समय बीत जाने के बाद जब हम मिलते हैं तो कई बार आंखें भर आती हैं क्योंकि हम खुद को भावनाओं में बहने से नहीं रोक पाते। जीवन को चाहिए ही क्या, बस प्यार मिल जाये और वह प्यार करता रहे। .

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Tuesday, February 9, 2010

बहुत कुछ बदल गया, पर बदले नहीं लोग



हम इतने समय बाद जब उन लोगों से मिलते हैं जो कभी हमारे लिये काफी अहम रहे हों तो काफी बेहतर लगता है। मुझे इतने समय बाद काफी सुखद एहसास हुआ। दरअसल अचानक ही ऐसा कुछ हुआ कि मैं अपने स्कूल पहुंच गया।

इतने समय में कितना बदल गया मेरा स्कूल -सैंट मैरी कान्वेंट। कालेज बन सेकेंडरी स्कूल कहा जाने लगा है। पहले जैसा कुछ था तो वह थे मेरे टीचर, खासकर मैडम डोगरा और मोहनचंद्रा जी। इसके अलावा मैं श्रीमान जगवीर सिंह का भी जिक्र करना चाहूंगा। सबसे पहले मेरी मुलाकात उनसे ही हुई। हालांकि उनका शरीर पहले से कुछ बदल गया, लेकिन उनका अंदाज वही पुराना था। शायद कुछ लोग हमेशा अपनी कुछ न कुछ खासियतों के साथ उसी तरह रहते हैं।

डोगरा जी को मैं कभी नहीं भूलना चाहूंगा क्योंकि वे ही एकमात्र ऐसी शिक्षिका हैं जिनसे मैं बहुत ही अपनेपन से मिला हूं। फोन पर भी उनसे काफी देर बात की थी तो मैं भावुक हो गया था। एक इंसान जो पहले से ही उसी तरह का हृदय रखता हो, उसे हम आसानी से भुला नहीं सकते और न ही मैं चाहूंगा कि मैं भूलूं। यह हममें खूबी नहीं नेमत है कि हम दूसरों को देखकर बहुत बार इतना खुश हो जाते हैं कि उनकी तारीफ करने लगते हैं। पर यहां मामला अलग है। मैंने मुलाकात की उन लोगों से जो शायद उससे भी ऊपर हैं। उनकी तारीफ नहीं की जा सकती। वे हमारे श्रद्धेय हैं। हमने उनका अनुसरण किया है ताकि हम कुछ हासिल कर सकें। और हमने बहुत कुछ हासिल भी किया है।

मैडम डोगरा को चौथी क्लास से जानता हूं। जब वे शुरु में आयीं तो हमें अजीब लगा। उन्होंने हमें मैथ्स पढ़ाया। गणित की सबसे बेहतरीन टीचर मैं उन्हें आज भी मानता हूं। अपने पड़ौस के बच्चों से मैं उनके बारे में अक्सर मौका मिलने पर बात करता हूं।

वे स्टाफ रुम से बाहर आ रही थीं तो मुझसे काफी दूरी पर थीं। उनके साथ मैडम कुमकुम और मैडम जैस्सी भी थीं। डोगरा जी की नजर जैसे ही मुझ पर पड़ी तो मैं छोटा बच्चे जैसे बन गया। मुझे काफी खुशी हुई और वे भी कम खुश नहीं थीं। उन्होंने मेरा हालचाल पूछा और मैंने उनका। खड़े-खड़े कितनी बातें होती हैं, वे सब हम कर पाये। थोड़े समय में इतना कुछ कह गयीं वे कि मैं उनका आभार व्यक्त करता हूं। सबसे पहले उनके शब्द थे,‘‘देखो कितना बदल गया है।’’ पास में मोहनचन्द्रा जी भी खड़े मुस्करा रहे थे। सबसे मेहनती व्यक्ति मोहनजी को कहा जा सकता है। वे साधारण दिखते जरुर हैं लेकिन कालेज की कई अहम जिम्मेदारियों को वे बखूबी निभाते हैं। उनकी खासियत उनके स्वभाव में साफ झलकती है।
खैर, डोगरा जी से मिलकर मुझे पुराने दिनों की याद ताजा हो गयी। उनका व्यवहार आंका नहीं जा सकता। कुछ लोग शायद होते ही ऐसे हैं कि वे जब भी आपसे मिलते हैं, आपको उनमें अपनापन नजर आता है। वे आपकी फिक्र करते हैं, ठीक एक बेटे की तरह। या फिर ऐसे जैसे आप उनके खुद के परिवार के हों। यह हमें इंसानों की उस खूबी का ज्ञान कराता है कि हम सब प्रेम भाव से कितने गदगद हो जाते हैं। यह बहने वाली भावना है जो हमारे हृदय को कितना सुकून पहुंचाती है, यह हम ही जान सकते हैं। और शायद वे भी जो हमें यह अनुभूति कराते हैं। कितना अच्छा हो, अगर हम सभी एक-दूसरे को इस तरह समझें। प्रेमपूर्ण व्यवहार की हवायें हमेशा इसी तरह चलती रहीं।

मैं आजतक कुछ इंसानों को समझ नहीं पाया। एक वे जो ‘स्पेशल’ हैं और एक वे जो हमसे प्रेम करते हैं। ये दोनों व्यक्तित्व ही ऐसे हैं जिनकी दुनिया थोड़ी अलग है आम इंसान से। इन्हें एक भाषा पक्की आती है और वह है रिश्तों के अपनेपन की। ऐसा ये करते हैं क्योंकि ऐसा करना इन्हें अच्छा नहीं, मेरे ख्याल से बहुत ही अच्छा लगता है।

मेरी तबीयत थोड़ा इस लेख को लिखते समय ठीक नहीं है। पर मैं उन पलों को जीवित रखना चाहता हूं जो मैंने जिये।

गुरप्रीत जी से मेरी मुलाकात पहले कभी नहीं हुई थी। वह केवल मेरे लेख पढ़ते थे। जब उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया तो उनके शब्द थे,‘‘जिस इंसान को मैं मिलने की उम्मीद कर रहा था, उससे आज मुलाकात हो गयी।’’ इससे खुशी की बात क्या हो सकती है कि कोई व्यक्ति दिल से आपकी कद्र करता है। ये ऐसे लोग होते हैं जो भी शायद हम कभी भूल सकते हों। ये ऐसे लोग होते हैं जिनका कद उनसे मिलने के बाद हमारी नजरों में और बढ़ जाता है। उन्होंने एक बात और कही,‘‘पंजाबियों के दिल तो हर किसी से मिल जाते हैं।’’

एक और व्यक्ति से मेरी मुलाकात हुई। वे थे वहां के मैथ्स के टीचर श्रीमान रिंकू सक्सेना। उनके बारे में कहा जाता है कि वह अपने विषय के महारथी हैं। सीबीएसई के ग्रेडिंग सिस्टम पर उनसे बात हुई तो उनका कहना था इससे स्टूडेंट पता नहीं कितना फायदा होगा।

कुछ वक्त बिता कर मुझे लगा कि मैं बरसों पहले के समय में पहुंच गया। हम अक्सर ऐसा अनुभव करते हैं जब हम लंबे समय बाद यादों को ताजा करने की कोशिश करते हैं। वैसे ऐसा स्वत: ही हो जाता है।

मेरी निगाह उस मैदान पर थी जहां हम कभी गिने-चुने मित्रों की टोली के साथ बतियाते हुए घूमते थे। उन बच्चों को देखकर मुझे पुराने दिन याद आ गये जो बास्केटबाल कोर्ट। मेरे कुछ साथी बास्केटबल के शौकीन थे। एक-आध बार मैंने भी गेंद को हाथ लगाया, लेकिन इतना साहस नहीं हुआ कि नैट में गेंद फेंक सकता।

आकाश आज भी वैसा ही है। हालांकि उससे मेरी मुलाकात काफी समय से नहीं हुई। वह नहीं बदला, दुनिया बदल गयी। जैसे ही मैं कालेज के गेट पर पहुंचा, उसने मेरे पैर छुए। वह खुश कुछ अधिक ही था। लेकिन मैं पता नहीं क्यों उससे अधिक देर बात नहीं कर सका। मेरे साथ अक्सर ऐसा हो जाता है कि मैं कई मायनों में एक तरह से ‘रुखा’ किस्म का इंसान हो जाता हूं। मैं ऐसा नहीं चाहता मगर हो जाता है। घर लौटकर मैंने इस विषय में सोचा तो पाया कि मुझे उससे तसल्ली से बात करनी चाहिए थी।

डोगरा जी से भी उतना देर नहीं बात कर सका। मैं बस उनकी सुनता रहा। कुछ शब्द ही मैं कह पाया। उस समय मैं एक तरह से अजीब सा हो गया था। यह वक्त की वजह से हुआ था, या लिख लिख कर मैं ऐसा बन गया- रुखापन लिए एक आम इंसान। वैसे रंजना दूबे जी से मुझे मलाल है नहीं मिलने का । उनसे मैंने कितना कुछ सीखा है। उनके व्यवहार को आप उनसे मिलकर अच्छी तरह जान सकते हैं। बाहर से आप उन्हें थोड़ी सख्त समझ सकते हैं, लेकिन उनका हृदय उतना ही कोमल भी हो जाता है। उनकी ‘सीरीयसनेस’ का मैं आभारी हूं। आज भी जब मैं सुमित या शुभांगी से उनका जि्क्र करता हूं तो यह बात जरुर कहता हूं कि उनके सामने जब हम पढ़ते तो हम केवल पढ़ते ही थे। विषय से संबंधित जो बातें होती थीं, वे रंजना जी इस तरह से समझाती थीं कि हम उन्हें शायद ही कभी भूल पायें। हिन्दी पढ़ाने का तरीका उनका अपना है और आप बोर तो बिल्कुल नहीं हो सकते। जिंदगी की बारीकियों को चैप्टर के साथ उनसे अच्छा भला कौन समझा सकता है? शायद ऐसे शिक्षकों की वजह से ही मैं इतना कुछ लिख पाया हूं। वे आभार योग्य हैं।

-harminder singh
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दुख भी है बुढ़ापे का

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गरीबदास उन्हीं की श्रेणी में आते हैं जिन्हें अपने पराये कर देते हैं और थकी हड्डियों को सहारा देने के बजाय उल्टे उनसे सहारे की उम्मीद करते हैं
दो बूढ़ों का मिलन

दोनों बूढ़े हैं, फिर भी हौंसला रखते हैं आगे जीने का। वे एक सुर में कहते हैं,‘‘अगला लोक किसने देखा। जीना तो यहां ही है।’’
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इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल
प्रताप महेन्द्र सिंह कहते हैं- ''लाचारी और विवशता के सिवाय कुछ नहीं है बुढ़ापा. यह ऐसा पड़ाव है जब मर्जी अपनी नहीं रहती। रुठ कर मनाने वाला कोई नहीं।'' एक पुरानी फिल्म के गीत के शब्द वे कहते हैं-‘‘इक दिन बिक जायेगा, माटी के मोल, जग में रह जायेंगे, प्यारे तेरे बोल।’’

सम्मान के हकदार
सेवानिवृत्त अध्यापक मा. कृपाल सिंह ऐसे व्यक्ति हैं जो अपने परिवार, गांव, देश और अपने पद पर बेहद कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार, साहसी और समर्पित रहे हैं

दादी गौरजां
उनका युग अपना था। अंग्रेज अफसर भी उनसे घबराते थे। आवाज का रौब देखते ही बनता था। मर्दाना अंदाज था उनका

ऐसे थे मुंशी निर्मल सिंह
बुढ़ापे में जवान होने का साहस कौन कर सकता है, लेकिन मुंशी जी करते थे। वे अपने आप को अंतिम दिनों तक नौजवान समझते रहे और गन्ने को चूसते हुये जवान ही लगते थे

अपने अंतिम दिनों में
गन्ने की पोरी को छीलने की आदत अभी भी उनके बुढ़ापे को संक्षय में डालती थी। रेडियो उनके पास रखे एक स्टूल पर अब भी बजता था। उनके पास बच्चे कम फटकते थे क्योंकि वे उन्हें झिड़क देते थे

...............कहानी
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किशना- एक बूढ़े की कहानी
(भाग-1)..................(भाग-2)
ये भी कोई जिंदगी है
बृजघाट के घाट पर अनेकों साधु-संतों के आश्रम हैं। यहां बहुत से बूढ़े आपको किसी आस में बैठे मिल जायेंगे। इनकी आंखें थकी हुयी हैं, येजर्जर काया वाले हैं, किसी की प्रेरणा नहीं बने, हां, इन्हें लोग दया दृष्टि से जरुर देखते हैं

अपने याद आते हैं
राजाराम जी घर से दूर रह रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले घर को अलविदा कह दिया है। लेकिन अपनों की दूरी अब कहीं न कहीं परेशान करती है, बिल्कुल भीतर से

कविता.../....हरमिन्दर सिंह .
विदाई बड़ी दुखदायी
आखिर कितना भीगता हूं मैं
प्यास अभी मिटी नहीं
पता नहीं क्यों?
बेहाल बागवां

यही बुढापा है, सच्चाई है
विदा, अलविदा!
अब कहां गई?
अंतिम पल
खत्म जहां किनारा है
तन्हाई के प्याले
ये मेरी दुनिया है
वहां भी अकेली है वह
जन्म हुआ शिशु का
गरमी
जीवन और मरण
कोई दुखी न हो
यूं ही चलते-चलते
मैं दीवाली देखना चाहता हूं
दीवाली पर दिवाला
जा रहा हूं मैं, वापस न आने के लिए
बुढ़ापा सामने खड़ा पूछ रहा
मगर चुप हूं मैं
क्षोभ
बारिश को करीब से देखा मैंने
बुढ़ापा सामने खड़ा है, अपना लो
मन की पीड़ा
काली छाया



तब जन्म गीत का होता है -रेखा सिंह
भगवान मेरे, क्या जमाना आया है -शुभांगी
वृद्ध इंसान हूं मैं-शुभांगी
मां ऐसी ही होती है -ज्ञानेंद्र सिंह
खामोशी-लाचारी-ज्ञानेंद्र सिंह
उम्र के पड़ाव -बलराम गुर्जर
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