बूढ़ी काकी कहती है-‘‘बुढ़ापा तो आना ही है। सच का सामना करने से भय कैसा? क्यों हम घबराते हैं आने वाले समय से जो सच्चाई है जिसे झुठलाना नामुमकिन है।’’.

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Friday, November 27, 2009

फिर लुट रहा छोटा किसान







गन्ना आंदोलन चला रहे किसान संगठन और उनका सहयोगी रालोद किसानों को लाभ के बजाय क्षति ही पहुंचा रहे हैं। इससे लघु और सीमांत किसान बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। छोटी जोत वाले किसान 70 फीसदी से भी ज्यादा हैं। उन्हें नवंबर में अपना कुछ खेत खाली करना मजबूरी होता है। कुछ तो रबी की बुवाई और कुछ सरदी के लिए कपड़े और दूसरी जरुरत की चीजों को उसे पैसा चाहिए। साथ ही पशुओं को चारे की समस्या भी छोटे किसानों के सामने होती है। इन सारी समस्याओं का एक ही समाधान उसके पास होता है। वह जल्दी चले क्रेशर या मिलों पर अपना गन्ना डाले। मिलों को आंदोलनरत बड़े किसान चलने नहीं दे रहे। जिससे क्रेशर और कोल्हुओं पर गन्ना आशा से अधिक पहुंच रहा है। इससे क्रेशर वालों ने जहां सीजन के शुरु में गन्ना दो सौ रुपये खरीदना शुरु किया था उन्होंने घटाते-घटाते डेढ़ सौ रुपये पर ला दिया। फिर भी गन्ना उन्हें मिल रहा है। उधर आंदोलनकारी किसान नेताओं को देखिये वे 195 रुपये पर भी मिलों को गन्ना नहीं देने दे रहे। छोटा किसान लुट रहा है। वह हर बार इसी तरह लुटता है। किसान नेता यदि समय से मिलों को चल जाने देते तो पूरा गन्ना न मिलने से मिलों को मूल्य बढ़ाना पड़ता। हो सकता है अभी तक वह दो सौ रुपये तक पहुंच जाता। इस बार गन्ना कम है। ऐसे में उसका उचित मूल्य स्वत: ही मिल जाता। जब मिल चलते तो क्रेशरों को भी मूल्य बढ़ाना पड़ता अन्यथा उन्हें गन्ना ही नहीं मिलता। मिल चलने में देरी कराकर आंदोलनकारी छोटे किसानों का ही गला घोंट रहे हैं। बड़े किसान तो आराम से बाद में भी महंगे मूल्य में अपना गन्ना बेच लेंगे। उन्हें गेहूं बोने को भी खाद उपलब्ध हो रहा है। बेचारे छोटे किसान को वह भी नसीब नहीं। कई समितियां पर तो छोटे किसानों को यदि खाद मिल भी रहा है तो उन्हें मनमानी दवाईयां और बीज खरीदने को बाध्य होना पड़ रहा है। ऐसे में वह मजबूरी में या तो ब्लैक से खाद ले रहा है अथवा बिना खाद के ही गेहूं बोने को मजबूर है। किसानों के हितों की लड़ाई लड़ने वाले किसान नेता और राष्ट्रीय लोकदल के नेताओं को गरीब किसान से कोई सरोकार नहीं उन्हें तो अपनी नेतागीरी चमकाने का बहाना चाहिए। गन्ने पर हो हल्ला मचाने वालों को खाद की समस्या दिखाई नहीं दे रही जिससे आम किसान परेशान है। उसके खेत बुवाई को तैयार हैं और वह बेचारा सुबह से शाम तक भूखा प्यासा खाद मिलने की उम्मीद में रात को खाली हाथ वापस लौटता है।

  आंदोलनकारी नेताओं को चाहिए कि वे गन्ना मूल्य से पहले खाद दिलाने की लड़ाई लड़ें। चीनी संकट से खाद्य संकट खतरनाक है। समय रहते खाद समस्या नहीं सुलझी तो देश में खाद्य समस्या उत्पन्न हो जायेगी।

-harminder singh
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coming soon1
कैदी की डायरी......................
>>सादाब की मां............................ >>मेरी मां
बूढ़ी काकी कहती है
>>पल दो पल का जीवन.............>क्यों हम जीवन खो देते हैं?

घर से स्कूल
>>चाय में मक्खी............................>>भविष्य वाला साधु
>>वापस स्कूल में...........................>>सपने का भय
हमारे प्रेरणास्रोत हमारे बुजुर्ग

...ऐसे थे मुंशी जी

..शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय काम था मुंशी जी का

...अपने अंतिम दिनों में
तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?

सम्मान के हकदार

नेत्र सिंह

रामकली जी

दादी गौरजां

कल्याणी-एक प्रेम कहानी मेरा स्कूल बुढ़ापा

....भाग-1....भाग-2
सीधी बात नो बकवास

बहुत कुछ बदल गया, पर बदले नहीं लोग

गुरु ऐसे ही होते हैं
युवती से शादी का हश्र भुगत रहा है वृद्ध

बुढ़ापे के आंसू

बूढ़ा शरीर हुआ है इंसान नहीं

बुढ़ापा छुटकारा चाहता है

खोई यादों को वापिस लाने की चाह

बातों बातों में रिश्ते-नाते बुढ़ापा
ऐसा क्या है जीवन में?

अनदेखा अनजाना सा

कुछ समय का अनुभव

ठिठुरन और मैं

राज पिछले जन्म का
क्योंकि तुम खुश हो तो मैं खुश हूं

कहानी की शुरुआत फिर होगी

करीब हैं, पर दूर हैं

पापा की प्यारी बेटी

छली जाती हैं बेटियां

मां ऐसी ही होती है
एक उम्मीद के साथ जीता हूं मैं

कुछ नमी अभी बाकी है

अपनेपन की तलाश

टूटी बिखरी यादें

आखिरी पलों की कहानी

बुढ़ापे का मर्म



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>>मेरी बहन नेत्रा

>>मैडम मौली
>>गर्मी की छुट्टियां

>>खराब समय

>>दुलारी मौसी

>>लंगूर वाला

>>गीता पड़ी बीमार
>>फंदे में बंदर

जानवर कितना भी चालाक क्यों न हो, इंसान उसे काबू में कर ही लेता है। रघु ने स्कूल से कहीं एक रस्सी तलाश कर ली. उसने रस्सी का एक फंदा बना लिया

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वृद्धग्राम पर पहली पोस्ट में मा. होराम सिंह का जिक्र
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वृद्धों की सेवा में परमानंद -
डा. रमाशंकर
‘अरुण’


बुढ़ापे का दर्द

दुख भी है बुढ़ापे का

सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य गिरीराज सिद्धू ने व्यक्त किया अपना दुख

बुढ़ापे का सहारा

गरीबदास उन्हीं की श्रेणी में आते हैं जिन्हें अपने पराये कर देते हैं और थकी हड्डियों को सहारा देने के बजाय उल्टे उनसे सहारे की उम्मीद करते हैं
दो बूढ़ों का मिलन

दोनों बूढ़े हैं, फिर भी हौंसला रखते हैं आगे जीने का। वे एक सुर में कहते हैं,‘‘अगला लोक किसने देखा। जीना तो यहां ही है।’’
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इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल
प्रताप महेन्द्र सिंह कहते हैं- ''लाचारी और विवशता के सिवाय कुछ नहीं है बुढ़ापा. यह ऐसा पड़ाव है जब मर्जी अपनी नहीं रहती। रुठ कर मनाने वाला कोई नहीं।'' एक पुरानी फिल्म के गीत के शब्द वे कहते हैं-‘‘इक दिन बिक जायेगा, माटी के मोल, जग में रह जायेंगे, प्यारे तेरे बोल।’’

...............कहानी
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किशना- एक बूढ़े की कहानी
(भाग-1)..................(भाग-2)
ये भी कोई जिंदगी है
बृजघाट के घाट पर अनेकों साधु-संतों के आश्रम हैं। यहां बहुत से बूढ़े आपको किसी आस में बैठे मिल जायेंगे। इनकी आंखें थकी हुयी हैं, येजर्जर काया वाले हैं, किसी की प्रेरणा नहीं बने, हां, इन्हें लोग दया दृष्टि से जरुर देखते हैं

अपने याद आते हैं
राजाराम जी घर से दूर रह रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले घर को अलविदा कह दिया है। लेकिन अपनों की दूरी अब कहीं न कहीं परेशान करती है, बिल्कुल भीतर से

कविता.../....हरमिन्दर सिंह .
कभी मोम पिघला था यहां
इस बहाने खुद से बातें हो जायेंगी
विदाई बड़ी दुखदायी
आखिर कितना भीगता हूं मैं
प्यास अभी मिटी नहीं
पता नहीं क्यों?
बेहाल बागवां

यही बुढापा है, सच्चाई है
विदा, अलविदा!
अब कहां गई?
अंतिम पल
खत्म जहां किनारा है
तन्हाई के प्याले
ये मेरी दुनिया है
वहां भी अकेली है वह
जन्म हुआ शिशु का
गरमी
जीवन और मरण
कोई दुखी न हो
यूं ही चलते-चलते
मैं दीवाली देखना चाहता हूं
दीवाली पर दिवाला
जा रहा हूं मैं, वापस न आने के लिए
बुढ़ापा सामने खड़ा पूछ रहा
मगर चुप हूं मैं
क्षोभ
बारिश को करीब से देखा मैंने
बुढ़ापा सामने खड़ा है, अपना लो
मन की पीड़ा
काली छाया

तब जन्म गीत का होता है -रेखा सिंह
भगवान मेरे, क्या जमाना आया है -शुभांगी
वृद्ध इंसान हूं मैं-शुभांगी
मां ऐसी ही होती है -ज्ञानेंद्र सिंह
खामोशी-लाचारी-ज्ञानेंद्र सिंह
उम्र के पड़ाव -बलराम गुर्जर
मैं गरीबों को सलाम करता हूं -फ़ुरखान शाह
दैनिक हिन्दुस्तान और वेबदुनिया में वृद्धग्राम
hindustan vradhgram ब्लॉग वार्ता :
कहीं आप बूढ़े तो नहीं हो रहे
-Ravish kumar
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इन काँपते हाथों को बस थाम लो!
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