुझे कोई,
क्या बताऊं? कैसा हूं?

जानता हूं,
यहीं रहना है सब,
नहीं जायेगा साथ मेरे,
फिर क्यों उतावला हुआ?
इतना जोड़ा,
किस लिए?
दिन बादल घेर चुके,
कोहरा ठहर रहा,
धुंध जालों में लिपटी,
चुभ रही सांसों में,
थक गयी आस,
थक चुका मैं।

ओढ़ लूं कंबल सफेद,
रोने वाले कितने हैं,
काश! होता कोई अपना,
तो आज जीभर रोता,
बूंद-बूंद तिड़कती,
टुकड़े-टुकड़े मेरा मन,
रहने दो जीवन को,
प्यास अभी मिटी नहीं।

-harminder singh

Monday, November 23, 2009

कहीं फूटती कोपलें मिल जाएं


मैंने बूढ़ी काकी से कहा,‘‘मैं कहीं खो गया हूं। शायद कोई स्वप्न चल रहा है।’’

काकी बोली,‘‘जिंदगी एक सपना ही तो है। ऐसा सपना जो पता नहीं कब टूट जाए। तब डोर भी छूट जायेगी। वह जीवन की डोर कहलाती है।’’

‘‘तमाम जिंदगी हम कहीं खाये रहते हैं। अक्सर ऐसा होता है कि खोने की वजहें इंसान होते हैं। पर कई बार अनजाने में यह सब हो जाता है। मस्तिष्क पर सारा खेल निर्भर करता है। हमारा दिमाग और हृदय खोने की वजह होते हैं। विचारों का अनगिनत ठहराव इंसान को दुविधा में डाल देता है। विचारों को एक कोने में इकट्टठा करने के बजाय हम उनसे जूझते हुए अधिक नजर आते हैं। यह एक आपसी लड़ाई की शक्ल ले लेता है। चुनौती आसान नहीं होती, पर उससे पार पाने के तरीके की तलाश स्वयं एक चुनौती से कम नहीं।’’

‘‘मस्तिष्क इतना कुछ घटने के बाद ठगा-सा महसूस करता है। इसे उसकी विवशता भी कहा जा सकता है। अत: वह खो जाता है, तो इंसान खुद को भूल जाता है। यह किसी कल्पना से कम नहीं होता, पर कल्पनाएं जब मजबूती से प्रकट हो जाती हैं तो वास्तविकता का टीला भी कठोरता प्राप्त कर लेता है जिसका धराशायी होना नामुमकिन-सा लगता है। यह भाग्य के कारण उपजा नहीं होता।’’

काकी आगे कहती है,‘‘खोई हुई चीजें अक्सर ढूंढी जाती हैं। ऐसा हमारे साथ भी होता है। इंसान खुद को खुद में खोजने की कोशिश करता है। लेकिन ऐसा करने वाले कम होते हैं क्योंकि भ्रम में जीने वालों की तादाद का कोई ठिकाना भी तो नहीं। भ्रम पैदा हालातों के कारण होता है। हालात इंसान स्वयं पैदा करता है। हुआ न अजीब- इंसान और हालात।’’

‘‘सपनों की नगरी बस जाने पर स्थिति बेहतर लगती है। ऐसा लगता है जैसे सारी खुशियां एक दामन में सिमट गयी हैं। सपनों के बिखरने पर जीवन किसी हादसे से कम नहीं रह जाता। उन वादियों में फूल खिलने बंद हो जाते हैं जहां कभी खुशबुंए महका करती थीं। डरावने सच की शक्ल देखकर अच्छे-अच्छे सहम जाते हैं। हमारे जैसे जर्जर काया वाले प्राणी टूटे हुए सपने के बाद की हकीकत का जायका ले रहे हैं। खोये हम भी थे कभी। शायद जिंदगी अब भी कुछ तलाश रही है। क्योंकि तलाश जारी है। बुढ़ापा गुमसुम है, थका-सा है, फिर भी तलाश जारी है इसी उम्मीद के साथ कि कहीं किसी कोने में फूटती कोपलें मिल जाएं।’’

-harminder singh

Sunday, November 22, 2009

खामोशी-लाचारी

कुछ दिन पहले-

दो समुदायों के बीच मजहब को लेकर झड़प हुई।
प्रत्येक ने अपने धर्म को दूसरे से श्रेष्ठ बताया।

मजहब को लेकर लड़ पड़े दोनों समुदाय आपस में।
मंदिर टूटे, मस्जिद गिरी, भगवान दोनों से रुठे।

एक ने भोग लगाया भगवान को, दूसरे ने अल्लाह को पुकारा।
आपस में लड़े लोग, तलवारें निकलीं, गोलियां चलीं।

औरतों की आवरु लुटी, मासूमों की चीखें निकलीं।
किसी का सुहाग लुटा, कोई घर से बेघर हुआ।

कुछ घरों के चिराग बुझे, कुछ को जेलों में भरा गया।
लोग सड़कों पर उतरे, जुलूस निकला, नारे हुये।

शहर में दंगे हुये, गाडि़यां टूटीं, ट्रेनें जलीं।
नेताओं का दौरा हुआ, पुलिस का पहरा लगा।

सरकारी कमेटियां बनीं, राजनीति होने लगी।


कुछ दिन बाद-

शहर में उग्रवादियों ने हमला किया।
भीड़ वाली गली में बम फटा, शोर से दिल थमा।

सैकड़ों मरे, हजारों घायल, कुछ लापता हुये।
मासूमों का साया छिना, कुछ गोदे सूनी हुयीं।

लोग घरों में सिमटे, शहर खामोशी में डूबा।
आज न जुलूस निकला, न नारे हुये, न विरोध।

हर चेहरे पर लाचारी, अब न किसी से शिकवा रहा।
मजहब के नाम पर विवाद टला।

फिर नेताओं का दौरा हुआ, पुलिस का पहरा लगा।
सरकारी कमेटियां बनीं, राजनीति होने लगी।

हादसा ये नहीं कि हादसा हो गया।
हादसा ये है कि सब खामोश हैं।

-ज्ञान प्रकाश सिंह नेगी ‘ज्ञानेन्द्र’
टेवा एपीआई इंडिया लि.

Saturday, November 21, 2009

मैडम मौली



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मैडम मौली की बड़ी-बड़ी आंखों को देखकर सभी घबराते थे। उनकी आवाज की आहट भर से ही पूरी क्लास में शांति छा जाती। मुझे, सच कूहूं, सबसे अधिक भय मैडम मौली से लगता था। उनका हैयर-स्टाइल समय-समय पर बदलता रहता। उनके माथे की बड़ी बिंदिया का रंग रोज बदलता था। साथ ही वे घड़ियों की शौकीन थीं। लेकिन कंगन या गहना पहनती नहीं थीं।

  उन्होंने ब्लैक-बोर्ड पर एक सवाल किया। मैं अगली सीट पर बैठा था। वे मेरे ठीक सामने खड़ी थीं। उन्होंने मेरी तरफ उंगली दिखाई और कहा,‘‘तुम, यह सवाल हल करो।’’ मैं एकदम घबरा गया।

  मैं हल करुं तो कैसे? सवाल मुझे आता ही नहीं। मैडम मौली ने मुझे घूरा। मैं सोचने का बहाना करने लगा। वह बोलीं,‘‘क्या सोच रहे हो। सवाल करो।’’

  मैं नीचे मुंह कर खड़ा रहा।

  ‘‘इधर आओ।’’ मैडम मौली ने कहा।

  उन्होंने मुझसे आगे कहा,‘‘मैं कुछ मदद करुं।’’

  मैं कुछ नहीं बोला। मैं सोच में पड़ गया कि आखिर मैडम इतनी नम्र कैसे हो गयीं?
 
  बच्चों में खुसर-पुसर शरु हो गयी थी।

  तभी मैडम मौली ने कठोर शब्दों में कहा,‘‘चुप, किसी की आवाज आई तो खैर नहीं।’’ क्लास में सन्नाटा छा गया।

  मैं कांप रहा था। मुझे डर था कहीं मेरे चांटा न लग जाए। मेरी इज्जत न उतर जाए।

  ‘‘तुम।’’ मैडम मौली ने मेरी तरफ देखकर कहा। ‘‘सीट पर जाकर खड़े हो जाओ।’’

  ‘‘विनय इधर आकर सवाल करो।’’ मैडम मौली ने कहा। विनय ने सवाल को झट से कर दिया। उसके बाद मैडम ने मुझसे कहा,‘‘देखो कितना आसान था। समझ गए तुम।’’

  मैंने ‘हां’ में सिर हिला दिया। मगर मेरी समझ में सवाल बिल्कुल नहीं आया था। मैंने जल्दी से सवाल कोपी में हल सहित उतार लिया।

  मैडम मौली ने एक-एक बच्चे को पहाड़े सुनाने के लिए खड़ा किया। मेरी बारी आ गयी थी।

  ‘‘तेरह का पहाड़ा सुनाओ।’’ मैडम मौली ने कहा। मैं फिर मुंह नीचे कर खड़ा था।

  ‘‘यह तुम्हारा दूसरा साल है न।’’ उन्होंने कहा। ‘‘होमवर्क दिया गया था, किया नहीं।’’

  मैं भीतर-भीतर घबरा रहा था कि कहीं मैडम मौली मुझे कड़ी सजा न दें। जिसका डर था वही हुआ। उन्होंने मेरा कान पकड़ लिया और मुझे क्लास के बाहर खड़ा कर कहा,‘‘छुट्टे से पहले क्लास में मत आना। इंटरवेल में भी बाहर इसी तरह खड़े रहकर पहाड़े याद करोगे।’’

  मुंह पर किताब लगाये मैं दीवार से सटा खड़ा रहा। मेरी टांगे जबाव दे गयीं। नेत्रा ने मुझे देख लिया था।

  घर पहुंचकर नेत्रा ने माता-पिता को बताया दिया। मैंने सफाई देने की कोशिश की।
 
  मां ने कहा,‘‘पढ़ाई करते तो क्लास के अंदर बैठते।’’ पिताजी बोले,‘‘यह लड़का दिन-ब-दिन नालायक होता जा रहा है। बस टी.वी. और खेल में ध्यान है साहब का।’’

  नेत्रा कहां पीछे रहने वाली थी। वह बोली,‘‘मुझे भईया पढ़ने को मना करते हैं। कल मेरे सिर पर किताब भी मारी थी।’’

  ‘‘ये नहीं सुधरेगा।’’ पिताजी बोले। ‘‘अबकी बार भी उसी क्लास में रहेगा। पढ़ता नहीं, ठाठ देखो कैसे हैं।’’

  ‘‘मैं कहती हूं, इसे होस्टल में भर्ती करवा दो। अक्ल ठिकाने आ जाएगी।’’ मां गुस्से में बोली।

  मैंने अपने कान बंद करने चाहे, मगर मैं ऐसा कर न सका। मैंने मन ही मन सोचा कि आगे से शिकायत का मौका नहीं दूंगा। बहुत हो गयी डांट।

-harminder singh

Friday, November 20, 2009

जीवन से इतना प्यार है



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‘‘जीवन से इतना प्यार क्यों करते हैं। क्या इसलिए मरने से लोग डरते हैं?’’

इतना कहकर काकी अपने कंबल को शरीर पर ओढ़ने लगी। उसने कहना प्रारंभ किया,‘हम इस जीवन से इतना मोह कर बैठते हैं कि मन नहीं करता इसे छोड़ कर जाने का। मोह का खेल है सब। जिंदगी ने इंसान को कितना दिया है। लेकिन वक्त आने पर यह रुठेगी जरुर। यह मालूम होते हुए भी हम खुद को छोड़ने से डरते हैं। ये बातें इतनी उलझी हैं कि सिलवटें इनकी कहानी बयान करने में असमर्थ हैं। ऐसे सवाल हमेशा रह जाते हैं जब जिंदगी के विषय में बातें की जाती हैं। पेचीदा और पेचीदा हो जाता है।’

‘भूल कर जाते हैं हम। यह अक्सर अंत समय पता चल पाता है कि इंसान गलतियां कब कर बैठा। यह भी आखिर में एहसास होता है कि क्या पीछे छूट गया और कितना हाथ लगा। रंगीन जीवन सुन्दरता से भरा होता है। अनगिनत साधन, कोई कमी नहीं। बस यहीं रस पड़ जाता है। इसे जीवन का रस कहा जाता है। यह इतना स्वाद से भरा है कि हम इसकी मिठास में बहुत कुछ याद नहीं करते। हमें जीवन में लोग मिलते हैं। संबंध बनते हैं, भरोसे की बातें होती हैं और न जाने क्या-क्या। मोह का जन्म संबंधों के साथ शुरु होता है। जुड़ाव जीवन का हिस्सा है।’

मैंने काकी से कहा,‘मोह करना भ्रम की स्थिति पैदा तो नहीं करता।’

इसपर बूढ़ी काकी बोली,‘देखो, जब रिश्ते बने हैं, मोह जरुर उपजा होगा। इंसान के लिए यह जरुरी नहीं कि वह किस स्थिति में लोगों से जुड़ाव रखे, बल्कि वह कई बार मोह के झोंके को अचानक अपने करीब पाता है। जब दो या उससे अधिक जीवित लोग संबंधों के दायरे में जीते हैं, तो उनमें यह बात स्वत: ही घर कर जाती है कि उनका जीवन खुद के लिए तथा दूसरों के लिए कितना अनमोल है। उन्हें जीवन से मोह हो जाता है। उसे छोड़ कर जाने की इच्छा नहीं होती।’

‘कई बार ऐसा होता है कि इंसान बुढ़ापे में एकांत में अपनों का स्मरण कर कराहता है। उस समय उसका प्रेम जाग उठता है। शायद पहले से कहीं अधिक। उसे हालांकि यह पता होता है कि जो वह कर रहा है उसके मायने सांस रुकने पर खत्म हो जायेंगे। फिर भी वह प्यार करता है। शायद भ्रम में हम जीते हैं।’



-harminder singh

Thursday, November 19, 2009

सादाब की कहानी

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सुबह काफी समय तक मैं सोया रहा। नींद पूरी हो गयी। पता नहीं चला कब आंख लग गई। कलम और डायरी को सादाब ने मेरे पास से उठाकर कोने में रख दिया। वह मेरा कितना ख्याल रखता है। उसने बताया कि मुझे चादर उसने उढ़ाई थी। मैं उसे एकटक निहारता रहा। वह अधिक कुछ बोला नहीं। जितना बोलता है, कीमत का बोलता है। कहते हैं न-‘सबका तरीका अपना होता है।’

भगवान हर किसी का ख्याल रखता है। यह हम अच्छी तरह जानते हैं। इंसान इंसानियत को लेकर पैदा हुआ है। हमारे भी कई कर्तव्य हैं जिनकी पूर्ति हमें करनी होती है। मुझे मालूम नहीं कि मेरा जीवन कितना है, लेकिन जितना है उतने समय बहुत कुछ करने की मेरी तमन्ना है। लोगों को समझाना चाहता हूं कि इंसानियत कितनी अहम है, हम भी और हमारा जीवन भी। वह हर चीज अहम है जो संसार में बसती है। इंसान भी संसार में बरसते हैं। फिर क्यों इंसान ने इंसान को कष्ट पहुंचाया है?

कई प्रश्न जटिल होते हैं। उन्हें सुलझाया नहीं जाता। सादाब ने बताया कि वह आज मुझे बहुत कुछ बताने वाला है। उसने कहा,‘‘शायद किस्मत को मोड़ना कठिन है। मैं किस्मत के हाथों परास्त हुआ हूं। मेरे अब्बा तो बचपन में गुजर गये थे। अम्मी को घर का चौका-बरतन ही पता था। वह बाहर की दुनिया को उतने करीब से नहीं जानती थी। हमारे घर की दीवारें पहले ही कमजोर थीं, अब्बा की मौत से स्थिति और खराब हो गयी। परदानशीं औरतों के लिए बाहर का माहौल अटपटा होता है। अम्मी कई मायनों में अंजान थी। हम तीन भाई-बहन हैं। सबसे बड़ी रुखसार केवल दस साल की थी। उससे छोटी जीनत आठ साल की और मैं पांच साल का। दोनों बहनें मुझे बहुत प्यार करती थीं। एक भाई की खुशी बहन की खुशी होती है।

‘‘स्कूल में केवल मेरा दाखिला कराया गया था। उस दिन अब्बा बहुत खुश नजर आ रहे थे।  उन्हें लग रहा था जैसे कोई बड़ा सपना साकार होने जा रहा था। सपने बड़े ही होते हैं, जब उम्मीदें बड़ी हों। एक पिता को अपनी औलाद से बहुत उम्मीद होती है। उम्मीद पूरी होने पर तसल्ली होती है।’’ इतना कहकर सादाब कुछ पल के लिए चुप हो गया। उसकी आंखें गीली थीं।

सादाब को याद है कि उसके पिता ने उससे काफी कुछ कहा था।

वह कहता है,‘‘जब मैं छोटा था तब मेरे अब्बा ने मुझे कई अच्छी बातें बताई थीं। उन्हें मैं भूलना नहीं चाहता क्योंकि जिंदगी उनसे प्रभावित होती है और ऐसी चीजों का प्रभाव हर बार अच्छा ही होता है। मेरा ताल्लुक सदा ऐसे लोगों से रहा जिनके विचार टूटे हुए नहीं थे। वे ऐसे लोग थे जिनके सपने ऊंचे जरुर थे, मगर इरादे कमजोर बिल्कुल नहीं। वे आज कामयाबी को अपने नीचे रखते हैं। मेरे अब्बा ने कहा था कि हम एक बार जीते हैं, एक बार मरते हैं। इसलिए इतने काम कर जाएं कि लोग हमें याद रखें। ऐसा मेरे दादा ने मेरे पिता से कहा था।’’

मेरा बेटा मेरे पास होता तो शायद उससे भी मैं यही कहता। बेटी को भी उतना ही हौंसला देता। खैर, वे मेरे पास नहीं। मैं फिर भावुक हो रहा हूं। ये भावुकता भी इंसान को मजबूर कर देती है। मैं मजबूरी को समझ रहा हूं। मजबूरी मुझे समझने में असमर्थ जान पड़ती है।

जारी है.......

-harminder singh

Wednesday, November 18, 2009

खुशी का मरहम


[jail_diary.jpg]

मैंने खुद को अनेक बार समझाया कि बहुत हो चुका। दूसरों को देखकर मैंने खुद को बदला है। सादाब ने मुझे समझाया और कहा,‘‘तुम मन को बीच में लाते हो। इसलिए हर बार हार जाते हो। तुम सोचते बहुत हो, इसलिए निराश हो जाते हो। मैं कई दिन उदास रहा, अब भी हूं। मगर इससे फायदा कुछ मिला नहीं, सो मुस्कराना पड़ा। कम से कम गम तो कम होंगे। दुखों से जितना बचने की कोशिश करोगे, वे उतना तुम्हें जकड़ेंगे। सही यह है कि उनपर खुशी का मरहम लगाओ।’’

उसकी बातों को मैंने ध्यान से सुना। उनका असर कितना होगा, यह मालूम नहीं। इतना कहना चाहूंगा कि कुछ फर्क तो होगा, शायद धीरे-धीरे ही सही।

लोगों का असर हम पर होता है। हम खुद को बदल भी देते हैं। लेकिन कहीं न कहीं उनकी तरह हो नहीं पाते। कुछ अंतर जरुर रहता है। यह इसलिए ताकि सब एक जैसे न हों। यदि ऐसा होता तो फर्क का मतलब क्या रह जायेगा?

मुझे साफ तौर पर याद नहीं लेकिन सादाब ने इतना बताया कि उसे धोखा दिया गया है। वह चोट खाया है। उसके इस समय के जिम्मेदार उसका कोई अपना है। लेकिन वह बाद में चुप हो गया था। उसका मन भीतर ही भीतर दुखी था। उसकी और मेरी बातें उतनी लंबी नहीं चलतीं। वह कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाता है। ऐसा अक्सर बहुत कम लोग कर पाते हैं।

धोखा इंसान खाता है। उसकी परेशानी वह ही जान सकता है। विश्वास की अहमियत जीवन में बहुत है। रिश्तों की नींव ही भरोसे पर टिकी होती है। एक मामूली दरार रिश्तों को भरभराकर ढहने पर मजबूर कर देती है। तब इंसान केवल मूक-दर्शक की तरह तमाशा देखता है। ऐसी स्थिति में आखिर वह कर भी क्या सकता है? अपने नसीब को खोटा कह सकता है। भगवान को कोस सकता है। वक्त को गाली दे सकता है। कौन रोक सकता है भला उसे ऐसा करने से? कोई भी तो नहीं, कोई नहीं। यहां तक की वह खुद भी नहीं खुद को रोक सकता। मैंने पता नहीं धोखा खाया है, लेकिन कभी-कभी गुस्से में बहुत कुछ ऐसा बोल जाता हूं जिससे दूसरों को लगता है कि मैंने धोखा झेला है।

मेरी आंख लगने को हो रही है। मैं फिर भी लिखे जा रहा हूं। इसका कारण मेरे विचार हैं। लिखना नहीं चाहते हुए लिखता जा रहा हूं। यह अजीब है न कि मैं पहले नींद का इंतजार करता था। आजकल ऐसा होता नहीं।

कोई हमें अपने मित्र की तरह समझता और समझाता हो, तो हम कई प्रकार से सुकून में हैं। कम से कम कुछ पल उसके साथ बिताने को मिल जायेंगे।

जारी है.......

-harminder singh

Tuesday, November 17, 2009

प्रेम कितना मीठा है

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‘‘प्यार तो बहुत लोग करते हैं, लेकिन कुछ लोग शायद दूसरों को इस कदर चाहते हैं कि प्यार भी छोटा पड़ जाए। और यह सब इतना अचानक हो जाता है कि पता ही नहीं चलता। हमें पता नहीं चलता कि हमारे लिए कब वे खास हो गए। और इतना खास कि हम उन्हें कई जन्मों तक भी न भलें। वाकई कितना अजीब है प्रेम।’’

बूढ़ी काकी की आंखें इतना कहकर भर आयी थीं, पर वह मुस्करा रही थी। बूंदें खुशी की थीं। बुढ़ापा करुणा से भर उठा था। नीर आंखों में बहकर शुष्क, झुर्रिदार दरारों को गीला करने की कोशिश में जस्बे के साथ ऐसी यात्रा पर निकले थे जिसकी शुरुआत हुई थी, लेकिन अंत का फैसला भाग्य पर टिका था।

काकी ने बताया कि उसे किसी से प्रेम हो गया था। वह भी किसी के सपनों में खोई थी कभी। उसके जीवन में भी वह समय आया था जब उसकी नींदें करवट लेते गुजरीं। उसने जाना कि प्रेम कितना मीठा होता है। काकी को अहसास हो गया था कि तब जीवन कितना मीठा होता है। वह मानो जीवन की मिठास में कहीं खो गयी थी। डूब गयी थी एक नारी किसी के प्रेम में। उसकी सखियों ने उसे ‘पगली’ कहना शुरु कर दिया था।

काकी ने अपनी कांपती अंगुलियों से आंखों को हल्का मला, कुछ धुंध छंटती हुई उसने महसूस की।

वह बोली,‘‘बूंदों का क्या, उनका काम तो गिरना है। प्रेम कितना अनोखा है। निरंतर बहता है, सिर्फ बहता है। उसकी महक जीवन को आनंदित करती है। ऐसा लगता है जीवन उल्लास से भर गया है। पता नहीं हवा कैसी चलने लगती है। झोंके रंगीन लगते हैं। मिजाज बदल जाता है। फूलों से बातें करने का मन करता है।’’

मैंने कहा,‘‘यह अद्भुत है। जीवन अद्भुत है। प्रेम जीवन में उपजता है। और जीवन प्रेम से उपजता है। प्यार जीवन से लगाव करना सिखाता है। इंसान को इंसान से जुड़ना सिखाता है। दिल को दिल से मिलाता है। बहुत विशाल, सीमा का जिसकी अंत नहीं।’’

काकी ने मुझसे कहा,‘‘ऐसा लगता है तुमने भी किसी से प्रेम किया है। यह वास्तविकता है कि ऐसी बातें तभी उचरती हैं। सूखी डाली की हरियाली को कभी देखा है? सूखने पर डाली नीरस हो जाती है। प्रेम के स्पर्श से उसमें भी कोंपलें सूखी डाली की हरियाली को कभी देखा है? सूखने पर डाली नीरस हो जाती है। प्रेम के स्पर्श से उसमें भी कोंपलें फूट पड़ती हैं। किसी को चाह कर देखो तो असलियत जान जाओगे।’’

मैंने जाना कि प्रेम बिना जीवन अधूरा है। दूसरों की चाह हमें जीने की चाह जगाती है। नई आशा के साथ हम जीते हैं, लेकिन जीवन से प्यार कर बैठते हैं, शायद पहले से अधिक।

-harminder singh

Saturday, November 14, 2009

घर से स्कूल


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नेत्रा को मैंने कई बार कहा कि इतना पढ़ाई न किया करे। पर वह मेरी ओर ध्यान ही नहीं देती। उसे एक ही धुन सवार है,‘सबसे अधिक नंबर आने चाहिएं।’ हर बार वह क्लास में पहला स्थान प्राप्त करती है, तो बहुत खुश होती है।

  मैंने उसे समझाया,‘अभी चश्मे लगे हैं। बाद में बैठे रहना अंधी बनकर।’

  वह स्कूल से आते ही होमवर्क करने बैठ जाती है। बेचारी लगती है वह मुझे।

सुबह से लगातार कई घंटे अपना दिमाग थका देती है। उसमें दो-तीन घंटें और जोड़ देती है।

  मैंने उससे कहा,‘इतना पढ़ोगी तो पागल हो जाओगी।’

  ‘हो जाने दो।’ वह बोली। ‘बिना पढ़े से पागल भली।’

  उसकी बातों का मुझे बुरा नहीं लगता, लेकिन कभी-कभी झुंझला जाता हूं।

आखिर मैं उसका इकलौता भाई और वह मेरी इकलौती बहन जो ठहरी।

  ‘मेरा मानो, थोड़ा आराम कर लो। होमवर्क बाद में कर लेना।’ मैंने कहा।


मेरी बहन नेत्रा




  ‘भाई मैं ऐसा नहीं कर सकती।’ नेत्रा ने कहा। उसका ध्यान पेंसिल छीलने में था। ‘बिना होमवर्क करे मुझे चैन नहीं आता। काम खत्म करने के बाद फ़्री हो जाती हूं। फिर सहेलियों संग खेलना भी तो है।’

  ‘तुम नहीं समझोगी। मेरी तरह बनो। रिलैक्स वाला बंदा। उतना ही चलता हूं, जितनी जरुरत है।’ मैं बोला।

  ‘मुझे नहीं बनना रिलैक्स वाली बंदी।’ उसने किताब का अगला पन्ना पलटा। ‘तुम्हारी तरह एक क्लास में दो साल नहीं गुजारने मुझे। तुम ही रिलैक्स करो उसी क्लास में। चौथी के फेलियर। देखना आठवीं से पहले मैं तुम्हें पछाड़ दूंगी।’

  मेरी बोलती बंद हो गयी। नेत्रा ने मुझे मेरी औकात याद दिला दी। उसकी तरफ मैंने पीठ कर ली और कुछ सोचने लगा। नेत्रा तीसरी क्लास में है, मैं चौथी में। मुझे डर लग रहा है कि कहीं इस बार लुढ़क गया तो माता-पिता घर से ही न निकाल दें। उफ! तब क्या होगा? इसलिए मैंने अपना बस्ता खोला और गणित की किताब निकाली। गर्दन घुमाकर नेत्रा को देखा। काम में वह इतनी तल्लीन थी कि उसे पता नहीं लगा कि एक मधुमक्खी उसके सिर पर बैठी है। मैंने उसे बिना बताए, फुर्ती से किताब की सहायता ली और मधुमक्खी को उड़ा दिया। तभी नेत्रा चीख पड़ी।

  ‘क्या किया भैया? किताब क्यों मारी?’ वह झल्लाई।

  मैंने बताया कि मधुमक्खी उसके बालों पर थी। उसे यकीन नहीं हुआ।

  उसने चेहरा लाल कर कहा,‘झूठ बोलते हो। मुझे पढ़ने नहीं देना चाहते।’

  ‘ऐसा नहीं है नेत्रा। मैं तो मक्खी को हटा रहा था। धोखे से किताब लग गयी होगी।’ मैंने सफाई देनी चाहिए।
  वह फिर किताब में खो गयी। उसने मेरी तरफ ध्यान नहीं दिया। उसकी यह विशेषता मुझे अच्छी लगती है कि वह जब पढ़ रही होती है, तब ज्यादा बोलती नहीं। एक-आध बार झगड़ चुकी है, बस।

  उसकी सहेली पिंकी मुझसे चिढ़ती है। मैं कई बार पिंकी की लंबी चोटी खींच चुका हूं। उसी तरह स्मिता जो पिंकी और नेत्रा की सहेली, जो बिल्कुल काले रंग की है, जो चपटी नाक की है और जो लड़कों जैसे बाल रखती है, उसे मैं ‘सैम’ कहकर चिढ़ाता हूं।

  दरअसल ‘सैम’ एक पात्र है जो टी.वी. पर दिखता है। वह कभी लड़की का भेष बना लेता है, कभी बूढ़ा हो जाता है। उसका रंग और स्मिता का रंग तथा नाक एक-जैसे हैं। स्मिता एक बार नेत्रा के साथ घर के बाहर खड़ी थी। मैंने चुपके से उसपर पानी की बोतल उडेल दी और छिप गया। यह किस्से काफी पुराने हैं- यही कोई दो साल पहले के। उस दिन पिताजी ने मुझे दो चाटें लगा दिये थे। अगले दिन जब मैं स्कूल गया तो स्मिता ने मेरा गाल देखा और खिल्ली उड़ायी, बोली,‘गाल है कि टमाटर।’

  खैर, काफी देर हो चुकी थी। मेरा मन गणित के सवाल करते-करते ऊब गया था। इस विषय से मुझे पहली कक्षा से ही चिढ़ हो गयी थी। वास्तव में उस समय सवाल आकार में बड़े होने लगे थे। गणित की टीचर मुझे कभी भाये नहीं। इसमें बहुत हद तक सच्चाई है। पहाड़े, उफ! बड़ा सिरदर्द है।

  मेरी बहन ने मुझसे पूछा,‘तुम इतनी देर से गणित की किताब खोलकर बैठे हो। हल कुछ कर नहीं रहे।’

   ‘जब तुम चौथी क्लास में आओगी, पता लग जायेगा।’ मैं बोला। ‘तीसरी क्लास की भी कोई पढ़ाई है। छोटे-छोटे मामूली सवाल। चुटकियों का खेल है।’

  नेत्रा लिखाई करने लगी। टीचर ने मुझे पहाड़े याद करने के लिए दिये थे। क्लास में जब पहाड़े सुनाने की याद आती, मुझे सांप सूंघ जाता। दो का पहाड़ा याद करने में मुझे काफी मशक्कत करनी पड़ी थी।

  तभी नेत्रा मुझसे बोली,‘भाई, मुझसे पहाड़े सुन लो।’

  मैंने यूं ही कह दिया,‘चलो सुनाओ।’

  उसने पहले दो का पहाड़ा सुनाया। मैं हां-हां-हूं-हूं करता रहा। तीन का पहाड़ा सुनाया। मैंने फिर हां-हां-हूं-हूं किया। नेत्रा को लग रहा था मैं बड़े गौर से सुन रहा हूं। उसे पता नहीं था कि आज मैं क्लास में इसलिए बैंच पर खड़ा किया गया था क्योंकि मुझे तीन का पहाड़ा याद नहीं था। बहुत ग्लानि का अनुभव किया था मैंने। सारी क्लास मुझपर हंसी थी। यहां तक की विनय जो मेरा सबसे अच्छा मित्र है, भी अपनी हंसी न रोक पाया। दूसरी-तीसरी क्लास के बालकों को पांच तक पहाड़े याद होते हैं। मेरा चौथी क्लास में दूसरा साल है।

  ‘भाई पांच का पहाड़ा पहले सुन लो।’ नेत्रा बोली।

  ‘मुझे नींद आ रही है।’ मैं बोला। ‘तुम्हें मालूम नहीं, कितना काम कर चुका हूं।’

  ‘थोड़ी देर ही तो बात है।’ नेत्रा ने कहा।

  मैं तकिया लगाकर लेट गया। सोने का बहाना करने लगा। मुंह पर एक कपड़ा डाल लिया।

  नेत्रा ने मेरे पैर पर जोर से हाथ मारा और बड़बड़ाती हुई कमरे से बाहर चली गयी। उसके जाते ही मैं खुद से बोला,‘बला टली।’

  पहाड़े की किताब नेत्रा के बस्ते से निकाली और याद करने बैठ गया।

-harminder singh

Friday, November 13, 2009

जीवन फीका-फीका लगता है

बहती धारा मद्धिम-मद्धिम,
दिल पिघला-पिघला लगता है,
मन का खाली कोना,
सब सूना-सूना लगता है।

जीवन करता रुकने दो,
सब सूखा-सूखा लगता है,
आस नहीं, अब प्सास नहीं,
अंबर रुखा-रुखा लगता है।

नाव बह गयी पानी में,
तल नीचा-नीचा लगता है,
स्वाद नहीं रहा कहीं,
जीवन फीका-फीका लगता है।

-harminder singh

Tuesday, November 10, 2009

अंतिम यह लड़ाई है

भला जीने में क्या बुराई है?
आंसू में वह नहाई है,
थकी काया कराही है,
धुंध कितनी छाई है।

हौले-हौले बोले वह,
जुबान लड़खड़ाई है,
जर्जर हाथ थामें क्या?
देह भी कंपकपायी है।

हौंसला कम नहीं,
वृद्धा बुदबुदायी है,
हार क्यों मानें, जब
अंतिम यह लड़ाई है।

-harminder singh

Sunday, November 8, 2009

थोड़ा रो लो, मन हल्का हो जाएगा




‘‘मन भारी है, क्या रोकर मन हल्का हो जाता है?’ मैंने बूढ़ी काकी से पूछा।

बूढ़ी काकी बोली,‘‘बहती धारा को न तुम रोक सकते, न मैं। मन में जब भावनाओं की उथलपुथल होती है तो इसका असर हृदय पर होता है। हम खुद को रोक नहीं पाते और बह जाते हैं। ऐसा करने से दुख कम हो जाता है। इसलिए हम कह देते हैं कि थोड़ा रो लिए, मन हल्का हो गया। मन की वेदना ने आंसुओं की शक्ल ली और टपक पड़ी।’’

‘‘अक्सर गुस्सा हम उन्हीं पर करते हैं जिनसे हमारा लगाव भावनात्मक होता है। यह शायद अथाह घनिष्ठता का परिचय देता है। लगाव इंसानी रिश्तों को एक मायना देता है- जुड़कर चलने का, साथ निभाने, कभी न दूर जाने का और एक-दूसरे को बारीकी से समझने का।’’

‘‘लगाव की कोई सीमा नहीं होती। रिश्ते इंसान से जुड़कर चलते हैं। जबकि हम कई बार रिश्तों के कई अजीब तरह की भावनाओं में उलझकर रह जाते हैं। जब कहीं टूटन या दीवार के ढहने की आहट होती है, तो हम चौंक जाते हैं। हमें लगता है कहीं इससे सबकुछ बिखर न जाए। उस आने वाले भय की घबराहट हमें सोचने को विवश करती है। हम भावनाओं में सिमट जाते हैं।’’

‘‘मैं किसी से इतना मोह नहीं रखती क्योंकि मुझे जीने की उतनी इच्छा नहीं रही। ऐसा मैं अनेक बार सोचती हूं। मेरी उम्र काफी हो चली, इसलिए भी मैं आशान्वित नहीं। मगर यह कम होता है जब मैं निराशा से खुद को बचा पाती हूं। जब मैं अधिक निराश हो जाता हूं, मेरी आंखें नम हो जाती हैं।’’

‘मेरी मां कहा करती थी कि आंसू अनमोल हैं, इन्हें यूं जाया मत करो। वक्त आने पर इनकी कीमत मालूम होगी। वैसे जब भी मन को भरा पाया, मैंने आंसू बहा दिये। हृदय की वेदना बाहर आ गयी। मां ने यह भी कहा-‘जो बात छिपी हो किसी कोने में, दर्द बढ़ा हो कहीं, उसे बाहर लाना हो अगर, तो थोड़ा रो लो। शायद तसल्ली मिल जाए, मन हल्का हो जाए।’’

-harminder singh

Friday, November 6, 2009

वृद्ध इंसान हूं मैं



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अंधकार में खो गया प्रकाश,
सूर्य छोड़ चला आकाश,
अंधेरी काली रात है,
न तारे, न चांद साथ है,

जीवन बढ़ रहा अंत दिशा में,
हर्षोल्लास के रंग खो रहे निशा में,
यादें धुंधली पड़ रही हैं,
धड़कनें घड़ी से लड़ रही हैं।

समझ का भंडार भरा-सा लगता है,
दिमाग और मन डरा-सा लगता है,
भूल और गलतियां समझ आ रही हैं,
भूत की स्मृतियां नीदों में छा रही हैं।

अहसास हो रहा मृत्यु की करीबी का,
अंन्तरात्मा की गरीबी का,
डूबने को है नाव, खेने का प्रयास है,
जी तो सकता नहीं, जन्नत की आस है।

जीवन का सार, प्रियजनों का भार हूं मैं,
सच्चाईयों से लड़ता, वृद्ध इंसान हूं मैं।

-शुभांगी

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भगवान मेरे, क्या जमाना आया है

Wednesday, November 4, 2009

अहिस्ता-अहिस्ता जुड़ते हैं भाव



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मैंने सादाब से कहा कि तुम हंसना बंद कर दो। हालांकि यह एक मजाक की तरह था। इसपर वह मुस्कराया। सुबह शायद मैं उससे खुलकर बात करने की कोशिश करुं कि वह चुप क्यों है? अब यह मैं उसपर छोड़ता हूं कि वह क्या उत्तर दे। हम सवाल तो पूछ लेते हैं, मगर उत्तर का रुप मालूम नहीं होता। जिंदगी में सवाल इतने हैं कि जिंदगी कम पड़ जायेगी। नीरसता एक अधूरेपन का अहसास कराती है। हम चुपचाप रहते हैं, केवल सोचते हैं। मन में एक कशमकश उठ गिर रही होती है। यहीं हम एक आंतरिक लड़ाई लड़ रहे होते हैं। इस समय जंग का मैदान हम स्वयं ही होते हैं। अजीब दौर से गुजर रहे होते हैं और मन में एक घबराहट भी होती है।

  मेरे साथ कई बार ऐसा हुआ है कि मैं बहुत घबरा गया हूं। मैं खुद को पराजित व्यक्ति नहीं कहना चाहता। यह अलग बात है कि मैं मन को निराशा से बचाने की कोशिश करता हूं, पर हर बार हार जाता हूं। साथ ही हारता है मेरा मन भी। सादाब को देखता हूं तो लगता है कि वह बहुत कुछ कहना चाहता है। उसकी एक-एक बात मैं ध्यान से सुनता हूं। वह सोचता बहुत है, ऐसा उसका चेहरा बताता है। उसकी आंखें थकी जरुर हैं, लेकिन उसके हंसने पर वे भी हंसती हैं। उसे मैं पहले अच्छी तरह जानता था, लेकिन अब धीरे-धीरे वह मुझसे कई बातें कर जाता है। शायद उसे लगता है कि वह मुझे समझता है और मैं उसे। फिर भी वह कई बातें खुलकर नहीं बता पाता क्योंकि ऐसा करना उसे उचित नहीं लगता।

  मुझे काफी प्रसन्नता हुई कि सादाब फिर से मुझसे बातें करने लगा। उसके पास उलझनें बहुत हैं, और वह उनका हल ढूंढता रहता है। मैं शायद ऐसा कम ही कर पाता हूं।

  कुछ लोग हम पर प्रभाव डालते हैं, हम प्रभावित होते हैं और एक दिन ऐसा भी आता है जब प्रभाव का असर होता है। अच्छे लोग हमारी दुनिया को बदल देते हैं। धीरे-धीरे हम उनसे जुड़ाव महसूस करने लगते हैं।

  सादाब ने मुझसे कई बार कहा कि वह वक्त आने पर सब कुछ बता देगा। उसकी बातें मुझे सच लगती हैं। ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि मुझे उससे लगाव हो गया है। यह रिश्ता मामूली है, पर मायने वाला है। इसकी गांठ दिन-ब-दिन मजबूत होती जा रही है। मुझे मालूम नहीं कब मैंने उसे अपना कह दिया। यह हमारे भावों से जुड़ा है कि किस तरह हम दूसरों में अपनापन तलाशते हैं। यह एक प्रक्रिया की तरह जान पड़ता है- सच पूछा जाए तो मेरा जीवन शायद कुछ बदल जाए।

  अहिस्ता-अहिस्ता भाव जुड़ते हैं। मन का खाली कोना चुपके से भर जाता है। हम शायद अंजान रहते हैं और अचानक बहुत कुछ बदल जाता है। बदल जाता है हमारा संसार, हम और दूसरे भी हमें अलग नजर आने लगते हैं।   

-harminder singh

Tuesday, November 3, 2009

जीवन अभी हारा नहीं

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‘जिंदगी खत्म होते देर नहीं लगती।’ मैं काकी के सिराहाने बैठा कहने लगा।

  काकी मुस्कराई और बोली,‘जीवन पानी का बुलबुला ही तो है। मामूली तिनके से टकराकर कब नष्ट हो जाये।’

  ‘जीवन की धारा को कोई समझ नहीं पाया। यह पहेली ऐसी है जो कभी न सुलझ पाये। इसके विषय में ऊपरी तौर पर विमर्श करने पर यह नहीं लगता कि इसमें रहस्य छिपे हैं। मगर जीवन इतना गहरा है कि उसकी गहराई के विषय में सोचना मुश्किल है। इंसान जीवन के पानी में गोते लगाता है, किनारे की तलाश करता है। इस छोर को पाने की कोशिश रहती है, कभी उस छोर तक पहुंचने की कल्पना करता है। न छोर मिलता, न किनारा। इंसान केवल गोते लगाता रह जाता है। जीवन संघर्ष में गुजर जाता है।’

  मैंने काकी को झपकी लेते पहली बार देखा। उसकी आंखें बंद हो गयीं। मैंने काकी को जगाया। वह बोली,‘ये नींद भी थक कर आती है। जितना कठिन परिश्रम, उतनी बेहतर नींद। जीवन में उतार-चढ़ाव, कठिनाईयां, मुश्किल रास्ते आते हैं। हम एक के बाद एक बढ़ते हैं। संघर्ष की दास्तान मनुष्य लिखता है। पैरों को घिसकर बहुत कुछ आसान बनता है। शरीर को थकाकर पथरीली राहों में हरियाली उग जाती है। पसीने की खारी बूंदों की कीमत लहू के कतरे से की जा सकती है। उधड़ी शक्लों को पहचानने की जुर्रत जीवन में की है, तो सुन्दरता-शौर्यता को लेकर इंसान जीवन में चला है। रस संसार को रंगीन बनाते हैं। बिना रस के जीवन बेकार है। बुढ़ापे में सारे रस छिन चुके होते हैं- रसहीन जीवन के साथ अंतिम यात्रा की तैयारी। इतना कुछ पाकर भी महसूस होता है जैसे कटोरा खाली रह गया। जीवन का कटोरा भरता नहीं। हाथ पहले खाली था, अब भी खाली है और अलविदा भी खाली हाथ से कहा जायेगा। कपड़ों के दिखावे पर मत जाईये, न ही शरीर के। क्या तन सजावट करके हम अपना शरीर सजा सकते हैं? जितने समय वस्त्रों की जगमगाहट है, उतने वक्त शरीर भी जगमगायेगा। फिर नये वस्त्र धारण करते जायेंगे, लेकिन देह तो पुरानी की पुरानी रहेगी, उसका क्या? वही हडिड्यों का पिंजर जिसपर मांस उभर आया, वही ढांचा जिसपर मांस को खाल की परत छिपाती है।’’

  ‘‘मैं इतना कहती हूं कि इंसान भ्रम का जीवन न जिये। सच्चाई से दो-चार होने में बुराई नहीं। सामना एक दिन होता है। इसलिए मैंने तसल्ली पहले कर ली। अब इस नाजुक समय में इतनी परेशानी नहीं लगती। जिंदगी को जीना सीखना होगा। बुढ़ापे में हताशा होती है। व्यक्ति को समझना चाहिए कि वक्त को काटने का बहाना चाहिए। जीवन को बोझ समझकर खुद को व्यथित करना है। कोशिशें बचपन में ही होती हैं, यह सही नहीं। कोशिशें जीवन में की जाती हैं, यह सही नहीं। कोशिशें बुढ़ापे में भी होती हैं, यह गलत नहीं। बुढ़ापा बिल्कुल बोझिल नहीं। सफर कितना भी मुश्किल क्यों न हो, एक मुस्कराहट उसे आसान बना देती है। जिंदगी का यह अंतिम सफर अबतक के सफर का सार है। शायद अधिक कठिन भी। ऊपर से थकी देह, जो सरक कर चलती है, मगर हारता नहीं है तो हौंसला। हां, बुढ़ापा टिका है हौंसले पर, एक वादे पर कि जीवन अभी हारा नहीं, वह पीछे हटेगा नहीं।’’

-harminder singh

Monday, November 2, 2009

गुरु नानक देव




    हमारा देश मध्यकाल में घोर अराजकता का शिकार था। आये दिन विदेशी हमलावर यहां आक्रमण कर जनता को लूट रहे थे और जनता पर घोर अत्याचार कर रहे थे। उस समय कई छोटे-छोटे राज्यों में देश बंटा हुआ था और इन राज्यों के राजा एकजुट होकर आक्रमणकारियों से मोर्चा लेने के बजाय आपस में ही लड़-मर रहे थे।

     लोगों का धार्मिक पतन भी हो चुका था। तत्कालीन तथाकथित धर्मगुरु धर्म व देश की रक्षा नहीं कर पा रहे थे।

      ऐसे घोर अंधकार, निराशा तथा अशांति के समय में अविभाजित पंजाब के साधो की तलबंडी ( पाकिस्तान) में कार्तिक पूर्णिमा संवत 1526 में श्री गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ।

      बालक नानक बचपन से एकान्तसेवी व ध्यानमग्न मुद्रा में रहते थे। उनका इस प्रकार रहना उनके पिता कल्याणराय के लिए चिन्ता का कारण बना हुआ था। एक बार उन्होंने बालक नानक को एक वैद्य को दिखाया लेकिन वैद्य भी उनका ‘रोग’ समझ नहीं पाया।

      दस वर्ष की अवस्था में ही बालक नानकदेव ने विद्या अध्ययन पूरा कर लिया था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार उनका शिक्षक उनसे बहुत प्रभावित हुआ था और यह कहकर उसने उनसे क्षमा मांग ली थी कि यह बच्चा देवपुरुष है जो आने वाले समय में संसार को शिक्षा देगा।

      किशोर अवस्था में एक बार नानक देव को उनके पिता ने कुछ सामान लाने उन्हें शहर भेजा। रास्ते में नानक देव को भूखे साधू मिले और उन्होंने सारे पैसे का भोजन उन्हें खिला दिया तथा प्रसन्न मुद्रा में खाली हाथ वापस घर लौट आये। उनके इस कृत्य से पिता कल्याणराय बहुत नाराज हुए थे।

      नानक देव ईश्वर भक्त तो थे ही साथ ही अत्यंत कोमल हृदय तथा दीनों पर दया करने वाले भी थे। उनके पिता को केवल नानक की चिंता थी लेकिन नानक को संपूर्ण संसार के लोगों के दुखों की चिंता थी और उन दुखों का अंत करने आये थे।

      अपने पिता के तमाम प्रयासों के बावजूद नानक देव सांसारिक मोह में न बंध सके। उन्होंने एक दिन संसार की चारों दिशाओं की यात्रा करने का निश्चय किया और वह बाला व मरदाना नामक आपने दो प्रिय शिष्यों के साथ लोगों को सन्मार्ग पर लाने तथा ईश्वरीय संदेश देने निकल पड़े।

    नानक देव ने विरक्त होकर घर नहीं छोड़ा था। उनका विवाह हो चुका था। वह अपने माता-पिता, पत्नि तथा बहन नानकी जी से आज्ञा लेकर और शीघ्र वापस लौटने का आ’वासन देकर घर से निकले थे। वह गृहस्थ जीवन व संन्यासी जीवन को एक साथ जीकर संसार को दिखाना चाहते थे।

     अपनी प्रथम यात्रा के दौरान उन्होंने देश की दुर्दशा देखी। उसका वर्णन स्वयं अपनी वाणी में यूं किया है ........

   ‘कलि काती राजे कसाई धर्म पंख कर उडरिया’
अर्थात:  इस कलयुग में राजे (  प्रजापालक के बजाय)  कसाई बन गये हैं तथा धर्म पंख लगाकर यहां से गायब हो गये हैं।


जन्म दिवस पर विशेष
  
  गुरु नानक देव ने अपने सत्तर वर्षीय जीवन में चारों दिशाओं में चार यात्रायें की थीं। इस दौरान उन्होंने भारत के अलावा अफगानिस्तान, श्रीलंका, तिब्बत, मक्का-मदीना, बगदाद आदि देशों की भी पद यात्रा की थी। वह उस समय के लगभग सभी धर्मों के प्रमुख आचार्यों, सन्तों और विद्वानों से मिले थे तथा उनसे ज्ञान चर्चायें की थीं। यात्राओं के दौरान वह अनेक पोंगापंथियों, कर्मकांडियों तथा पाखंडी लोगों से भी मिले थे। गुरु जी ऐसे लोगों को बिना किसी तर्क-वितर्क ही सहज भाव से सीधे मार्ग पर ले आते थे।

    गुरु नानक देव हमेशा कमजोर के पक्षधर तथा जोर-जबरदस्ती के विरुद्ध रहे। वह दूसरे का हक मारने के सर्वथा विरोधी थे। वह धनवानों के पकवानों के बजाय खून-पसीने की कमाई से रुखी रोटी खाने वालों के अन्न को महत्व देते थे। एक बार एक शहर में पहुंचे, जहां उनका एक अत्यंत धनवान तथा दूसरा निर्धन शिष्य रहते थे। गुरु जी ने निर्धन के घर रुकना पसंद किया। उसके यहां उन्होंने बड़े चाव से पानी के साथ रुखी रोटियां खायीं। धनवान शिष्य इस पर बड़ा नाराज हुआ तथा उसने गुरु जी से कहा कि उसके यहां अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन छोड़कर उन्होंने रुखा-सूखा भोजन क्यों किया?

     इस बात पर नानक देव अत्यंत सहज भाव से बोले कि इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए वह अपने व निर्धन दोनों के घर से भोजन ले आये। भोजन आने पर गुरुजी ने अनेक लोगों के सामने दोनों हाथों में उन दोनों का खाना अलग-अलग लेकर निचोड़ा तो लोग यह देखकर दंग रह गये कि निर्धन के खाने से दूध तथा धनवान के भोजन से खून की बूंदें टपक पड़ीं। यह देखकर धनवान शिष्य गुरु जी के पैरों पर गिर पड़ा और उसने अपनी सारी सम्पत्ति निर्धनों में बांट दी। उनके जीवन से इस प्रकार की अनेक घटनांए जुड़ी हुयी हैं।

    वह जीवनपर्यन्त जहां ईश्वर आराधना व मन की पवित्रता पर जोर देते रहे वहीं तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त जाति-पांति के भेदभाव, छुआछूत, नारी उत्पीड़न, ऊंच-नीच, अंधविश्वास और सती प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध भी संघर्ष करते रहे। उन्होंने भारतीय समाज के नवनिर्माण में एक जबरदस्त रचनात्मक आन्दोलन छेड़ दिया जिसे उनके बाद नौ गुरुओं ने भी जारी रखा।

     गुरु नानक देव अपने उपदेश गाकर सुनाते थे। उनका शिष्य मरदाना शास्त्रीय संगीत का धुरंधर विद्वान था। वह रबाब पर उनकी संगत करता था। गुरु जी द्वारा उच्चारण किये गये 974 सबद हैं जिन्हें 19 रागों में लयबद्ध कर गुरु ग्रंथ साहिब में संग्रहित किया गया है।

     स्वर्ग प्रस्थान का समय निकट जानकर गुरु नानक ने अपने द्वारा चलाये आन्दोलन को जारी रखने और लक्ष्य प्राप्ति हेतु अपने एक अत्यंत योग्य शिष्य को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया। गुरु जी का यह प्रिय शिष्य बाद में गुरु अंगद देव के नाम से विख्यात हुआ।

      गुरु जी के दो पुत्र बाबा लखमीचन्द और श्रीचन्द थे जो गुरु जी की परीक्षा में विफल रहने के कारण गुरु गद्दी से वंचित रहे। ये दोनों जीवनपर्यन्त ब्रहमचारी रहे और तपस्या करते रहे।

       गुरु अंगद देव जी को गुरु गद्दी सौंपकर गुरु नानक देव संवत 1596 में क्वार सुदी 23 को इस असार संसार को छोड़कर सदा के लिए परम सत्ता में विलीन हो गये।

-harminder singh

Tuesday, October 27, 2009

वाकई जीना उतना आसान नहीं



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मैं आज फिर से उदास हूं। मेरा एक साथी कैदी सादाब चुप सा रहने लगा है। पिछले कई दिनों से पता नहीं क्या हुआ कि वह मायूस रहता है। उसका चेहरा काफी शांत लगता है। मैंने उससे पूछा नहीं, लेकिन लगता है कि वह अंदर ही अंदर दुखी है। ऐसा होता है जब हम हृदय से अधिक सोचना शुरु कर देते हैं। हमारा मन कुछ सोचता है, दिमाग कुछ। तब अजीब सी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। मैं उसके हृदय को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता। इसलिए मैंने उससे बिल्कुल नहीं पूछा कि वह उदास क्यों है? हम ऐसा करते भी नहीं क्योंकि हर किसी का अपना व्यक्तिगत जीवन होता है जिसके बारे में हर कोई बताना भी तो नहीं चाहता।

सादाब काफी हंसता था। हालांकि वह खुश नहीं था, मगर वह हंस देता था। शायद इससे उसका दुख कम हो जाता था। उसकी एक मुस्कराहट से मुझे भी काफी राहत मिलती थी। ऐसा अक्सर होता था। कोई बात होती तो गंभीरता से उसपर वार्तालाप होता। जब कुछ अधिक गहरापन आ जाता तो वह अपनी हंसी को बीच में लाकर उसमें उथलापन ला देता। उसके विचार मुझे प्रभावित करते हैं। मैं सोचता हूं कि वह पहले मुझसे काफी कुछ कहता आया है, फिर कुछ दिनों से क्यों अपनी व्यथा नहीं बताना चाहता। मैं किसी को दुखी नहीं देखना चाहता।

इंसान इसलिए इंसान कहलाता है क्योंकि उसमें इंसानियत है और इंसानियत कहती है कि दूसरों की जरुरत पड़ने पर जहां तक हो सके मदद करो। उन्हें यदि किसी चीज की जरुरत है उसे उपलब्ध कराओ। मैं चाहता हूं कि वह इस तरह गुमसुम न रहे। उसने मुझे कई बार हौंसला दिया है। मैं भी कम हताशा से भरा नहीं, बल्कि अपने आसपास कई लोगों के कारण कभी-कभी बहुत कमजोर हो जाता हूं। इंसान कमजोर नहीं होता, उसे लोग ऐसा बना देते हैं। कुछ बातों का असर होता है, कुछ स्थितियों का, लेकिन हम खुद को विचारों से लड़ता हुआ असहाय पाते हैं। फिर कहते हैं कि जीना उतना आसान नहीं। वाकई जीना उतना आसान नहीं। शायद मरना भी कठिन है।

-harminder singh

Monday, October 26, 2009

ठेस जो हृदय तोड़े


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बूढ़ी काकी ने कहा,‘हम कई बार बिना सोचे-समझे बहुत कुछ कह जाते हैं। हमें अहसास नहीं हो पाता कि क्या कह दिया। लेकिन कुछ समय बाद मालूम पड़ता है कि शायद जो नहीं कहना चाहिए था वह कह दिया। जो नहीं करना चाहिए था वह कर दिया। इंसानों के साथ अक्सर ऐसा होता है।’

  ‘मैंने कई बार जाने-अनजाने बोल दिया। उस समय शायद मुझे नाप-तोल का वक्त न मिला हो, लेकिन शाम को सोते समय मुझे ख्याल आया कि आज कुछ गलत हो गया। मैंने किसी के हृदय को ठेस पहुंचा दी। जब हमें दर्द होता है, तब पता चलता है। दूसरों को दुख देना आसान है। मैं रात भर करवट बदलती रही। सोचती रही कि चंदा जो मेरी सखा थी, उसको कैसा महसूस हो रहा होगा।’

  काकी को बीच में रोक कर मैंने कहा,‘शायद बहुत बुरा लगा होगा उसे। ऐसे मौकों पर भला अच्छा कैसे लग सकता है?’

 मेरी बात को ध्यान से सुन काकी बोली,‘दिल तोड़ने आसन हैं, जोड़ने मुश्किल।’

 मैंने काकी को कालेज में मेरे साथ पढ़ने वाले राम और अंजलि का किस्सा बताया। इसपर काकी तपाक से बोली,‘राम के साथ अंजलि......कुछ अजीब नहीं लगता। ऐसा हो सकता था जैसे राम-श्याम, सीता-गीता, और राम....... बगैरह-बगैरह। आगे कहो।’

  मैंने बताना शुरु किया,‘न वे दोस्त थे, न दुश्मन, लेकिन राम को लगता था कि किस्मत ने उन्हें बस यूं ही मिला दिया। शायद इसलिए कि पिछले जन्म की कुछ बातें अधूरी रह गयी हों। खैर, राम कई बार जल्दबाजी में अंजलि को कुछ-न-कुछ अजीब बोल जाता। इसका असर अंजलि के चेहरे पर साफ झलकता। फिर काकी, बिल्कुल आपकी तरह वह रात को सोते समय दिन भर की बातों को याद करता, विचार करता। फिर अंजलि को याद करता कि ऐसा उसने क्यों किया कि किसी को बुरा लग गया हो। वैसे शब्दों की चोट हृदय पर काफी प्रभाव करती है। लेकिन राम अगले दिन या कुछ समय बाद अंजलि से बात कर स्थिति को फिर सामान्य बनाने की कोशिश में लग जाता।’

  काकी ने अपनी झुर्रिदार, कमजोर गर्दन को घुमाया। वह बोली,‘लोग ऐसा कर तो जाते हैं, पर बाद में उन्हें एहसास भी होता है। मुझे लगता है इंसान ऐसा ही करते हैं। कुदरत ने उन्हें ऐसी बुद्धि दी है, या समझ से परे है सब कुछ। वैसे, सोच समझकर बहुत कुछ आसान किया जा सकता है। चिंतन सबसे महत्वपूर्ण है। किसी के हृदय को ठेस क्यों पहुंचायी जाये? तुमने राम-अंजलि की बात बताई। उससे राम के व्यवहार के विषय में साफ मालूम लग जाता है। फिर अंजलि की भावुकता का भी पता लगता है क्यों तुमने कहा कि उसका चेहरा बदल जाता है। आगे तुम कहते हो कि राम ठेस पहुंचाकर मामला सुलझा लेता है। यह राम का व्यवहार अजीब नहीं लगता।’

  मैंने कहा,‘शायद यह भगवान की मर्जी है कि उन दोनों में विवाद नहीं हुआ। राम को भरोसा होगा कि भगवान सब संभाल लेगा। वैसे हमें आजतक वह ही तो संभालता आया है।’

  इसपर काकी ने कहा,‘इंसानों के विचार अगर ठीक तरह से चल रहे हैं तो कुछ नहीं बिगड़ने वाला। मुझे नहीं लगता कि हम कभी विचारों की लड़ाई से पार सकेंगे। हां, उन्हें एक व्यवस्था जरुर उपलब्ध करा सकते हैं। हमें सीखना होगा ताकि किसी को यह न लगे कि हम बुरे हैं। हमें सीखना होगा कि किसी का हृदय कभी न टूटे, कभी न दुखे क्योंकि इससे व्यक्ति भी बिखर जाता है। हमें नहीं कहना होगा वह शब्द जो वाण की तरह धंस जाए।’

  ‘शायद बहुत सी चीजें कही अच्छे ढंग से जाती हैं, लेकिन उन्हें उस तरह करना मुश्किल होता है।’

  इतना कहकर काकी ने विराम लिया। मैं उसकी आंखों को देखता रहा, कितनी शांत थीं।

-harminder singh

Sunday, October 25, 2009

बेहाल बागवां

पाला नाज से जिन्हें,
आज आंख दिखाते हैं,
सुनते नहीं, उलटे
जुबान लड़ाते हैं,

यह सिला मिला एक बागवां को,
बगीचा पाल कर,
उन्हें परवाह नहीं, खुश हैं ‘वे’,
बागवां को बेहाल कर,

दर्द को किस से कहे ’बेचारा’,
किस्मत को कोस रहा,
पड़ा एक कोने में,
मन मसोस रहा,

कुछ नहीं बचा अब,
सब छिना जा रहा,
कैसा खेल है ऊपरवाले,
‘वह’ पराया गिना जा रहा।

-harminder singh

Tuesday, October 20, 2009

स्वयं से लड़ना बहुत मुश्किल है


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यह सच है कि जीवन एक कहानी की तरह है। कहानी की शुरुआत होती है और वह समाप्त भी हो जाती है। यही सब तो हमारे साथ होता है। वे लोग ही आपस में मिलते हैं जिनकी कहानी एक तरह की होती है। वे लोग ही मित्र होते हैं जिनके विचार एक जैसे हों। अगर मित्र दुखी है तो वह हमारे दुख को अपना मानकर हमारा साथ देगा।

जो लोग मुझे मिले, जिन्हें मैंने अपने हृदय का हाल बताया वे सब मेरी ही तरह टूटे हुए और असहाय थे। वे मुझसे कहीं अधिक कष्टकारी समय को बर्दाश्त कर रहे थे, लेकिन उनकी ताकत क्षीण नहीं हो रही थी क्योंकि वे जीवन से हारना नहीं चाहते थे। उनके लिए जीवन संघर्ष का मैदान है। ‘इंसान वही होता है जो लड़ता हुआ मरे। संघर्ष करने की क्षमता हमारे भीतर मौजूद है। तुम कर कर तो देखो।’ अब्दुल ने मुझसे कहा था। शायद कुछ लोग कहकर कर जाते हैं, कुछ केवल कहते रह जाते हैं। अब्दुल ने तबाही का दर्द झेला। उसने खुद को संभाला। यह उसका संघर्ष था क्योंकि स्वयं से लड़ना बहुत मुश्किल है।

-harminder singh

Monday, October 19, 2009

जिंदगी कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है


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मैं ‘बेचारा’ कहलाना नहीं चाहता। इस शब्द से मुझे नफरत है। लोग कहते हैं कि मजबूर की मदद करो। मुझे लगता है कोई मजबूर नहीं। सब हालातों के हाथ कठपुथली हैं। इस हिसाब से सारा संसार किसी न किसी मौके बेचारा है। फिर मैं भी एक बेचारे से कम नहीं, लेकिन मैं खुद को बेचारा नहीं कहना चाहता। मैं हौंसले से जीवन की सच्चाई का मुकाबला करना चाहता हूं। पर यह कठिन लगता है। मैं अपनों से बहुत दूर हो कर भी उनके पास हूं, पर उनकी याद के सहारे धुंधले पड़ गए हैं। मेरा संसार रुका हुआ सा हो गया है, उधड़ा हुआ सा हो गया है। एक अजीब सी कशमकश फिर से उभरी है। शायद उभरती रहेगी टीस बनकर।

सहारे की तलाश जीवन भर रहती है। इंसान सहारा चाहता है। बिना सहारे के शायद जीवन अधूरा है। अपनों का सहारा मिलता है तो बहुत बेहतर होता है। मेरे पास कोई नहीं जो संभाल सके। जब हम निराश होते हैं, दुखी होते हैं तब हमें ऐसे व्यक्ति की तलाश रहती है जो हमें हौंसला दे सके और हमारे दर्द को समझ सके। मुझे कई लोग ऐसे मिले जो मेरे काफी करीब आये, लेकिन वे मुझसे दूर चले गये। उनकी कहानी भी मेरी ही तरह थी। जब कभी अधिक निराश होता हूं तो इस गीत को गुनगुनाता हूं-

‘जिंदगी कुछ भी नहीं,
तेरी मेरी कहानी है।’

-harminder singh

Sunday, October 18, 2009

एक बूढ़ा नदी से आंख मिलाता है




 नदी का रास्ता होकर गुजरता है मेरे गांव। मैं उस ओर नहीं जाता क्योंकि वह मुझे नहीं भाता। गांव वाले अक्सर कहते हैं कि वहां कई का जीवन थमा है। एक भय है, संशय भी, कहीं अगली बारी हमारी न हो।

मगर एक बूढ़ा वहां रोज घंटों बैठकर नदी से आंखें मिलाता है। उसे न भय है, न संशय। नदी जानती है कि एक मामूली लहर में वह ढह जायेगा। पर वर्षों से वह नहीं डूबा, न बहा क्योंकि उसे पास एक लाठी है- हौंसले की लाठी। वह कहता है,‘‘नदी झूठ बोलती है। भला बुढ़ापा इतना कमजोर कहां?’

बुढ़ापा जर्जर है, थका है, ऊबा है, पर लड़ाई जारी है खुद से और अपनों से।

बूढ़ा आगे कहता है,‘‘शरीर पुराना हुआ क्या हुआ, इंसान और मजबूत हुआ है।’’

तभी नदी का ऊफान उसे क्षति पहुंचा नहीं सका। तभी वह तना खड़ा है। तभी वह खोखले मुंह के साथ मुस्करा रहा है। तभी वह नदी से आंख मिला रहा है।

-harminder singh

Saturday, October 17, 2009

दीवाली पर दिवाला


























दीवाली का समय जैसे-जैसे,
करीब आ रहा था,
दम मेरा धीरे-धीरे,
निकला जा रहा था,
अकाल पड़ा है, पानी नहीं बरसा,
कैसे मनेगी दीवाली?
रंग-रोगन, मिठाई, नए कपड़े,
है मेरी जेब खाली,
कहती पत्नि देकर ताने,
‘ये लाओ, वो लाओ,
चरणों में रख दो,
पूरा बाजार ही उठा लाओ।’

बच्चों की समस्या अलग,
कष्ट पहुंचाने की,
कुछ मेरी जेब,
कुछ मुझे खाने की,
‘नहीं पापा हम एटम-बम,
रोकेट छोड़ेंगे जरुर’,
बच्चे मेरे हैं, मेरे जैसे,
नहीं उनका कसूर।

हद कर दी दीवाली ने,
दिवाला निकलवा दिया,
जेब में धमाका, कड़का कर,
कड़का बना दिया,
शपथ लेता हूं,
होगी नहीं आगे ऐसी बर्बादी,
शपथ तोड़ता हूं,
मैंने जो कर रखी है शादी।

-हरमिन्दर सिंह

Friday, October 16, 2009

बस चाह थी सूखने की



















आंसू
का कतरा-कतरा बहकर फर्श पर गिरा है। बूंद को कोई संभाल न सका। शुष्क आंखों में गीलापन, लबालब पानी है भरा। खारा पानी है वह। क्या नमक मिला है? नहीं दर्द भरा है।

पलकों को भिगोया है। सिलवटों को छुआ है, उनका सहारा लिया है। गंतव्य मालूम नहीं, फिर भी आंसू बहा है होता हुआ किनारों को छूकर, सरपट दौड़ा है। चमक थी अनजानापन लिए, सिमेटे ढेरों अल्फाज - कुछ जिंदगी के, कुछ अनकहे। रुढककर थमा नहीं। रास्ता जानने की फुर्सत कहां। बस चाह थी सूखने की।

-harminder singh

Thursday, October 15, 2009

मैं दीवाली देखना चाहता हूं



























बेताब है रोशनी,
दरार से झांकने को,
सही सलामत हूं मैं,
अकेला भी,
साथ नहीं कोई यहां,
सोच कहती है,
जलते दीये देखूं,
मोम का पिघलना देखूं।

कदमों को धीरे बढ़ा,
चलना चाहता हूं,
अंधेरे में रहा जीवन,
उजाला देखना चाहता हूं,
बीत गयी होली कब की,
रंगों में नहीं नहाया,
इस बार,
सिर्फ एक बार,
रोशनी में भीगना चाहता हूं,
लड़खड़ाते कदमों से ही सही,
सच कहूं,
मैं दीवाली देखना चाहता हूं।

-harminder singh

Wednesday, October 14, 2009

उर्मिला के पिता चल बसे

वे लाठी का सहारा लेकर चलते थे। उनकी आंखों की रोशनी सालों पहले छिन चुकी थी। दो बेटियों के पिता थे। और एक पत्नि के पति जो बेचारी वृद्धावस्था भोग रही है, लेकिन मानसिक रुप से लाचार है। उर्मिला के पिता दो दिन हुए, चल बसे। मेरी मां को सबुह यह सूचना उर्मिला की सास से मिली।

मैं सोच में पड़ गया कि लोग किस तरह बिना बताए चले जाते हैं। और पीछे छूट जाते हैं रोते-बिलखते परिजन। मौत का सच पीड़ादायक होता है। मातम की घड़ी कष्टकारी होती है।

जीवन का खेल खत्म होने के बाद इंसान का अस्तित्व नहीं रह जाता। रह जाती हैं बस यादें। उर्मिला अपने पिता को उतनी तवज्जो नहीं देती थी। जब वे घर आते वह उनके पास कम ही वक्त बिताती।

एक बार जब वे गजरौला आये, उर्मिला का पता पूछने लगे। चूंकि उन्हें दिखता नहीं था, इसलिए लाठी का सहारा लिए इधर-उधर घूमते रहे। गांव से किसी गाड़ी में बैठकर बेटी से मिलने आये थे। गाड़ी वाला उन्हें पास के मोहल्ले के किनारे छोड़ गया था। करीब दो घंटे पूछताछ के बाद वे उर्मिला के घर पहुंचे। किसी बच्चे की उंगली पकड़ रखी थी। उर्मिला का हाथ थामकर वे रो पड़े।

उर्मिला के यहां वे कुछ दिन रहे। उनके साथ मैंने उर्मिला को कभी बैठे नहीं देखा। हां, धेवता और धेवती जरुर अपने नाना संग चारपाई पर बैठकर घंटों बतियाते। वे खुश थे अपनों के बीच, लेकिन दुख भी था कि स्नेह कहीं अधूरेपन के छींटे दे गया था। उनकी सगी बेटी उनसे घुल-मिल नहीं रही थी। बूढ़े लोगों से दूरी का कारण उनका बुढ़ापा होता है। लगता था जैसे पराये घर सगी बेटी बिल्कुल पराई हो गयी थी। वे भरे मन से घर लौटे जरुर थे, लेकिन खुशी इसकी थी कि बेटी खुश है।

आज उर्मिला दुखी है। आज वह जी भर कर रोई है। उसने पिता को याद कर दहाड़े मारे हैं, छाती पीटी है। यह ढोंग नहीं था। दुख था अपने के बिछुड़ने का। किसी के दूर जाने का। शायद रिश्ते जिंदगी भर दरके हुए लगें, लेकिन अंतिम समय वे जुड़ जरुर जाते हैं।

-harminder singh

Tuesday, October 13, 2009

मुरझाये चेहरों का सूखा हिस्सा

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केवल मुरझाये चेहरों का सूखा हिस्सा बनने में ही फिलहाल बेहतर मालूम होता है। इसके अलावा इस घुटन में कुछ खास नहीं। कल की बातों को सोचना बेवकूफी लगती है। उनका समय बीत चुका। पुरानी कोई भी चीज हो, वह नयी कभी दिख नहीं सकती। वह हंस नहीं सकती, मुस्करा नहीं सकती, गुनगुना नहीं सकती। हां, अपने साथ घटने वाला तमाशा चुपचाप देख जरुर सकती है।

दूसरों को आपका दर्द मालूम नहीं होता। वे केवल उपहास करते हैं। मुझे चिढ़ाया जाता है। ऐसा कई बार हुआ है। कई कैदियों ने शाम के भोजन के समय मुझसे खींचातानी भी की। मैंने कुछ नहीं कहा। खामोशी कई बार हमें रोकती है। मैं किसी से कुछ कहना नहीं चाहता। मैं उन लोगों से अलग रहता हूं। वैसे मैं अच्छी तरह जानता हूं कि कुछ लोग दूसरों को दुखी करकर सुकून महसूस करते हैं। यह उनका आनंद है।

-harminder singh

Monday, October 12, 2009

सूखी भी, गीली हैं आंखें








‘खुशियां सिमट जाती हैं। जिंदगी एक खाली कटोरा लगती है। दौड़ती थी जो चीज कभी, आज रुकी सी लगती है। ऐसा लगता है जैसे कुछ थम सा गया है। बदला है, तब से अबतक बहुत कुछ बदला है। बदली है मेरी जिंदगी, बदली है हंसी। और बदल चुकी हूं मैं। मैं पहले जैसी नहीं रही, मगर मैं खुश हूं। संतुष्टि एक अलग एहसास कराती है। हमें जीने का सलीखा सिखाती है।’ इतना कहकर काकी ने पलकों में पुतलियों को छिपा लिया। कुछ क्षण वह मौन साध गयी। मैं उसके चेहरे पर बनती-बिगड़ती बनावट को गंभीरता से देखता रहा।

वृद्धों के चेहरे सिलवटों से भावनाओं को व्यक्त कर देते हैं। एक-एक लकीर अपनी कहानी कहती है- जरा गौर से पढ़िए या उनमें खुद को डुबोकर देखिए। हमें मालूम लग जाएगा कि बुढ़ापा क्या-क्या समेटे है।

आंखें खोलकर काकी ने मेरी तरफ देखा। मुझे बूढ़ी काकी की बूढ़ी आंखें ऐसी लगीं जैसे कुछ कहना चाह रही हों। उनमें एक संसार बसता है जो निराला बिल्कुल नहीं। एक ऐसा धुंधला संसार जो कोहरे से ढका बिल्कुल नहीं। जहां हरियाली है जरुर, पर सूखे पत्तों में कहीं छिप गयी है। माहौल उजाले भरा है, लेकिन घने अंधेरे ने कहीं से दस्तक जो दे दी है। सब जगह सूखी मिट्टी के टीले हैं। उनमें कहीं-कहीं उम्मीदों के छींटे पड़े हैं। ऐसा लगता है जैसे बहार आते-आते रुक गयी। बीच का काला बिन्दु गहरा होता जा रहा है। आसपास के इलाके को भी धुंधला करने की कोशिश की है। कहीं कोई चूक तो नहीं हुई, मालूम नहीं। सूखी नदियां इसी रास्ते बहती हैं। भावनाएं उमड़ कर बाहर तरल अवस्था धारण करती हैं। मन का बोझ हल्का हो जाता है। एक गहराई लिये लोक जिसमें झांकना मुमकिन है, लेकिन उसे नापा नहीं जा सकता। अथाह, विचित्र, नवेला, अनगिनत रहस्यों को छिपाये हुए। सफेदी पर उम्र ने परत चढ़ा दी है जिसका छुटना मुश्किल है। उजलेपन को फीका कर दिया है। मैं फिर भी उनमें छिपा उजाला ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा हूं। काकी का जीवन के प्रति नजरिया जो भी रहो हो, मैं उसकी आंखों को पढ़ने की असफल कोशिश करता रहा।

इंसान को वक्त ही कहां मिलता है कि वह चीजों की गहराई को जान सके। आंखों से आंखों को पढ़ने के लिए पूरा जीवन न कहीं बीत जाए। बीत न जाए वह सब जिसने जीवन को जीना सिखाया।

बूढ़ी काकी का मौन टूटा, वह बोली,‘बुढ़ापा खाली बैठने वाला नहीं। अनगिनत ख्वाहिशें विचरती हैं। कौन कहता है ये आंखें खामोश हैं? इनमें इतना कुछ समाया है कि खोज कभी खत्म ही न हो। शायद अब भी किसी को खोजती हैं। पलकें खुलती हैं, बंद हो जाती हैं। इंसान जागता है, सो जाता है। आधी-अधूरी इच्छायें पूर्ण करने की जद्दोजहद होती है। संसार को क्या दिया, कितना लिया। सब कुछ देखती हैं आंखें। सुख होने पर खुशी से भर जाती हैं। दर्द होने पर कराह उठती हैं आंखें। नाजुक हैं, फिर भी कितना कुछ सह जाती हैं आंखें। अनमोल हैं किसी के लिए कोई, और उनसे भी कीमती हैं उसकी आंखें। न कहते हुए भी बहुत कुछ कह जाती हैं। जो हम जुबान से नहीं कह पाते, वह निगाहें कह जाती हैं। चुप हैं आंखें, मगर कितना बोल जाती हैं। यहां शब्दों की गुंजाइश नहीं रह जाती, बल्कि हर कोई बात बिखर जाती है ताकि उसे समझा जा सके। कभी क्रोध को, तो कभी प्रेम को व्यक्त करती हैं आंखें। मेरे हिसाब से इनके जितना बेमिसाल कोई अंग नहीं। अजब-गजब का दर्शन कराती हैं। निरालापन-अलबेलापन समझाती हैं। इंसान को इंसान से मिलाती हैं। यह संसार सुन्दर है, हमने इसके रुप को अपनी आंखों से निहारा है।’’

नयनों की भाषा कमाल की है।

‘नयन नयन से मिलकर विचित्र संयोग बना बना रहे,
कहीं मधुर, कहीं कड़वा योग बना रहे।’

बूढ़ी काकी की यह उक्ति आंखों की भाषा के बारे में बताती है।

-harminder singh

Friday, October 9, 2009

हालातों के हाथ मजबूर

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हालातों को करीब हम खुद लाते हैं। हालात हमसे नहीं कहते कि हमें अपने साथ लेकर चलो। सोचने दो, मुझे बहुत कुछ सोचना है अभी। शायद पूरी जिंदगी सोचता ही रह जाऊं। काश, काश मैं कुछ कर पाता। अब क्या हो सकता है? नये जेलर ने मुझे घूरा था। उसने मुझे दो बेंत भी मारे। मेरी डायरी के पन्ने उलट-पुलट किये। फिर डायरी को एक कोने में फेंक दिया। मैंने इसका विरोध किया। उसने मेरा दो दिन का खाना रोक दिया। मैं गुस्से में हूं। हालातों के हाथों मजबूर इंसान भला कर भी क्या सकता है। हां, मैं यहां इतना अदना सा हो गया हूं, कुछ भी तो नहीं कर सकता। दीवारें हैं, इंसान हैं। उनके बीच में अंजानों की तरह नियति को कोस रहा हूं। चुप हूं क्योंकि यहां चुप रहने में ही भलाई है, सहने में ही भलाई है। एकांत नहीं है, मन शांत नहीं है। कठोरता और क्रूरता की आदत को रोकना नामुमकिन है। इन्हें मुस्कराना, प्रेम से पेश आना किसी ने नहीं सिखाया। जेलर के व्यवहार से मैं काफी निराश हूं क्योंकि मैं विवश भी हूं। विवशता में इंसान बंधे हुए हाथों का हो जाता है। उसका हौंसला सिर्फ चिल्लाता रह जाता है, बौखलाता रह जाता है, लेकिन अंदरुणी फड़फड़ाहट को सुनने वाला कोई नहीं होता है। केवल हम स्वयं ही सह जाते हैं, सहते रह जाते हैं। एकटक निहारते रह जाते हैं, इतना कुछ कहना चाहते हैं, कह नहीं पाते। मन घुटता रहता है और इसका निदान कहीं नजर नहीं आता। उपाय ढूंढते हुए..................बस कुछ हासिल नहीं हो पाता।

-harminder singh
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coming soon1
कैदी की डायरी......................
>>सादाब की मां............................ >>मेरी मां
बूढ़ी काकी कहती है
>>पल दो पल का जीवन.............>क्यों हम जीवन खो देते हैं?

घर से स्कूल
>>चाय में मक्खी............................>>भविष्य वाला साधु
>>वापस स्कूल में...........................>>सपने का भय
हमारे प्रेरणास्रोत हमारे बुजुर्ग

...ऐसे थे मुंशी जी

..शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय काम था मुंशी जी का

...अपने अंतिम दिनों में
तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?

सम्मान के हकदार

नेत्र सिंह

रामकली जी

दादी गौरजां

कल्याणी-एक प्रेम कहानी मेरा स्कूल बुढ़ापा

....भाग-1....भाग-2
सीधी बात नो बकवास

बहुत कुछ बदल गया, पर बदले नहीं लोग

गुरु ऐसे ही होते हैं
युवती से शादी का हश्र भुगत रहा है वृद्ध

बुढ़ापे के आंसू

बूढ़ा शरीर हुआ है इंसान नहीं

बुढ़ापा छुटकारा चाहता है

खोई यादों को वापिस लाने की चाह

बातों बातों में रिश्ते-नाते बुढ़ापा
ऐसा क्या है जीवन में?

अनदेखा अनजाना सा

कुछ समय का अनुभव

ठिठुरन और मैं

राज पिछले जन्म का
क्योंकि तुम खुश हो तो मैं खुश हूं

कहानी की शुरुआत फिर होगी

करीब हैं, पर दूर हैं

पापा की प्यारी बेटी

छली जाती हैं बेटियां

मां ऐसी ही होती है
एक उम्मीद के साथ जीता हूं मैं

कुछ नमी अभी बाकी है

अपनेपन की तलाश

टूटी बिखरी यादें

आखिरी पलों की कहानी

बुढ़ापे का मर्म



[ghar+se+school.png]
>>मेरी बहन नेत्रा

>>मैडम मौली
>>गर्मी की छुट्टियां

>>खराब समय

>>दुलारी मौसी

>>लंगूर वाला

>>गीता पड़ी बीमार
>>फंदे में बंदर

जानवर कितना भी चालाक क्यों न हो, इंसान उसे काबू में कर ही लेता है। रघु ने स्कूल से कहीं एक रस्सी तलाश कर ली. उसने रस्सी का एक फंदा बना लिया

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वृद्धग्राम पर पहली पोस्ट में मा. होराम सिंह का जिक्र
[ARUN+DR.jpg]
वृद्धों की सेवा में परमानंद -
डा. रमाशंकर
‘अरुण’


बुढ़ापे का दर्द

दुख भी है बुढ़ापे का

सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य गिरीराज सिद्धू ने व्यक्त किया अपना दुख

बुढ़ापे का सहारा

गरीबदास उन्हीं की श्रेणी में आते हैं जिन्हें अपने पराये कर देते हैं और थकी हड्डियों को सहारा देने के बजाय उल्टे उनसे सहारे की उम्मीद करते हैं
दो बूढ़ों का मिलन

दोनों बूढ़े हैं, फिर भी हौंसला रखते हैं आगे जीने का। वे एक सुर में कहते हैं,‘‘अगला लोक किसने देखा। जीना तो यहां ही है।’’
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इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल
प्रताप महेन्द्र सिंह कहते हैं- ''लाचारी और विवशता के सिवाय कुछ नहीं है बुढ़ापा. यह ऐसा पड़ाव है जब मर्जी अपनी नहीं रहती। रुठ कर मनाने वाला कोई नहीं।'' एक पुरानी फिल्म के गीत के शब्द वे कहते हैं-‘‘इक दिन बिक जायेगा, माटी के मोल, जग में रह जायेंगे, प्यारे तेरे बोल।’’

...............कहानी
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किशना- एक बूढ़े की कहानी
(भाग-1)..................(भाग-2)
ये भी कोई जिंदगी है
बृजघाट के घाट पर अनेकों साधु-संतों के आश्रम हैं। यहां बहुत से बूढ़े आपको किसी आस में बैठे मिल जायेंगे। इनकी आंखें थकी हुयी हैं, येजर्जर काया वाले हैं, किसी की प्रेरणा नहीं बने, हां, इन्हें लोग दया दृष्टि से जरुर देखते हैं

अपने याद आते हैं
राजाराम जी घर से दूर रह रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले घर को अलविदा कह दिया है। लेकिन अपनों की दूरी अब कहीं न कहीं परेशान करती है, बिल्कुल भीतर से

कविता.../....हरमिन्दर सिंह .
कभी मोम पिघला था यहां
इस बहाने खुद से बातें हो जायेंगी
विदाई बड़ी दुखदायी
आखिर कितना भीगता हूं मैं
प्यास अभी मिटी नहीं
पता नहीं क्यों?
बेहाल बागवां

यही बुढापा है, सच्चाई है
विदा, अलविदा!
अब कहां गई?
अंतिम पल
खत्म जहां किनारा है
तन्हाई के प्याले
ये मेरी दुनिया है
वहां भी अकेली है वह
जन्म हुआ शिशु का
गरमी
जीवन और मरण
कोई दुखी न हो
यूं ही चलते-चलते
मैं दीवाली देखना चाहता हूं
दीवाली पर दिवाला
जा रहा हूं मैं, वापस न आने के लिए
बुढ़ापा सामने खड़ा पूछ रहा
मगर चुप हूं मैं
क्षोभ
बारिश को करीब से देखा मैंने
बुढ़ापा सामने खड़ा है, अपना लो
मन की पीड़ा
काली छाया

तब जन्म गीत का होता है -रेखा सिंह
भगवान मेरे, क्या जमाना आया है -शुभांगी
वृद्ध इंसान हूं मैं-शुभांगी
मां ऐसी ही होती है -ज्ञानेंद्र सिंह
खामोशी-लाचारी-ज्ञानेंद्र सिंह
उम्र के पड़ाव -बलराम गुर्जर
मैं गरीबों को सलाम करता हूं -फ़ुरखान शाह
दैनिक हिन्दुस्तान और वेबदुनिया में वृद्धग्राम
hindustan vradhgram ब्लॉग वार्ता :
कहीं आप बूढ़े तो नहीं हो रहे
-Ravish kumar
NDTV

इन काँपते हाथों को बस थाम लो!
-Ravindra Vyas WEBDUNIA.com