बूढ़ी काकी कहती है-‘‘बुढ़ापा तो आना ही है। सच का सामना करने से भय कैसा? क्यों हम घबराते हैं आने वाले समय से जो सच्चाई है जिसे झुठलाना नामुमकिन है।’’.

LATEST on VRADHGRAM:

Showing posts with label feeling sad. Show all posts
Showing posts with label feeling sad. Show all posts

Monday, June 16, 2008

नैनहू नीर बहै तन खीना

उपदेशों की एक बहुत बड़ी मचान बांधने का कार्य तेजी के साथ किया जा रहा है। ये कुछ उन्हें सबक सिखला जाये जो सोचे बैठे हैं कि उन्हें अपनों के साथ एक बहुत बड़े खेल का प्रारंभ करना है। यह खेल ही तो होगा। यहां दुख और दर्द का अहसास किया जायेगा। उनकी पीड़ा को अपनी माना जाये जिनके साथ यह किया जाने वाला है या किया जा रहा है। वे बतातें ही तो नहीं लेकिन अंदर की कराहटों को छिपाना इतना आसान भी नहीं हैं। समझ सकते हैं उनके चेहरों की सलवटों से तथा उनके शब्दों की उलझन से कि वे कितने टूट चुके हैं।

यह अवस्था ही कुछ ऐसी है कि सब कुछ खोया-खोया सा, खामोश सा लगता है यह जहां। पता नहीं कैसे जीते हैं वे लोग जो हालातों के साथ उठते, बैठते, जागते, सोते रहते हैं।

यहां लड़ाई अपने से होती है, अपनों से भी और उससे भी जो इसे चैबीसों घंटे देखता रहता है। फिर वही बात, जब जी भर कर जिये हैं, तो पुराने होने में दर्द कैसा? धूल चीजों को धूमिल करती है। हम भी यदि धूमिल हो रहे हैं तो इसमें क्या बुराई है? राख की ओट में मिलने की ख्वाहिशें जल्द पूरी हो जायें। यह शायद ही तो है।

चलिये ठीक है मान लें कि बहुत अच्छा नहीं हो रहा। लेकिन क्या इससे अच्छा हो सकता है इस उम्र में? झुर्रियां टिकीं हैं। यह कई सालों के लिये हैं।

आईये देखते हैं कि इस अवस्था के बारे में हमारे धर्मशास्त्र क्या कहते हैं-

अभिभावदन शीलस्य नित्यम्वृद्धोपसेविनम्।
चत्वारि तस्य वर्द्धयन्ते आयुः विद्या पशोबलम्।।
(हिन्दू धर्मशास्त्र)

-जो नित्यप्रति वृद्ध जनों तथा अभिवादन योग्य भद्र जनों की सेवा करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल चार चीजें बढ़ती हैं।


नैनहू नीर बहै तन खीना केस भये दुध बानी।
रुंधा कंठ सबद नहिं उचरहि अब क्या करै परानी।।
(आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब)

-आंखों से पानी बह रहा है। शरीर क्षीण हो गया, केश दूध की भांति सफेद हो चुके, बोलते ही गला रुंध जाता है। वृद्धावस्था के ये स्पष्ट लक्ष्ण हैं। ऐसे में हे प्राणी, अब क्या उपाय है?


विरध भयो सूझै नहीं, काल पहुंचयो आनि।
कहु नानक नर बावरे, क्यों न भजै भगवान।।
(आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब)

-मानव वृद्ध हो गया, कुछ भी नहीं सूझ रहा। उधर काल भी निकट ही पड़ा है। गुरु जी कहते हैं कि हे पागल मानव तू फिर भी ईश्वर का भजन क्यों नहीं करता?


-हरमिन्दर सिंह द्वारा

अपने याद आते हैं

राजाराम जी घर से दूर रह रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले घर को अलविदा कह दिया है। लेकिन अपनों की दूरी अब कहीं न कहीं परेशान करती है, बिल्कुल भीतर से। पिता होने की जहां पहले खुशी थी, बेटों के व्यवहार से दुख भी हुआ, फिर भी अपने तो अपने होते हैं। यही सोचकर कि उनसे अब बात नहीं करेंगे, दूर चले आये। बच्चों को फिर भी भूल नहीं पाया यह पिता।


‘‘अपने सुनते नहीं, पराये अपने होते नहीं। यह दौर का खेल है। वक्त बीत जायेगा। मगर अब बीतने से क्या फायदा। कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं। यह सब उसका किया धरा है। ऊपर वाला पता नहीं क्या-क्या करता रहता है?’’

-राजाराम जी, उम्र 80 साल


‘‘रह रहकर याद आती है उनकी। वे मुझे याद करते होंगे या नहीं, लेकिन मैं उन्हें नहीं भूल पाया हूं। दुखी होकर घर से निकला था मैं। निकला क्या हालात ही ऐसे बना दिये गये थे कि वहां रहना मेरे बस से बाहर था। अपनी औलाद के साथ कुछ पल बिताना चाहता था। वह समय मेरा छिन गया।’’ राजाराम भावुक हो जाते हैं।

लेकिन आगे कहते हैं,‘‘मैंने बुरा वक्त देखा है। 80 साल की उम्र को मैं कम नहीं समझता, बहुत ज्यादा बूढ़ा हो गया हूं मैं। बच्चों को बढ़ा होते देखा है मैंने। उम्मीदें बहुत थीं। सब चकनाचूर हो गयीं।’’ राजाराम का चेहरा थोड़ा गुस्सा भी जाहिर करता है और मन की टीस भी।

‘‘अपने सुनते नहीं, पराये अपने होते नहीं। यह दौर का खेल है। वक्त बीत जायेगा। मगर अब बीतने से क्या फायदा। कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं। यह सब उसका किया धरा है। ऊपर वाला पता नहीं क्या-क्या करता रहता है?’’

राजाराम अपने घर में बेइज्जत किये गये। उन्हें ताने दिये जाते थे, रोज-रोज के तानों से वे घुटन महसूस कर रहे थे। पेंशन मिलती है, गुजारा ठीक-ठीक चल रहा है। पत्नि की मौत के बाद टूट गये थे, अब जाकर थोड़े संभले हैं। पर यह भी कोई संभलना है।

रमेश उनका नौकर है। वह बचपन से उनके साथ रहा है। जब वे घर से निकले तो वह भी उनके साथ आ गया। बड़ा ईमानदार और नेक है। आसपड़ोस के लोग भी उसकी अच्छाई के बारे में बता देंगे। वह उनकी भी कुछ न कुछ मदद कर देता है।

राजाराम जी कहते हैं,‘‘कितनी जिंदगी बची है, पता नहीं। वैसे मन नहीं मानता। मरने से पहले एक बार बच्चों को जरुर देखूंगा।’’

थोड़ा रुक जाते हैं। फिर कहते हैं,‘‘अब क्या करें, बाप का मन कितना होता है। औलाद के साथ रहने को दिल कहता है। अपने बच्चे भूले नहीं जाते चाहें वे क्यों न हमें भूल जायें और कितने ही बुरे क्यों न हों।’’ भावुक हो गये राजाराम जी।

उन्होंने गर्दन झुकाकर अपने कमजोर हाथों से आंखों को मसला। उनकी उंगलियां कुछ गीली थीं।

-हरमिन्दर सिंह द्वारा
Blog Widget by LinkWithin
coming soon1
कैदी की डायरी......................
>>सादाब की मां............................ >>मेरी मां
बूढ़ी काकी कहती है
>>पल दो पल का जीवन.............>क्यों हम जीवन खो देते हैं?

घर से स्कूल
>>चाय में मक्खी............................>>भविष्य वाला साधु
>>वापस स्कूल में...........................>>सपने का भय
हमारे प्रेरणास्रोत हमारे बुजुर्ग

...ऐसे थे मुंशी जी

..शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय काम था मुंशी जी का

...अपने अंतिम दिनों में
तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?

सम्मान के हकदार

नेत्र सिंह

रामकली जी

दादी गौरजां

कल्याणी-एक प्रेम कहानी मेरा स्कूल बुढ़ापा

....भाग-1....भाग-2
सीधी बात नो बकवास

बहुत कुछ बदल गया, पर बदले नहीं लोग

गुरु ऐसे ही होते हैं
युवती से शादी का हश्र भुगत रहा है वृद्ध

बुढ़ापे के आंसू

बूढ़ा शरीर हुआ है इंसान नहीं

बुढ़ापा छुटकारा चाहता है

खोई यादों को वापिस लाने की चाह

बातों बातों में रिश्ते-नाते बुढ़ापा
ऐसा क्या है जीवन में?

अनदेखा अनजाना सा

कुछ समय का अनुभव

ठिठुरन और मैं

राज पिछले जन्म का
क्योंकि तुम खुश हो तो मैं खुश हूं

कहानी की शुरुआत फिर होगी

करीब हैं, पर दूर हैं

पापा की प्यारी बेटी

छली जाती हैं बेटियां

मां ऐसी ही होती है
एक उम्मीद के साथ जीता हूं मैं

कुछ नमी अभी बाकी है

अपनेपन की तलाश

टूटी बिखरी यादें

आखिरी पलों की कहानी

बुढ़ापे का मर्म



[ghar+se+school.png]
>>मेरी बहन नेत्रा

>>मैडम मौली
>>गर्मी की छुट्टियां

>>खराब समय

>>दुलारी मौसी

>>लंगूर वाला

>>गीता पड़ी बीमार
>>फंदे में बंदर

जानवर कितना भी चालाक क्यों न हो, इंसान उसे काबू में कर ही लेता है। रघु ने स्कूल से कहीं एक रस्सी तलाश कर ली. उसने रस्सी का एक फंदा बना लिया

[horam+singh.jpg]
वृद्धग्राम पर पहली पोस्ट में मा. होराम सिंह का जिक्र
[ARUN+DR.jpg]
वृद्धों की सेवा में परमानंद -
डा. रमाशंकर
‘अरुण’


बुढ़ापे का दर्द

दुख भी है बुढ़ापे का

सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य गिरीराज सिद्धू ने व्यक्त किया अपना दुख

बुढ़ापे का सहारा

गरीबदास उन्हीं की श्रेणी में आते हैं जिन्हें अपने पराये कर देते हैं और थकी हड्डियों को सहारा देने के बजाय उल्टे उनसे सहारे की उम्मीद करते हैं
दो बूढ़ों का मिलन

दोनों बूढ़े हैं, फिर भी हौंसला रखते हैं आगे जीने का। वे एक सुर में कहते हैं,‘‘अगला लोक किसने देखा। जीना तो यहां ही है।’’
[old.jpg]

इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल
प्रताप महेन्द्र सिंह कहते हैं- ''लाचारी और विवशता के सिवाय कुछ नहीं है बुढ़ापा. यह ऐसा पड़ाव है जब मर्जी अपनी नहीं रहती। रुठ कर मनाने वाला कोई नहीं।'' एक पुरानी फिल्म के गीत के शब्द वे कहते हैं-‘‘इक दिन बिक जायेगा, माटी के मोल, जग में रह जायेंगे, प्यारे तेरे बोल।’’

...............कहानी
[kisna.jpg]
किशना- एक बूढ़े की कहानी
(भाग-1)..................(भाग-2)
ये भी कोई जिंदगी है
बृजघाट के घाट पर अनेकों साधु-संतों के आश्रम हैं। यहां बहुत से बूढ़े आपको किसी आस में बैठे मिल जायेंगे। इनकी आंखें थकी हुयी हैं, येजर्जर काया वाले हैं, किसी की प्रेरणा नहीं बने, हां, इन्हें लोग दया दृष्टि से जरुर देखते हैं

अपने याद आते हैं
राजाराम जी घर से दूर रह रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले घर को अलविदा कह दिया है। लेकिन अपनों की दूरी अब कहीं न कहीं परेशान करती है, बिल्कुल भीतर से

कविता.../....हरमिन्दर सिंह .
कभी मोम पिघला था यहां
इस बहाने खुद से बातें हो जायेंगी
विदाई बड़ी दुखदायी
आखिर कितना भीगता हूं मैं
प्यास अभी मिटी नहीं
पता नहीं क्यों?
बेहाल बागवां

यही बुढापा है, सच्चाई है
विदा, अलविदा!
अब कहां गई?
अंतिम पल
खत्म जहां किनारा है
तन्हाई के प्याले
ये मेरी दुनिया है
वहां भी अकेली है वह
जन्म हुआ शिशु का
गरमी
जीवन और मरण
कोई दुखी न हो
यूं ही चलते-चलते
मैं दीवाली देखना चाहता हूं
दीवाली पर दिवाला
जा रहा हूं मैं, वापस न आने के लिए
बुढ़ापा सामने खड़ा पूछ रहा
मगर चुप हूं मैं
क्षोभ
बारिश को करीब से देखा मैंने
बुढ़ापा सामने खड़ा है, अपना लो
मन की पीड़ा
काली छाया

तब जन्म गीत का होता है -रेखा सिंह
भगवान मेरे, क्या जमाना आया है -शुभांगी
वृद्ध इंसान हूं मैं-शुभांगी
मां ऐसी ही होती है -ज्ञानेंद्र सिंह
खामोशी-लाचारी-ज्ञानेंद्र सिंह
उम्र के पड़ाव -बलराम गुर्जर
मैं गरीबों को सलाम करता हूं -फ़ुरखान शाह
दैनिक हिन्दुस्तान और वेबदुनिया में वृद्धग्राम
hindustan vradhgram ब्लॉग वार्ता :
कहीं आप बूढ़े तो नहीं हो रहे
-Ravish kumar
NDTV

इन काँपते हाथों को बस थाम लो!
-Ravindra Vyas WEBDUNIA.com