Wednesday, July 8, 2009

मकड़ी के जाले सी जिंदगी

‘जिंदगी में बहुत परेशानियां हैं। हर मोड़ नयी उलझनें हैं, फिर भी जिंदगी रुकती नहीं।’ मैंने बूढ़ी काकी से कहा।

काकी कुछ पल की चुप्पी के बाद बोली,‘उलझनों और परेशानियों का मेल है जिंदगी। मकड़ी के जाले सी उलझी हूई, जीत-हार का मैदान है जिंदगी। यहां पासे फेंके जाते हैं, पासे पलट भी जाते हैं। उदास और खिले चेहरों का समागम, भावनाओं की बिक्री का खुला बाजार, मोल-भाव और कई खरीददार।’

‘सूखी रेत, चिलचिलाती धूप में दहक उठती है, उसपर सरपट दौड़ती जिंदगी। सवाल हजार हैं, उत्तर ढूंढती। कहीं चकराने की नौबत भी, होशियारी से कदम बढ़ाती हुई। तेजी में और तेज होती हुई खिलखिलाती हुई निकल भागने को बेताब है जिंदगी। हम अपना अक्स तलाश करने की तमाम कोशिशें करते हैं, लेकिन सिफर नतीजा शायद बेमतलब का रह जाता है। मामूली थपेड़े जब बार-बार कश्ती को डुबोने की ताक में रहते हैं, तो सवार हड़बड़ा जाता है और डूबने का डर बना रहता है। गहरे समुद्र को तैर करने वाले हौंसले वाले होते हैं। हम सीखते बहुत हैं, इसलिए जीवन को नया मुकाम देने की बात करते हैं।’ काकी ने इतना कहकर अपनी बात खत्म की।

मैं जीवन जी रहा हूं, लेकिन यह सब निश्चित समय के लिए ही है। उसके बाद न हम होंगे, न तुम। यह जीवन का सच है। उलझ कर भी सुलझा हुआ लगता है जीवन, जबकि यह दोनों तरह न होते हुए भी, अनोखा है।

काकी गंभीर स्वर में कहती है,‘निरालापन गतिशीलता के लिए चाहिए। जीवन का सिद्धांत कहता है कि थमो नहीं, चलते रहो। निराशा को धुंधला करने की जुगत में रहो। जिंदगी मुस्कराती हुई अच्छी लगती है, न कि निराशा से मुंह छिपाये हुए। हार-जीत को एक समझ कर आगे बढ़ने में हमारी भलाई है। ऐसा करने से हम जीवन को अपनाते हैं और वह हमें। कितना सुकून मिलता है तब।’

‘बालों की उलझी लटाओं को संवारने में समय लगता है। हम कहते हैं जिंदगी उलझी है। लटाएं सुलझ जाती हैं, लेकिन कई बाल साथ छोड़ जाते हैं। जीवन की पहेली को सुलझाते रहते हैं। यह विस्तृत है। कई मौकों पर उलझन बढ़ती जाती है। तब जीवन जाले सा उलझ जाता है। जिंदगी का दस्तूर है कि सफर में बाधाओं को पछाड़ते जाओ। नये आयाम बनाते जाओ। तभी जीवन सुलझने की कोशिश करेगा।’

-harminder singh

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*अब यादों का सहारा है

* अनुभव अहम होते हैं

*बुढ़ापा भी सुन्दर होता है

*उन्मुक्त होने की चाह

*बंधन मुक्ति मांगते हैं

*गलतियां सबक याद दिलाती हैं

*सीखने की भी चाह होती है

*रसहीनता का आभास

*जीवन का निष्कर्ष नहीं

Monday, July 6, 2009

जा रहा हूं मैं, वापस न आने के लिए

जा रहा हूं मैं,
वापस न आने के लिए,
रहूंगा नहीं मैं,
रह जायेंगी सिर्फ यादें,

जा रहा हूं मैं,
उन लम्हों को छोड़कर,
जो मैंने जिये,
जिंदगी पूर्ण मानकर।

-harminder singh

Sunday, July 5, 2009

अब बेवदुनिया ने सराहा वृद्धग्राम



















रवीश कुमार ने दैनिक हिन्दुस्तान में वृद्धग्राम ब्लॉग को सराहा था। अब बेवदुनिया.काम के साप्ताहिक कोलम में ravinder vyas ने वृद्धग्राम के बारे में लिखा है। लेख का शीर्षक है-‘इन काँपते हाथों को बस थाम लो!’। वृद्धग्राम उन सबका आभारी है जिन्होंने इसे इतना सराहा और यहां आकर कुछ देर बुढ़ापे को करीब से जानने की कोशिश की। एक बार फिर सभी का आभार।
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http://hindi.webdunia.com/samayik/article/article/0907/02/1090702092_1.htm