बूढ़ी काकी कहती है-‘‘बुढ़ापा तो आना ही है। सच का सामना करने से भय कैसा? क्यों हम घबराते हैं आने वाले समय से जो सच्चाई है जिसे झुठलाना नामुमकिन है।’’.

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Friday, June 18, 2010

............तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?



मेरे दादा जी उस उम्र के दौर से गुजर रहे हैं जहां चीजें अक्सर छूटने लगती हैं। छोटी शुभी ने उनके हाथों को देखकर हैरत से कहा,‘इनके हाथों की नसें किस तरह चमक रही हैं।’ ऐसा उसने गंभीरता से कहा था। उस छोटी बच्ची को भी एक वृद्ध की इस अवस्था को देखकर हैरानी हुई।

दरअसल बुढ़ापा अपने साथ संशय और हैरानी लाता है। इंसान खुद को ऐसे दौर में पाता हैं जहां से रुट बदलना नामुमकिन है। अब तो सिर्फ आगे जाना है। हां, पीछे मुड़कर देखा जा सकता है, लेकिन पुराने दिनों को जिया नहीं जा सकता।

शुभी की बात ने मुझे भी गंभीर कर दिया था। नसों ने त्वचा का दामन नहीं छोड़ा है। बस किसी तरह चिपकी हैं।

हम जब एक वृद्ध को देखते हैं तो पाते हैं कि जर्जरता किस कदर हावी हो सकती है। शरीर कितना  है बाकी।

हम जानते हैं कि हम भी कभी वृद्ध होंगे। हम भी होंगे अपने वृद्धजनों के दौर में। ...............तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?



-harminder singh

Wednesday, February 24, 2010

संबंधों के दायरे में

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कभी-कभी काकी को लगता है कि वह मुझसे घृणा क्यों नहीं करती?

उसे यह अटपटा लगता है। काकी को मुझसे लगाव है, यह मैं जानता हूं। उसकी बातों को मैंने बारीकी से समझाया और पाया कि वाकई बुढ़ापा अनुभव लिए होता है।

समय के साथ-साथ बूढ़ी काकी का मोह मेरे प्रति बढ़ता गया। उम्र के फासले को मोह ने छोटा बना दिया। मैं उसकी थकी जिंदगी को नजदीक से देखता हूं तो पाता हूं कि इन आंखों ने जिंदगी को कितने करीब से देखा है।

बूढ़ी काया है, फिर भी काकी को एहसास नहीं कि वह कब अलविदा कह दे, क्योंकि उससे संवाद करते समय ऐसा बिल्कुल नहीं लगता। उसने हमेशा मुझे मुस्कराकर कई बातों से अवगत कराया है। यह मोह के कारण उपजी स्थिति है या कुछ ओर।

मुझे यह सोचने पर विवश करता है कि बूढ़े लोग लगाव इतना क्यों करते हैं? क्यों वे प्रेम की एक छींट से खुद को भिगो देते हैं? क्यों उनका प्रेम उनकी सूखी आंखों से छलकता है? क्या बुढ़ापा प्रेम का भूखा होता है? वृद्धों का मन क्यों मामूली बात पर पिघल जाता है?

काकी ने कहा,‘‘मन का क्या, वह तो बहता है। प्रेम की चाह किसे नहीं। मन को बंधना नहीं आता और प्रेम को रुकना। दोनों ही इंसान के संगी हैं। तुमने बचपन में मां-बाप का दुलार देखा। उन्होंने तुम्हें कितना कुछ दिया। सबसे बड़ी बात यह कि उन्होंने तुम्हें जीवन दिया। इस संसार में तुम उन्हीं की वजह से हो। तुमने उनसे घृणा की होगी, लेकिन वे तुम्हें सदा दुलार ही करते रहेंगे। बूढ़ों को अपने ही छोड़ जाते हैं, जबकि बूढ़े लोग तमाम जिंदगी उनके मोह में जकड़े रहते हैं। औलाद का सुख क्या होता है, यह वे ही जानते हैं।’’

‘‘मेरी जिंदगी अधूरी है, यदि मैं अपने माता-पिता से दूरी बना लूं।’’ मैंने कहा।

इसपर काकी बोली,‘‘बिल्कुल इंसान इंसान के बिना पूरा नहीं। हम संबंधों के दायरे में जीते हैं। यह किसी ने सिखाया नहीं, स्वत: है। जरुरतें मिलजुलकर पूर्ण होती हैं। इंसानियत सिखाती है कि जुड़कर चलो। रिश्ते यहीं उत्पन्न होते हैं। रिश्ते टूटते जरुर हैं, लेकिन उनका अंत नहीं होता। इंसान को जीना यही सिखाते हैं। इसलिए जीवन को पूर्ण करने के लिए कुछ बंधनों में रहना पड़ता है। माता-पिता या उन्हें तुमसे लगाव है, उनकी भावनाओं को समझना जरुरी है।’’

‘‘रही बात घृणा कि तो उसकी उपज भी इंसान ही करते हैं। जहां प्रेम नहीं, वहां घृणा मंडराती है। इंसान को इंसान से ही समस्या है। जबकि लगाव करके हम अपनों में रहना सीखते हैं। बुढ़ापे में बहुत कुछ बदल जाता है। मोह बढ़ता जाता है, क्योंकि वक्त कम होता है। उतने में अपनों का साथ पाने की इच्छा होती है. शायद उनका सुख आसानी से हमें संसार छोड़कर जाने दे। शायद हौंसला दे जाए, ताकि शेष वक्त को उनके सहारे बिता सकें। मन की गहराई को बुढ़ापा जानता है। उसे मालूम है कि कितना कुछ हासिल कर चुका। उसे यह भी पता है कि बहुत कुछ पाकर, जीवन अभी तक प्यासा है।’’

काकी ने खिड़की से खुले आसमान को निहारा। वह काफी देर तक सफेद बादलों की चमक में खोई रही। उसने पलकों को नीचे किया, आंखों को थोड़ा आराम दिया।

मैंने सोचा कि बुढ़ापा समय को पढ़ रहा है। शनै: शनै: जीवन की अंतिम उड़ान की तैयारी कर रहा है। यहां पलकों को भिगोने की जरुरत है, मन भरा जरुर है, लेकिन खुशी उस बात की है कि बुढ़ापे को सब्र बहुत है।

-harminder singh

Tuesday, February 2, 2010

पूर्व जनम के मिले संजोगी

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‘‘क्या हम इसलिए साथ बैठे हैं कि कुछ बातें जो पिछले जन्म में अधूरी रह गयी थीं, उन्हें पूरा कर सें?’’
मैंने उत्सुकतावश काकी से पूछा।

  बूढ़ी काकी ने मुझे जीवन के अनगिनत पहलुओं पर पहले भी बताया है। उसने कभी खुद को एहसास नहीं होने दिया कि वह बूढ़ी है। यह उसके व्यक्तित्व की सबसे अच्छी खूबी रही।

  उसने एक बार कहा था कि शायद पिछले जन्म के कामों को पूरा करने के लिए हमें फिर से जन्म लेना पड़ा। ऐसा तब तक होगा जबतक हम तृप्त नहीं हो जाते। या हम मुक्त नहीं हो जाते।

  काकी ने मेरे प्र’न का उत्तर देने के बजाय इतना कहा,‘‘तुम खुद से क्यों नहीं पूछ लेते?’’

  मैं हैरानी से बिना पलक झपके काकी की ओर देखता रहा। फिर बोला,‘‘मैं क्या जानूं जन्म-मरण? उम्र आपकी ज्यादा, अनुभव भी अधिक। और सबसे बड़ी बात जीवन की समझ भला मुझे कैसे हो सकती है? मुझे याद नहीं कि मैं पहले भी जन्म ले चुका। यह कैसे मालूम होगा कि हम अधूरी बातों को पूर्ण करने आये हैं? आपने जब मुझे पहले बताया था तब की उत्सुकता नये प्र’नों को जरुर जन्म दे रही थी।’’

  काकी ने हल्की मुस्कान के साथ मेरे सिर पर हाथ फेरा और कहा,‘‘देखो, हम इस जन्म को मृत्यु तक याद रखते हैं। बाद का कोई नहीं जानता। लेकिन मुझे लगता है कि हम कई जन्मों तक प्यासे रहते हैं। उस चीज की तलाश शायद हमें बार-बार जन्म लेने को विवश करती है जिसे पाने की इच्छा एक जन्म में अधूरी रह गयी थी। उन ख्वाबों को हमने कभी देखा था, जिंदगी रुठ गयी, पूरा न कर सके। जन्म लेंगे दोबारा इसी तमन्ना के साथ की सपना पूरा हो, और इस बार जिंदगी रुठे नहीं।’’

  ‘‘सच में कितना सुकून मिलता है जब हम खुद को पूर्ण-सा पाते हैं। असल में ऐसा न कभी हुआ है और न होगा। इंसान ने पाने की जाने क्या-क्या कोशिश की, पर हासिल क्या किया, यह वह अच्छी तरह जानता है।’’ काकी ने विराम लिया।

  वह बोली,‘‘तुम्हारा मेरा साधारण रिश्ता है। शायद पिछले जन्म में हमारा कोई अलग रिश्ता रहा हो। लेकिन मुझे लगता है कि हम बहुत लगाव वाले रहे होंगे, क्योंकि हम एक-दूसरे से काफी लगाव रखते हैं। पूर्व जन्म का योग इस जन्म में हमें साथ लाया। तभी हमारे विचार इधर-उधर टहलने के बजाय एक-जैसे हैं। विचारों की टकराहट का मतलब कैसे बैठ सकता है?’’

  ‘‘जरुरत शायद थी, इसलिए हमारी मुलाकात हुई। दो अनजाने आज जाने-पहचाने हो गए। कभी ढंग से सोचना। यदि हमारे नसीब में कुछ लिखा न होता तो हम मिलते ही क्यों? इतनी बातें करते ही क्यों? तुम मुझे अपने हृदय का हाल बताते क्यों? कितना भरोसा किया हम दोनों ने एक-दूसरे पर। तभी तो बहुत कुछ बता बैठे यूं ही बातों-बातों में। ऐसा होने के पीछे कारण था। हम जान गए काफी हद तक एक-दूसरे को। आखिर पिछले जन्म के संजोगी मिल ही गए।’

  ‘‘अब कितना पा लिया हमने एक-दूसरे से यह हम जान गए। कितना पाना बाकी रह गया, यह वक्त पर छोड़ते हैं। तुमने एक मजबूत रिश्ता बना लिया जो शायद ही कभी टूटे। एहसास हो गया मुझे कि अनजाने लोग किस तरह अपनों की तरह लगने लगते हैं। कितना प्रेम करने लगते हैं हम उनसे। ये लोग शायद कभी हमसे जुड़े रहे होंगे, तभी फिर से हमारे साथ हैं- यह संयोग नहीं तो क्या है?’’
काकी इतना कहकर चुप हो गयी।

-harminder singh

Saturday, January 30, 2010

बुढ़ापा छुटकारा चाहता है



मैं अकेला हूं, सूनसान हूं, वीरान हूं। यह मुझे मालूम है कि मेरा जीवन बीत चुका। कुछ सांसें शेष हैं- कब रुक जाएं क्या पता?

मैंने हर रंग को छूकर देखा है, चाहें वह कितना उजला, चाहें वह धुंधला हो। उन्हें सिमेटा, जितना मुटठी में भर सका, उतना किया। रंग छिटके भी और उनका अनुभव जीवन में बदलाव लाता रहा। मैं बदलता रहा, माहौल बदलता रहा, लोग भी।

चश्मे में मामूली खरोंच आयी। दिखता अब भी है, मगर उतना साफ नहीं। सुनाई उतना साफ नहीं देता। लोग कहते हैं,‘‘बूढ़ा ऊंचा सुनता है।’’ लोग पता नहीं क्या-क्या कहते हैं।

जब जवानी में फिक्र नहीं की, फिर बुढ़ापे में शर्म कैसी?

कुछ लोग यह कहते सुने हैं,‘‘बूढ़ा पागल है।’

हां, बुढ़ापा पागल होता है, बाकि सब समझदार हैं।

जवानों की जमात में ‘कमजोर’ कहे जाने वाले इंसानों का क्या काम? सदा जमाने ने हमसे किनारा किया। हमें बेगाना किया। इसमें अपनों की भूमिका ज्यादा रही।

इतना कुछ घट चुका, इतना कुछ बीत चुका। पर लगता नहीं कि इतनी जल्दी इतना घट गया। जीवन वाकई एक सपने की तरह है। थोड़े समय पहले हम नींद में थे, अब जाग गये। शायद आखिरी नींद लेने के लिए। चैन की अंतिम यात्रा हमारे लिए शुभ हो।

मैं बिल्कुल टूटा नहीं। यह लड़ाई खुद से है जिसे मुझे लड़ना है। समर्पण नहीं करुंगा। संघर्ष मैंने जीवन से सीखा है।

विपत्तियों को धूल की तरह उड़ाता हुआ चलना चाहता हूं। हारना नहीं चाहता मैं। बिल्कुल नहीं। वैसे भी हारने के लिए मेरे पास बचा ही क्या है? इतना कुछ गंवा चुका, बस चाह है मोक्ष पाने की। चाह है फिर से न लौट कर आने की।

बुढ़ापा चाहता है छुटकारा, बहुत सह चुका, बस आराम की चाह है।

-harminder singh

photo: mohit

Saturday, December 19, 2009

गलतियों की गुंजाइश रह ही जाती है




समंदर गहरा है और पानी खारा। यहां मछलियां नहीं मचलतीं क्योंकि वक्त ने इसे अभिशापित कर दिया। मुझे मालूम नहीं मैं कितना हंसा हूं, लेकिन इस समुद्र में नहाया नहीं। लगता है स्नान का समय करीब है क्योंकि मुझे इसका एहसास हो रहा है।

मेरी मर्जी आजतक नहीं चली। किसी ने सुनी नहीं मेरी। हालात पहले भी वही थे, आज भी वैसे ही हैं। फर्क पड़ा है तो उन्हें झेलने की क्षमता का। नहीं झेल पा रहा इस दर्द को मैं। यह दर्द जितना अपनों ने दिया है, लगभग उतना ही दर्द खुद का शरीर दे रहा है।

चाहता हूं जल्द विदाई हो। आखिर बुढ़ापे में विवशता के सिवा मुझे मिला क्या? अंगुलियों की उभरी हुई नसों को देखता हूं तो पीड़ा होती है। खुद से कहता हूं कि अच्छा होता मैं जन्म ही न लेता। न होती यह दशा, न दर्द का साथ होता, न अपनों की झिड़क, न परायों सा व्यवहार।

क्या जीवन का सिला मिला। कुछ भी तो नहीं। मैं वाकई डर कर सिमट जाता हूं। कई दिनों से पता नहीं क्यों भयभीत सा रहने लगा हूं। अंधेरा पहले भी डराता था, अब खुद से डर जाता हूं।

‘जल्द आओ मुझे मुक्ति दो इस शरीर से’ - यही दुआ मनाता हूं। दुआ करता हूं भगवान से कि मुझे माफी दो किये पापों की जिनका प्रायश्चित मैं न कर सका। शायद बुढ़ापा इसलिए ही है ताकि इंसान को प्रायश्चित का मौका मिल सके।

जितना स्वाद जवानी ने लिया उतना कष्ट बुढ़ापे में भोगना पड़ता है। ऐसा मैंने कई जगह सुना है। अच्छे कर्म हम कितने ही क्यों न करते हों, गलतियों की गुंजाइश रह ही जाती है।

-harminder singh

Sunday, October 18, 2009

एक बूढ़ा नदी से आंख मिलाता है




 नदी का रास्ता होकर गुजरता है मेरे गांव। मैं उस ओर नहीं जाता क्योंकि वह मुझे नहीं भाता। गांव वाले अक्सर कहते हैं कि वहां कई का जीवन थमा है। एक भय है, संशय भी, कहीं अगली बारी हमारी न हो।

मगर एक बूढ़ा वहां रोज घंटों बैठकर नदी से आंखें मिलाता है। उसे न भय है, न संशय। नदी जानती है कि एक मामूली लहर में वह ढह जायेगा। पर वर्षों से वह नहीं डूबा, न बहा क्योंकि उसे पास एक लाठी है- हौंसले की लाठी। वह कहता है,‘‘नदी झूठ बोलती है। भला बुढ़ापा इतना कमजोर कहां?’

बुढ़ापा जर्जर है, थका है, ऊबा है, पर लड़ाई जारी है खुद से और अपनों से।

बूढ़ा आगे कहता है,‘‘शरीर पुराना हुआ क्या हुआ, इंसान और मजबूत हुआ है।’’

तभी नदी का ऊफान उसे क्षति पहुंचा नहीं सका। तभी वह तना खड़ा है। तभी वह खोखले मुंह के साथ मुस्करा रहा है। तभी वह नदी से आंख मिला रहा है।

-harminder singh

Thursday, October 1, 2009

धुंधले पड़ गये हैं शब्द

काफी बूढ़ा हो चुका हूं। कहते हैं,‘कमजोरी बुढ़ापे की निशानी है।’ मैं लगातार चल नहीं सकता। थोड़ी दूरी पर किसी सहारे की जरुरत पड़ती है। बुढ़ापे को सहारा चाहिए। टांगे जबाव दे चुकीं, डर है कहीं लड़खड़ा कर गिर न जाऊं। तब बुढ़ापा और दुश्वार हो सकता है।

मुझे पता है मैं गली के बच्चों को देखकर थोड़ा मुस्कराता हूं। उनकी अठखेलियां मुझे ऊर्जा से भर देती हैं। एक पल को मैं खुद को भूल जाता हूं। मैं उनमें खो जाता हूं।

लोग मुझे मिलते हैं, उलझी हुई बातें होती हैं, पर ढेर सारी। कुछ समय आती हैं, कुछ उनके नहीं। फिर भी मन खामोश रहता है। ‘बूढ़ा ऊंचा सुनता है’- कहीं से आवाज आती है। मुझे बुरा नहीं लगता क्योंकि बुढ़ापा बेपरवाह है, लापरवाह नहीं।

चाय की दुकान पर सबुह अखबार पढ़ लेता हूं। तब चाय की चुस्की और.........., एक बिस्कुट भिगो कर खा लेता हूं। बीच-बीच में अपने कुरते से चश्मे को साफ करता रहता हूं। मोटी छपाई को आसानी से पढ़ लेता हूं। बारीक लिखे अक्षरों को पढ़ने के लिए अखबार को करीब लाना पड़ता है। थोड़े समय में शब्द धुंधले पड़ जाते हैं।

-harminder singh

इतना पाकर भी खाली हाथ है
















पतझड़ कैसा होता है, यह मैं जान गया हूं। पेड़ के सूखने पर उसे कैसा महसूस होता है। यह भी मुझे मालूम हो गया। इंसान और पेड़ सूखने पर एक जैसे लगते हैं। दोनों तरफ जर्जरता है, नीरसता है, और आखिरी वक्त का इंतजार। मगर एक जस्बा है जिसने सूखे ठूंठ को भी इतना बल दिया हुआ है कि वह बाधाओं से मुकाबला करने की रट लगाए है।

आंखों का धुंधलापन कहता है कि उम्र ढल गयी। हां, वक्त बीतता है तो इंसान पुराना हो जाता है। दूर की चीजें साफ नजर नहीं आतीं। सिर्फ आकृतियां दिखती हैं। पोता गोद में उछलता है। उसका उतावलापन मुझमें नयी ऊर्जा भर देता है। मैं बुढ़ापे को भूल जाता हूं। उसके साथ बच्चा बन जाता हूं। ‘‘बाबा मुझे ढूंढो।’’ दूर से कहीं मीठी आवाज आती है। अपनी कमजोर देह और धीमी नजरों से उसे खोजने की कोशिश करता हूं। ‘‘मैं यहां हूं।’’ वह दौड़कर दूसरी जगह छिप जाता है। सिलसिला जारी रहता है। दादा-पोता का मन बहलने का सिलसिला।

इंसानी रिश्तों की मजबूती का परिचय हमें कितनी आसानी से मिल जाता है। प्रेम की डोरी हमें किस तरह जोड़कर रखती है, यह शायद बुढ़ापे से बेहतर कौन जान सकता है। मैं इसका अर्थ समझ चुका।

अपनों के बीच कितना अपनापन है। मुझे लगता है मेरा बेटा संसार का सबसे अच्छा बेटा है। मुझे नाज है उसपर। उम्मीद है हर मां की कोख से ऐसा लाल पैदा हो। इकलौता है, लेकिन कभी नखरे नहीं दिखए। बहू ने मुझे अपने सगे पिता सा दुलार दिया- बहू नहीं बेटी है मेरी वह।

ऐसा अधिक होता है कि मेरे जैसे वृद्धों को अपनों का प्यार नहीं मिलता। मुझे स्नेह इतना मिला, लेकिन मेरा शरीर खुद से ऊबता जा रहा है। कई बार निराश हो जाता हूं। हम कभी-कभी परिस्थितियों के हाथों बिक जाते हैं। इतना कुछ पाकर भी लगता है जैसे हाथ खाली है।

-harminder singh

Monday, June 16, 2008

अपने याद आते हैं

राजाराम जी घर से दूर रह रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले घर को अलविदा कह दिया है। लेकिन अपनों की दूरी अब कहीं न कहीं परेशान करती है, बिल्कुल भीतर से। पिता होने की जहां पहले खुशी थी, बेटों के व्यवहार से दुख भी हुआ, फिर भी अपने तो अपने होते हैं। यही सोचकर कि उनसे अब बात नहीं करेंगे, दूर चले आये। बच्चों को फिर भी भूल नहीं पाया यह पिता।


‘‘अपने सुनते नहीं, पराये अपने होते नहीं। यह दौर का खेल है। वक्त बीत जायेगा। मगर अब बीतने से क्या फायदा। कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं। यह सब उसका किया धरा है। ऊपर वाला पता नहीं क्या-क्या करता रहता है?’’

-राजाराम जी, उम्र 80 साल


‘‘रह रहकर याद आती है उनकी। वे मुझे याद करते होंगे या नहीं, लेकिन मैं उन्हें नहीं भूल पाया हूं। दुखी होकर घर से निकला था मैं। निकला क्या हालात ही ऐसे बना दिये गये थे कि वहां रहना मेरे बस से बाहर था। अपनी औलाद के साथ कुछ पल बिताना चाहता था। वह समय मेरा छिन गया।’’ राजाराम भावुक हो जाते हैं।

लेकिन आगे कहते हैं,‘‘मैंने बुरा वक्त देखा है। 80 साल की उम्र को मैं कम नहीं समझता, बहुत ज्यादा बूढ़ा हो गया हूं मैं। बच्चों को बढ़ा होते देखा है मैंने। उम्मीदें बहुत थीं। सब चकनाचूर हो गयीं।’’ राजाराम का चेहरा थोड़ा गुस्सा भी जाहिर करता है और मन की टीस भी।

‘‘अपने सुनते नहीं, पराये अपने होते नहीं। यह दौर का खेल है। वक्त बीत जायेगा। मगर अब बीतने से क्या फायदा। कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं। यह सब उसका किया धरा है। ऊपर वाला पता नहीं क्या-क्या करता रहता है?’’

राजाराम अपने घर में बेइज्जत किये गये। उन्हें ताने दिये जाते थे, रोज-रोज के तानों से वे घुटन महसूस कर रहे थे। पेंशन मिलती है, गुजारा ठीक-ठीक चल रहा है। पत्नि की मौत के बाद टूट गये थे, अब जाकर थोड़े संभले हैं। पर यह भी कोई संभलना है।

रमेश उनका नौकर है। वह बचपन से उनके साथ रहा है। जब वे घर से निकले तो वह भी उनके साथ आ गया। बड़ा ईमानदार और नेक है। आसपड़ोस के लोग भी उसकी अच्छाई के बारे में बता देंगे। वह उनकी भी कुछ न कुछ मदद कर देता है।

राजाराम जी कहते हैं,‘‘कितनी जिंदगी बची है, पता नहीं। वैसे मन नहीं मानता। मरने से पहले एक बार बच्चों को जरुर देखूंगा।’’

थोड़ा रुक जाते हैं। फिर कहते हैं,‘‘अब क्या करें, बाप का मन कितना होता है। औलाद के साथ रहने को दिल कहता है। अपने बच्चे भूले नहीं जाते चाहें वे क्यों न हमें भूल जायें और कितने ही बुरे क्यों न हों।’’ भावुक हो गये राजाराम जी।

उन्होंने गर्दन झुकाकर अपने कमजोर हाथों से आंखों को मसला। उनकी उंगलियां कुछ गीली थीं।

-हरमिन्दर सिंह द्वारा
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कैदी की डायरी......................
>>सादाब की मां............................ >>मेरी मां
बूढ़ी काकी कहती है
>>पल दो पल का जीवन.............>क्यों हम जीवन खो देते हैं?

घर से स्कूल
>>चाय में मक्खी............................>>भविष्य वाला साधु
>>वापस स्कूल में...........................>>सपने का भय
हमारे प्रेरणास्रोत हमारे बुजुर्ग

...ऐसे थे मुंशी जी

..शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय काम था मुंशी जी का

...अपने अंतिम दिनों में
तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?

सम्मान के हकदार

नेत्र सिंह

रामकली जी

दादी गौरजां

कल्याणी-एक प्रेम कहानी मेरा स्कूल बुढ़ापा

....भाग-1....भाग-2
सीधी बात नो बकवास

बहुत कुछ बदल गया, पर बदले नहीं लोग

गुरु ऐसे ही होते हैं
युवती से शादी का हश्र भुगत रहा है वृद्ध

बुढ़ापे के आंसू

बूढ़ा शरीर हुआ है इंसान नहीं

बुढ़ापा छुटकारा चाहता है

खोई यादों को वापिस लाने की चाह

बातों बातों में रिश्ते-नाते बुढ़ापा
ऐसा क्या है जीवन में?

अनदेखा अनजाना सा

कुछ समय का अनुभव

ठिठुरन और मैं

राज पिछले जन्म का
क्योंकि तुम खुश हो तो मैं खुश हूं

कहानी की शुरुआत फिर होगी

करीब हैं, पर दूर हैं

पापा की प्यारी बेटी

छली जाती हैं बेटियां

मां ऐसी ही होती है
एक उम्मीद के साथ जीता हूं मैं

कुछ नमी अभी बाकी है

अपनेपन की तलाश

टूटी बिखरी यादें

आखिरी पलों की कहानी

बुढ़ापे का मर्म



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>>मेरी बहन नेत्रा

>>मैडम मौली
>>गर्मी की छुट्टियां

>>खराब समय

>>दुलारी मौसी

>>लंगूर वाला

>>गीता पड़ी बीमार
>>फंदे में बंदर

जानवर कितना भी चालाक क्यों न हो, इंसान उसे काबू में कर ही लेता है। रघु ने स्कूल से कहीं एक रस्सी तलाश कर ली. उसने रस्सी का एक फंदा बना लिया

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वृद्धग्राम पर पहली पोस्ट में मा. होराम सिंह का जिक्र
[ARUN+DR.jpg]
वृद्धों की सेवा में परमानंद -
डा. रमाशंकर
‘अरुण’


बुढ़ापे का दर्द

दुख भी है बुढ़ापे का

सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य गिरीराज सिद्धू ने व्यक्त किया अपना दुख

बुढ़ापे का सहारा

गरीबदास उन्हीं की श्रेणी में आते हैं जिन्हें अपने पराये कर देते हैं और थकी हड्डियों को सहारा देने के बजाय उल्टे उनसे सहारे की उम्मीद करते हैं
दो बूढ़ों का मिलन

दोनों बूढ़े हैं, फिर भी हौंसला रखते हैं आगे जीने का। वे एक सुर में कहते हैं,‘‘अगला लोक किसने देखा। जीना तो यहां ही है।’’
[old.jpg]

इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल
प्रताप महेन्द्र सिंह कहते हैं- ''लाचारी और विवशता के सिवाय कुछ नहीं है बुढ़ापा. यह ऐसा पड़ाव है जब मर्जी अपनी नहीं रहती। रुठ कर मनाने वाला कोई नहीं।'' एक पुरानी फिल्म के गीत के शब्द वे कहते हैं-‘‘इक दिन बिक जायेगा, माटी के मोल, जग में रह जायेंगे, प्यारे तेरे बोल।’’

...............कहानी
[kisna.jpg]
किशना- एक बूढ़े की कहानी
(भाग-1)..................(भाग-2)
ये भी कोई जिंदगी है
बृजघाट के घाट पर अनेकों साधु-संतों के आश्रम हैं। यहां बहुत से बूढ़े आपको किसी आस में बैठे मिल जायेंगे। इनकी आंखें थकी हुयी हैं, येजर्जर काया वाले हैं, किसी की प्रेरणा नहीं बने, हां, इन्हें लोग दया दृष्टि से जरुर देखते हैं

अपने याद आते हैं
राजाराम जी घर से दूर रह रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले घर को अलविदा कह दिया है। लेकिन अपनों की दूरी अब कहीं न कहीं परेशान करती है, बिल्कुल भीतर से

कविता.../....हरमिन्दर सिंह .
कभी मोम पिघला था यहां
इस बहाने खुद से बातें हो जायेंगी
विदाई बड़ी दुखदायी
आखिर कितना भीगता हूं मैं
प्यास अभी मिटी नहीं
पता नहीं क्यों?
बेहाल बागवां

यही बुढापा है, सच्चाई है
विदा, अलविदा!
अब कहां गई?
अंतिम पल
खत्म जहां किनारा है
तन्हाई के प्याले
ये मेरी दुनिया है
वहां भी अकेली है वह
जन्म हुआ शिशु का
गरमी
जीवन और मरण
कोई दुखी न हो
यूं ही चलते-चलते
मैं दीवाली देखना चाहता हूं
दीवाली पर दिवाला
जा रहा हूं मैं, वापस न आने के लिए
बुढ़ापा सामने खड़ा पूछ रहा
मगर चुप हूं मैं
क्षोभ
बारिश को करीब से देखा मैंने
बुढ़ापा सामने खड़ा है, अपना लो
मन की पीड़ा
काली छाया

तब जन्म गीत का होता है -रेखा सिंह
भगवान मेरे, क्या जमाना आया है -शुभांगी
वृद्ध इंसान हूं मैं-शुभांगी
मां ऐसी ही होती है -ज्ञानेंद्र सिंह
खामोशी-लाचारी-ज्ञानेंद्र सिंह
उम्र के पड़ाव -बलराम गुर्जर
मैं गरीबों को सलाम करता हूं -फ़ुरखान शाह
दैनिक हिन्दुस्तान और वेबदुनिया में वृद्धग्राम
hindustan vradhgram ब्लॉग वार्ता :
कहीं आप बूढ़े तो नहीं हो रहे
-Ravish kumar
NDTV

इन काँपते हाथों को बस थाम लो!
-Ravindra Vyas WEBDUNIA.com