बूढ़ी काकी कहती है-‘‘बुढ़ापा तो आना ही है। सच का सामना करने से भय कैसा? क्यों हम घबराते हैं आने वाले समय से जो सच्चाई है जिसे झुठलाना नामुमकिन है।’’.

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Friday, June 18, 2010

............तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?



मेरे दादा जी उस उम्र के दौर से गुजर रहे हैं जहां चीजें अक्सर छूटने लगती हैं। छोटी शुभी ने उनके हाथों को देखकर हैरत से कहा,‘इनके हाथों की नसें किस तरह चमक रही हैं।’ ऐसा उसने गंभीरता से कहा था। उस छोटी बच्ची को भी एक वृद्ध की इस अवस्था को देखकर हैरानी हुई।

दरअसल बुढ़ापा अपने साथ संशय और हैरानी लाता है। इंसान खुद को ऐसे दौर में पाता हैं जहां से रुट बदलना नामुमकिन है। अब तो सिर्फ आगे जाना है। हां, पीछे मुड़कर देखा जा सकता है, लेकिन पुराने दिनों को जिया नहीं जा सकता।

शुभी की बात ने मुझे भी गंभीर कर दिया था। नसों ने त्वचा का दामन नहीं छोड़ा है। बस किसी तरह चिपकी हैं।

हम जब एक वृद्ध को देखते हैं तो पाते हैं कि जर्जरता किस कदर हावी हो सकती है। शरीर कितना  है बाकी।

हम जानते हैं कि हम भी कभी वृद्ध होंगे। हम भी होंगे अपने वृद्धजनों के दौर में। ...............तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?



-harminder singh

32 comments:

  1. बिलकुल सही कहा....मैं भी जब अपनी दादी के हाथ देखती तो यही सब मन में आता था....आज वैसे ही हाथ मेरे होने की स्थिति में हैं .. :) :)

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  4. है यह वह दौर उम्र का
    जहां से गुजरता है हर कोई
    वक्त की मेहरबानी से
    थामे कोई हाथ तो
    खुशी से भर आता है दिल
    वरना क्या है ऐसे में
    इलावा दर्द और परेशानी के

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  5. sahi kaha aapne hum khud jab tak budhe n hoge is anubhuti ko mahsus nhi kar sakte

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  7. This comment has been removed by the author.

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  8. तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है.....
    बिलकुल सही कहा आपने..
    यह सच्चाई है जिससे हम अनजान बने रह्ते है
    आप ने इस ओर ध्यान आकर्षित करा दिया आभार

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  9. स्‍वयं पर बीतती है तभी मालूम पड़ता है कि बुढापा क्‍या होता है? अच्‍छी बात।

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  10. sach hai waqt se phele ane wale samay ko batane ka DHANVAAD.mai hamesa apni mummy ke haat ko dek kr yahi sochti thi pr budapa to aa

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    harminder singh

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  12. very true....can learn a lot from this blog...

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  13. बहुत अच्छा ब्लॉग है आपका ... बुढ़ापा एक दिन तो सबको आना ही है पर हम इसे समझ तभी पातें हैं जब ये हम पर आता है...
    ब्लॉग की दुनिया में नयी हूँ. . यदि आप मेरा लिखा हुआ पढेंगे तो अच्छा लगेगा ...

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  15. बहुत अच्छा लिखा है आपने ब्लॉग भी बहुत बढ़िया है |

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    आप को सूचित करते हुवे हर्ष हो रहा है क़ि आगामी शैक्षणिक वर्ष २०११-२०१२ के दिसम्बर माह में ०९--१० दिसम्बर (शुक्रवार -शनिवार ) को ''हिंदी ब्लागिंग : स्वरूप, व्याप्ति और संभावनाएं '' इस विषय पर दो दिवशीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जा रही है. विश्विद्यालय अनुदान आयोग द्वारा इस संगोष्ठी को संपोषित किया जा सके इस सन्दर्भ में औपचारिकतायें पूरी की जा चुकी हैं. के.एम्. अग्रवाल महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजन की जिम्मेदारी ली गयी है. महाविद्यालय के प्रबन्धन समिति ने संभावित संगोष्ठी के पूरे खर्च को उठाने की जिम्मेदारी ली है. यदि किसी कारणवश कतिपय संस्थानों से आर्थिक मदद नहीं मिल पाई तो भी यह आयोजन महाविद्यालय अपने खर्च पर करेगा.

    संगोष्ठी की तारीख भी निश्चित हो गई है (०९ -१० दिसम्बर२०११ ) संगोष्ठी में आप की सक्रीय सहभागिता जरूरी है. दरअसल संगोष्ठी के दिन उदघाटन समारोह में हिंदी ब्लागगिंग पर एक पुस्तक के लोकार्पण क़ी योजना भी है. आप लोगों द्वारा भेजे गए आलेखों को ही पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया जायेगा . आप सभी से अनुरोध है क़ि आप अपने आलेख जल्द से जल्द भेजने क़ी कृपा करें . आलेख भेजने की अंतिम तारीख २५ सितम्बर २०११ है. मूल विषय है-''हिंदी ब्लागिंग: स्वरूप,व्याप्ति और संभावनाएं ''
    आप इस मूल विषय से जुड़कर अपनी सुविधा के अनुसार उप विषय चुन सकते हैं

    जैसे क़ि ----------------
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    ४-हिंदी ब्लागिंग और हिंदी साहित्य

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    ६-हिंदी अध्ययन -अध्यापन में ब्लागिंग क़ी उपयोगिता

    ७- हिंदी टंकण : समस्याएँ और निराकरण
    ८-हिंदी ब्लागिंग का अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य

    ९-हिंदी के साहित्यिक ब्लॉग
    १०-विज्ञानं और प्रोद्योगिकी से सम्बंधित हिंदी ब्लॉग

    ११- स्त्री विमर्श से सम्बंधित हिंदी ब्लॉग

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    १३-दलित विमर्श से सम्बंधित हिंदी ब्लॉग
    १४- मीडिया और समाचारों से सम्बंधित हिंदी ब्लॉग
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कविता.../....हरमिन्दर सिंह .
कभी मोम पिघला था यहां
इस बहाने खुद से बातें हो जायेंगी
विदाई बड़ी दुखदायी
आखिर कितना भीगता हूं मैं
प्यास अभी मिटी नहीं
पता नहीं क्यों?
बेहाल बागवां

यही बुढापा है, सच्चाई है
विदा, अलविदा!
अब कहां गई?
अंतिम पल
खत्म जहां किनारा है
तन्हाई के प्याले
ये मेरी दुनिया है
वहां भी अकेली है वह
जन्म हुआ शिशु का
गरमी
जीवन और मरण
कोई दुखी न हो
यूं ही चलते-चलते
मैं दीवाली देखना चाहता हूं
दीवाली पर दिवाला
जा रहा हूं मैं, वापस न आने के लिए
बुढ़ापा सामने खड़ा पूछ रहा
मगर चुप हूं मैं
क्षोभ
बारिश को करीब से देखा मैंने
बुढ़ापा सामने खड़ा है, अपना लो
मन की पीड़ा
काली छाया

तब जन्म गीत का होता है -रेखा सिंह
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वृद्ध इंसान हूं मैं-शुभांगी
मां ऐसी ही होती है -ज्ञानेंद्र सिंह
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