बूढ़ी काकी कहती है-‘‘बुढ़ापा तो आना ही है। सच का सामना करने से भय कैसा? क्यों हम घबराते हैं आने वाले समय से जो सच्चाई है जिसे झुठलाना नामुमकिन है।’’.

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Friday, June 18, 2010

............तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?



मेरे दादा जी उस उम्र के दौर से गुजर रहे हैं जहां चीजें अक्सर छूटने लगती हैं। छोटी शुभी ने उनके हाथों को देखकर हैरत से कहा,‘इनके हाथों की नसें किस तरह चमक रही हैं।’ ऐसा उसने गंभीरता से कहा था। उस छोटी बच्ची को भी एक वृद्ध की इस अवस्था को देखकर हैरानी हुई।

दरअसल बुढ़ापा अपने साथ संशय और हैरानी लाता है। इंसान खुद को ऐसे दौर में पाता हैं जहां से रुट बदलना नामुमकिन है। अब तो सिर्फ आगे जाना है। हां, पीछे मुड़कर देखा जा सकता है, लेकिन पुराने दिनों को जिया नहीं जा सकता।

शुभी की बात ने मुझे भी गंभीर कर दिया था। नसों ने त्वचा का दामन नहीं छोड़ा है। बस किसी तरह चिपकी हैं।

हम जब एक वृद्ध को देखते हैं तो पाते हैं कि जर्जरता किस कदर हावी हो सकती है। शरीर कितना  है बाकी।

हम जानते हैं कि हम भी कभी वृद्ध होंगे। हम भी होंगे अपने वृद्धजनों के दौर में। ...............तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?



-harminder singh

Thursday, June 17, 2010

क्रोध

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मुझे गुस्सा आता है तो मैं उसे शांत करने की कोशिश करता हूं। बहुत सी चीजें आसान नहीं हो सकतीं और हम उनसे अछूते भी नहीं रह पाते। वे हमारे साथ जुड़कर चलती हैं। मैं अकेला नहीं हूं।

क्रोध किसी को भी सुकून नहीं पहुंचाता। कुछ लोगों के अंदर क्षमता होती है कि वह इसे सहन कर जायें। कुछ ऐसे होते हैं जिनकी मजबूरी बन जाता है गुस्सा पीना। कुछ ऐसे हैं जो अपने अंदर के उबाल को काबू नहीं कर पाते। इसका परिणाम बहुत बार उनके हित में नहीं होता।

हम स्वयं को बदलने की कोशिश करते हैं, लेकिन कर नहीं पाते। मैंने क्रोध को शांत करने की कला को सादाब से सीखा। उसने मुझसे कहा था कि वह पहले काफी गुस्सेवाला था। अब वह खुद को उसके वश में नहीं करता। वह कहता है कि उसने प्रण किया है कि वह गुस्सा नहीं करेगा। उसका मानना है कि क्रोध इंसान को बेहतर जीवन जीने से रोकता है।

हम इतना तो मानते हैं कि क्रोध हमारी बुद्धि को प्रभावित करता है। मैंने सादाब से कहा कि तुम इतने शांत कैसे हो सकते हो? वह केवल मुस्कराया। मैंने उसकी मुस्कान को ही उसका उत्तर मान लिया, मगर कुछ समय के लिए।

हमें कभी-कभी कुछ लोगों पर इतना भरोसा हो जाता है कि हम उनकी प्रत्येक बात को सच मान लेते हैं। सादाब पर मैं बहुत अधिक भरोसा करने लगा हूं। इस घनिष्ठता का मतलब तलाशने की कोशिश करना मैं समय बर्बाद करना ही समझता हूं।

अदृश्य डोर जो हमें जोड़े है वह और मजबूत हो रही है। जीवन मानो अब अधूरा उतना नहीं लगता।

सादाब ने कहा कि वह शांत नहीं है। उसका हृदय उथलपुथल कर रहा है। पर उसे पता है कि वह दिमाग से ज्यादा, दिल से कम सोचने लगा है। दिल की धड़कन कभी बढ़ती है, तो कम होकर भी इंसान को परेशान करती है। उसने जीना सीख लिया क्योंकि हालातों से सामना करने की उसे आदत हो गयी। जीवन के सूनेपन को वह छिपा नहीं रहा, बल्कि सूनापन खुद ढकता जा रहा है। मैंने उससे कहा कि मैं ऐसा कर रहा हूं, पर कई बार निराश हो जाता हूं कि मेरी स्थिति बहुत कमजोर इंसान सी हो जाती है।

गुस्सा आता है मुझे अपने पर। धिक्कार आती है। मन करता है कि बस.........।

मैं कहना नहीं चाहता, क्या फायदा? मेरे अंदर ज्वाला की धधक शायद उतनी नहीं। ऊफान का दौर शांत भी तो हो जाता है।

-to be contd....

-harminder singh

Wednesday, June 16, 2010

कभी मोम पिघला था यहां




लौ जल रही हौले-हौले,
बाती धधक रही हौले-हौले,

पिघला मोम जैसे बहता पानी,
दर्शा रहा एक लय,

जम रहा इकट्ठा हो,
जिंदगी की तरह,

सुलगती बाती बची बाद में,
ढह गयी वह भी मोम में,

विलीन हुआ कुछ,
अवशेष बाकी हैं सिर्फ,

पहचान रहे हैं हम, कि
कभी मोम पिघला था यहां।

-harminder singh

Tuesday, June 15, 2010

कल्याणी-एक प्रेम कहानी 2




रात भर वह मेरी आंखों में भरी रही, एक ख्वाब की तरह। वह ख्वाब मुझे हकीकत लग रहा था। मुझे उस समय कई किस्म के अहसास हुए। उनमें मैंने खुद को उलझा पाया। भला एहसासों में भी कोई उलझता होगा, लेकिन मैं उनके ताने-बाने में कहीं खो गया था। यह खुद को भूलने के बराबर लगता था।

सपनों की दुनिया मेरे लिए हमेशा अनोखी रही है। बचपन के सपने हैरान करते थे। आज भी वही होता है। फर्क इतना है कि तब मैं बच्चा था, आज बूढ़ा हूं। तब मैं डर कर जाग उठता था। मां से लिपट जाता। बाबूजी भी परेशान हो जाते। औलाद का प्रेम ऐसा ही होता है। मैं पसीने में नहा जाता। दिल की धड़कनें बढ़ जातीं। आज दिल तो है, लेकिन वह धड़कता उतना नहीं। शायद जब हम जिंदगी के आखिरी पायदान पर होते हैं तो धड़कने भी धीरे-धीरे सिमट रही होती हैं।

मैं कल्याणी के सपनों में इतना खोया था कि सोना ही भूल गया। तभी अलार्म बज उठा। सुबह के चार बज चुके थे। पास मेज पर रखी घड़ी को मामूली झिड़क दिया। अंधेरे में हाथ उसपर लगा तो वह नीचे गिर गयी। अलार्म फिर बज उठा।

‘ओह, तेरी.......।’ मैं खुद पर चिल्लाने को हुआ।

कल्याणी कुछ समय के लिए मानो गायब हो गयी थी। मगर आंखों से सपना टूटा नहीं था। जारी हो गया फिर से वह सब जो मेरे हृदय की धड़कन को बढ़ा रहा था।

मैं बिस्तर पर लेट गया। दृश्य तैरने लगा। मैं भी तैर रहा था। बड़ी-बड़ी आंखें मुझे देख शर्मा रही थीं। कभी पलकें खुलतीं, कभी बंद होतीं। बाल उड़कर बार-बार पलकों को ढक लेते। कल्याणी अपनी पतली उंगलियों से उन्हें हटाती। फिर दोहराती। फिर कहीं से हवा का झोंका आता, लटें बिखर जातीं। उसका चेहरा मुस्कराता रहता और होंठ खुलते, शायद कुछ कहने की तमन्ना की होगी। पढ़ने की कोशिश करता, अधर में रह जाता। अधरों की बनावट खूबसूरती लिये, समां को सुहाना बनाने को आतुर लग रही थी।

एक नजर का प्रेम जबरदस्त तरीके से फूटा। फड़फड़ाहट शरीर में अजीब सिरहन लाने लगी। नसों में कुछ दौड़ने लगा। रक्त हमेशा बहता है। फिर वह क्या था? प्रेम की परिभाषा से मैं अनजान समझ रहा था स्वयं को। प्यार के बादलों में घिरने पर बरसात मीठी होती है। उमड़-घुमड़ जारी होने पर जगमगाहट फैल जाए तो बुराई नहीं। हृदय में बिजली कौंधी,....... चुपके से सरसराहट,........ मामूली झटका,........हल्की हरारत। .........सुकून लगा, पर चैन छिन गया।

मैंने कल्याणी को देख खुद ही बोलना शुरु किया।

मैंने कहा,‘‘तुम मेरी आंखों में बसी हो। तुम्हें कभी भूलना नहीं चाहूंगा,.............. क्योंकि तुम्हें एक बार पाकर कौन खोना चाहेगा।.........जबसे तुम्हें देखा है, मन में तरंगें बह रही हैं। खुशी का समां मुझे झुमा रहा है। सिर्फ तुम्हें पाने की तमन्ना है।...........चाहें कुछ हो, तुम्हें अपने से दूर नहीं करना चाहता।............ऐसा क्या है तुम में जो मुझे खींचता है।..........और मैं खिंचा चला आता हूं। क्या प्रेम की डोरी ऐसी होती है?’’

‘‘तुम अलग हो, बहुत अलग। यकीन से कह सकता हूं कि तुमसा दूजा नहीं। मुझे तो ऐसा ही लग रहा है।..............यह मेरा हृदय ही जानता है कि वह तुम्हारी झलक पाने को कितना आतुर है। बस...............बस........सामने इसी तरह खड़ी रहो, मैं निहारता रहूं,..........सिर्फ निहारता रहूं। लगता है जैसे मैं तुम्हारा दास हो चुका। एक बार तुम्हें क्या देखा,........पूरा संसार बदल गया, मैं भी। जब दोबारा मिलोगी, तो न जाने क्या और बदलेगा। परिवर्तन के लिए मैं तैयार हूं।’’

-contd........

-harminder singh

Monday, June 14, 2010

बदल गया बहुत कुछ

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जिस दिन न अधिक खुशी हो, न अधिक दुख वह मेरे लिए मिलाजुला है। वैसे आज कई मायने में मैं खुश था क्योंकि मुझे लगा कि सादाब की अम्मी और बहन उससे मिलने आयेंगे। वह लगभग पूरे दिन चुप बैठा रहा। उसकी आदत को देखकर मैं कभी-कभी नहीं कई बार हैरत में पड़ जाता हूं। वह मुझे अनोखा लगता है, पर वह उतना अजीब भी तो नहीं।

मुस्कराने का मायना उसने मुझे बताया। वह शायद मुझे प्रभावित करता है। मैं उसके हौंसले की कद्र करता हूं। वह इतना थक कर भी जीवन से हारा नहीं। मैं यदि उसकी जगह होता तो कब का टुकड़े-टुकड़े हो गया होता। उसने ऐसा नहीं किया।

मैं अब कई बार चहक उठता हूं। मुझे यह बुरा नहीं लगता। हां, पहले ऐसा लगता था। वक्त ने बहुत कुछ तब्दील कर दिया, खुद भी बदल गया। बीती बातें उतनी हृदय को चुभती नहीं। क्या यह सब सादाब की वजह से है? शायद ऐसा हो।

जब से उससे मुलाकात हुई है, मैं पहले के कुछ नीरस तरीकों को छोड़ चुका.  मैं चुप रहने को महत्व देता था, अब ऐसा नहीं है। हंसना तो दूर किसी और की मुस्कराहट को भी शत्रु समझता था। लोगों से दूर रहने की कोशिश करता था।

आजकल मेरी सोच में परिवर्तन हो रहा है। मैं बदलता जा रहा हूं। दुनिया को खुशनुमा समझने की बात को मैं नकारता आया था, पर अब नहीं।

मेरा संसार सलाखों के पीछे जरुर है, मैं उसे उसी जगह सुन्दर बनाना चाहता हूं। सादाब मुझे मिल गया है। फिक्र को गंभीरता से न लेने की आदत को मैं अपनाने की कोशिश कर रहा हूं।
contd....

-harminder singh

Sunday, June 13, 2010

.............क्योंकि तुम खुश हो तो मैं खुश हूं



राम कल बहुत गुस्से में था। उसने अंजलि को पता नहीं क्या-क्या कह दिया। उसने कहा:

"एक आखिरी कमेंट सुनती जाओ अपने फ़्रेंड्स के बारे में। रियलेटी यह है कि तुम्हारा कोई अच्छा दोस्त है ही नहीं। दरअसल तुम्हारे में ऐसी कोई खासियत ही नहीं है जो कोई तुम्हारा दोस्त बन सके। जिस दिन तुमने ये जो थोड़ा बहुत पढ़ती हो बंद कर दिया- then you will be completely out from your friend circle. न तुम किसी के साथ एडजस्ट कर सकती हो और न कोई तुम्हारे साथ।

तुम पहले भी अकेली थीं और अब भी अकेली हो........और अगर तुम ऐसी ही रहीं तो शायद पूरी जिंदगी अकेली ही रहो। जिस उम्र में तुम हो मैं उससे गुजर चुका हूं। रियलेटी को एक्सैप्ट करना सीखो.........वैसे रियलेटी उतनी बुरी भी नहीं है।

मैं जानता हूं कि तुम्हें काफी बुरा लग रहा होगा। तुम्हें लगता है, मैं तुम्हारे बारे में बुरा सोच सकता हूं। कभी नहीं होगा ऐसा और न ऐसा कभी हो सकता है। तुम्हें एक न एक दिन सच्चाई को मानना ही होगा।

............लेकिन................लेकिन दिल छोटा मत करो, क्योंकि दुनिया के किसी कोने में एक ऐसा शख्स है जो हमेशा तुम्हारे साथ है, और रहेगा, हमेशा।

मेरे लिए तुम हमेशा ‘स्पेशल’ रहोगी, और मैं स्पेशल लोगों को दुखी नहीं देख सकता, कभी नहीं।

प्लीज कभी दुखी मत होना,..............क्योंकि तुम खुश हो तो मैं खुश हूं।"

-harminder singh

Saturday, June 12, 2010

एक उम्मीद के साथ जीता हूं मैं




ये उम्मीद जो है न, बहुत अजीब चीज है। इसने मुझे जीने का हौंसला दिया है। ......मैं थका था जरुर कभी, लेकिन उम्मीद लगाता हूं कि एक दिन सब अच्छा होगा और.........और आज तक उम्मीद ही तो लगाये हैं मेरे जैसे इंसान। शायद उनके जीने की वजह ये ही है।

मुझे मालूम है कि एक पल जीवन का कितना कठिन होता है इस उम्र में। मामूली जख्म भी काफी दर्द दे जाता है। पता नहीं क्यों दर्द को सहने की आदत सी जो पड़ गयी है। शायद यही बुढ़ापा होता है- सहना और सहते जाना।

मैंने कभी नहीं चाहा कि किसी को कष्ट पहुंचे। सबसे प्रेम करता रहा जीवन भर और........और आज जब मैं अकेला हूं, कोई मेरे पास नहीं फटकता। ऐसा क्यों होता है? क्यों अपने वक्त के साथ पराये हो जाते हैं? क्यों कोई जर्जर काया वालों को नहीं पूछता? क्यों हर कोई बचने की कोशिश करता है? क्यों?.............इस क्यों का सवाल मुझे आजतक नहीं मिल सका।

एक जिंदगी और हजार बातें। ठहर कर चलने की आदत। एक मु्ट्ठी और रेत के हजार कण। कैसा महसूस होता है जब रेत धीरे-धीरे हाथ से फिसल जाती है। रेशे-रेशे की चमक आज फीकी मालूम पड़ती है। जायके की मत पूछिये, वह तो रहा ही नहीं।

.........लेकिन एक चीज अभी बाकी है, जो बाकी ही रहेगी। ........उम्मीद अभी बाकी है। मैं जी रहा हूं इसी उम्मीद के साथ कि एक दिन सब ठीक होगा।.........शायद बुढ़ापा भी एक दिन जी खोल कर हंसेगा........उस दिन न दिवाली होगी, न ईद, न होली..........बस जश्न होगा, अनगिनत रंगों की चमक का, लेकिन उसके लिए खुदा के घर का इंतजार है।

-harminder singh

Wednesday, June 9, 2010

ऐसा क्या है जीवन में?

मैं कभी-कभी हैरत में पड़ जाता हूं। ऐसा क्या है जीवन में जो उसे चलाता है? पता नहीं क्या है जिससे यह जीवन चलता है? .........पर हम खुश हैं कि जीवन चलता है।

‘‘कुछ कहते नहीं बन रहा ..........वो क्या चीज है जो चलाती है जीवन को ..........’’- शारदा अरोरा जी  का यह कमेंट आज सुबह से ही मेरे जहन में घूम रहा है।  कुछ नमी अभी बाकी है  इस शीर्षक पर शारदा जी ने यह कमेंट किया था। इसका अर्थ बहुत गहरा है और शायद उसे विस्तार देना इतना आसान नहीं। हां, कई तरह से हम उसपर विचार जरुर कर सकते हैं।

जीवन की पहेली जितनी सुलझाने की कोशिश करते हैं, उतनी उलझती जाती है। मैं खुद को उलझा हुआ पाता हूं।

सवालों के ढेर पहले से ही इतने हैं कि उनका उत्तर देते ही नहीं बनता। जीवन हम जीते हैं जिसका सवाल हम हल नहीं कर पा रहे। यही तो जीवन का रहस्य है।

एक उलझी हुई कहानी जो जारी है। बस इतना कह सकता हूं कि कुछ तो है ऐसा जिससे यह जीवन चलता है।

-harminder singh

Tuesday, June 8, 2010

फंदे में बंदर


गांव के प्राइमरी स्कूल में एक मास्टर साहब छुटिट्यों में बच्चों को पढ़ाते थे। लोग उन्हें दलपत मास्टर के नाम से पुकारते थे। उनका स्वभाव दूसरे शिक्षकों की तरह बिल्कुल नहीं था। उन्होंने आजतक किसी बच्चे पर हाथ नहीं उठाया था। गांव के सभी बच्चे और बड़े उनका बहुत सम्मान करते थे। दादी ने मुझसे कहा कि मैं जितने दिन गांव में हूं, उतने दिन उनसे कुछ पढ़ लूं। मैंने रघु से पूछा, उसने हां कर दिया।

  मास्टर जी से मेरी काफी पटने लगी। रघु की बहन गीता भी किताबें लेकर वहां पहुंच जाती।

एक दिन बादल घिर आये और तेज बारिश शुरु हो गयी। मैंने रघु से कहा,‘‘शायद आज मास्टर जी स्कूल न पहुंचें। इसलिए हम आज पढ़ने नहीं जा रहे।’’

  मास्टर जी के पास एक पुरानी साईकिल थी जिससे वे स्कूल आते थें कच्चे रास्ते थे, बरसात में टूट-फूट जाते और उनमें पानी भर जाता, कीचड़ हो जाता।

  रघु कहां मानने वाला था। वह बोला,‘‘मैं स्कूल जा रहा हूं। तुम्हें आना है तो आओ।’’ उसने छाता सिर पर किया और चलने को हुआ। मुझे भी उसके साथ चलना पड़ा। वह गाना-गुनगुनाता आगे बढ़ रहा था। किताबों को हमने पोलीथिन की थैली में रखा था ताकि पानी उन्हें नुक्सान न पहुंचा सके।

  गाना पुरानी फिल्म का था। मैं भी उसके साथ शुरु हो गया। बोल थे,‘‘सुहाना सफर और ये मौसम..........।’’

  तभी रघु ने मेरे कान में कहा,‘‘सामने देख।’’

  हम रुक गये। बरसात तेज होने लगी थी। पानी घुटनों तक आने को आतुर था।

  सामने जो नजारा था, उसे देखकर हमारी आंखें खुली रह गयीं।

  मैंने कहा,‘‘अरे! ये तो मास्टर दलपत हैं। इन्हें क्या हुआ?’’

  मास्टर साहब कीचड़ में साइकिल सहित गिरे थे। उनका चश्मा दूर जाकर गिरा। बिना चश्मे के उन्हें चमकता नहीं था। वे उसे तलाश कर रहे थे। हम दौड़कर उनके पास पहुंचे और चश्मा उन्हें पकड़ा दिया। चश्मा लगाकर उन्होंने ऊपर देखा और कहा,‘‘तुम इतनी बरसात में भी पढ़ने आये हो।’’

  ‘‘जब आप हमें पढ़ाने के लिए अपनी परवाह नहीं करते। हम आपके शिष्य ठहरे।’’ रघु बोला।

  दलपत जी हमारे संग स्कूल आ गये। इतने में बारिश थम गयी। हमने उनके कपड़े हैंडपंप पर धुलवा दिये। मैं घर जाकर कुछ कपड़े ले आया। मास्टर जी ने उन्हें पहन लिया।

  सूरज चमकने लगा था। कपड़े धूप में सूख रहे थे कि तभी एक बंदर वहां कहीं से आ गया। मुझे डर था कहीं वह कपड़ों को उठा न ले जाए। हुआ वही जिसका डर था। बंदर कपड़े उठाकर ले गया। वह उछलकर शहतूत के पेड़ पर चढ़ गया। रघु ने काफी कोशिश की, लेकिन वह नहीं उतरा। उल्टे गुस्से में उसने मास्टर जी के कपड़े अपने पैने दांतों से फाड़ने शुरु कर दिए। मास्टर जी चिल्लाते रह गए, पर बंदर पर कुछ असर न हुआ। धीरे-धीरे कपड़ों के फटे टुकड़े नीचे गिरते रहे।

  इतने में प्रीतम किताबें लेकर पढ़ने आ गया। उसके पास गुलेल थी। रघु ने उससे घर जाकर गुलेल लाने को कहा। बंदर अभी तक पेड़ पर चढ़ा था। मुझे गुस्सा आ रहा था। मैंने रघु से कहा,‘‘इसे छोड़ना मत रघु। इस पेड़ से बाकी पेड़ बहुत दूरी पर हैं। बंदर उतनी लंबी छलांग लगा नहीं सकता और नीचे हम खड़े हैं, आ नहीं सकता। फंस गया बच्चू, इसकी खैर नहीं।’’ मैं पूरे ताव में आ चुका था।

  जानवर कितना भी चालाक क्यों न हो, इंसान उसे काबू में कर ही लेता है। रघु ने स्कूल से कहीं एक रस्सी तलाश कर ली। प्रीतम अभी आया नहीं था। रघु ने रस्सी का एक फंदा बना लिया। वह बिना डरे पेड़ पर चढ़ गया। फंदा उसके हाथ में था। बंदर उसे घुड़की देकर नीचे गिराने की जुगत में था। पर रघु ने पेड़ से एक टहनी तोड़ उसे डराना चाहा। वह उछलकर ऊपर शाखाओं की तरफ कूदा। तभी प्रीतम गुलेल ले आया। रघु बोला,‘‘अभी इसकी जरुरत नहीं है। देखते जाओ मैं क्या करता हूं।’’

  रघु ने रस्सी का फंदा ऊपर शाखाओं में उछाला। फंदा टहनियों में उलझ गया। रघु ने फिर कोशिश की। बंदर जैसे ही फंदे से बचने को उछला उसका एक पैर फंदे में फंस गया। रघु ने रस्सी को खींचा, तो फंदा पैर में कसता चला गया। रस्सी को नीचे गिरा दिया गया और रघु पेड़ से उतर गया।

  फिर रघु बोला,‘‘अब होगा कमाल। बंदर होगा बेहाल।’’

  रस्सी काफी लंबी थी इसलिए उसका छोर हैंडपंप से बांध दिया गया। रघु ने सबको छिपने को कहा। किसी को आसपास न पाकर बंदर पेड़ से उतर गया। पर यह क्या फंदा उसके पैर में था। वह जितना जोर लगाता, फंदा कसता जाता। चूंकि रस्सी हैंडपंप से बंधी थी, इस कारण बंदर उसके चारों ओर गोल-गोल चक्कर काटने लगा। उधर रस्सी हैंडपंप से लिपटती जा रही थी और बंदर उसके करीब आता जा रहा था। हम सब उस दृश्य को देखकर ठाठे मार हंस रहे थे।

  रघु ने प्रीतम से कहा,‘‘ला गुलेल। खेल शुरु करते हैं।’’

  रघु ने गुलेल से बंदर पर निशाना लगाना शुरु किया। जैसे ही गुलेल का कंकड़ बंदर को लगता, वह उछल जाता।

  ‘‘मार निशाना।’’ मैंने कहा। ‘‘ये भी क्या याद करेगा।’’

  ‘‘जिंदगी भर इसे यह सजा याद रहेगी, भूल नहीं पायेगा।’’ प्रीतम उत्साहित होकर बोला।

  बंदर पर गुलेल से चोटों का प्रहार जारी था। इस घटना से बंदर-बुद्धि का पता चल गया था। उसने अपने हाथों से बिल्कुल कोशिश नहीं कि फंदे को जरा-सा भी खोलने की। सिर्फ पैर से उसे खींच कर कसता रहा।

  इस उछलकूद का आनंद ले ही रहे थे कि तीन बंदर वहां आ धमके। वे साथी बंदर के आसपास शोर करने लगे। तभी बंदरों का समूह आ गया। मास्टर जी शायद स्थिति को भांप गये थे। वे हमें लेकर स्कूल की कक्षा में छिप गये।  दरवाजा अंदर से लगाकर हम खिड़की से सारा दृश्य देखने लगे। बंदर रस्सी को खींचने की कोशिश करते, कुछ उछलकर चीख मचाते।

  मैंने खिड़की से बाहर हाथ निकाल रखा था कि अचानक कहीं से मेरा हाथ किसी ने जोर से खींचा। मेरी चीख निकल गयी। सामने एक मोटा बंदर था जिसकी शक्ल देखकर मेरे प्राण निकल गये। वह मेरा हाथ पकड़कर खींचने लगा जैसे मुझसे रस्सी खोलने को कह रहा हो। तभी रघु ने गुलेल से उसके सिर पर निशाना मारा। बंदर ने मेरा हाथ छोड़ दिया और वह चीं-चीं करता भाग गया। मैंने चैन की सांस ली।

  करीब एक घंटा बीत जाने के बाद सभी बंदर अपने बंधे साथी को छोड़कर वहां से चले गये। मास्टर जी ने कहा,‘‘बहुत हो चुका। बेचारा काफी दुखी है। रघु जाओ उसे खोल दो।’’

  रघु ने बंदर को आजाद कर दिया। रस्सी से खुलते ही वह सरपट दौड़ा।

  गांव में जब यह बात पता लगी तो सभी हंसते-हंसते लोटपोट हो गए। गीता तो कुरसी से पीछे पलट गयी। उसकी बांह में फिर मोच आ गयी, लेकिन अबकी बार मामूली थी।


-harminder singh

-अगले कहानी: चाय में मक्खी

इंसान और भगवान

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इंसान झंझावातों से बचना चाहता है। पर वह ऐसा कर नहीं पाता क्योंकि वह इंसान है, भगवान नहीं। भगवान को हम पर दया नहीं आती या हमारा उसपर से भरोसा उठ गया है। खैर.......जो भी तो मैं उसे भूलना नहीं चाहता। मेरा भरोसा कम नहीं हो सकता। मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात है कि मेरा उससे नाता है। वैसे हम सबका उससे जुड़ाव है। जब कोई साथ नहीं होता, तब वह होता है। हर पल उसकी हमपर निगाह रहती है। वह हमारा कितना ख्याल रखता है। हम हैं कि उसका नाम लेने से बचने की कोशिश करते हैं। पर वह बुरा नहीं मानता। कितना भला है वह, बिल्कुल उसे बुरा नहीं लगता, चाहें कोई उसके बारे में किसी तरह की भी सोच क्यों न रखता हो।

मैं सुबह-शाम भगवान को याद करता हूं। मैं उससे सबकी शांति की दुआ मांगता हूं। मैं अपने परिवार, साथियों और विरोधियों के लिए भी सब ठीक होने की ईश्वर से फरमाईश करता हूं। अपने लिए कहता हूं कि मैं जल्द अपने परिवार, बच्चों को देख सकूं। ईश्वर मुझे शक्ति प्रदान करे कि मैं हालातों के हाथों मजबूर होने के बजाय उनसे कड़ा मुकाबला करुं बिना हताश हुए।

मांगने को हम बहुत भगवान से मांग सकते हैं। उसके दर पर देर हैं, अंधेर नहीं। यह हम अच्छी तरह जानते हैं। उसकी चौखट हर जगह है। वहां से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता। वह किसी भी समय अपनी झोली से हमारी गोद भर सकता है। सच्चे अर्थों में वह महान है। बिना उसकी मर्जी के एक पत्ता तक हिलता नहीं- यह भी हम कहते हैं। उसकी ताकत से इंसान अंजान नहीं है, पर वह अपनी शक्ति का बेमतलब परिचय देता रहता है। यहीं से वह भगवान की नजरों में बहुत छोटा सा बन जाता है।

contd...

-harminder singh

Monday, June 7, 2010

कहानी की शुरुआत फिर होगी

कहानी की शुरुआत होती है। .......और जल्द ही वह सिमट भी जाती है। कुछ लोग मिल जाते हैं और कम समय में हमारे लिए ‘स्पेशल’ भी हो जाते हैं। फिर कहानी मोड़ लेती है क्योंकि कुछ नये लोग उसमें दाखिल हो जाते हैं। फिर कहा जाता है-‘‘यह कहानी ही तो थी। ऐसी अनोखी, जहां से शुरु, वहीं खत्म हो गयी।’’

अब उम्मीद है कि कुछ नया होगा। नये पात्रों का उदय होगा। पुरानी बातें शायद फिर न दोहराई जाएं क्योंकि आज उनका महत्व नहीं रहेगा। उन खुश्नुमा पलों की शायद याद आये, कभी जब दो अनजान लोग मिलकर हंसे थे एक साथ। आज दरार में फासला इतना बढ़ चुका कि नजरें चुराने का मन करता है।

कुछ कुंठाएं पता नहीं कैसे विकसित हो गयीं। मन को पक्का करने की कोशिशें जारी हैं। ......लेकिन मन कहां मानने वाला है।.......फिर से भावनाओं में बहना चाहता है। उस ‘स्पेशल’ इंसान से ढेर सारी बातें करना चाहता है। मगर वह रुक जाता है यही सोचकर कि कहानी को यहीं विराम दिया जाए।

अब नये सवेरे की तलाश है जब फिर से किसी के लिए कोई ‘स्पेशल’ होगा। पुरानी गलतियों से सबक जो हासिल हुआ है उसका पालन किया जायेगा। .......लेकिन जो एक बार ‘अहम’ हो गया, इतना आसान नहीं उससे दूर जाना। फिर क्या इंसान पुरानी कहानी को संवारने की कोशिश करेगा। शायद हां.......पर वह एक बार सोचेगा कि काफी देर हो चुकी। उन पलों को सिर्फ यादें ताजा रखेंगी।

काश! ऐसा न होता। हमसे कोई न छूटता। लेकिन परिस्थितियां हमारे बस में नहीं होतीं। टूटकर बहुत कुछ बिखर गया, अब एहसास होता है। टुकड़े बिखरे जरुर हैं लेकिन उस ‘स्पेशल’ इंसान का चेहरा उनमें अभी भी वैसा ही चमक रहा है, जगमगाता हुआ, हंसता हुआ।

कल कुछ था, आज कुछ। सच मानो, वक्त ही ऐसा था। दूर हो गया कोई किसी से, बिना बोले, बिना कहे, फिर से न मिलने के वादे के साथ।

उम्मीद है वह खुश रहे हमेशा। इसी तरह चहकता रहे सदा।

दुनिया के किसी कोने में कोई शख्स ऐसा भी है जो मुस्करा कर उस ‘स्पेशल’ इंसान से कहेगा-‘‘मैं खुश हूं, क्योंकि तुम खुश हो।’’

-harminder singh

Sunday, June 6, 2010

अपनेपन की तलाश

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मेरी कहानी बहुत पहले शुरु हुई थी। उसमें मेरा अनुभव है जिसे शब्दों के धागों से बांधकर मैंने कोरे पन्नों पर उकेरा है। मेरे साथ इस सफर में कई लोग जुड़े, मगर अब्दुल और सादाब से मुझे बेहद लगाव है। अब्दुल तो कब का चला गया, सादाब पता नहीं कितने दिन और मेरे साथ रहेगा। उसकी मां से मैं मिलना चाहता हूं। मुझे काफी अच्छा लगेगा।

जब हम दुनिया से दूर होते हैं, तब हमें अपनेपन की तलाश रहती है। कुछ लोग इस बीच ऐसे ही मिल जाते हैं। उनसे ढेर सारी बातें होती हैं। बातें इतनी की वक्त कब गुजर गया पता ही नहीं चलता। उनमें अपनापन ढूंढने की जरुरत महसूस नहीं होती क्योंकि हम उन्हें अपना पहले ही मान चुके होते हैं। उनकी एक पल की मुस्कराहट जानें कितने जनमों की थकान दूर कर देती है। उनकी मुस्कराहट हमारे मन को हरा कर जाती है। उनकी एक मुस्कराहट हमारी ऊर्जा को कई गुना बढ़ा जाती है। उनकी हल्की मुस्कराहट जीवन जीने का तरीका बदल जाती है। उनकी मुस्कराहट हमें सुकून पहुंचाती है।

हमारी दुनिया बदल जाती है और हम अलग संसार के मीठे पलों में जीना शुरु कर देते हैं। हम उन लोगों को अपना मान कर उन्हें अपना हाल सुनाते हैं। हम विश्वास करने लग जाते हैं कि हमारी दुनिया का वे भी एक हिस्सा हैं। उनकी जिंदगी के उतार-चढ़ावों को महसूस करते हैं। उनके गमों की झोली का भार हम उन्हें बांटकर कम कर लेते हैं।

जीने का मतलब समझ आने लगता है। ऐसा बहुत कुछ हमारे मन को लगता है जिससे हम एक तरह की संतुष्टि का अनुभव करते हैं। दिल की बातों को उनसे छिपाने का साहस नहीं होता। लगभग विचारों के एक समागम का प्रारंभ हो रहा होता है जिससे दो अजनबियों के बीच की दूरियां सिमट रही होती हैं। हम अनजान होकर भी अनजान नहीं होते। इससे वास्ता हमारे जीवन को है। तन्हाईयों को कम कर वक्त में कई पल की खुशियां खालीपन को भी सिमेती हैं। अपनापन क्या होता है यह तब पता लगता है। अपनों का सुख कैसा होता है, इसका एहसास भी तभी होता है।

मुझे अपने नहीं मिले क्योंकि मैं एक वीरान, नीरस और उधड़े हुए संसार में रहने वाला एक कैदी हूं, जिसे लोग हत्यारा कहते हैं। यादों का बसेरा धीरे-धीरे बिखर रहा है जिसके तिनके इधर-उधर छिटक कर टूटे फर्श पर फैल गये हैं। स्मृतियों का मौसम पतझड़ में बदल गया है। उनका धुंधलापन समय की देन है। समय की ताकत अद~भुत है। कितना संभल कर इंसान क्यों न चले समय का मामूली थपेड़ा उसे हिला कर रख देता है।

contd....

-harminder singh

Saturday, June 5, 2010

दूसरों का साथ

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मैंने बूढ़ी काकी से पूछा,‘‘हमें दूसरों की जरुरत क्यों पड़ती है?’’

काकी बोली,‘‘देखने में सवाल कितना सरल है। उत्तर तलाशने की जरुरत है जो उतना सरल नहीं। कुंए का तल छूने वाले कम होते हैं जबकि पानी कोई भी पी सकता है। मैंने हमेशा गहराई से विचार किया है।’’

कुछ समय बाद काकी ने कहा,‘‘हौंसला देते हैं हमें दूसरे। सहारा देते हैं हमें दूसरे। ........और जीवन जुड़कर जिया जाता है, न कि अकेले। अकेले रहकर नीरसता की बाहों में सिमटने से बेहतर है, लोगों के बीच रहना। हम नीरस क्यों रहें? अकेले क्यों रहें? अब जब कोई साथ न हो तो खुद से ही दोस्ती कर लेनी चाहिए। शायद कुछ लाभ मिले। मगर जीवन कहता है कि जब लोग आसपास हैं तो उनके साथ जिया जाये।’’

‘‘मैं आज अकेली हूं। कल ऐसा नहीं था। अपने माता-पिता के घर से विदाई के बाद तुम्हारे काका और मेरा साथ था। एक परिवार से दूसरे परिवार का सफर नई जिंदगी की शुरुआत थी। अब मैं अकेली हूं, लेकिन तुमसे बातें कर शायद खालीपन को दूर करने की कोशिश करती हूं।’’

‘‘इंसान मुस्कराते हुए अच्छे लगते हैं। तुम्हारे साथ मैं मुस्करा सकती हूं चाहें समय कम ही सही। मुझे काफी हौंसला मिला क्योंकि मैं इस उम्र के आखिरी पड़ाव में बिल्कुल निराश हो गयी थी। बूढ़ों को समझते कम लोग हैं, तुमने समझा। बूढ़ों से दूर होते हैं सब, तुम नहीं हुए। हमारे जैसों के लिए यही काफी है कि कोई दो शब्द कहता है, हम भी कहते हैं। कोई हमारी सुनता है, हम उसकी सुनते हैं। यह इंसानी रिश्ते की व्याख्या स्वत: ही कर देता है।’’

‘‘बोझ और तसल्ली दोनों जीवन में होते हैं। बोझ कम करने या खत्म होने पर तसल्ली का अहसास होता है। इसका कारण और निवारण लोग ही हैं। इंसान को भगवान ने अकेले जीवन व्यतीत करने के लिए नहीं कहा। उसे लोगों के बीच रहकर जिंदगी का स्वाद मिलता है। रुखे हो जाते हैं अकेलेपन में लोग। दुनियादारी यही कहती है:

"बिता लो जीवन पूरा,
 रह न जाए कोई बात अधूरी,
 सिमट न जाएं हम खुद में,
 इसलिए साथ है जरुरी’’

‘‘तुम जानते हो कि अपनों का अपनापन हृदय को कितनी तसल्ली देता है। वे अपने ही होते हैं जो हर पल हमारा हाथ थामे रहते हैं। वे जब भी हमारे पास हैं, हमारे साथ हैं जब लड़खड़ाते हैं हम। गिरते हैं तो सहारा भी अपने ही बनते हैं।’’ काकी ने कहा।

मैंने सोचा कि इंसान इंसान बिना निर्जन है। वैसे ही जैसे बिन पत्तों के पेड़। हमें ठूंठ नहीं बनना जो खड़ा तो सीधा है, पर वह जीवन के सुनहरेपन की वादियों के मोड़ों से नहीं गुजरा।

एक पीड़ा जो अंतहीन है उसका असर कम होना चाहिए ताकि जीवन उपहास न करे। मैला जीवन किसने बताया। लोगों की हंसी इसे साफ कर देगी और उनका साथ भी। दुख होंगे कम। आंख होगी नम। यह नमी हर्ष की होगी।

-harminder singh

Friday, June 4, 2010

कुछ नमी अभी बाकी है

उस ठूंठ को मैं देख रहा हूं। वह मेरे सामने है। उसकी काया मेरी तरह है। फर्क इतना है कि वह जीवन से हार गया, मेरी जंग जारी है।

पता है पहले वह हरा-भरा था। चिड़ियां चहचहाती थीं उसपर। कितना आंनद था। कितना सुहानापन था।

आज वह सूना है। कोई पास नहीं, लेकिन देखो न फिर भी वह खड़ा है। यह जीवन की दास्तान है- कभी शुरु हुई थी, अब खत्म हो रही है।

रुखापन सिमटा हुआ मेरे साथ चल रहा है। विवशता का आदि होना पड़ता है। समय ही ऐसा है।

अगर कोई चौराहा है, तो सभी रास्ते एक से हैं। वही वीरान राहे हैं जहां हमेशा सूखी हरियाली शरण लिए रहती है। एहसास होता है कि कुछ नमी अभी बाकी है।



-harminder singh

Thursday, June 3, 2010

अपनेपन की तलाश

वरुण के दादा अपने पोते को बहुत चाहते हैं। वे उसके पास कुछ पल बिताने की इच्छा रखते हैं। पोता दादा की भावनाओं की कद्र नहीं करता क्योंकि वह बुढ़ापे के बहते प्रेम को आंक नहीं सकता।

वरुण के माता-पिता नौकरी करते हैं। उनके पास समय नहीं। दोनों सुबह जाकर देर रात घर लौटते हैं। तब तक वरुण सो चुका होता है। उसकी उम्र यही कोई 14-15 साल है। वह सुबह स्कूल जाता है। लौटने के बाद ट्यूशन। फिर शाम को दोस्तों संग थोड़ा समय बिताता है। उसके बाद पढ़ाई-लिखाई कर जल्दी सो जाता है। तभी पढ़ाई में वह औसत है।

बेचारे दादा जी घर में इधर से उधर टहलते रहते हैं।

रविवार के दिन पूरा परिवार साथ होता है। लेकिन उस दिन वरुण को मम्मी-पापा कार से कहीं घुमाने ले जाते हैं। मां कहती है वरुण से,‘‘बेटा कहां जाना चाहोगे।’’ वरुण के दादाजी से कोई कुछ नहीं कहता। वे रविवार को भी अकेले रह जाते हैं।

शायद वे एक ऊबी हुई वस्तु की तरह हो चुके हैं जिसे कोई पसंद नहीं करता। वरुण मौल में घूमता है। ढेर सारी शापिंग होती है। खुशियों के सामान समेटे जाते हैं। घर में दादा जी मायूसी में लिपटे बाट जोह रहे होते हैं।

यह घर हर सुख-सुविधा से भरा है। दा्दा जी बच्चों से खुश हैं। बच्चे उन्हें दुखी नहीं करते। जिस चीज की जरुरत पड़ती है, उपलब्ध हो जाती है। अभी कुछ दिन पहले उनकी आंखें चैक करवाई गईं। मामूली खांसी होने पर डाक्टर के पास ले जाते हैं।

‘‘कमी किस बात की है, सब कुछ तो है आपके पास।’’ मैंने उनसे पूछा।

उनका उत्तर था,‘‘बेटा, बच्चे इतने करीब रहकर भी, कितने दूर हैं।’’ यह कहकर उनके आंसु निकल आये।

मैंने उनका हाथ थामा और उन्हें भावनात्मक तसल्ली देने की कोशिश की। उन्होंने मेरी तरफ देखा। हल्की मुस्कान थी चेहरे के साथ आंखों में, क्योंकि कोई था उनके साथ, जो अपना न सही, पर पराया होते हुए भी अपना लग रहा था।

-harminder singh

Saturday, May 29, 2010

सीधी बात नो बकवास

पूरी तरह तो याद नहीं कि जैस्सी जी ने हमारी क्लास कब ज्वाइन की थी। जब वे हमारी क्लास में पहली बार आईं थीं तो हम ज्यादातर बच्चों ने उन्हें अजीब समझा था। वे दक्षिण भारतीय पृष्ठभूमि से नाता रखती हैं। साइंस की क्लास में उनका घंटा शुरु होते ही उतनी फुर्ती से आना कई बार आगे बैठे लोगों का बैंड बजा देता था। मेरा पाला वैसे उनसे कम ही पड़ा। वैसे भी मेरा नेचर कुछ शर्मीला था। मैं शायद टीचरों से बचने में ही समझदारी समझता था। क्या पता कब कौन सा सवाल दाग दें और आपसे न बात बने, न सवाल उचरे। मतलब रोटी गले में ही अटकी रह जाये। फिर पानी पीने को अंधों की तरह ग्लास ढूंढते फिरो।

जब जैस्सी जी का घंटा आता तो मैं थोड़ा बेआराम महसूस करता। पता नहीं स्टूडेंट्स के साथ ऐसा क्यों होता है? टीचर के सामने चूहे और बाद में शेर। वैसे मुझे न ही गुर्राना आता था और न ही दुम दबा कर भाग जाना। और हां,...न ही मैं अपने समय में खरगोश हुआ करता था। वैसे मेरे कुछ साथी खुद को चीता समझते थे, पर बाद में वे भी भीगी बिल्ली बन गये थे। जैस्सी जी क्लास में प्रवेश बाद में करतीं सवाल का प्रहार पहले शुरु हो जाता। मेरे कुछ साथी कलम या पैंसिल गिराकर छिपने की असफल कोशिश करते। क्योंकि टीचर की निगाह से वे बच नहीं पाते थे। एक टीचर के सामने सारे बच्चे शायद चूहे की तरह ही होते हैं, जिन्हें एक कुर्सियों और मेजों वाले शानदार फर्श वाले बिल में कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाता है। लेकिन ऐसा मुझे कभी लगा नहीं। आज जब मैं पुराने दिनों को याद करता हूं तो पाता हूं कि वाकई वे दिन शानदार थे। शिक्षकों की एक-एक बात आज बिल्कुल साफ हो रही है। शायद वे हमारे भविष्य के लिए हमें बिल में बंद किये थे। वैसे बिल में पंखे भी लगे थे। अरे हां...खिड़िकयां तो मैं भूल ही गया। लेकिन अगर किसी ने खिड़की का कांच जानबूझकर या धोखे में तोड़ दिया तो जुर्माना देने के लिए प्रिसिंपल तैयार हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई जानबूझकर खिड़की का कांच तोड़ेगा।

एक बात बहुत महत्व रखती है कि आप खुद पर कितना भरोसा करते हैं। हम कहते हैं कि आत्मविश्वास भी कोई चीज होती है। जैस्सी जी में वह आज भी उतना ही बरकरार है। मुझे उनके विषय में सुनने को मिल जाता है। वे उस दिन मेरे पास से मुस्कराते हुए गुजरी थीं। कमाल है न कि हम कई बार ऐसे हो जाते हैं कि पता ही चलता कि कहां हैं? इतने सालों बाद मुलाकात करने जा रहे हैं उन लोगों से जिनसे आपने जिंदगी के पायदान पर चलना सीखा। उनके सामने आने पर आप उनसे चंद शब्द नहीं कह पाये। क्या मुस्कराकर आप उनका उधार चुकता कर सकते हैं? शायद नहीं, लेकिन उस समय मैं शायद खुद को कुछ ज्यादा ही भावुक कर बैठा था।

कैमिस्ट्री मुझे उतनी बेहतर कभी नहीं लगी। मगर जैस्सी जी ने हमारी क्लास में बच्चों में एक उत्साह जगाने की कोशिश की। एक तरह की एनर्जी का संचार करने की कोशिश की गयी। कुछ बातें जो उन्होंने बताई थीं शायद ही कोई मेरा साथी भूला होगा। कैमिकल्स से दोस्ती करना हमें आ ही गया था। एक बात ओर मेरे दसवीं में सांइस में सर्वाधिक नंबर आये थे। बायोलोजी के एक्सपैरिमेंट भी उन्होंने कई कराये थे।

एक बार की बात है हमें बायो लैब ले जाया गया। हमें आनियन पील (प्याज की छील) को माइक्रोस्कोप से देखना था। जैस्सी जी ने पहले हमें खुद करके दिखाया कि किस तरह माइक्रोस्कोप को सैट किया जाता है, बगैरह, बगैरह। स्लाइड को किस तरह तैयार किया जाता है, यह भी हमने सीखा। उन्होंने साथ में यह भी हिदायत दी कि स्लाइड को तोड़ मत देना। मैं खासकर काफी उत्साहित था। मेरे तमन्ना थी कि जो मैंने किताबों में देखा है, उसे आज वास्तव में देखने का मौका मिल रहा था। था न अजीब अहसास। हमने स्लाइड तैयार कर ली थी। माइक्रोस्कोप से एक्सपैरिमेंट को किया भी। मेरे पास के एक लड़के ने पता नहीं कैसे अपनी स्लाइड चटका दी और धोखे से मेरी जगह रख दी। मुझे सब पता था पर यह वह जानता था या मैं या फिर भगवान जिसके किसी अदालत में कभी बयान नहीं लिये गये। मैं मन की मन डर रहा था कि अगर जैस्सी जी को पता लग गया तो मैं तो गया काम से। उन्होंने शायद ही मुझे कभी डांटा था। मगर डर तो सबको लगता है। यहां उस समय माउंटन ड्यू नहीं थी जो कह सकता कि डर से मत डरो, डर के आगे जीत है।

घबराहट सिमटने का नाम नहीं ले रही थी। तभी जैस्सी जी की नजर चटकी हुई स्लाइड पर पड़ गयी। उन्हें लगा कि मैंने स्लाइड को तोड़ दिया। उन्होंने यह कहा,‘हरमिन्दर यह क्या कर दिया?’। आसपास के सभी बच्चे मेरी तरफ देख रहे थे। जब नजरें घूरती हैं भरी महफिल में तो कैसा एहसास होता है, यह हम जानते हैं। मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। आज भी मेरे वह बात याद है और शायद जिंदगी भर याद रहे। शुभांगी और सुमित को मैंने यह एक बार बताया भी था। बाद में क्लास में आकर भी उन्होंने उस बात को   दोहराया कि बच्चे अपना एक्सपैरिमेंट ढंग से नहीं कर सकते। ऐसा आगे से नहीं हो। मैं क्या कह सकता था? मैंने उनसे कहा भी कि मैंने ऐसा नहीं किया। कोई गवाह भी तो नहीं था। अब भगवान को तो उनके सामने पेश नहीं किया जा सकता था। जो देखा था, वह दिख गया था। मेरा पूरा दिन खराब ही गया होगा और क्या? अब मैं उनसे कभी मिलूंगा तो इस बात को जरुर    बताउंगा कि आपने मुझे धोखे में ऐसा कह दिया था। उस समय तो बुरा लगा मगर आज समझ आता है कि उनका कहना सही था। जो उन्होंने देखा कहा और उनकी जिम्मेदारी बनती थी लैब के रखरखाव की। आगे उन्हें जबाव देना था, हमें नहीं।

वक्त के साथ काफी कुछ धुंधला पड़ जाता है। लेकिन कुछ लोग फिर भी उसी तरह कभी न कभी याद आ ही जाते हैं। हम उनसे बहुत कुछ सीखे थे और उनकी सीखें शायद ही कभी भूल पायें। जैस्सी जी से आप कुछ सीख सकते हैं तो वह बिना थके पढ़ना। उनमें समझाने की एक अलग तरह की खूबी है जिसे मैं समझता हूं कि विज्ञान के शिक्षकों में होना बहुत जरुरी है। मुझे पता है कि हम उनकी क्लास में कभी बोर नहीं हुए, हां कई बार सहम जरुर गये। वैसे वे आपको डराती नहीं, आप खुद घबरा जाते हैं। भई उनके मुताबिक जो सही है, वह तो सही ही है। कुछ खरी बातें कह देंगी, लेकिन उनसे पढ़ाई बेहतर ही होगी क्योंकि वे बातें आपके भले के लिए ही होंगी। उन्होंने मुझे काफी प्रभावित किया। यही कारण था कि कुछ शिक्षकों को मैं कभी भूल नहीं सकता। वे किसी न किसी तरह जेहन में रहेंगे ही।

मैं चाहता हूं कि एक दिन उनकी क्लास में बैठकर फिर से पुराने दिनों को याद करुं। शायद इसी बहाने कुछ पहले जैसा हो जाये। स्कूल के दिन तो स्कूल के ही होते हैं। पता नहीं क्यों जब हम उन्हें जीते हैं तो उतने अच्छे नहीं लगते, जबकि याद करने पर बड़े ही शानदार लगते हैं। यकीनन।

वैसे जैस्सी जी के बारे में एक बात कहना    चाहूंगा-‘‘सीधी बात नो बकवास।’’

-harminder singh

Tuesday, May 25, 2010

मन कहता है

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आज सुबह से सादाब का चेहरा रुखा नहीं लग रहा। उसने मुझे बताया कि उसकी अम्मी ने उसे हौंसला रखने को कहा है। वह उसे अच्छी तरह याद रहता है, लेकिन वक्त उसका हौंसला तोड़ता है। वक्त से लड़ने की ताकत किसी में नहीं। सादाब ने कई जबाव मुस्कराहट के साथ दिये।

ऐसा क्यों होता है कि किसी की मुस्कान आपके चेहरे की खोई रौनक लौटा देती है। हमें एहसास करा देती है कि हम अभी भी खिल सकते हैं। उन लोगों के साथ मित्रता किसी के जीवन को बदल सकती है जो सुख-दुख में एक समान रहते हैं। वे हर छोटी उपलब्धि का जश्न मनाने से नहीं चूकते। उन्हें लगता है कि हंसी-खुशी जीवन को बेहतर बना सकती है। ऐसा ही होता है जब हम उन लोगों से मुखातिब होते हैं जो हमें मुस्कराहट का मतलब बताते हैं।

मैं खुद को देखता हूं तो पाता हूं कि क्या मैं जीना भूल गया? क्योंकि मैं हंसना भी भूल गया।

जीवन तो जीवन है। यह आया है जाने के लिए। एक हवा का झोंका आया और हम वहां नहीं थे। पता नहीं क्यों नीरसता पीछा नहीं छोड़ती?

मन को उग्र और शांत करने के तरीके हमारे पास मौजूद हैं। हम उनका कितना उपयोग कर पाते हैं, यह हम स्वयं नहीं जानते। यह लिखते हुए सहज लगता है कि मन बैरागी हो गया। यह कहते हुए सहज लगता है कि हम कुंठा से पार पा सकते हैं। मेरा विचार है कि खुद की ऊर्जा को अच्छी तरह पहचाना जाए ताकि हर परेशानी का हल निकल सके। लेकिन मैं ऐसा करने में असमर्थ हूं। यह उतना आसान भी तो नहीं। अक्सर कुछ चीजें देखने में अच्छी लगती हैं, कहने में भी, लेकिन जब करने की बारी आती है तो उनसे पीछा छुड़ाने का मन करता है।

मन ये कहता है, मन वह कहता है। मन का काम ही कहना है। उसकी मान मानकर इंसान क्या से क्या हो जाता है। मेरी सोच यह कहती है मन के आगे हम बेबस हैं। यह बिल्कुल गलत नहीं है। मन की गलतियां इंसान को भुगतनी पड़ती हैं। आखिर हम इतने बेबस क्यों बनाए गए हैं? हमारे भीतर का इंसान कभी कमजोर है, तो कभी ताकतवर बन जाता है। यह अजीब ही तो है।

बाहर का प्रभाव हमें अंदर तक प्रभावित करता है। वह वक्त किसी भी तरह से उतना बेहतर नहीं कहा जा सकता।


-to be contd....

-harminder singh

Monday, May 17, 2010

इस बहाने खुद से बातें हो जायेंगी




मैं एकांत में कुछ बुन रहा हूं,

शायद ये वक्त ने मुझे सिखलाया है,

खुद से जूझ रहा हूं,

शायद यह भी वक्त की वजह से है,

शरीर से कुछ कह नहीं सकता,

वह तो केवल सहना जानता है,

चलो इस बहाने खुद से कुछ बातें तो हो जायेंगी।


-harminder singh

Friday, May 14, 2010

हम प्यार क्यों करते हैं?

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‘‘मुझे आज तक समझ नहीं आया कि हम प्यार क्यों करते हैं? इतना जरुर जानते हैं कि कोई रिश्ता ऐसा है जो हमें दिख नहीं पाता और हम प्यार करते हैं।

कई लोग ऐसे होते हैं जिनके साथ हम अलग-अलग तरह से प्रेम करते हैं। माता-पिता, भाई-बहन, दोस्त, आदि प्यार के बंधन में जकड़े हैं और हम उनके। यह प्यार ही तो है जो हमें अपनों से जोड़े रहता है।

प्यार एक अनजाना, न दिखने वाला एहसास है जो हमें बांधे रखता है।’’ इतना कहकर बूढ़ी काकी चुप हो गयी।

मैंने कहा,‘वाकई यह अजीब होता है, कि हम प्यार करते हैं और फिर उसका एहसास करते हैं। खुशी मिलती है आंतरिक तौर से। कई बार दर्द का भी एहसास होता है। खुशी और गम दोनों से ही प्रेम आगे बढ़ता है.’

’मैंने किसी से प्यार नहीं किया। मगर मुझे ऐसा कई बार लगा कि मैं प्यार करने लगा हूं। जब सब बिखर गया, तब मुझे एहसास हुआ कि अरे! वह तो प्रेम था। मैं फिर क्यों अनजान रहा? मुझे नहीं पता, लेकिन मैं इतना जानता हूं कि एहसास बहुत अच्छा था। एक अजीब तरह का एहसास। मुझे इसका अध्ययन करने का समय ही नहीं मिला काकी। मैं अपने कामों में ही उलझा रहा। मैं प्यार करना चाहता था, मगर कर न सका। जब सोची तब तक बहुत देर हो चुकी थी। लेकिन मैंने खुद को समझा लिया और मना भी लिया कि प्यार उन से किया जा सकता है जो हमेशा आपके पास रहें। मेरा परिवार है, कुछ स्पेशल लोग हैं जिन्हें मैं चाहता हूं। पर काकी मुझे नहीं लगता कि हमें कहीं दूसरी जगह प्यार तलाशने की आवश्यकता है क्योंकि इतना कुछ तो हमारे पास है।’

इसपर काकी बोली,‘तुम ठीक कहते हो। मगर बेटा प्यार का रहस्य बड़ा ही गहरा है। इसे शायद भगवान भी समझकर और समझने की कोशिश करे। यह तो कहीं भी, किसी को भी, किसे से भी हो सकता है। हां, हमारा परिवार हमें चाहता है, हम उन्हें और कुछ अहम लोग भी हमें चाहते हैं। इस तरह हम एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। भाव बहते रहते हैं, हम प्यार करते रहते हैं।’

‘तुम्हें पता है हम प्यार जाने-अनजाने में भी कर लेते हैं। वह प्यार कई बार इतना गहरा हो जाता है कि हम समझ नहीं पाते कि अब क्या करें? पशोपेश आड़े आता है और इंसान को बिखरने पर मजबूर भी कर देता है। तब अपने ही होते हैं हमें संभालने के लिए। यह विषय इतना व्यापक है कि मैं खुद उलझन में हूं कि कहां से शुरु करुं। खैर, तुमने कभी किसी अनजाने से प्यार किया हो तो इसका मतलब शायद समझ जाओ।’

मैंने कहा,‘मुझे नहीं लगता कि मैं कभी प्रेम-पाश में पड़ा हूं, मगर ऐसा कई बार लगता भी है। अधिकतर बार हम प्रेम में तब पड़ जाते हैं जैसा मैंने सुना है, जब हम किसी ऐसे व्यक्ति से मिलते हैं जो हमें दूसरों से अलग लगता है। मुझे ऐसे कई लोग मिले। मुझे नहीं लगता कि मैंने उनसे प्रेम किया, पर हां, इतना जरुर हुआ कि मैं उनसे हद से अधिक लगाव कर बैठा था। आजतक उनसे दूरी का दर्द मुझे सालता है। इसे प्रेम कहा जाये या कुछ ओर, मैं नहीं जानता।’

‘आकर्षण हुआ जरुर था, लेकिन वह अधिक समय तक नहीं रहा। बाद में शायद मैं उतना घुलमिल नहीं सका, या मैं घबरा गया।’

काकी ने मुझे गौर से देखा, फिर बोली,‘ओह! तो तुमने भी प्यार किया है। शायद वह प्यार की तरह था या उसे तुम सच में प्रेम कह सकते हो। आकर्षण हुआ और तुमने उसे सबकुछ मान लिया। ऐसा होता है, क्योंकि शुरुआत अक्सर ऐसे ही होती है। हृदय में उथलपुथल होती है और इंसान में कशमकश। कई बार एक झलक में बहुत कुछ हो जाता है, कई बार वर्षों लग जाते हैं। वैसे प्रेम का भाव काफी मजबूत होता है, यदि उसे ढंग से निभाया जाये।’

’मैं खुद से जूझ रही हूं लेकिन खुद से प्रेम भी कर रही हूं। जीवन से भी तो हम प्रेम कर सकते हैं। बुढ़ापे से भी प्रेम किया जा सकता है। बात सिर्फ नजरिये की है। कोई किसी से भी प्यार कर सकता है। प्यार का मतलब भाव से है, जब भाव से भाव का मिलन होता है तो एक और भाव उत्पन्न होता है। वह है प्यार का भाव जिसका अदृश्य होना उसकी खासियत है। वैसे भाव दिखते ही नहीं, महसूस किये जाते हैं।’

-harminder singh


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Saturday, May 8, 2010

युवती से शादी का हश्र भुगत रहा है वृद्ध



 



सत्तर साल की आयु के एक वृद्ध को पत्नि मर जाने के बाद जब दुनिया नीरस और बेगानी दिखाई देने लगी तो उसने अपनी आयु से आधी आयु की एक विधवा महिला से शादी रचा ली। इस शादी को अब आठ साल हो गये। उसके लिए अब यह शादी एक अभिशाप बनकर रह गयी। गजरौला थाना क्षेत्र के गांव महमूदपुर सल्तानठेर का यह बूढ़ा जहां सौतेले बेटों की मार खा रहा है, वहीं कौड़ी-कौड़ी का मोहताज हो गया है। हालांकि जब उसने दूसरी शादी की थी तो उस समय वह पचास लाख रुपयों से अधिक की संपत्ति का स्वामी था। दूसरी शादी से जहां वह संपत्ति गंवा बैठा वहीं अब सौतेले बेटों से उसे बराबर जान का खतरा बना हुआ है। दूसरी बहू (43 वर्ष) उसके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट की तैयारी में है। अपने जीवन की सुरक्षा की गुहार को वृद्ध ने दिसंबर में थाने में तहरीर भी दी थी लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई बल्कि महिला और उसके दो बेटों ने वृद्ध पर और भी अत्याचार करने शुरु कर दिये।

  थाने में अपनी फरियाद लेकर आये 78 वर्षीय वृद्ध मुंशी पुत्र रामचंदर ने बताया,‘दस वर्ष पूर्व पत्नि की मौत हो गयी थी। मेरे कोई पुत्र नहीं था। केवल चार लड़कियां थीं जिनकी शादी हो चुकी। सभी अपने घर हैं।’

  पत्नि की मौत के एक साल बाद वृद्ध ने दूसरी शादी करने का पक्का इरादा किया। वृद्ध के अनुसार उसे किसी के माध्यम से किसी अन्य गांव की 35 वर्षीय एक विधवा महिला मिली। वह एक शर्त पर तैयार हो गयी। उसकी शर्त थी कि वृद्ध उसके नाम दस बीघा जमीन कराये। वृद्ध महिला के लिए बेचैन था। उसने भूमि लिखाकर महिला से पुनर्विवाह रचा लिया।

  वृद्ध का कहना है कि तीन साल उनके बीच बहुत मधुर प्रेम रहा। जिसके बाद उसने बताया कि उसके पहले पति से दो बेटे हैं। वह उन्हें यहां लाना चाहती है। वृद्ध के अनुसार उसने दोनों लड़के प्रेमदेव और भगवानदास जो छह वर्ष पूर्व क्रमश: 14 और 11 वर्ष के थे (आज 20 और 17 वर्ष के हैं) अपने पास बुला लिए।

  वृद्ध का कहना है कि शादी के समय महिला ने उसे लड़कों के बारे में कुछ नहीं बताया था।

  गांव के लोग कहते हैं कि लड़कों के आने पर वृद्ध की बेटियों और दामादों ने समझा कि वृद्ध की कृषि भूमि (कुल 60 बीघा) कहीं दोनों लड़के न हथिया लें अत: उन्होंने वृद्ध से सारी भूमि बराबर-बराबर अपने नाम करा ली। वृद्ध का यह निर्णय उसके गले का फंदा बन गया।

  वृद्ध के पास ट्रैक्टर, टिलर, हैरो आदि कृषि यंत्र थे जिन्हें उसके पीछे आये बेटों प्रेमदेव और भगवानदास ने जबरन बेच दिया। वृद्ध मुंशी का कहना है कि उसे गत वर्ष से दोनों सौतेले बेटे इस लिए यातनायें दे रहे हैं कि उसने अपनी जमीन उनके बजाय अपनी बेटियों के नाम क्यों की।

  मुंशी (78) का कहना है कि उसका जीवन नारकीय बन गया है। वह पेट भर खाने के लिए भी अपनी बेटियों पर आश्रित है। कई बार प्रेमदेव और भगवानदास उसपर कातिलाना हमला कर चुके। उसका जीवन तार-तार हो चुका। वह उस दिन को कोस रहा है जिस दिन उसने राजवती से शादी रचाई थी।

  वृद्ध ने दुखी होकर गत वर्ष 18 दिसंबर को सौतेले बेटों और पत्नि के अत्याचारों से तंग आकर थाने में न्याय के लिए तहरीर दी थी। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। वृद्ध अपने एक दामाद को साथ लिए लोगों से अपने दर्द की दवा ढूंढ रहा है। और आठ वर्ष पूर्व किये अपने पुनविर्वाह की गलती का खामियाजा भी भुगत रहा है। जिस महिला को अपनी हमराह बनाकर खुशी-खुशी घर लाया था वही आज उसके लिए खतरा बन गयी है।

-harminder singh

pics by guddu singh

Wednesday, May 5, 2010

सूनापन दुनिया है

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संसार को बनाने की कोशिश की जाती रही, लेकिन हर बार इंसान हार गया क्योंकि जीत उतनी आसान नहीं। मैंने खुद को प्रभावित होने से बचाने की तमाम कोशिशें की हैं। ऐसा हो नहीं सका। मैं इंसानों के बीच एक इंसान ही रहा। बदलाव को पकड़ता हुआ चल रहा हूं। यह एक जबरदस्ती सी लगती है, जैसे कुछ थोपा जा रहा हो। पल्लू पकड़ने की आदत नहीं, फिर भी चले जा रहा हूं। आदतें हमें ऐसा करने पर मजबूर करती हैं।

व्यक्ति हमेशा इतना तय करता है कि वह एक दिन मंजिल को पा लेगा जिसकी वह कामना करता है। मेरी मंजिल कोई नहीं। मैं बिना हौंसले के चलने वाला सवार हूं। मंजिल को शायद मुझे तलाशने की जरुरत न पड़े।

यह काफी निराशापूर्ण समय है। ऐसे में बहुत कुछ सोचने की फुर्सत नहीं है। अपने बारे में बस इतना मालूम हो जाए कि मेरा भविष्य मुझे मेरे अपनों से कब मिलायेगा या ऐसे ही कोरा रह जाएगा। हिम्मत को जुटाने के लिए उपाय करने की जरुरत महसूस नहीं होती। मेरे अंदर का इंसान शांत और सूना-सूना पड़ा है। उसे यह मालूम है कि सूनापन ही उसकी दुनिया है। यह मन के लगभग मर जाने के बराबर है। हां, मेरा मन कांप कर ठंडा पड़ चुका है। उसमें इतना साहस नहीं कि वह सांस ले सके, पर वह सांस लेता नहीं और मेरा साथ जैसा मैं जीता हूं, वैसा उसका हाल है। उसका इरादा और ख्वाहिशें मुझसे मिलकर चलते हैं।

सादाब मेरी तरफ बड़े गौर से देखता है। मुझे लगता है कि वह मुझ पर तरस खा रहा है या पता नहीं बात क्या है? उसका चेहरा गंभीर हो जाता है। मैं उससे नजरें मिला नहीं सकता, यह भी मैं नहीं जानता। वह एक अलग किस्म का इंसान लगा मुझे, बिल्कुल अलग।

हम उन्हें अलग मान लेते हैं जो कुछ जुदा अंदाज में होते हैं, सादाब वाकई अनोखा है। उसके चेहरे के भावों को हालांकि मैं पढ़ नहीं पाया और पढ़ भी न पाउं। वह सूने चेहरे से बहुत कुछ कह जाता है। हां, वह चुप जरुर है, लेकिन उसका चेहरा इतना अधिक कह जाता है कि मैं हैरान हो जाता हूं। वह हैरानी इस तरह की होती है कि मैं कई बार देर रात तक उसके विषय में सोचता रहा। मैंने सोचा कि वह ऐसा क्यों है? कम बोलने वाला व्यक्ति गहराई समेटे होता है। सादाब उतना बोलता नहीं क्योंकि प्रवृत्ति को बदला नहीं जा सकता और वह ऐसा चाहता भी नहीं। खुश है वह इसी तरह दुख में। यह भी पता नहीं कि कष्टों पर किस तरह की प्रसन्नता का अहसास होता है। लेकिन सादाब कहता है कि वह इतने दुखों के बाद दुखी नहीं। यह शायद झूठ भी हो, या वह मुझे दुखी नहीं देखना चाहता। मेरे दर्द को अपना समझता है। उसकी निराशा इसे लेकर भी है कि वह पशोपेश में पड़ गया है। अपनी अम्मी और बहनों से वह कई दिनों से नहीं मिला है। पहले वह दूसरे बैरक में था। वह बताता है कि वे उससे मिलने समय-समय पर आते रहते हैं।


to be contd........

-harminder singh

Saturday, May 1, 2010

अनदेखा अनजाना सा



अंजलि की बातों में उस दिन मैं खो गया था। वैसे ऐसा लगभग रोज होता है। कभी-कभी मुझे लगता है कि शायद वह परेशान है। कभी लगता है कि वह कुछ कहना चाहती है, लेकिन उसकी हालत मेरी तरह है क्योंकि में उससे हजारों बातें कहना चाहता हूं, पर उसके सामने जाकर सकपका जाता हूं। ऐस उन लोगों के साथ अधिक होता है जिनकी जन्मतिथि के हिसाब से कन्या राशि हो। राशियों का मेल मजेदार होता है और लोगों का भी।

मैं कहा रहा था कि अंजलि काफी गुस्से में है, मुझे कभी-कभी लगता है। वह चुप है क्योंकि वह बहुत सोचती है। वह शांत है क्योंकि वह संतुष्ट है। वह हर चीज को बारीकी से परखती है, बिल्कुल मेरी तरह। भीड़ में रहने के बावजूद वह उसमें खोना नहीं चाहती। उसकी ख्वाहिश भीड़ से अलग दिखने की है।

हम विचारों को महत्व इसलिए देते हैं, क्योंकि हमें लगता है कि उनसे हम सीख सकते हैं। हम दोनों एक-दूसरे के विचारों की कद्र करते हैं। शायद यह हमें अच्छा लगता है। हमें घंटों बैठकर बातें करने में कोई बुराई नहीं, जबकि आजतक ऐसा हुआ नहीं। पन्द्रह-बीस मिनट तक हम काफी विचार कर चुके हैं। समय की पाबंदी के कारण कई बातें अधूरी रह गयीं। उनकी भरपाई के लिए अगला दिन था, पर ऐसा हुआ नहीं।

अंजलि के कारण मुझे एक नया दोस्त मिल गया। हालांकि मैंने उसे कभी देखा नहीं, न ही मैं उसे जानता। लेकिन हमारी दोस्ती लंबी चलने वाली है। मैं यह जानता हूं कि वह काफी भला है। उसकी हंसी को करीब से देखने की तमन्ना है। जब वह मुस्कराता होगा तो कैसा लगता होगा, बगैरह, बगैरह। मेरे मन में कल्पनाओं का पूरा ढेर इकट~ठा है। हम सोचते बहुत हैं। सोच कभी थमती नहीं।

मैं खुद को अकेला मानता हूं। मुझे बरसों से एक अच्छे दोस्त की तलाश थी। कई लोग जिन्हें मैं हद से अधिक लगाव करता था, उन्होंने मुझे छोड़ दिया। मैं सूनसान इलाके का वासी हो गया। बताने को कुछ खास नहीं। सच कहूं तो वह दौर खराब था।

जिंदगी की पटरी पर मैं दौड़ रहा हूं। मैं कितनी दूर और जाउंगा, नहीं जानता। सफर को छोटा करना मेरे बस में नहीं। पागलों की तरह दहाड़े मार नहीं सकता। चुपचाप चलना बेहतर है। मुझे उसका साथ मिला है, तो कुछ आस बंधी है। एक गीत मुझे याद आता है-

‘‘यूं ही कट जायेगा सफर साथ चलने से,
मंजिल आयेगी नजर साथ चलने से।’’

जिस व्यक्ति को मैं झलक भर देख नहीं सका, उसपर इतना विश्वास। शायद हद से ज्यादा विश्वास कितना ठीक है, यह मैं जानने की कोशिश कर रहा हूं। मेरी दुनिया बदल रही है। नजरिया पहले सा नहीं रहा। झिलमिलाते सितारे आसमान को अनगिनत मुस्कराहटों से भर रहे हैं। मानो हर कोई खिला हो, पत्ते खुश हों और फूल महक रहे हों। सुनहरापन हो, जैसे जीवन जगमगा रहा हो। कहने को पता नहीं क्या-क्या बदल रहा है, मैं भी।

उसे मैंने बताने की सोची कि वह मेरे जीवन के कोरे कागज पर पल भर में हजारों चित्र उकेर गया। वाकई जीवन रंगों से भर गया। बिना एक मुलाकात के इतना सब मैं कह गया। जब वह पढ़ेगा तो उसे कैसा लगेगा।

मैं इतना जानता हूं कि उसकी प्रतिक्रिया जो भी रहे, पर सच को वह झुठला नहीं सकता क्योंकि मैंने सच को उकेरा है। शब्द स्पष्ट हैं, उन्हें मोड़ने की कोशिश मैंने नहीं की। शब्द सीधे हैं, उन्हें बिगाड़ने की कोशिश मैंने नहीं की।

हृदय की आवाज शायद वह सुन सकता है, साफ-साफ और स्पष्ट। जबसे उसने अंजलि से कहा है कि वह मेरा मित्र बनने को तैयार है, तबसे मैं काफी खुश हूं। इतना कि बयान करना मुश्किल सा मालूम पड़ता है।

-आपका
राम


-harminder singh

Saturday, April 24, 2010

मामा की मौत

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सादाब ने बताया कि जब वह घर लौटा तो उसके होश उड़ गये। रुखसार ने सबसे पहले अम्मी को संभाला। हाथ-पैर खोले तथा पानी पिलाया। रुखसार और जीनत दोनों अम्मी से लिपटकर बहुत रोयीं। सादाब इतने गुस्से में था कि मामा को ढूंढने निकल पड़ा। रुखसार ने उसे रोकना चाहा, पर वह रुका नहीं।

सादाब को क्रोध इसका अधिक था कि उसका मामा बिल्कुल बदला नहीं था। कुछ पैसों के लिए अपने ईमान को खराब कर गया। उसके लिए पैसा ही सबकुछ है। कितना गिरा हुआ इंसान है वह? तमाम विचार सादाब को और उत्तेजित करते रहे। तिराहे की एक पान की दुकान पर आकर वह रुका। उसने देखा सामने सड़क पर एक आदमी गठरी लेकर जा रहा है। सादाब उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।

सड़क किनारे रोशनी नहीं थी, रात हो चुकी थी। चंद्रमा की चांदनी उतनी साफ नहीं थी। वह आदमी सादाब को अपने मामा की तरह लग रहा था। सादाब ने कदमों को तेज किया। वह आदमी शायद भांप गया था। उसकी चाल भी तेज हो गई। अचानक वह दौड़ने लगा।

सादाब चिल्लाया,‘मामा रुक जाओ।’

सादाब भी दौड़ पड़ा। सादाब को पक्का यकीन हो गया था कि वह मामा ही था। वह व्यक्ति नजदीक के रेलवे स्टेशन की ओर भागने लगा। सादाब ने तेज दौड़कर उसे पीछे से पकड़ लिया। उसने गठरी सादाब के मुंह पर मारी और भागने लगा। लेकिन सादाब उसका पीछा कहां छोड़ने वाला था। वह कंधे पर गठरी टांग मामा के पीछे दौड़ा।

मामा पटरियां-पटरियां दौड़ रहा था, सादाब उसके पीछे। जैसे-जैसे कदम तेज हो रहे थे, थकान बढ़ती जा रही थी और सांस तेज। मामा को ठोकर लगी। वह गिर पड़ा। उसका चेहरा पत्थरों पर लगने से बुरी तरह छिल गया। सादाब ने मामा को उठाना मुनासिब न समझा। गठरी को किनारे रख दिया। उसे कहीं से एक लोहे का सरिया हाथ लगा।

क्रोध की सीमा जब पार हो जाती है तो इंसान एक अलग रुप में नजर आता है। सादाब के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था। उसने मामा पर सरिये से प्रहार शुरु कर दिया। मामा अपने भांजे से दया की भीख मांगता रहा। अपने पापों को कुबूल करता रहा। अपनी बेटियों की दुर्गति की जिम्मेदारी भी उसने ली। लेकिन सादाब उस जड़ को ही खत्म करने का इरादा किये था।

मामा चीखता रहा पर सादाब रुका नहीं। लोगों की भीड़ जमा हो गयी। जबतक पुलिस आई तबतक मामा अंतिम हिचकी ले चुका था।

कुछ समय पहले की दौड़ निर्णायक मोड़ पर आकर समाप्त हो गयी। एक चलता पुर्जा अब लाश में तब्दील हो चुका था। न वह बोल सकता था, न सुन सकता था, न देख सकता था जबकि उसके चारों ओर जो भीड़ जमा थी, वह यह सब कर सकती थी, तभी वह शांत था और लोग अशांत।

मामा के पापों की कहानी उसी के साथ समाप्त हो गयी। सादाब को हत्या के जुर्म में जेल में डाल दिया गया।

’वे कहते थे कि मैंने एक निर्दोष की हत्या की है। जबकि मैं जानता हूं कि मेरा मामा कितना नीच था। उसे न मारा जाता तो वह कई पाप और करता। जिसने पत्नि, सगी बेटियों, बहन को दुख दिया हो, वह जीने के काबिल नहीं।’ यह कहकर सादाब चुप हो गया।

मेरा मन कर रहा था कि मैं उसे सांत्वना दूं, लेकिन मैं रुक गया।

हम दूसरों को देखकर कई बार खुद दुख महसूस करने लगते हैं। इंसान होेने और न होने में यही फर्क है। हमारा संसार जैसा भी रहा हो दूसरों के संसार को संवारने की कोशिश मेरे जैसे लोग करते हैं। मुझे एहसास हुआ कि दर्द को सीने में दफन करना उतना आसान नहीं। कभी न कभी वह उभर ही आता है। परेशान आदमी फिर दिल को खोलकर रख देता है। मेरी कहानी का सच आना बाकी है। मैं फिलहाल चुप हूं। मैं नहीं चाहता कि मेरे जख्मों को हवा लगे। दुखती रग पर हाथ जाने से सब डरते हैं। मुझे थोड़ी खुशी इसकी है कि कोई तो मिला जो वास्तविकता को बता गया मुझपर भरोसा कर।

to be continued..........

-harminder singh

Monday, April 19, 2010

बुढ़ापे के आंसू



वे आजकल हंसते नहीं। ऐसा करना उन्हें पता नहीं क्यों भाता नहीं। वे सोचते हैं कुछ, कभी-कभी आंसू भी बहा देते हैं। वे उस अवस्था में जी रहे हैं जहां जीवन की रुसवाई इंसान को कचोटती है। लेकिन वह फिर भी जी रहा है। वे बूढ़े हैं, एक वृद्ध इंसान जो जीवन के अंतिम पड़ाव की ओर उन्मुख हो रहा है। उस जीवन के सच को जानने के लिए उसके लड़खड़ाते पैर दौड़ने को बेताब हैं।

वृद्धग्राम को एक मेल प्राप्त हुआ है जिसमें एक छात्रा ने बुढ़ापे पर कुछ लिखा है। आप भी पढ़ लीजिये:

 
in old age,
flowers shed colour,
but human shed tears,
isn't strange to hear........

nobody so near
nobody to care
nobody to cheer my tear
nobody to hear
nobody to share
nobody to clear my fear
nobody is here..........

-priyanshi dudeja, moradabad, uttar pradesh


वाकई बुढ़ापे में इंसान अजीब किस्म का हो जाता है। कितना अकेला हो जाता है एक इंसान जबकि वह इंसानों के संसार में ही तो जी रहा होता है।

-harminder singh

Monday, April 12, 2010

खुशी बिखेरता जीवन

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‘खुशी जीवन का हिस्सा है। यह अहम है।’ मैंने काकी से कहा।

बूढ़ी काकी हर बात को बहुत ध्यान से सुनती है। मैं भी उसकी बातों पर उतना ही गंभीर हो जाता हूं। काकी ने कुछ पल बाद कहा,‘हमारा जीवन हंसी-खुशी को पाकर सुकून महसूस करता है। हम उन लोगों संग खुद को भूल जाते हैं जो अपनी हंसी बिखेर हमें तृप्त करते हैं। शायद जिंदगी का सबसे अनमोल उपहार है हंसी। अगर हंसी-खुशी न होती तो जीवन नीरस होता।’

‘धरती पर बसा जीवन किसी न किसी बहाने तृप्त होना चाहता है। मैं भी तृप्ती की कामना करती हूं, तुम भी। खुशी एक एहसास है, एक खूबसूरत अनुभव। यह हमारे भीतर तक प्रवेश करता है। हमारा अंग-अंग इससे प्रभावित होता है। हम खुद को ताजा पाते हैं। नयी ऊर्जा का संचार होता और जीवन में बहार आ जाती है। कलियां खिलने लगती हैं, महक से हम पुलकित हो उठते हैं। वातावरण का रंग बदल जाता है। मन का दर्द छिप जाता है।’

‘फिर तो बुढ़ापा भी खुश होता होगा?’ मैंने काकी से पूछा।

‘क्यों नहीं?’ काकी बोली।

‘बुढ़ापा भी तो इस संसार का हिस्सा है। वृद्धों के पास केवल दुखों का ही पिटारा नहीं। उनकी कमजोर आंखें भी खुशी के आंसू छलकाती हैं। वे भी खुशी का अनुभव करते हैं। हर किसी के लिए हर किसी चीज के मायने अलग-अलग हैं। जीवन को चलने का रास्ता चाहिए, खुशी को फैलने का।’

‘मेरा अपना अनुभव कहता है कि इंसान दूसरों के कार्यों में यदि सहयोग दे तो उसका जीवन सफल हो जायेगा। कष्टों का निर्धारण कर्म करते हैं और इंसान अंत समय तक कर्म करता है। सही मायने में कर्मों का फल मिलता है। हमें यह लगता है कि हम अपनी खुशी बढ़ा रहे हैं। और जब हम दूसरों की खुशी छीनकर अपने घर में सजाने की कोशिश करते हैं तब हम भविष्य की पोथी में खुद सुराख कर रहे होते हैं।’

‘जो कार्य हमें आंतरिक शांति का एहसास कराते हैं उनसे हमें कई प्रकार के अनुभव होते हैं। खुशी उनमें से एक होती है। दुखी इंसान की हालत कितनी दयनीय होती है, यह हम जानते हैं। लंबे समय के दुख के बाद इंसान सुख की अनुभूति करता है। वह उसके लिए खुशी का समय होता है। यह कोई ऐसी वस्तु नहीं तो बाजार में मिल जाए। यह केवल सद कार्यों से मिलती है या फिर जीवन के सफर में उसे अलग-अलग मौकों पर हासिल किया जा सकता है। बुढ़ापा खुद को खुश देखना चाहता है। जबकि वह शायद उतना प्रसन्न रह पाये, लेकिन उम्मीद तो लगाता ही है।’

-harminder singh

Friday, April 9, 2010

मैं गरीबों को सलाम करता हूं

 मैं गरीबों को सलाम करता हूं
मेरे संगी-साथी, रिश्तेदार,
अधिकारीगण, नेता, बिजनेसमैन,
जो बघारते हैं अपनी झूठी शान,
उनसे कम कलाम करता हूं।
मैं गरीबों को सलाम करता हूं।

    







     आते हैं जो मेरे दर पर,
     मिलते हैं अक्सर राहों पर,
     कांधे पर है जिनके झोली,
     उनका भी अहतराम करता हूं।
     मैं गरीबों को सलाम करता हूं।

वो कृषि मजदूर,
जो होते हैं हकीकत में मजबूर,
मालिकों से पाते हैं जो तिरस्कार,
उनका सम्मान सरेआम करता हूं।
मैं गरीबों को सलाम करता हूं।

     जुड़े हैं जो देश के उत्थान से,
     निर्धन, बेबस, लाचार,
     दलित, पीड़ित, लाचार,
     उनके संग मिलके काम करता हूं।
     मैं गरीबों को सलाम करता हूं।

कुछ लोग जो हैं बेघर, बेसहारा,
विधवाएं, अपमानित वृद्ध, बालक,
फिरते हैं जो ठोकरें खाते,
उनकी पीड़ा आम करता हूं।
मैं गरीबों को सलाम करता हूं।

     पिटते हैं निर्दोष जो कानून से,
     झेलते हैं जो निर्धनता की मार,
     सहते हैं जो मौन सख्त यातना,
     उनको शत~-शत~ प्रणाम करता हूं।
     मैं गरीबों को सलाम करता हूं।

-furkan shah

Friday, April 2, 2010

कुछ समय का अनुभव

मेरे एक मित्र ने मुझे बताया था कि उसका वजन काफी बढ़ चुका है। मैंने उसे सलाह दी कि वह रोज लंबी दौड़ लगाया करे। मैंने उसे यह भी बताया कि सबसे बेहतरीन व्यायाम दौड़ को ही बताया गया है। वह राजी हो गया, लेकिन अगले ही पल उसने अपना दिमाग दौड़ाया। उसने कहा कि सुबह उठना उसके लिए टेड़ी खीर के बराबर है। काफी समझाने के बाद मुझे लगा कि वह सुबह पांच बजे मेरे घर आ जायेगा और हम दोनों दौड़ के लिए चलेंगे। घड़ी में अलार्म लगा मैं सो गया। ठीक पांच बजे अलार्म बजा भी, लेकिन मैंने उसे बंद कर दिया। सोचा बाद में उठ जाऊंगा। न मेरा मित्र आया और न हम दौड़ के लिए जा सके। इसी तरह तीन दिन हो गए। रात में प्लान कुछ होता और सुबह होते ही सब फुर्र।

  हम योजनाएं बना तो लेते हैं लेकिन अमल करने की जब बारी आती है तब हम ऐसा करने में असमर्थ रहते हैं। हम इंसानों में ज्यादातर की यह खासियत है।

  कई दिन के बाद वह मित्र शाम के समय आया। दोनों पहले एक दूसरे को देखकर मुस्कराये, फिर नयी योजना के बारे में चर्चा की। इस बार उसने कहा कि शाम के समय बैडमिंटन खेला जाए तो बेहतर व्यायाम हो जायेगा। सुबह उठने का झंझट लगभग खत्म।

  चूंकि नींद से हम दोनों को बेहद प्यार है (सभी को होता होगा)। बैडमिंटन खेलने के लिए जगह चाहिए थी। एक जगह मिली लेकिन वह स्थान ऊबड़खाबड़ था। उसे समतल करने की जरुरत थी। हमने मिट्टी डलवायी और उस स्थान को समतल बनाने के लिए खुद ही जुट गए। एक घंटा फावड़ा चलाने के बाद मालूम पड़ गया कि वाकई श्रम क्या होता है? वैसे पसीने की खारी बूंदों का कुछ तो मतलब होता होगा। जब आपके हाथों में छाले पड़ कर फूट जायें और आप जुटे रहें, तो कैसा महसूस होता होगा? रात को करवट बदलते हों तो कितनी मशक्कत करनी पड़ती होगी। कई अनुभव एक साथ दे गया वह एक घंटा।

  लगभग तीन दिन लगे हमें उस जमीन को समतल बनाने में। लेकिन एक बात जरुर बताना चाहूंगा कि नींद बड़ी अच्छी आयी।

  कुछ दिनों में हम सोच रहे हैं कि वहां नियमित खेलना प्रारंभ किया जाये। मैंने सुना है कि ऐसे खेल से पूरे शरीर का व्यायाम हो जाता है। दौड़ना अपनी जगह है और बाकी खेल अपनी जगह।

-harminder singh

Tuesday, March 23, 2010

मामा की चाल

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सादाब का मामा उनके घर ज्यादा आने लगा था। उसकी अम्मी खर्च चलाने के लिए पड़ौस के एक घर में चौका-बरतन करने लगी थी। यह उनकी मजबूरी थी।

सादाब के पिता ने जैसे-तैसे कर मिट~टी की ईंटों से चार दीवारें खड़ी की थीं। बाप की जमीन का उतना ही टुकड़ा बचा था जिसपर दीवारें खड़ी थीं।

मामा की नीयत में खोट आता जा रहा था। उसकी नजर गिद्ध की तरह थी। सादाब की अम्मी तीन बच्चों के साथ जहां गरीबी से जंग लड़ रही थी वहीं मामा झपट~टा मारने की बाट जो रहा था। उसमें उतनी चपलता नहीं थी, लेकिन पाशों को फेंकने में वह माहिर था। उसकी आंखें बिल्ली की तरह थीं। सुना जाता है कि ऐसे लोग मौका मिलते ही वार करने से नहीं चूकते। फिर वहां तो शिकार काफी कमजोर व असहाय था। मामा सोच रहा था कि बिना लाठी तोड़े काम बन जाए।

सादाब की अम्मी अपने भाई पर हद से ज्यादा भरोसा करती थी। शौहर की मौत के बाद मजलूम बेवा की तरह जी रही थी वह। अनपढ़ थी, अंगूठा लगाना जानती थी। मामा ने उसे किसी तरह राजी कर लिया। वह उन्हें अपने घर ले आया। कुछ दिन उसने खूब खातिरदारी की, लेकिन एक रात वह घर आधी रात आया। दो आदमी उसको सहारा दे रहे थे। वह नशे में इतना चूर था कि उसकी आवाज उसी की तरह लड़खड़ा रही थी। पास पड़ी चारपाई पर उसे डाल दिया गया। उसकी जेबों से नोट बाहर बिखर गये। बहन ने भाई का ऐसा रुप पहले देखा नहीं था। सादाब की अम्मी घबरा गयी।

रोज का सिलसिला यही होता रहा। अब घर में शाम को जुए और जाम की महफिल सजने लगी। भाई की हरकतों से आजिज आकर सादाब की मां ने साफ कह दिया कि वह उसकी जमीन के सारे रुपये लौटा दे। वह कहीं भी जाकर अपनी और बच्चों की गुजर-बसर कर लेगी। इसपर मामा तन गया। उसने कहा कि रुपये तो खर्च हो गए। जो बचे हैं वह ले सकती है। सादाब की मां मजबूर थी, इसलिए वह कुछ हजार रुपये अपने साथ लेकर बच्चों सहित भाई के घर से निकल गयी।

ऐसा होता है बुरा वक्त जिसका तमाशा जिंदगी को वीरान कर देता है। पति मरा, भाई ने धोखा दिया, और आसरा..........वह भी न रहा। तीन औलादों की किसी तरह परवरिश करनी थी।

उस मां ने किसी तरह ईंट-पत्थर-गारा ढोया, मजदूरी की। बच्चे बड़े होते रहे। मां का हाथ बंटाते रहे। मजदूरी उन्होंने भी की। सादाब ने कई जगह काम किया, मेहनत कर पैसा कमाया। कुछ गज जमीन पर एक कमरा बना लिया। उसकी अम्मी बीमार रहने लगी थी। दोनों बहनों की उम्र शादी को पार कर चुकी थी।

कहीं से अचानक मामा को उनका पता लग गया। वह अपनी बहन को दुखड़ा सुनाता रहा। बीमार बहन को फिर भाई पर दया आ गई। सादाब ने अपने मामा को देखा तो वह बहुत गुस्सा हुआ, लेकिन अम्मी की तबीयत उसका साथ नहीं दे रही थी। अपनी मां के कहने पर सादाब ने मामा को छोटा-मोटा काम दिलवा दिया। सुबह जाकर मामा शाम को आता।

रुखसार की शादी का इंतजाम सादाब कर रहा था। उसके ब्याह के लिए लड़के की तलाश जारी थी। संयोग से योग्य लड़का मिल गया। वह काफी भला था और अच्छा कारीगर भी। कमाऊ और मेहनती दामाद मिल जाने की आस कब से दिल में लिए थी सादाब की अम्मी। सपना पूरा होने जा रहा था।

कभी-कभी जिन घटनाओं का हम खूब इंतजार कर रहे होते हैं उनमें खलल पड़ जाने की टीस बड़ी होती है। सादाब की अम्मी की तबीयत बिगड़ रही थी। इलाज से कोई फायदा मिलता नहीं दिख रहा था। एक चारपाई पर वह पड़ी रहती। उसकी खांसी कम नहीं हो रही थी। उसके कदम धीरे-धीरे ही सही, ऐसा लगता था जैसे मौत की ओर बढ़ रहे हैं।

सादाब रुखसार को बाजार से कपड़ा दिलाने गया था। जीनत ने जाने की जिद की। मामा ने कहा कि वह घर पर ही रहेगा। उसने यह भी कहा कि अपनी बहन की उसे बहुत फिक्र है। यदि वह पानी या दवा मांगेगी तो वह उसके पास होगा। अपनी बहन के लिए वह एक दिन काम पर नहीं गया कोई पहाड़ थोड़े ही टूट जायेगा। पहले बहन है, बाद में उसका काम।

तीनों के जाने के बाद मामा की खुराफात शुरु हो गई। उसने सामने रखी संदूक पर नजर दौड़ाई। उसपर ताला लटका था। अपनी बहन से उसने चाबी मांगी। बहन ने इंकार कर दिया। मामा ने जबरदस्ती करनी चाही। मामा ने उसके चेहरे पर आवेश में आकर एक तमाचा जड़ दिया। सादाब की मां बेहोश हो गयी। मामा ने पूरे घर में सामान उलट-पुलट दिया। एक-एक कपड़े को झाड़कर देखा, चाबी कहीं नहीं मिली। बाहर से ईंट का टुकड़ा लाकर उसने संदूक का ताला तोड़ दिया। सादाब ने कुछ हजार रुपये और सामान उसमें रखा था। मामा ने एक गठरी में सब भर लिया। सादाब की अम्मी को होश आ चुका था। वह उठ तो नहीं सकती थी, लेकिन देख सब रही थी। हल्की आवाज में उसने गठरी बांध रहे भाई से कहा कि अल्लाह की शर्म करो। सादाब ने जैसे-तैसे कर रुपये इकट~ठा किये हैं, रुखसार के हाथ पीने होने से रह जायेंगे। बिरादरी सामने उनकी क्या इज्जत रह जायगी?

मामा ने गठरी बांध ली। उसे डर था कहीं उसकी बहन शोर न मचा दे। उसने उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया और हाथ-पैर चारपाई से बांध दिये। सारा सामान लेकर चला मामा चला गया। बहन की आंखों से आंसू झरझर बह रहे थे। इसके अलावा वह कर भी क्या सकती थी?

लोग कितने मतलबी होते हैं। दुनिया में रिश्तों का खून अक्सर होता रहता है। कोई किसी का अपना नहीं, सब मतलब के यार हैं। रिश्ते निभाना कौन जानता है? कोई भी तो नहीं। जिसका बस चलता है, वह काबिज होने की कोशिश करता है। कमजोर को जितना अधिक कुचला जाए, उतना कम है। भाई के लिए बहन केवल कहने के लिए हैं। सादाब का मामा सही मायने में भ्रष्ट और क्रूर इंसान था। उसे सिर्फ खुद से वास्ता था।

-to be contd.......

-harminder singh

Friday, March 19, 2010

हर पल जीभर जियो

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‘‘छोटी-छोटी खुशियां हमारे लिए कितने मायने रखती हैं। जरा सी खुशी पाकर हम फूले नहीं समाते। असल में इसका असर गहरा होता है। सीधा हृदय पर जाकर लगता है। लोग दिल से खुश होते हैं, तो कितना अच्छा लगता है। आंखें भर आती हैं। पलकें भीग जाती हैं। सच्चे अर्थों में इंसान खुश होता है।’’बूढ़ी काकी बोली।

काकी किसी विचार में डूब गयी। उसका चेहरा गंभीर हो चला था। मैंने उसकी हथेली को छूकर देखा। रेखायें गहरी थीं। दरारों के बीच की दूरी सिमटी कहां थी? बल्कि गहराई तिड़की हुई थी। शुष्क हथेली खुरदरेपन का अहसास कराती थी। चमड़ी में खिचाव की बात कब की खंदकों में दफन हो चुकी। इस समय घास के तिनके भी हाथ आ जाएं तो गनीमत है। खैर, कोशिश जारी है।

काकी फिर बोली,‘‘छोटी-छोटी चीजों को इक्ट~ठा कर उनसे कोई बड़ी चीज बनाई जाती है। हम यही करते हैं। खुशियों के कारण प्राय: मामूली होते हैं। किसी के लिए कोई बात खुशी लाती है, तो कोई किसी बात पर खुशी के आंसू बहाता है।’’

‘‘अक्सर इंसान इंसान के लिए खुशी बांटता है। कुछ उसे हासिल कर लेते हैं, कुछ वंचित रह जाते हैं। कई ऐसे भी होते हैं जिनके हिस्से की खुशी छिन चुकी होती है। वे वीरान संसार का हिस्सा खुद को समझने से परहेज नहीं करते। शायद यह उनकी आदतों में शुमार हो जाता है।’’

‘‘कुछ शायद दूसरों से इस कदर जुड़ाव महसूस करने लगते हैं कि उन्हें अपने हिस्से की खुशी देने की कोशिश करते हैं। ये वे होते हैं जो दूसरों की खुशी से अपनी खुशी हासिल करना चाहते हैं। कुछ खास लोगों को वे पता नहीं क्यों दुखी नहीं देखना चाहते। यह स्वत: ही होता है। दूसरों को यह अजीब जरुर लगता है, लेकिन उतना होता नहीं। वे सोचते हैं कि उन्हें संसार का सबसे बड़ा सुख मिल गया, पल भर में, सिर्फ हंसकर ही।’’

‘‘कुछ ऐसे भी होते हैं जो खुशी खरीदते हैं। जबकि हम यह जानते हैं कि न जिंदगी खरीदी जा सकती है, न उससे मिलने वाली खुशी। मैं कहती हूं इंसान हर पल को जीभर कर जीना सीखे। चूम ले रोशनी को ताकि सूरज निकलने का इंतजार न करना पड़े। दूसरों से लगाव करना सीखे वह। उनके शब्दों को समझे, मीठा बोले, तो कितना कुछ आसान हो जाए।’’

‘‘खुद से कहे कि वह हर पल को जीना चाहता है। इतना शानदार कि उसका चित्त हंसता रहे बिना अवरोध के। जिंदगी का क्या पता कब थम जाये। वह यह सोचे कि वह कितना खास है खुद के लिए, और उसकी एक मुस्कराहट उसके और दूसरों के जीवन में क्या कुछ बदल सकती है।’’

काकी ने जितना जीवन जिया खुद को खास मानकर जिया। वह जिंदगी के उस मोड़ पर खड़ी है जहां फर्श की दरारें दूरी बनाती जा रही हैं, इंतजार सिर्फ इंसान के धंसने का है।

-harminder singh

Wednesday, March 10, 2010

गीता पड़ी बीमार


गीता बीमार हो गयी। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। रघु के पेट में गड़बड़ जारी थी। उधर मैं भी दादी से पेट दर्द की शिकायत कर चुका था। लगता था, आमों का लालच इसका कारण था।

  दादी ने मुझसे कहा,‘क्यों आम चुराये?’

  ‘मैंने कहां चोरी की।’ मैं बोला। ‘रघु पेड़ पर चढ़कर आम तोड़े जा रहा था। मैं इकट~ठा कर रहा था, बस।’

  ‘चोरी में तुम भी शामिल थे न।’

  ‘पर दादी। मैंने चोरी नहीं की।’

  ‘मैंने कब कहा, तुमने चोरी की।’

  ‘ओह, दादी छोड़ो। यह बताओ कि पेट का दर्द कैसे दूर हो?’

  ‘पहले अपनी गलती मानो।’ दादी बोली।

  ‘चलो, माफ कर दो। अगली बार ऐसा नहीं होगा।’ मैंने मुंह पिचकाकर कहा।

  ‘ठीक है, मैं तुम्हारे लिए एक औषधि बनाती हूं। उसे पीकर तुम स्वस्थ हो जाओगे। थोड़ी तीखी होगी, पर आंख बंद कर गटक जाना, समझे तुम।’ दादी ने कहा।

  मैंने दादी का कहा अमल किया। औषधि जितनी तीखी थी, वह मैं ही जानता हूं। मैंने झट गुड़ का एक टुकड़ा खाया, तब जाकर मेरी हालत काबू में आयी।

  मैं सीधा रघु के घर पहुंचा। वह दीवार से पीठ सटाये पहाड़े याद कर रहा था। मैंने उससे हालचाल पूछा।

  वह बोला,‘अब ठीक हूं। तुम्हारे पेट का दर्द कैसा है?’

  मैंने दादी की औषधि का जिक्र किया। यह सुनकर रघु की हंसी छूट पड़ी।

  ‘तीखी, वाह! कमाल हो गया।’ रघु ने कहा।

  ‘मैं सच कह रहा हूं। मुझे बाद में गुड़ खाना पड़ा।’ मैं बोला। ‘खैर, हंसना छोड़। यह बता कि गीता की तबीयत सुधरी की नहीं।’

  ‘सुधार हो रहा है। डाक्टर ने अभी कुछ दिन उसे अस्पताल में रहने को कहा है। मां उसके साथ है।’ रघु गंभीर था।

  हम अस्पताल में पहुंचे। गीता हमें देखते ही उठने को हुई, पर नर्स ने उसे रोक लिया।

  ‘अब आम चुराने रघु के साथ मत जाना और हां, इतने आम मत खाना।’ मैंने मजाक किया।

  गीता हल्का मुस्कराई।

  रघु सांप-सीड़ी का खेल लाया था। हमने वहीं खेलना शुरु कर दिया। गीता लेटी हुई ही अपनी चाल बताती जाती। मैं गोटी आगे खिसकाता जाता। गीता ने हम दोनों को हरा दिया। कई बार मुझे हार का सामना करना पड़ा, मगर गीता हर बार जीत जाती। रघु ने गोटियां बदलने की असफल कोशिशें कीं, पर मैंने उसे देख लिया।

  ‘तुम बाज नहीं आओगे रघु।’ मैंने कहा। ‘चालाकी करते जरुर हो। जीतने से तो रहे।’

  ‘मैं नहीं जीत पा रहा, लेकिन गीता को तुम भी हरा नहीं पाओगे।’ रघु बोला।

  खेल से ऊब जाने के बाद रघु बोला,‘चलो एक दूसरे से पहाड़े सुनते हैं।’

  मै चौंका,‘पहाड़े।’

  ‘पहाड़ों से मुझे चिढ़ हैं। कोई और खेल खेलते हैं।’ मैं कहा।

  ‘फिर क्या गेंद-बल्ला अस्पताल में खेलोगे।’ रघु बोला।

  काफी देर बहस के बाद हमने निश्चय किया कि गीता जिस खेल को कहेगी, वह खेला जायेगा। गीता ने कहा कि वह पहाड़ों का खेल खेलना चाहेगी। गीता की बात कैसे टाली जा सकती थी?

  खेल के अनुसार जिसका नंबर आता वह किसी से भी कोई पहाड़ा पूछ सकता था, लेकिन केवल 15 तक। मुझे दो, तीन, दस और ग्यारह का पहाड़ा पक्का रटा था। पहाड़ों के इस खेल में मेरी पोल खुलती गयी। रघु की मां पास में बैठी हमें देख रही थी। मुझे एक भी पाइंट न मिल सका। उल्टा पास बैड पर पड़ा एक मरीज मुझ पर हंस रहा था। उसने कहा,‘क्या स्कूल के पीछे पढ़ते हो भाई, जो चार का पहाड़ा भी ढंग से याद नहीं।’ गीता भी हंसी न रोक पायी। देखा देखी वहां मौजूद सभी लोग ठहाका लगाकर मुझपर हंस पड़े। शर्म के मारे मैं मुंह नीचा कर बैठा रहा।

  मैंने सोचा कि इससे अच्छा अस्पताल ही न आता। कम से कम उपहास तो न होता। मैं मन ही मन रघु को कोस रहा था और साथ ही गीता को जिसने पहाड़ों का खेल खेलने को कहा था। पहाड़े मेरे लिए पहाड़ चढ़ने के समान थे। मैं मन ही मन सोच रहा था कि किस दिन पहाड़ की चोटी पर झंडा फहराऊंगा, लेकिन चढ़ाई बहुत कठिन थी। 

-harminder singh

Wednesday, March 3, 2010

शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय काम था मुंशी जी का




पंद्रह वर्ष की पूर्व भी होली के रंग में सराबोर थे लोग जब पता चला कि मुंशी निर्मल सिंह सौ वर्ष की आयु पूरी कर दिवंगत हुए। लोग उनके शव को अंतिम संस्कार के लिए मुंशी जी के गांव छीतरा से तिगरी गंगा तट पर ले गये थे। यहां ऐसा दृश्य था कि सभी लोग रंग में सराबोर थे। सभी ने मुंशी जी का अंतिम संस्कार करने के बाद गंगा नदी में स्नान किया था। बूढ़े जवान तथा किशोर भी उस भीड़ में शामिल थे जो मुंशी जी के स्वर्गवास के बाद बेहद गमगीन थे।

मुझे उस दिन मेरे पूछने पर उनके गांव के एक वृद्ध व्यक्ति ने बताया था कि ऐसे लोग संसार में कभी-कभी अवतरित होते हैं। वृद्ध ने अपनी बात जारी रखी तथा कहा कि उन्हें शिक्षा से बेहद प्यार था। वे अपनी किशोर व्यय से ही इस प्रयास में थे कि लोग शत प्रतिशत शिक्षित हों।

बात सन 1920 की है जब उनकी आयु लगभग 25 वर्ष की थी और हम खेलने कूदने की उम्र में थे। मुंशी जी ने गांव के बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया था। वे किसी से कोई फीस नहीं लेते थे तथा हिन्दी और उर्दू दोनों ही भाषाओं पर समान अधिकार रखते थे। वैसे वे पंजाबी और अंग्रेजी भी लिख पढ़ सकते थे।

तब दूर-दूर तक कालेज तो दूर स्कूल भी नहीं था। यही कारण था कि बछरायूं तथा भगवानपुर के कई युवक जिनमें मुसलिम अधिक थे उनसे उर्दू पढ़ने आने लगे। गांव के बच्चे उनसे पहले ही पढ़ रहे थे। वे अपनी चौपाल पर कभी छप्पर के नीचे और कभी नीम के पेड़ के नीचे पढ़ाते थे।

बाद में देश आजाद होने पर उन्होंने अपनी भूमि पर गांव में ही एक प्राइमरी स्कूल भी खुलवाया। जिसका संचालन बाद में जिला परिषद ने ले लिया। यहां के पहले प्रधानाध्यापक बल्दाना हीरा सिंह निवासी मास्टर यादराम सिंह बने। यादराम सिंह की आयु लगभग 90 वर्ष है और वे सकुशल हैं।

यादराम सिंह जी के अनुसार मुंशी जी ने शिक्षा की लौ उस समय जलाई जब क्षेत्र क्या देश में भी इस दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं हो सकी थी। उन्होंने बताया कि वे भी मुंशी जी से पढ़े थे। उन्होंने कभी किसी छात्र से कोई भी पैसा या किसी तरह की फीस आदि नहीं ली बल्कि कई निर्धन छात्र-छात्राओं की उन्होंने आर्थिक मदद भी की। कई छात्र बाद में उच्च पदों पर पहुंचे।

वह ऐसा दौर था जब गांव तो क्या शहरों में भी इक्का-दुक्का समाचार पत्र आते थे लेकिन उस समय मुंशी जी के पास एक दर्जन पत्र-पत्रिकायें नियमित आती थीं। दिल्ली से प्रकाशित सेवाग्राम, ग्राम युवक, खालसा समाचार (हिन्दी और पंजाबी), सोवियत संघ से युवक दर्पण, सोवियत देश (पंजाबी), सोवियत संघ (हिन्दी), सोवियत लैंड (अंग्रेजी), सोवियत नारी (हिन्दी व पंजाबी) सहित दर्जन भर रुसी पत्र-पत्रिकायें वे मंगाते थे।

इसी के साथ गीता प्रेस की कल्याण मासिक पत्रिका उनके पास लगातार आती रही। जिनकी कई प्रमुख प्रतियां आज भी मुंशी जी के परिवार वालों के पास हैं। इसी से मुंशी जी का शिक्षा के प्रति रुझान का पता चलता है। वे लोगों तथा छात्रों से अखबार पढ़ने को कहते थे। वे कहते थे, पैसे खर्च करने की भी जरुरत नहीं। उनके पास आकर पढ़ लिया करो।

शिक्षा, साहित्य और पुस्तकों से उनको इतना प्रेम था कि उन्होंने ही अपने घर एक काफी बड़ी लाइब्रेरी स्थापित कर ली थी। जिसमें हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, पंजाबी, रसियन, फारसी, संस्कृत और चीनी भाषा की पुस्तकें आज भी मौजूद हैं। इन पुस्तकों में सबसे अधिक संख्या धार्मिक पुस्तकों की है। हिन्दु-मुस्लिम, सिख और ईसाई धर्म से संबंधित पुस्तकें उनके पास मौजूद थीं। जिन्हें वे सभी धर्मों के लोगों को पढ़ने को दिया करते थे। वे सभी धर्मों का समान आदर करते थे। यही कारण था कि सभी धर्मावलंबी उनके पास श्रद्धा और प्यार के साथ पहुंचते थे। उन्हें सभी धर्मों के दर्शन की गहरी जानकारी थी। यह उनके गूढ़ अध्ययन के कारण थी। उनकी बातों को बच्चे, युवा, बूढ़े और महिलायें बहुत ही ध्यान से सुनते थे और उनपर अमल करने का पूरा प्रयास करते थे।

अपनी जेब से खर्च कर वे जो अखबार तथा पुस्तकें मंगाते थे उनसे वे तो लाभान्वित होते ही थे साथ ही लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित कर सभी को लाभान्वित करने का प्रयास करते थे। कभी-कभी लोग कई महत्वपूर्ण पुस्तकों को वापस नहीं करते थे।

बहुत दिन तक दिल्ली के एतिहासिक गुरुद्वारे बंगला साहिब के हेड ग्रंथी रहे ज्ञानी हेम सिंह का कहना है कि उनका परिवार बेहद गरीबी में था। उस समय वे दस वर्ष के थे। मुंशी जी ने उनपर तरस खाया और दिल्ली के एक गुरमत विद्यालय में निशुल्क शास्त्रीय संगीत तथा धार्मिक प्रवचन आदि के लिए दाखिल कराया। ज्ञानी जी का कहना है कि मेरे कपड़े और किराया स्वयं मुंशी जी ने ही दिया था। वे बराबर मेरी कुशल क्षेम पूछने दिल्ली आते रहे। यदि वे मेरी सहायता न करते तो मेरा भविष्य पता नहीं कितना बदतर होता।

इस तरह के लोगों की कमी नहीं जो मुंशी जी के प्रयास से जीवन में सफल रहे। दिल्ली चांदनी चौक स्थित गुरुद्धारा रकाबगंज में स्थित श्री गुरु तेगबहादुर लाइब्रेरी की स्थापना में भी उनकी अहम भूमिका रही। राष्ट्रीय सहारा हिन्दी दैनिक में इस संबंध में सन 1996 में एक लेख भी छपा है।

मुंशी जी ने गजरौला के शिव इंटर कालेज के निर्माण में भी भरपूर सहयोग दिया था। इसका निर्माण स्व. शिव किशोर वैद्य ने किया था। मंडी धनौरा के गांधी इंटर कालेज के निर्माण में भी उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया। उनके रिश्तेदार मुंशी यादराम सिंह जीवन पर्यन्त इस कालेज के अध्यक्ष रहे। यह कालेज मंडी धनौरा निवासी साहू साहब ने स्थापित कराया था। जेपी नगर के फत्तेहपुर छीतरा में स्थित गुरु नानक जू.हा. स्कूल मुंशी जी द्वारा ही स्थापित है। पहले इस गांव में कोई भी स्कूल नहीं था।

मुंशी जी केवल क्षेत्र ही नहीं पूरे भारत को शिक्षित देखना चाहते थे। आजादी से पूर्व अविभाजित भारत के लाहौर और अमृतसर की वे बराबर यात्रायें करते थे। जहां शिक्षा संबंधी सभाओं में वे स्पष्ठ वक्ता होते थे। उनकी वाकशैली से श्रोता इतने प्रभावित थे कि लोग उनके मंच पर आते ही खुशी व हर्षोल्लास से उछल पड़ते थे।

इस लेख में शिक्षा के क्षेत्र में मुंशी जी के विशिष्ट प्रयास पर संक्षिप्त प्रकाश डाला गया है। उन्होंने इतना काम किया कि जिसे लिखने में एक पुस्तक तैयार हो जायेगी। उनकी यह विशेषता रही कि उन्होंने कभी भी अपने नाम का प्रचार नहीं किया। जिन संस्थाओं को उन्होंने खड़ा किया उनमें भी अपना नाम नहीं जोड़ा। यह भी एक अविस्मरणीय बात है कि वे दीपावली को जन्में और होली पर हमेशा के लिए आसार संसार से विदा हो गये। हम उन्हें कभी भुला नहीं पायेंगे।


-G S chahal 
editor gajraula times

Monday, March 1, 2010

लंगूर वाला



मैं अपनी कापी में सवाल हल कर रहा था। तभी दादी ने कहा कि वह मेरे बालों में मालिश करेगी ताकि मेरा दिमाग चुस्त रहे। मैंने दादी से कहा कि पहले मालिश हो जाए बाद में सवाल हो जायेंगे। दादी ने बालों में तेल रगड़ना शुरु किया। इतने में रघु दौड़ता हुआ आया और बोला,‘सुना है आज गांव में लंगूर का खेल दिखाने वाला आ रहा है। जल्दी कर वह आता ही होगा।’ उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे उठा दिया।

  मैंने कहा,‘रुक तो सही, दादी से सिक्के ले लूं।’ बालों पर आधा-अधूरी मालिश ही हुई थी। दादी ने कहा,‘बेटा इतनी जल्दी काहे की, पहले एक काम तो पूरा हो जाने दे।’

  मैंने दादी से कहा कि बाद में हो जायेगा। कुछ सिक्के ले मैं रघु के साथ चल पड़ा।

  डुगडुगी की आवाज आनी शुरु हो गयी थी।

  मैंने कहा,‘लगता है वह आ गया। दौड़ लगानी पड़ेगी।’

  गांव के बीच बरगद के पेड़ के नीचे हम दोनों हांफते हुए पहुंचे। लंगूर वाला व्यक्ति डुगडुगी बजा लोगों को इकट~ठा कर रहा था। वह कहा रहा था,‘नाच देखो, नाच देखो। भाईयो ऐसा तमाशा पहले कभी देखा नहीं होगा आपने। आओ, सब आओ, लंगूर तमाशा शुरु करने वाला है।’

  तमाशा शुरु हो गया। हमने बीच-बीच में तालियां बजाईं। लंगूर उछलकर पेड़ पर चढ़ जाता और पूंछ से उलटा लटक जाता। वह अपनी पूंछ को हवा में घुमाकर हमें हैरान कर देता। बंदर का खेल हमने कई बार देखा था, मगर लंगूर का खेल देखना पहला अनुभव था। गीता भी वहीं मौजूद थी। वह रघु की छोटी बहन थी।

  खेल खत्म होने के बाद तमाशा दिखाने वाले ने जमीन पर एक कपड़ा फैला दिया और बोला,‘भाईयो, सब पेट की खातिर है। तमाशा हमारी रोजी-रोटी है। जो इच्छा हो गरीब के कपड़े पर डाल दो। भगवान आपका भला करेगा। यह जानवर आपको दुआ देगा।’

  मैंने सिक्का कपड़े पर फेंक दिया। रघु ने जेब टटोली। फिर उसने गीता से कहा,‘जा मां से एक सिक्का ले आ।’

  गीता दौड़ी चली गयी। काफी देर बाद भी वह नहीं लौटी तो रघु को चिंता हुई। उसने मुझे साथ लिया और अपने घर की ओर चल दिया। रास्ते में हमने देखा कि गीता आम के पेड़ के नीचे बैठी रो रही है। वह पके आम के छिलके से फिसल गयी थी। उसकी बांह में मोच आ गयी और टांग दर्द कर रही थी। रघु उसे गोद में उठाकर घर पहुंचा आया।

  तभी लंगूर वाला व्यक्ति आम के पेड़ के नीचे सुस्ताने बैठ गया। लंगूर उसने पेड़ के तने से बांध दिया। उसकी लाठी और उसपर बंधा थैला जो कपड़े का बना था, वहीं पास में रख लिया। हमें जब यकीन हो गया कि वह सो गया, तब रघु ने चुपके से लंगूर की रस्सी खोल दी और हम झाड़ियों के पीछे छिप गये।

  लंगूर उछलकर पेड़ पर जा बैठा। कुछ समय बाद उस व्यक्ति की आंख खुली। उसने इधर-उधर देखा। लंगूर कहीं नहीं था। उसके होश उड़ गये। तभी उसकी नजर पेड़ की शाखाओं पर पड़ी। लंगूर की पूंछ उसे लटकती नजर आ गयी। उसने आवाज देकर लंगूर को बुलाना चाहा। पर वह लाख जतन के बाद भी पेड़ से नहीं उतरा। हमारी हंसी छूट पड़ी। उस व्यक्ति को पक्का यकीन हो गया कि उसका लंगूर हमने ही खोला था। वह लाठी और थैला लेकर हमारी ओर दौड़ा। लेकिन हम उससे काफी तेज दौड़े। वह थक कर बैठ गया। हम भी रुककर उसे देखते रहे। जब कोई उपाय समझ न आया तो वह व्यक्ति बोला,‘बच्चों मुझे पता है तुमने मेरा लंगूर रस्सी से खोला है। मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूंगा। उसे पेड़ से उतारने में मेरी मदद करोगे।’

  हमें उसपर दया आ गयी।

  करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद लंगूर को हम तीनों ने पेड़ से उतार ही लिया। को्शिश केवल लंगूर वाले की थी। हम वहां भी सिर्फ तमाशा ही देख रहे थे। वह लंगूर की कभी पूंछ पकड़ता, कभी उसे ‘बच्चा’ कहकर नीचे आने को कहता। उस व्यक्ति ने हमारा बिना बात के ही धन्यवाद दिया।

  गीता दो दिन में स्वस्थ हो गयी। रघु ने बताया कि क्यों न हम तीनों पास के गांव में फिर तमाशा देखने चलें। उसने बताया कि वह लंगूर वाला अभी गांव-गांव घूम रहा है और खेल दिखा रहा है। दादी से कहकर मैं, गीता और रघु के साथ पास के गांव पैदल चल दिए। गांव कुल एक किलोमीटर की दूरी पर था।

  भीड़ जुटने लगी थी। लोगों के बीच में जगह बनाकर हम भी भीड़ में घुस गये। मैंने रघु का हाथ थामा था और रघु ने गीता का। कुछ ही पलों में हम सबसे आगे थे। लंगूर वाला हमें देखकर मुस्कराया और हम भी। थोड़ी देर में खेल समाप्त हुआ और तामझाम इकट~ठा कर वह जाने की तैयारी करने लगा।

  तभी मैंने उससे कहा,‘आपका लंगूर दुबला लगता है। कुछ खाने को देते नहीं क्या?’

  ‘इतने पैसों में अकेले इंसान का पेट नहीं भरता, फिर यह तो जानवर है।’ लंगूर वाला रुखी जुबान में बोला।

  मैं गंभीर हो गया। मैंने कहा,‘फिर गुजारा कैसे चलता है।’

  ‘गांव वाले जो कुछ देते हैं, उसे ही रख लेते हैं।’ वह बोला।

  रस्सी पकड़कर उसने लंगूर को खींचा। लंगूर अपने मालिक के पीछे-पीछे चल दिया।

  मैंने कहा,‘सुनो ओ लंगूर वाले।’ वह रुक गया। उसने पीछे मुड़कर देखा।

  मैंने आगे कहा,‘तुम्हारा लंगूर आम खाता है।’

  उसने कहा,‘हां, कोई भी फल खा लेता है। पर क्यों?’

  ‘हम तुम्हें ढेर सारे आम तोड़ कर देंगे। खुद भी खा लेना और अपने लंगूर को भी जी भर खिलाना।’ मैंने कहा।

  उसने हमारी तरफ ध्यान से देखा और मुस्कराता हुआ आगे चलने लगा।

  ‘हम सच कह रहे हैं लंगूर वाले भईया।’ रघु बोला।

  ‘आओ तो सही।’ मैंने कहा।

  रघु ने मुझे रास्ते में बताया था कि इस गांव में आम के कई बाग हैं जिनपर ढेरों आम लदे हैं। इन दिनों आम पक कर गिर रहे थे। एक बाग के किनारे पर हम खड़े हो गए। रघु ने पहले बाग का वहीं से मुआयना किया। फिर धीरे से पेड़ पर चढ़ गया। कुछ ही देर में उसने कई आम नीचे गिरा दिये। मेरे मुंह में पानी भर आया। गीता उन्हें इकट~ठा करने में जुट गयी। दो आम लंगूर को उठाकर दिये। तभी बाग वाले का लड़का डंडा लेकर वहां आ पहुंचा। रघु अभी पेड़ पर ही था।
  लड़का चिल्लाया,‘ठहरो, कौन आम चुरा रहा है?’

  आवाज सुनकर लंगूर वाला, मैं और गीता पास की झाड़ियों में छिप गये। रघु पेड़ पर चुपचाप चिपक गया। पर लंगूर उछलकर आम बीनने लगा। बाग वाले के लड़े ने लंगूर को भगाना चाहा। उसने लाठी दिखाई तो लंगूर ने गुस्से में अपनी पूंछ से उसकी लाठी छीन ली। वह लड़का वहां से डर कर भाग गया। फिर रघु ने कई पेड़ों के आम तोड़े। लंगूर वाले ने अपना थैला भर लिया। गीता ने अपने हाथों को बिल्कुल खाली नहीं रहने दिया। मैंने अपनी पैंट की जेबों में कई आम रख लिए।

  ‘आज का दिन मजेदार रहा।’ मैंने रघु से कहा।

  ‘आम के आम, गुठलियों के दाम।’ रघु मुस्कराया।

-harminder singh

Wednesday, February 24, 2010

संबंधों के दायरे में

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कभी-कभी काकी को लगता है कि वह मुझसे घृणा क्यों नहीं करती?

उसे यह अटपटा लगता है। काकी को मुझसे लगाव है, यह मैं जानता हूं। उसकी बातों को मैंने बारीकी से समझाया और पाया कि वाकई बुढ़ापा अनुभव लिए होता है।

समय के साथ-साथ बूढ़ी काकी का मोह मेरे प्रति बढ़ता गया। उम्र के फासले को मोह ने छोटा बना दिया। मैं उसकी थकी जिंदगी को नजदीक से देखता हूं तो पाता हूं कि इन आंखों ने जिंदगी को कितने करीब से देखा है।

बूढ़ी काया है, फिर भी काकी को एहसास नहीं कि वह कब अलविदा कह दे, क्योंकि उससे संवाद करते समय ऐसा बिल्कुल नहीं लगता। उसने हमेशा मुझे मुस्कराकर कई बातों से अवगत कराया है। यह मोह के कारण उपजी स्थिति है या कुछ ओर।

मुझे यह सोचने पर विवश करता है कि बूढ़े लोग लगाव इतना क्यों करते हैं? क्यों वे प्रेम की एक छींट से खुद को भिगो देते हैं? क्यों उनका प्रेम उनकी सूखी आंखों से छलकता है? क्या बुढ़ापा प्रेम का भूखा होता है? वृद्धों का मन क्यों मामूली बात पर पिघल जाता है?

काकी ने कहा,‘‘मन का क्या, वह तो बहता है। प्रेम की चाह किसे नहीं। मन को बंधना नहीं आता और प्रेम को रुकना। दोनों ही इंसान के संगी हैं। तुमने बचपन में मां-बाप का दुलार देखा। उन्होंने तुम्हें कितना कुछ दिया। सबसे बड़ी बात यह कि उन्होंने तुम्हें जीवन दिया। इस संसार में तुम उन्हीं की वजह से हो। तुमने उनसे घृणा की होगी, लेकिन वे तुम्हें सदा दुलार ही करते रहेंगे। बूढ़ों को अपने ही छोड़ जाते हैं, जबकि बूढ़े लोग तमाम जिंदगी उनके मोह में जकड़े रहते हैं। औलाद का सुख क्या होता है, यह वे ही जानते हैं।’’

‘‘मेरी जिंदगी अधूरी है, यदि मैं अपने माता-पिता से दूरी बना लूं।’’ मैंने कहा।

इसपर काकी बोली,‘‘बिल्कुल इंसान इंसान के बिना पूरा नहीं। हम संबंधों के दायरे में जीते हैं। यह किसी ने सिखाया नहीं, स्वत: है। जरुरतें मिलजुलकर पूर्ण होती हैं। इंसानियत सिखाती है कि जुड़कर चलो। रिश्ते यहीं उत्पन्न होते हैं। रिश्ते टूटते जरुर हैं, लेकिन उनका अंत नहीं होता। इंसान को जीना यही सिखाते हैं। इसलिए जीवन को पूर्ण करने के लिए कुछ बंधनों में रहना पड़ता है। माता-पिता या उन्हें तुमसे लगाव है, उनकी भावनाओं को समझना जरुरी है।’’

‘‘रही बात घृणा कि तो उसकी उपज भी इंसान ही करते हैं। जहां प्रेम नहीं, वहां घृणा मंडराती है। इंसान को इंसान से ही समस्या है। जबकि लगाव करके हम अपनों में रहना सीखते हैं। बुढ़ापे में बहुत कुछ बदल जाता है। मोह बढ़ता जाता है, क्योंकि वक्त कम होता है। उतने में अपनों का साथ पाने की इच्छा होती है. शायद उनका सुख आसानी से हमें संसार छोड़कर जाने दे। शायद हौंसला दे जाए, ताकि शेष वक्त को उनके सहारे बिता सकें। मन की गहराई को बुढ़ापा जानता है। उसे मालूम है कि कितना कुछ हासिल कर चुका। उसे यह भी पता है कि बहुत कुछ पाकर, जीवन अभी तक प्यासा है।’’

काकी ने खिड़की से खुले आसमान को निहारा। वह काफी देर तक सफेद बादलों की चमक में खोई रही। उसने पलकों को नीचे किया, आंखों को थोड़ा आराम दिया।

मैंने सोचा कि बुढ़ापा समय को पढ़ रहा है। शनै: शनै: जीवन की अंतिम उड़ान की तैयारी कर रहा है। यहां पलकों को भिगोने की जरुरत है, मन भरा जरुर है, लेकिन खुशी उस बात की है कि बुढ़ापे को सब्र बहुत है।

-harminder singh

Tuesday, February 23, 2010

जिंदगियों का सौदा

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सादाब को काफी गुस्सा आ गया था। उससे मैंने कहा कि अब उसे आराम करना चाहिए। उसकी कहानी तसल्ली से किसी दिन सुन लेंगे।

पता नहीं क्यों वह जैसे मुझे सबकुछ बताना चाह रहा था। उसने आगे बताना शुरु किया,‘‘मामा की छोटी बेटी शायना मुश्किल से छह साल की थी और बड़ी फरीदा नौ की। वह रात को देर से आता था। घर में जुआ खेलता। कई लोगों को साथ लाता। बेटियों से उनके लिए चाय-पानी मंगवाता और रात का खाना बनवाता। कहा न मानने पर उनके सामने ही बाल पकड़कर अपनी बेटियों को बेरहमी से पीटता। बच्चियां थीं, मासूम थीं, अंजान भी, इसलिए बाप की मर्जी को बेचारी आंसू पोंछते-पोंछते मान लेतीं। एक कसाई से कम नहीं था हमारा मामा।’’

‘‘शायना और फरीदा ने कभी मेरी अम्मी से यह नहीं बताया। अम्मी को अपने सगे भाई की असलियत पता नहीं थी। एक रोज मामा शाम को हमारे घर रोता हुआ आया। उसने कहा कि शायना का सुबह से पता नहीं चला। सारा मोहल्ला छान मारा वह मिली नहीं। इसपर अम्मी परेशान हो गयी। लड़कियों की उन्हें बहुत फिक्र रहती थी। शायना फिर कभी नहीं लौटी। मालूम पड़ा कि मामा ने उसे जुए में दांव पर लगाया था। दांव हार जाने पर शायना को उस खूसट जमील को सौंप दिया। जमील उस रात मामा के यहां से नागपुर जा रहा था जहां वह जूते बनाने की एक कंपनी में काम करता था। वहां शायना का क्या हुआ होगा मुझे पता नहीं। लेकिन मामा अच्छा नहीं कर रहा था। अब उसकी नियत यह थी कि किसी तरह फरीदा से भी छुटकारा पा ले।’’

‘‘वह फरीदा को मेला दिखाने ले गया। फरीदा अंजान थी। मेला एक बहाना था। फरीदा का कुछ हजार में पहले ही सौदा किया जा चुका था। सौदेबाज तैयार थे। भीड़ में फरीदा का हाथ छूट गया। उसे किसी ओर ने थामा। कुछ पलों में फरीदा की जिंदगी का फैसला हो चुका था। उसकी दुनिया उजड़ चुकी थी। वह बिक चुकी थी। और ऐसे लोगों के हाथ में थी जिनके लिए वह केवल मांस का लोथड़ा भर थी, कोई मामूली खरीदी हुई वस्तु जिसकी कीमत चुकायी जा चुकी थी।’’

सादाब का दर्द और गहरा होता जा रहा था। मैं उसकी पीड़ा समझ सकता था। एक व्यक्ति कितना गिर सकता है, मैंने सोचा नहीं था। कितना दुख होता है जब कोई आपका अपना आप पर भरोसा करे और अपने स्वार्थ के लिए आप उसे ऐसे लोगों के हवाले कर दें जो जिंदगियों का सौदा करते हैं। उनके यहां मरी हुई आत्माओं का बाजार सजता है जिनके खरीददार होते हैं। छी है ऐसे इंसानों पर जिनके लिए इंसान मंडी की सजावट से अधिक कुछ नहीं। मैं इसके आगे इसपर लिखना नहीं चाहूंगा।

लोगों की चमड़ी एक सी होती है, फर्क रंग का होता है। लोग एक से होते हैं, यहां भी फर्क रंग का होता है। रंग बदलते देर नहीं लगती। गिरगिट को ही देख लें। जिस जगह बैठा, वैसा उसका रंग हो जाता है।

इंसानों की कला जानवरों से कई गुना शक्तिशाली और अनोखी है। वह जितनी अजीब है, उतनी भयानक भी।

सादाब ने बताया कि उसका मामा अम्मी के सामने फूट-फूटकर रोया। मेले की झूठी कहानी गढ़ दी। उसकी अम्मी को मामा पर यकीन आ जाता था।

to be contd.......

-harminder singh
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घर से स्कूल
>>चाय में मक्खी............................>>भविष्य वाला साधु
>>वापस स्कूल में...........................>>सपने का भय
हमारे प्रेरणास्रोत हमारे बुजुर्ग

...ऐसे थे मुंशी जी

..शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय काम था मुंशी जी का

...अपने अंतिम दिनों में
तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?

सम्मान के हकदार

नेत्र सिंह

रामकली जी

दादी गौरजां

कल्याणी-एक प्रेम कहानी मेरा स्कूल बुढ़ापा

....भाग-1....भाग-2
सीधी बात नो बकवास

बहुत कुछ बदल गया, पर बदले नहीं लोग

गुरु ऐसे ही होते हैं
युवती से शादी का हश्र भुगत रहा है वृद्ध

बुढ़ापे के आंसू

बूढ़ा शरीर हुआ है इंसान नहीं

बुढ़ापा छुटकारा चाहता है

खोई यादों को वापिस लाने की चाह

बातों बातों में रिश्ते-नाते बुढ़ापा
ऐसा क्या है जीवन में?

अनदेखा अनजाना सा

कुछ समय का अनुभव

ठिठुरन और मैं

राज पिछले जन्म का
क्योंकि तुम खुश हो तो मैं खुश हूं

कहानी की शुरुआत फिर होगी

करीब हैं, पर दूर हैं

पापा की प्यारी बेटी

छली जाती हैं बेटियां

मां ऐसी ही होती है
एक उम्मीद के साथ जीता हूं मैं

कुछ नमी अभी बाकी है

अपनेपन की तलाश

टूटी बिखरी यादें

आखिरी पलों की कहानी

बुढ़ापे का मर्म



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>>मेरी बहन नेत्रा

>>मैडम मौली
>>गर्मी की छुट्टियां

>>खराब समय

>>दुलारी मौसी

>>लंगूर वाला

>>गीता पड़ी बीमार
>>फंदे में बंदर

जानवर कितना भी चालाक क्यों न हो, इंसान उसे काबू में कर ही लेता है। रघु ने स्कूल से कहीं एक रस्सी तलाश कर ली. उसने रस्सी का एक फंदा बना लिया

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वृद्धग्राम पर पहली पोस्ट में मा. होराम सिंह का जिक्र
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वृद्धों की सेवा में परमानंद -
डा. रमाशंकर
‘अरुण’


बुढ़ापे का दर्द

दुख भी है बुढ़ापे का

सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य गिरीराज सिद्धू ने व्यक्त किया अपना दुख

बुढ़ापे का सहारा

गरीबदास उन्हीं की श्रेणी में आते हैं जिन्हें अपने पराये कर देते हैं और थकी हड्डियों को सहारा देने के बजाय उल्टे उनसे सहारे की उम्मीद करते हैं
दो बूढ़ों का मिलन

दोनों बूढ़े हैं, फिर भी हौंसला रखते हैं आगे जीने का। वे एक सुर में कहते हैं,‘‘अगला लोक किसने देखा। जीना तो यहां ही है।’’
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इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल
प्रताप महेन्द्र सिंह कहते हैं- ''लाचारी और विवशता के सिवाय कुछ नहीं है बुढ़ापा. यह ऐसा पड़ाव है जब मर्जी अपनी नहीं रहती। रुठ कर मनाने वाला कोई नहीं।'' एक पुरानी फिल्म के गीत के शब्द वे कहते हैं-‘‘इक दिन बिक जायेगा, माटी के मोल, जग में रह जायेंगे, प्यारे तेरे बोल।’’

...............कहानी
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किशना- एक बूढ़े की कहानी
(भाग-1)..................(भाग-2)
ये भी कोई जिंदगी है
बृजघाट के घाट पर अनेकों साधु-संतों के आश्रम हैं। यहां बहुत से बूढ़े आपको किसी आस में बैठे मिल जायेंगे। इनकी आंखें थकी हुयी हैं, येजर्जर काया वाले हैं, किसी की प्रेरणा नहीं बने, हां, इन्हें लोग दया दृष्टि से जरुर देखते हैं

अपने याद आते हैं
राजाराम जी घर से दूर रह रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले घर को अलविदा कह दिया है। लेकिन अपनों की दूरी अब कहीं न कहीं परेशान करती है, बिल्कुल भीतर से

कविता.../....हरमिन्दर सिंह .
कभी मोम पिघला था यहां
इस बहाने खुद से बातें हो जायेंगी
विदाई बड़ी दुखदायी
आखिर कितना भीगता हूं मैं
प्यास अभी मिटी नहीं
पता नहीं क्यों?
बेहाल बागवां

यही बुढापा है, सच्चाई है
विदा, अलविदा!
अब कहां गई?
अंतिम पल
खत्म जहां किनारा है
तन्हाई के प्याले
ये मेरी दुनिया है
वहां भी अकेली है वह
जन्म हुआ शिशु का
गरमी
जीवन और मरण
कोई दुखी न हो
यूं ही चलते-चलते
मैं दीवाली देखना चाहता हूं
दीवाली पर दिवाला
जा रहा हूं मैं, वापस न आने के लिए
बुढ़ापा सामने खड़ा पूछ रहा
मगर चुप हूं मैं
क्षोभ
बारिश को करीब से देखा मैंने
बुढ़ापा सामने खड़ा है, अपना लो
मन की पीड़ा
काली छाया

तब जन्म गीत का होता है -रेखा सिंह
भगवान मेरे, क्या जमाना आया है -शुभांगी
वृद्ध इंसान हूं मैं-शुभांगी
मां ऐसी ही होती है -ज्ञानेंद्र सिंह
खामोशी-लाचारी-ज्ञानेंद्र सिंह
उम्र के पड़ाव -बलराम गुर्जर
मैं गरीबों को सलाम करता हूं -फ़ुरखान शाह
दैनिक हिन्दुस्तान और वेबदुनिया में वृद्धग्राम
hindustan vradhgram ब्लॉग वार्ता :
कहीं आप बूढ़े तो नहीं हो रहे
-Ravish kumar
NDTV

इन काँपते हाथों को बस थाम लो!
-Ravindra Vyas WEBDUNIA.com