बूढ़ी काकी कहती है-‘‘बुढ़ापा तो आना ही है। सच का सामना करने से भय कैसा? क्यों हम घबराते हैं आने वाले समय से जो सच्चाई है जिसे झुठलाना नामुमकिन है।’’.

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Tuesday, June 3, 2008

अपने अंतिम दिनों में

किस्मत खेल करती है और उस खेल को देखा जा सकता है, भुगता जा सकता है, लेकिन वह आज तक समझा नहीं जा सका। औरों के लिये ही सब किया अपने एक ख्वाब देखा जिसका बुलबुला पता नहीं चला कब फूट गया।

अंतिम दिनों का कष्ट सारे जीवन के आनंद, सुख और रस को एक झटके में समाप्त कर देता है। मुंशी जी की दशा दिन--दिन बिगड़ती चली गयी। चारपाई की चर-चर अब कम ही होती थी। वेलेटे-लेटे ही अखबार पढ़ते थे, गन्ने की पोरी को छीलने की आदत अभी भी उनके बुढ़ापे को संक्षय में डालती थी। रेडियो उनके पास रखे एक स्टूल पर अब भी बजता था। उनके पास बच्चे कम फटकते थे क्योंकि वे उन्हें झिड़क देते थे


मुंशी निर्मल की यादों की बस्ती को कुरेदने की कोशिशें जारी हैं। उनके पुत्र मुंशी भोला सिंह हमें उस बस्ती में ले चलते हैं जहां एक बूढ़ा बैठा है। एक टूटी चारपाई है। कुछ बुदबुदा रहा है। पता नहीं क्यों वह कुछ साफ-साफ नहीं कह पाता। यह मुंशी निर्मल सिंह हैं। वे अब इतने जर्जर और गतिशील हो गये हैं कि सब कुछ अलग-अलग सा लग रहा है। पहले उनके आसपास लोगों का जमावड़ा होता था, आज नहीं है। हालांकि आज वे भी नहीं हैं, लेकिन यादों का सिलसिला जारी है जो आगे भी शायद इसी तरह चलता रहे। मुंशी जी हमारे और आपके बीच जीते रहें।

मंशी भोला सिंह कहते हैं,‘‘उनका अंतिम समय कठिन था। उनकी मानसिक स्थिति क्षीण पड़ गयी थी। एक तरह से कहें तो झुंझलाये रहते थे। व्यवहार से एकदम रुखे हो गये थे। हर किसी को ड़ांटने लगे थे। बीच-बीच में ऐसा करते हुये वे आंखों से एक-आद आंसू भी छलका देते थे।’’

बड़ा कठिन समय था वह जब एक बूढ़ा विलाप करने की कोशिश करे और किया न जाये। वे रोते थे तो रोया नहीं जाता था, आवाज रुक गयी थी। खाते तो खाया नहीं जाता था।

उनकी गायों की हालत देखकर दुख होता था जो उनके पास एक नीम के पेड़ से बंधी थीं। वे भी अंतिम समय तक शांत रहीं।

अंतिम दिनों का कष्ट सारे जीवन के आनंद, सुख और रस को एक झटके में समाप्त कर देता है। मुंशी जी की दशा दिन-ब-दिन बिगड़ी चली गयी। चारपाई की चर-चर अब कम ही होती थी। वे लेटे-लेटे ही अखबार पढ़ते थे, गन्ने की पोरी को छीलने की आदत अभी भी उनके बुढ़ापे को संक्षय में डालती थी। रेडियो उनके पास रखे एक स्टूल पर अब भी बजता था। उनके पास बच्चे कम फटकते थे क्योंकि वे उन्हें झिड़क देते थे।

सुबह की किरण से पहले उठने की उनकी आदत जारी थी। शरीर धीरे-धीरे जबाव दे रहा था। अपनी अंतिम विदाई से एक दो दिन पूर्व वे खूब रोये, जी भर रोये। पता नहीं क्या याद किया, क्या पछतावा किया, लेकिन उनकी आवाज मानो अब रुक सी गयी थी। इशारों में कुछ कहने की कोशिश करते, कह नहीं पाते। फिर एक आसूं की बूंद उनके जर्जर हाथों पर टपक पड़ती।

‘‘इससे आगे मैं बता नहीं सकता......।’’ इतना कहकर मुंशी भोला सिंह अपने पिता को याद कर चश्मे को नीचे करते हैं। एक आंसू यहां भी गिरा। यह पिता को याद कर दूसरे बूढ़े की आंखों की नमी दर्शा गया। प्रेम और अपनेपन की झलक दे गया जो आगे के वक्त में शायद काम आये या ना आये, लेकिन यादों के झरोखे से झांकने पर हर बार महसूस की जायेगी।

हरमिन्दर सिंह द्वारा

3 comments:

  1. आगे भी लिखते रहें ।

    आभार,

    ReplyDelete
  2. harminder singh(vradhgram)June 3, 2008 at 11:30 PM

    धन्यवाद, नीरज जी,
    हम निर्मल जी के बारे में और जानकारी एकत्रित कर रहे हैं। अगली पोस्टों पर उनके बारे में लिखते रहेंगे।

    ReplyDelete
  3. दिल को छू लिया इस लेख ने ।

    ReplyDelete

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>>सादाब की मां............................ >>मेरी मां
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>>पल दो पल का जीवन.............>क्यों हम जीवन खो देते हैं?

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>>चाय में मक्खी............................>>भविष्य वाला साधु
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हमारे प्रेरणास्रोत हमारे बुजुर्ग

...ऐसे थे मुंशी जी

..शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय काम था मुंशी जी का

...अपने अंतिम दिनों में
तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?

सम्मान के हकदार

नेत्र सिंह

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कल्याणी-एक प्रेम कहानी मेरा स्कूल बुढ़ापा

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प्रताप महेन्द्र सिंह कहते हैं- ''लाचारी और विवशता के सिवाय कुछ नहीं है बुढ़ापा. यह ऐसा पड़ाव है जब मर्जी अपनी नहीं रहती। रुठ कर मनाने वाला कोई नहीं।'' एक पुरानी फिल्म के गीत के शब्द वे कहते हैं-‘‘इक दिन बिक जायेगा, माटी के मोल, जग में रह जायेंगे, प्यारे तेरे बोल।’’

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किशना- एक बूढ़े की कहानी
(भाग-1)..................(भाग-2)
ये भी कोई जिंदगी है
बृजघाट के घाट पर अनेकों साधु-संतों के आश्रम हैं। यहां बहुत से बूढ़े आपको किसी आस में बैठे मिल जायेंगे। इनकी आंखें थकी हुयी हैं, येजर्जर काया वाले हैं, किसी की प्रेरणा नहीं बने, हां, इन्हें लोग दया दृष्टि से जरुर देखते हैं

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राजाराम जी घर से दूर रह रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले घर को अलविदा कह दिया है। लेकिन अपनों की दूरी अब कहीं न कहीं परेशान करती है, बिल्कुल भीतर से

कविता.../....हरमिन्दर सिंह .
कभी मोम पिघला था यहां
इस बहाने खुद से बातें हो जायेंगी
विदाई बड़ी दुखदायी
आखिर कितना भीगता हूं मैं
प्यास अभी मिटी नहीं
पता नहीं क्यों?
बेहाल बागवां

यही बुढापा है, सच्चाई है
विदा, अलविदा!
अब कहां गई?
अंतिम पल
खत्म जहां किनारा है
तन्हाई के प्याले
ये मेरी दुनिया है
वहां भी अकेली है वह
जन्म हुआ शिशु का
गरमी
जीवन और मरण
कोई दुखी न हो
यूं ही चलते-चलते
मैं दीवाली देखना चाहता हूं
दीवाली पर दिवाला
जा रहा हूं मैं, वापस न आने के लिए
बुढ़ापा सामने खड़ा पूछ रहा
मगर चुप हूं मैं
क्षोभ
बारिश को करीब से देखा मैंने
बुढ़ापा सामने खड़ा है, अपना लो
मन की पीड़ा
काली छाया

तब जन्म गीत का होता है -रेखा सिंह
भगवान मेरे, क्या जमाना आया है -शुभांगी
वृद्ध इंसान हूं मैं-शुभांगी
मां ऐसी ही होती है -ज्ञानेंद्र सिंह
खामोशी-लाचारी-ज्ञानेंद्र सिंह
उम्र के पड़ाव -बलराम गुर्जर
मैं गरीबों को सलाम करता हूं -फ़ुरखान शाह
दैनिक हिन्दुस्तान और वेबदुनिया में वृद्धग्राम
hindustan vradhgram ब्लॉग वार्ता :
कहीं आप बूढ़े तो नहीं हो रहे
-Ravish kumar
NDTV

इन काँपते हाथों को बस थाम लो!
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