बूढ़ी काकी कहती है-‘‘बुढ़ापा तो आना ही है। सच का सामना करने से भय कैसा? क्यों हम घबराते हैं आने वाले समय से जो सच्चाई है जिसे झुठलाना नामुमकिन है।’’.

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Tuesday, June 8, 2010

फंदे में बंदर


गांव के प्राइमरी स्कूल में एक मास्टर साहब छुटिट्यों में बच्चों को पढ़ाते थे। लोग उन्हें दलपत मास्टर के नाम से पुकारते थे। उनका स्वभाव दूसरे शिक्षकों की तरह बिल्कुल नहीं था। उन्होंने आजतक किसी बच्चे पर हाथ नहीं उठाया था। गांव के सभी बच्चे और बड़े उनका बहुत सम्मान करते थे। दादी ने मुझसे कहा कि मैं जितने दिन गांव में हूं, उतने दिन उनसे कुछ पढ़ लूं। मैंने रघु से पूछा, उसने हां कर दिया।

  मास्टर जी से मेरी काफी पटने लगी। रघु की बहन गीता भी किताबें लेकर वहां पहुंच जाती।

एक दिन बादल घिर आये और तेज बारिश शुरु हो गयी। मैंने रघु से कहा,‘‘शायद आज मास्टर जी स्कूल न पहुंचें। इसलिए हम आज पढ़ने नहीं जा रहे।’’

  मास्टर जी के पास एक पुरानी साईकिल थी जिससे वे स्कूल आते थें कच्चे रास्ते थे, बरसात में टूट-फूट जाते और उनमें पानी भर जाता, कीचड़ हो जाता।

  रघु कहां मानने वाला था। वह बोला,‘‘मैं स्कूल जा रहा हूं। तुम्हें आना है तो आओ।’’ उसने छाता सिर पर किया और चलने को हुआ। मुझे भी उसके साथ चलना पड़ा। वह गाना-गुनगुनाता आगे बढ़ रहा था। किताबों को हमने पोलीथिन की थैली में रखा था ताकि पानी उन्हें नुक्सान न पहुंचा सके।

  गाना पुरानी फिल्म का था। मैं भी उसके साथ शुरु हो गया। बोल थे,‘‘सुहाना सफर और ये मौसम..........।’’

  तभी रघु ने मेरे कान में कहा,‘‘सामने देख।’’

  हम रुक गये। बरसात तेज होने लगी थी। पानी घुटनों तक आने को आतुर था।

  सामने जो नजारा था, उसे देखकर हमारी आंखें खुली रह गयीं।

  मैंने कहा,‘‘अरे! ये तो मास्टर दलपत हैं। इन्हें क्या हुआ?’’

  मास्टर साहब कीचड़ में साइकिल सहित गिरे थे। उनका चश्मा दूर जाकर गिरा। बिना चश्मे के उन्हें चमकता नहीं था। वे उसे तलाश कर रहे थे। हम दौड़कर उनके पास पहुंचे और चश्मा उन्हें पकड़ा दिया। चश्मा लगाकर उन्होंने ऊपर देखा और कहा,‘‘तुम इतनी बरसात में भी पढ़ने आये हो।’’

  ‘‘जब आप हमें पढ़ाने के लिए अपनी परवाह नहीं करते। हम आपके शिष्य ठहरे।’’ रघु बोला।

  दलपत जी हमारे संग स्कूल आ गये। इतने में बारिश थम गयी। हमने उनके कपड़े हैंडपंप पर धुलवा दिये। मैं घर जाकर कुछ कपड़े ले आया। मास्टर जी ने उन्हें पहन लिया।

  सूरज चमकने लगा था। कपड़े धूप में सूख रहे थे कि तभी एक बंदर वहां कहीं से आ गया। मुझे डर था कहीं वह कपड़ों को उठा न ले जाए। हुआ वही जिसका डर था। बंदर कपड़े उठाकर ले गया। वह उछलकर शहतूत के पेड़ पर चढ़ गया। रघु ने काफी कोशिश की, लेकिन वह नहीं उतरा। उल्टे गुस्से में उसने मास्टर जी के कपड़े अपने पैने दांतों से फाड़ने शुरु कर दिए। मास्टर जी चिल्लाते रह गए, पर बंदर पर कुछ असर न हुआ। धीरे-धीरे कपड़ों के फटे टुकड़े नीचे गिरते रहे।

  इतने में प्रीतम किताबें लेकर पढ़ने आ गया। उसके पास गुलेल थी। रघु ने उससे घर जाकर गुलेल लाने को कहा। बंदर अभी तक पेड़ पर चढ़ा था। मुझे गुस्सा आ रहा था। मैंने रघु से कहा,‘‘इसे छोड़ना मत रघु। इस पेड़ से बाकी पेड़ बहुत दूरी पर हैं। बंदर उतनी लंबी छलांग लगा नहीं सकता और नीचे हम खड़े हैं, आ नहीं सकता। फंस गया बच्चू, इसकी खैर नहीं।’’ मैं पूरे ताव में आ चुका था।

  जानवर कितना भी चालाक क्यों न हो, इंसान उसे काबू में कर ही लेता है। रघु ने स्कूल से कहीं एक रस्सी तलाश कर ली। प्रीतम अभी आया नहीं था। रघु ने रस्सी का एक फंदा बना लिया। वह बिना डरे पेड़ पर चढ़ गया। फंदा उसके हाथ में था। बंदर उसे घुड़की देकर नीचे गिराने की जुगत में था। पर रघु ने पेड़ से एक टहनी तोड़ उसे डराना चाहा। वह उछलकर ऊपर शाखाओं की तरफ कूदा। तभी प्रीतम गुलेल ले आया। रघु बोला,‘‘अभी इसकी जरुरत नहीं है। देखते जाओ मैं क्या करता हूं।’’

  रघु ने रस्सी का फंदा ऊपर शाखाओं में उछाला। फंदा टहनियों में उलझ गया। रघु ने फिर कोशिश की। बंदर जैसे ही फंदे से बचने को उछला उसका एक पैर फंदे में फंस गया। रघु ने रस्सी को खींचा, तो फंदा पैर में कसता चला गया। रस्सी को नीचे गिरा दिया गया और रघु पेड़ से उतर गया।

  फिर रघु बोला,‘‘अब होगा कमाल। बंदर होगा बेहाल।’’

  रस्सी काफी लंबी थी इसलिए उसका छोर हैंडपंप से बांध दिया गया। रघु ने सबको छिपने को कहा। किसी को आसपास न पाकर बंदर पेड़ से उतर गया। पर यह क्या फंदा उसके पैर में था। वह जितना जोर लगाता, फंदा कसता जाता। चूंकि रस्सी हैंडपंप से बंधी थी, इस कारण बंदर उसके चारों ओर गोल-गोल चक्कर काटने लगा। उधर रस्सी हैंडपंप से लिपटती जा रही थी और बंदर उसके करीब आता जा रहा था। हम सब उस दृश्य को देखकर ठाठे मार हंस रहे थे।

  रघु ने प्रीतम से कहा,‘‘ला गुलेल। खेल शुरु करते हैं।’’

  रघु ने गुलेल से बंदर पर निशाना लगाना शुरु किया। जैसे ही गुलेल का कंकड़ बंदर को लगता, वह उछल जाता।

  ‘‘मार निशाना।’’ मैंने कहा। ‘‘ये भी क्या याद करेगा।’’

  ‘‘जिंदगी भर इसे यह सजा याद रहेगी, भूल नहीं पायेगा।’’ प्रीतम उत्साहित होकर बोला।

  बंदर पर गुलेल से चोटों का प्रहार जारी था। इस घटना से बंदर-बुद्धि का पता चल गया था। उसने अपने हाथों से बिल्कुल कोशिश नहीं कि फंदे को जरा-सा भी खोलने की। सिर्फ पैर से उसे खींच कर कसता रहा।

  इस उछलकूद का आनंद ले ही रहे थे कि तीन बंदर वहां आ धमके। वे साथी बंदर के आसपास शोर करने लगे। तभी बंदरों का समूह आ गया। मास्टर जी शायद स्थिति को भांप गये थे। वे हमें लेकर स्कूल की कक्षा में छिप गये।  दरवाजा अंदर से लगाकर हम खिड़की से सारा दृश्य देखने लगे। बंदर रस्सी को खींचने की कोशिश करते, कुछ उछलकर चीख मचाते।

  मैंने खिड़की से बाहर हाथ निकाल रखा था कि अचानक कहीं से मेरा हाथ किसी ने जोर से खींचा। मेरी चीख निकल गयी। सामने एक मोटा बंदर था जिसकी शक्ल देखकर मेरे प्राण निकल गये। वह मेरा हाथ पकड़कर खींचने लगा जैसे मुझसे रस्सी खोलने को कह रहा हो। तभी रघु ने गुलेल से उसके सिर पर निशाना मारा। बंदर ने मेरा हाथ छोड़ दिया और वह चीं-चीं करता भाग गया। मैंने चैन की सांस ली।

  करीब एक घंटा बीत जाने के बाद सभी बंदर अपने बंधे साथी को छोड़कर वहां से चले गये। मास्टर जी ने कहा,‘‘बहुत हो चुका। बेचारा काफी दुखी है। रघु जाओ उसे खोल दो।’’

  रघु ने बंदर को आजाद कर दिया। रस्सी से खुलते ही वह सरपट दौड़ा।

  गांव में जब यह बात पता लगी तो सभी हंसते-हंसते लोटपोट हो गए। गीता तो कुरसी से पीछे पलट गयी। उसकी बांह में फिर मोच आ गयी, लेकिन अबकी बार मामूली थी।


-harminder singh

-अगले कहानी: चाय में मक्खी

Wednesday, March 10, 2010

गीता पड़ी बीमार


गीता बीमार हो गयी। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। रघु के पेट में गड़बड़ जारी थी। उधर मैं भी दादी से पेट दर्द की शिकायत कर चुका था। लगता था, आमों का लालच इसका कारण था।

  दादी ने मुझसे कहा,‘क्यों आम चुराये?’

  ‘मैंने कहां चोरी की।’ मैं बोला। ‘रघु पेड़ पर चढ़कर आम तोड़े जा रहा था। मैं इकट~ठा कर रहा था, बस।’

  ‘चोरी में तुम भी शामिल थे न।’

  ‘पर दादी। मैंने चोरी नहीं की।’

  ‘मैंने कब कहा, तुमने चोरी की।’

  ‘ओह, दादी छोड़ो। यह बताओ कि पेट का दर्द कैसे दूर हो?’

  ‘पहले अपनी गलती मानो।’ दादी बोली।

  ‘चलो, माफ कर दो। अगली बार ऐसा नहीं होगा।’ मैंने मुंह पिचकाकर कहा।

  ‘ठीक है, मैं तुम्हारे लिए एक औषधि बनाती हूं। उसे पीकर तुम स्वस्थ हो जाओगे। थोड़ी तीखी होगी, पर आंख बंद कर गटक जाना, समझे तुम।’ दादी ने कहा।

  मैंने दादी का कहा अमल किया। औषधि जितनी तीखी थी, वह मैं ही जानता हूं। मैंने झट गुड़ का एक टुकड़ा खाया, तब जाकर मेरी हालत काबू में आयी।

  मैं सीधा रघु के घर पहुंचा। वह दीवार से पीठ सटाये पहाड़े याद कर रहा था। मैंने उससे हालचाल पूछा।

  वह बोला,‘अब ठीक हूं। तुम्हारे पेट का दर्द कैसा है?’

  मैंने दादी की औषधि का जिक्र किया। यह सुनकर रघु की हंसी छूट पड़ी।

  ‘तीखी, वाह! कमाल हो गया।’ रघु ने कहा।

  ‘मैं सच कह रहा हूं। मुझे बाद में गुड़ खाना पड़ा।’ मैं बोला। ‘खैर, हंसना छोड़। यह बता कि गीता की तबीयत सुधरी की नहीं।’

  ‘सुधार हो रहा है। डाक्टर ने अभी कुछ दिन उसे अस्पताल में रहने को कहा है। मां उसके साथ है।’ रघु गंभीर था।

  हम अस्पताल में पहुंचे। गीता हमें देखते ही उठने को हुई, पर नर्स ने उसे रोक लिया।

  ‘अब आम चुराने रघु के साथ मत जाना और हां, इतने आम मत खाना।’ मैंने मजाक किया।

  गीता हल्का मुस्कराई।

  रघु सांप-सीड़ी का खेल लाया था। हमने वहीं खेलना शुरु कर दिया। गीता लेटी हुई ही अपनी चाल बताती जाती। मैं गोटी आगे खिसकाता जाता। गीता ने हम दोनों को हरा दिया। कई बार मुझे हार का सामना करना पड़ा, मगर गीता हर बार जीत जाती। रघु ने गोटियां बदलने की असफल कोशिशें कीं, पर मैंने उसे देख लिया।

  ‘तुम बाज नहीं आओगे रघु।’ मैंने कहा। ‘चालाकी करते जरुर हो। जीतने से तो रहे।’

  ‘मैं नहीं जीत पा रहा, लेकिन गीता को तुम भी हरा नहीं पाओगे।’ रघु बोला।

  खेल से ऊब जाने के बाद रघु बोला,‘चलो एक दूसरे से पहाड़े सुनते हैं।’

  मै चौंका,‘पहाड़े।’

  ‘पहाड़ों से मुझे चिढ़ हैं। कोई और खेल खेलते हैं।’ मैं कहा।

  ‘फिर क्या गेंद-बल्ला अस्पताल में खेलोगे।’ रघु बोला।

  काफी देर बहस के बाद हमने निश्चय किया कि गीता जिस खेल को कहेगी, वह खेला जायेगा। गीता ने कहा कि वह पहाड़ों का खेल खेलना चाहेगी। गीता की बात कैसे टाली जा सकती थी?

  खेल के अनुसार जिसका नंबर आता वह किसी से भी कोई पहाड़ा पूछ सकता था, लेकिन केवल 15 तक। मुझे दो, तीन, दस और ग्यारह का पहाड़ा पक्का रटा था। पहाड़ों के इस खेल में मेरी पोल खुलती गयी। रघु की मां पास में बैठी हमें देख रही थी। मुझे एक भी पाइंट न मिल सका। उल्टा पास बैड पर पड़ा एक मरीज मुझ पर हंस रहा था। उसने कहा,‘क्या स्कूल के पीछे पढ़ते हो भाई, जो चार का पहाड़ा भी ढंग से याद नहीं।’ गीता भी हंसी न रोक पायी। देखा देखी वहां मौजूद सभी लोग ठहाका लगाकर मुझपर हंस पड़े। शर्म के मारे मैं मुंह नीचा कर बैठा रहा।

  मैंने सोचा कि इससे अच्छा अस्पताल ही न आता। कम से कम उपहास तो न होता। मैं मन ही मन रघु को कोस रहा था और साथ ही गीता को जिसने पहाड़ों का खेल खेलने को कहा था। पहाड़े मेरे लिए पहाड़ चढ़ने के समान थे। मैं मन ही मन सोच रहा था कि किस दिन पहाड़ की चोटी पर झंडा फहराऊंगा, लेकिन चढ़ाई बहुत कठिन थी। 

-harminder singh

Monday, March 1, 2010

लंगूर वाला



मैं अपनी कापी में सवाल हल कर रहा था। तभी दादी ने कहा कि वह मेरे बालों में मालिश करेगी ताकि मेरा दिमाग चुस्त रहे। मैंने दादी से कहा कि पहले मालिश हो जाए बाद में सवाल हो जायेंगे। दादी ने बालों में तेल रगड़ना शुरु किया। इतने में रघु दौड़ता हुआ आया और बोला,‘सुना है आज गांव में लंगूर का खेल दिखाने वाला आ रहा है। जल्दी कर वह आता ही होगा।’ उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे उठा दिया।

  मैंने कहा,‘रुक तो सही, दादी से सिक्के ले लूं।’ बालों पर आधा-अधूरी मालिश ही हुई थी। दादी ने कहा,‘बेटा इतनी जल्दी काहे की, पहले एक काम तो पूरा हो जाने दे।’

  मैंने दादी से कहा कि बाद में हो जायेगा। कुछ सिक्के ले मैं रघु के साथ चल पड़ा।

  डुगडुगी की आवाज आनी शुरु हो गयी थी।

  मैंने कहा,‘लगता है वह आ गया। दौड़ लगानी पड़ेगी।’

  गांव के बीच बरगद के पेड़ के नीचे हम दोनों हांफते हुए पहुंचे। लंगूर वाला व्यक्ति डुगडुगी बजा लोगों को इकट~ठा कर रहा था। वह कहा रहा था,‘नाच देखो, नाच देखो। भाईयो ऐसा तमाशा पहले कभी देखा नहीं होगा आपने। आओ, सब आओ, लंगूर तमाशा शुरु करने वाला है।’

  तमाशा शुरु हो गया। हमने बीच-बीच में तालियां बजाईं। लंगूर उछलकर पेड़ पर चढ़ जाता और पूंछ से उलटा लटक जाता। वह अपनी पूंछ को हवा में घुमाकर हमें हैरान कर देता। बंदर का खेल हमने कई बार देखा था, मगर लंगूर का खेल देखना पहला अनुभव था। गीता भी वहीं मौजूद थी। वह रघु की छोटी बहन थी।

  खेल खत्म होने के बाद तमाशा दिखाने वाले ने जमीन पर एक कपड़ा फैला दिया और बोला,‘भाईयो, सब पेट की खातिर है। तमाशा हमारी रोजी-रोटी है। जो इच्छा हो गरीब के कपड़े पर डाल दो। भगवान आपका भला करेगा। यह जानवर आपको दुआ देगा।’

  मैंने सिक्का कपड़े पर फेंक दिया। रघु ने जेब टटोली। फिर उसने गीता से कहा,‘जा मां से एक सिक्का ले आ।’

  गीता दौड़ी चली गयी। काफी देर बाद भी वह नहीं लौटी तो रघु को चिंता हुई। उसने मुझे साथ लिया और अपने घर की ओर चल दिया। रास्ते में हमने देखा कि गीता आम के पेड़ के नीचे बैठी रो रही है। वह पके आम के छिलके से फिसल गयी थी। उसकी बांह में मोच आ गयी और टांग दर्द कर रही थी। रघु उसे गोद में उठाकर घर पहुंचा आया।

  तभी लंगूर वाला व्यक्ति आम के पेड़ के नीचे सुस्ताने बैठ गया। लंगूर उसने पेड़ के तने से बांध दिया। उसकी लाठी और उसपर बंधा थैला जो कपड़े का बना था, वहीं पास में रख लिया। हमें जब यकीन हो गया कि वह सो गया, तब रघु ने चुपके से लंगूर की रस्सी खोल दी और हम झाड़ियों के पीछे छिप गये।

  लंगूर उछलकर पेड़ पर जा बैठा। कुछ समय बाद उस व्यक्ति की आंख खुली। उसने इधर-उधर देखा। लंगूर कहीं नहीं था। उसके होश उड़ गये। तभी उसकी नजर पेड़ की शाखाओं पर पड़ी। लंगूर की पूंछ उसे लटकती नजर आ गयी। उसने आवाज देकर लंगूर को बुलाना चाहा। पर वह लाख जतन के बाद भी पेड़ से नहीं उतरा। हमारी हंसी छूट पड़ी। उस व्यक्ति को पक्का यकीन हो गया कि उसका लंगूर हमने ही खोला था। वह लाठी और थैला लेकर हमारी ओर दौड़ा। लेकिन हम उससे काफी तेज दौड़े। वह थक कर बैठ गया। हम भी रुककर उसे देखते रहे। जब कोई उपाय समझ न आया तो वह व्यक्ति बोला,‘बच्चों मुझे पता है तुमने मेरा लंगूर रस्सी से खोला है। मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूंगा। उसे पेड़ से उतारने में मेरी मदद करोगे।’

  हमें उसपर दया आ गयी।

  करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद लंगूर को हम तीनों ने पेड़ से उतार ही लिया। को्शिश केवल लंगूर वाले की थी। हम वहां भी सिर्फ तमाशा ही देख रहे थे। वह लंगूर की कभी पूंछ पकड़ता, कभी उसे ‘बच्चा’ कहकर नीचे आने को कहता। उस व्यक्ति ने हमारा बिना बात के ही धन्यवाद दिया।

  गीता दो दिन में स्वस्थ हो गयी। रघु ने बताया कि क्यों न हम तीनों पास के गांव में फिर तमाशा देखने चलें। उसने बताया कि वह लंगूर वाला अभी गांव-गांव घूम रहा है और खेल दिखा रहा है। दादी से कहकर मैं, गीता और रघु के साथ पास के गांव पैदल चल दिए। गांव कुल एक किलोमीटर की दूरी पर था।

  भीड़ जुटने लगी थी। लोगों के बीच में जगह बनाकर हम भी भीड़ में घुस गये। मैंने रघु का हाथ थामा था और रघु ने गीता का। कुछ ही पलों में हम सबसे आगे थे। लंगूर वाला हमें देखकर मुस्कराया और हम भी। थोड़ी देर में खेल समाप्त हुआ और तामझाम इकट~ठा कर वह जाने की तैयारी करने लगा।

  तभी मैंने उससे कहा,‘आपका लंगूर दुबला लगता है। कुछ खाने को देते नहीं क्या?’

  ‘इतने पैसों में अकेले इंसान का पेट नहीं भरता, फिर यह तो जानवर है।’ लंगूर वाला रुखी जुबान में बोला।

  मैं गंभीर हो गया। मैंने कहा,‘फिर गुजारा कैसे चलता है।’

  ‘गांव वाले जो कुछ देते हैं, उसे ही रख लेते हैं।’ वह बोला।

  रस्सी पकड़कर उसने लंगूर को खींचा। लंगूर अपने मालिक के पीछे-पीछे चल दिया।

  मैंने कहा,‘सुनो ओ लंगूर वाले।’ वह रुक गया। उसने पीछे मुड़कर देखा।

  मैंने आगे कहा,‘तुम्हारा लंगूर आम खाता है।’

  उसने कहा,‘हां, कोई भी फल खा लेता है। पर क्यों?’

  ‘हम तुम्हें ढेर सारे आम तोड़ कर देंगे। खुद भी खा लेना और अपने लंगूर को भी जी भर खिलाना।’ मैंने कहा।

  उसने हमारी तरफ ध्यान से देखा और मुस्कराता हुआ आगे चलने लगा।

  ‘हम सच कह रहे हैं लंगूर वाले भईया।’ रघु बोला।

  ‘आओ तो सही।’ मैंने कहा।

  रघु ने मुझे रास्ते में बताया था कि इस गांव में आम के कई बाग हैं जिनपर ढेरों आम लदे हैं। इन दिनों आम पक कर गिर रहे थे। एक बाग के किनारे पर हम खड़े हो गए। रघु ने पहले बाग का वहीं से मुआयना किया। फिर धीरे से पेड़ पर चढ़ गया। कुछ ही देर में उसने कई आम नीचे गिरा दिये। मेरे मुंह में पानी भर आया। गीता उन्हें इकट~ठा करने में जुट गयी। दो आम लंगूर को उठाकर दिये। तभी बाग वाले का लड़का डंडा लेकर वहां आ पहुंचा। रघु अभी पेड़ पर ही था।
  लड़का चिल्लाया,‘ठहरो, कौन आम चुरा रहा है?’

  आवाज सुनकर लंगूर वाला, मैं और गीता पास की झाड़ियों में छिप गये। रघु पेड़ पर चुपचाप चिपक गया। पर लंगूर उछलकर आम बीनने लगा। बाग वाले के लड़े ने लंगूर को भगाना चाहा। उसने लाठी दिखाई तो लंगूर ने गुस्से में अपनी पूंछ से उसकी लाठी छीन ली। वह लड़का वहां से डर कर भाग गया। फिर रघु ने कई पेड़ों के आम तोड़े। लंगूर वाले ने अपना थैला भर लिया। गीता ने अपने हाथों को बिल्कुल खाली नहीं रहने दिया। मैंने अपनी पैंट की जेबों में कई आम रख लिए।

  ‘आज का दिन मजेदार रहा।’ मैंने रघु से कहा।

  ‘आम के आम, गुठलियों के दाम।’ रघु मुस्कराया।

-harminder singh

Saturday, January 23, 2010

दुलारी मौसी



गांव में रघु मेरा अच्छा दोस्त बन गया था। हम दोनों घंटों तालाब में पत्थर फेंका करते थे-‘‘छपाक।’’ तालाब पर गांव की महिलांए कपड़े धोने आतीं। यह कहा जा सकता है कि वहां छोटा घाट भी था। पानी में पत्थर फेंकने की वजह से दुलारी मौसी से मेरी बहस हो गयी। रघु मेरा बखूबी साथ दे रहा था। बहस ने तमाशे की शक्ल ले ली थी। पास खड़ी महिलांए सारा नजारा देख रही थीं।

  ‘‘देखो कैसी कैंची की तरह जुबान चल रही है, इस छुटके की।’’ दुलारी मौसी बोली।

  ‘‘छुटका न कहो मौसी। चौथी जमात में हूं। मैं औरतों के मुंह नहीं लगता।’’ मैंने सीना चौड़ा कर कहा।

  ‘‘ओह! औरतों के मुंह नहीं लगता। कहीं का कलैक्टर है क्या तू?’’

  ‘‘हां, हूं। क्या करोगी?’’

  ‘‘राम रे! छोटा मुंह, बड़ी बातें। मां-बाप ने तुझे यही सिखाया है।’’

  ‘‘मां-बाप को बीच में मत घसीटो मौसी।’’

  ‘‘जुबान लड़ा रहा है। तेरी दादी से ’शिकायत करनी पड़ेगी।’’

  ‘‘कर देना। कुछ बिगाड़ नहीं सकोगी मेरा। दादी मुझे बहुत प्यार करती है।’’ मैं मुस्कराया।

  ‘‘पहले चोरी, फिर सीनाजोरी। कमाल है रे तू।’’ मौंसी बोली।

  ‘‘अभी पत्थर तुम्हें भिगो गया। अगली बार पत्थर का निशाना पानी नहीं तुम होगी।’’ मैं गुर्राया।

  ‘‘ठीक है, मार निशाना।’’ दुलारी मौसी ने आंखें निकाल लीं। ‘‘मैं तेरे सामने खड़ी हो जाती हूं।’’ इतना कहकर वह मेरे सामने बाजुएं चढ़ाकर खड़ी हो गयी।

  मैंने रघु के कंधे पर हाथ रखा और उससे कहा,‘‘मौसी बड़ी गुस्सैल मालूम पड़ती है। समझा इसे इतना गुस्सा करेगी तो हार्ट-अटैक आ जाएगा। शंभू और जीवा बेचारे बिन मां के हो जाएंगे।’’

  रघु मौसी से बोला,‘‘हां, मौसी यह सही कह रहा है। तुम गुस्सा मत करो।’’

  ‘‘मैं गुस्सा कर रही हूं। अभी बताती हूं।’’ इतना कहकर दुलारी मौसी हमारे पीछे दौड़ पड़ी। कुछ देर में वह हांफ गयी और बोली,‘‘घर जाकर दोनों की खबर लेती हूं। इसकी तो दादी से ’शिकायत पक्की है।’’ मौसी का इशारा मेरी तरफ था।

  ‘‘हम चलें तुम्हारे साथ। कहो तो घाट से कपड़े ले आयें।’’ रघु ने चुटकी ली।

  ‘‘देखो मौसी आप ठहरीं हमसे बड़ी। अब माफ भी कर दो।’’ मैंने आंखें नीचे झुकाकर झूठी विनती की।

  ‘‘माफी, नहीं किसी कीमत पर माफी नहीं मिलेगी। शंभू के बापू से भी कहूंगी। जरुरत पड़ी तो पंचायत होगी, लेकिन तुम्हारी अक्ल ठिकाने जरुर लगनी चाहिए।’’ मौसी का गुस्सा कम होने का नाम नहीं ले रहा था, जबकि उसकी सांस उखड़ रही थी। उसका शरीर मोटापा लिए था और लंगड़ा कर चलती थी।

  मैंने रघु के कान में कहा,‘‘चल मौसी को और छकाते हैं।’’

  रघु दौड़ा-दौड़ा घाट पर गया। जल्दी में दुलारी मौसी कपड़े धोना भूल, हमारे पीछे दौड़ी थी। रघु गीले कपड़े उठा लाया और मौसी के पीछे से आकर उसके सिर पर रख दिये।

  तभी मौसी चिल्लाई,‘‘सत्यानाश हो तेरा रघु।’’

  हम भागकर पेड़ पर चढ़ गए और आम तोड़ने लगे। मौसी नीचे खड़ी हमें गालियां देती रही। मैंने एक आम खाया और गुठली दुलारी मौसी के सिर पर टपका दी। मौसी फिर चिल्लाई,‘‘रुक जाओ, अभी आती हूं।’’

  ‘‘कैसे आओगी मौसी?’’ मैंने प्र’न किया। ‘‘औरतें पेड़ों पर नहीं चढ़तीं।’’

  गुस्से में मौसी ने जमीन पर पड़ी गुठली ऊपर की ओर फेंकी, लेकिन यह क्या, गुठली टहनियों में टकराकर मौसी के माथे पर जा लगी।

  ‘‘ऊई मां!’’ मौसी चिल्लाई।

  बड़बड़ाती हुई दुलारी मौसी वहां से चली गई।

  ‘‘कमाल हो गया रघु।’’ मैंने कहा।

  ‘‘लेकिन, संभल कर रहना। कुछ ज्यादा सता दिया बेचारी मौसी को।’’ रघु गंभीर होकर बोला।

  ‘‘मुझे लगता है दुलारी मौसी सीधी दादी के पास गयी होगी। चल वहां का नजारा देखते हैं।’’ मैंने रघु से कहा जो आम अपनी जेब में रख रहा था।

  हम छिपकर दादी और मौसी को देख रहे थे। मौसी कह रही थी,‘‘ ये कपड़े जानती हैं, कितनी मेहनत से धुलते हैं। आपके पोते ने गांव के दूसरे लड़के के साथ मिलकर खराब कर दिए। ऊपर से मुझसे सीनाजोरी की। पेड़ पर चढ़कर आम की गुठली मुझे मारी। ये देखो सिर कैसा हो गया?’’ मौसी ने दादी को सिर दिखाया जिसपर गुठली का निशान था। ‘‘जब से आपका पोता गांव आया है तालाब पर हमारे जैसों का जाना मुहाल हो गया है। मैं चाहती  तो उसे वहीं पकड़कर पीटती, पर आपके पास आयी हूं। उसे तो किसी का शर्म-लिहाज है नहीं, हमारा-आपका वास्ता पुराना है।’’

  दादी ने किसी तरह दुलारी मौसी को समझा दिया। मौसी के जाने के बाद मैं और रघु दादी के पास पहुंचे।

  दादी ने कहा,‘‘तुम्हारी शैतानी बढ़ती जा रही है। आज दुलारी घर तक आ गई। कल कोई और आयेगा। ऐसा कैसे चलेगा बेटा।’’

  मैंने कहा,‘‘दादी आप भी दूसरों की बातों में आ जाती हो। रघु बता न सच क्या था?’’ मैंने रघु की पीठ पर हाथ मारा।

  ‘‘वो...वो....दादी....हम दोनों खेल रहे थे कि.....।’’ रघु हिचक कर बोला कि दादी ने बीच में उसकी बात काटते हुए कहा,‘‘मैं समझ गयी रघु बेटा। अच्छी तरह जानती हूं तुम दोनों को। मेरे बाल ऐसे ही सफेद नहीं हो गए।’’

  दादी सब समझ चुकी थी। उन्हें मूर्ख बनाना हमारे जैसे बच्चों का खेल नहीं था। रघु के जाने के बाद मैंने किताब निकाली और पढ़ने लगा।

-harminder singh


अगले अंक में पढ़िये:
लंगूर वाला

Friday, December 18, 2009

खराब समय





मां अभी बाजार से आयी नहीं थीं। बता गयी थीं कि चाबी पड़ोस में रहने वाली सावित्री को दे कर जाऊंगी। खाना बनाकर गयी थीं, सिर्फ मुझे दूध गरम करना था। पुष्पा आंटी भी उनके साथ बाजार गयी होंगी। उन्हें घंटों घूमने की आदत है। वे सब्जी घरीदे हुए मोल-भाव इतना करती हैं कि सब्जी वाला पक जाता है। भीड़ होती है तो एक-आध सब्जी यूं ही चुपके से उठकर थैले में रख लेती हैं। मैंने अपनी मां से कई बार कहा कि वे पुष्पा के साथ न जाया करें। वह किसी दिन उन्हें भी बाजार के भाव पिटवा देगी। मगर मां को मेरी बात सुननी ही नहीं है। बस मैं उनका कहना मानता रहूं।

  मैंने स्कूल की ड्रेस निकाल कर रिमोट अपने हाथ में ले लिया। नेत्रा बैठकर प्रोजेक्ट तैयार करने लगी। मैंने उसे फिर टोका, बोला,‘‘अभी स्कूल से आयी है। अरे, छुट्टियां लंबी हैं, टी.वी. देखते हैं साथ बैठकर।’’

  ‘‘मैं दूसरे कमरे में जा रही हूं। आप टी.वी. देखो। फिर स्कूल खुलने से दो दिन पहले होमवर्क करते हुए इधर-उधर दौंड़ना।’’ नेत्रा ने कहा।

  ‘‘मैं आज मौज करुंगा। कल से टाइम-टेबल बनाकर पढ़ाई शुरु होगी।’’ मैंने कहा।

  ‘‘ऐसा शायद कभी हो।’’

  ‘‘क्यों?’’

  ‘‘शायद आप कहते ही रह जाओ और छुटि~टयां बीत जाएं।’’

  ‘‘नहीं, ये सच नहीं है।’’

  ‘‘तो, फिर सच क्या है भैया?’’

  ‘‘सच यह है कि मैं पहले वाला स्टूडेंट नहीं रहा। बदल गया हूं।’’

  ‘‘हां, तुम्हारी लाल नाक से तो यही लगता है।’’

  ‘‘ज्यादा मत बोलो नेत्रा।’’

  ‘‘ठीक ही कह रही हूं प्यारे भैया।’’

  ‘‘नेत्रा।’’ मैं चिल्लाया।

  ‘‘भैया।’’ नेत्रा आंखें घुमाते हुए बोली।

   ‘‘तुम सिर पर चढ़ती जा रही हो। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम्हारा बड़ा भाई हूं। भाई का सम्मान करना सीखो।’’

   ‘‘ओह, मैं भूल गयी थी। पर तुम्हारी नाक.......।’’ नेत्रा मुझे चिढ़ाती हुई दूसरे कमरे में दौड़ गयी। मैं सोफे पर खिसयाया सा बैठा रहा।

   ‘‘मां ने इसे बिगाड़ कर रखा है। पिताजी कुछ कहते नहीं।’’ मैंने खुद से कहा।

  ‘‘भैया दूध गरम कर दो।’’ नेत्रा की आवाज आयी।

  तभी मैं रसोई की ओर दौड़ा। मां आ गयी और दूध गरम नहीं हुआ तो खैर नहीं। टी.वी. को आन छोड़ आया। उधर दूध गरम हो रहा था, इधर मैं रिमोट लेकर टी.वी. का आनंद ले रहा था।

  नेत्रा फिर चिल्लायी,‘‘भैया टी.वी. मत देखते रह जाना। कहीं दूध उबल न जाए।’’

  मैंने उसकी कही अनसुनी कर दी। कुछ ही देर में मां आ गयी। मैं तब भी टी.वी. पर नजरें गढ़ाये था। मानो खो गया था मैं कहीं।

  ‘‘नालायक, एक भी काम ढंग से नहीं करता।’’ मां  मेरे कान पर चिल्लायी।

  मां ने पीछे से मेरा कान पकड़ कर कहा,‘‘तू कब सुधरेगा। दूध आखिर उबाल की दिया। यहां बैठकर टी.वी. देख रहे हैं साहब।’’

  टी.वी. शो का आनंद मां की डांट ने पल भर में स्वाह कर दिया। मुझे बिखरा दूध पोछे से साफ करना पड़ा। लगातार तीन दिन से मेरे दिन खराब थे।

  उसी वक्त मेरी दादी आ गयीं। नेत्रा ने उनसे कहा,‘‘देखो, भैया रोज कोई न कोई ऊटपटांग हरकत कर रहे हैं। आज दूध उबाल बैठे।’’

  ‘‘बच्चा है।’’ दादी ने मुस्कराकर कहा।

  मां बोली,‘‘आप नहीं जानती अम्मा, इसकी नासमझी भरी हरकतों में तंग आ चुकी।’’ मां ने मेरी नाक की तरफ देखा और बोलीं,‘‘यह देखो, फिर किसी टीचर से मार खा कर आया है।’’

  ‘‘कोई बात नहीं जानकी। बच्चे ज्यादा दिन ऐसे नहीं करते।’’ दादी ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

  ‘‘मैं इसे गांव ले जाऊंगी। तू एक महीने आराम से रहना।’’ दादी बोली। ‘‘क्यों बेटा चलेगा न।’’

  मैं दादी से लिपट गया। दादी मुझे बहुत लगाव करती थीं। नेत्रा से उन्होंने ज्यादा बात नहीं की। इसका कारण यह भी रहा कि मां ने नेत्रा को कभी खुद से अलग नहीं होने दिया और मुझे दादी के साथ गांव जाने से मना नहीं किया।

  शाम को विनय हमारे घर आया। उसने मुझे अपना नया बल्ला दिखाया। मेरी आंखें बड़ी हो गयीं। मैंने विनय से कहा,‘‘कितने का है?’’

  विनय बोला,‘‘पैसों की फिक्र मत कर। मामा आये थे। मैंने जिद की, दिलवा दिया। वैसे उतना सस्ता भी नहीं है। चल खेलने चलते हैं।’’

   मैंने गेंद को बल्ले से उछालना शुरु किया।

  ‘‘बल्ला काफी अच्छा है। वजन काफी कम है।’’ मैं बोला।

  ‘‘आंटी से मुझे भी पिटवायेगा क्या?’’ विनय ने कहा।

  ‘‘रुक, कुछ गेदें और उछाल कर देखूं।’’ मैंने कहा।

  अचानक गेंद बल्ले से छिटक कर मेज पर रखे कांच के फूलदान से जा टकराई।

  मेरे मुंह से निकल पड़ा,‘‘मर गए।’’

  फूलदान फर्श पर गिरकर टुकड़े-टुकड़े हो गया। विनय मेरी मां के गुस्से को जानता था। वह तुरंत बल्ला मुझसे छीनकर वहां से रफूचक्कर हो गया। मैंने तेजी से टुकड़ों को इकट्ठा किया और एक पोलीथिन में भरकर खिड़की से बाहर फेंक दिया। मैं निश्चिंत था कि किसी को पता नहीं चला कि फूलदान का क्या हुआ? तभी मां दौड़ी आयी और मुझसे पूछा,‘‘कांच टूटने की आवाज कहां से आयी थी? और विनय दौड़कर घर से बाहर क्यों भागा?’’
 
  मैं चुप्पी साध गया। तभी मां को कांच के टुकड़े मेज पर गिरे दिख गये। जल्दी में मैं मेज साफ करनी भूल गया था। मां का पारा गर्म हो गया।

  ‘‘फूलदान कहां है?’’ मां चिल्लाई।

  ‘‘टूट गया।’’ मैं मरी आवाज में बोला।

  ‘‘ओह! क्या किया तूने?’’

  ‘‘धोखे से.........हो गया।’’

  ‘‘धोखा, तुझे उसकी कीमत पता थी? कितना महंगा था वह। कहता है, धोखा हो गया।’’ मां का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। उनके हाथ में झाड़ू थी। उन्होंने मेरे दो-तीन झाड़ू जड़ दीं। मैं रोने लगा।

   शोर सुनकर दादी आ गयीं। मेरे पास आकर खड़ी हो गयीं और बोली,‘‘जानकी कांच ही तो टूटा है। बेटे से कीमती था क्या?’’

  मां ने कहा,‘‘अम्मा, इसने जानकर तोड़ा है। इसे आज मैं कड़ी सजा देकर रहंूगी।’’

  ‘‘बच्चों से चीजें नहीं टूटेंगी तो क्या हम तोड़ेंगे। अरे, बच्चे छोटी-छोटी गलतियां कर देते हैं। उन्हें नजरअंदाज करना सीखो। मारपीट से क्या फायदा? समझाकर देखो तो सही।’’ दादी बोली।

  ‘‘समझा ही रही हूं। पूरी जिंदगी कहीं समझाती न रह जाऊं इसे। समझाने से सुधर गया होता, तो आज कांच न टूटता अम्मा।’’ मां बोली। ‘‘जब देखो, तब नुक्सान ही करता रहता है। क्या भगवान आसमान से आकर इसे समझाए?’’

  मुझे दादी पुचकार रही थी। मैं अभी तक आंसू बहा रहा था। मुझे दुख इस बात का हो रहा था कि मैं ही क्यों नुक्सान की जड़ बन रहा हूं। शायद मेरी किस्मत मेरा साथ नहीं दे रही। लगता है मैं बद-किस्मती हो गया था, लेकिन कुछ समय के लिए। दादी मुझे गांव ले गयीं। किताबों को मैं साथ नहीं ले जाना चाह रहा था, मगर मां के कहने को टालना नामुमकिन था। मैं सोच रहा था कि मां मुझे अपने से दूर रखकर सुकून से रह सकेगी और पिताजी भी।

  गांव में तीन दिन बीत गये, पता ही नहीं चला। मां का दोपहर फोन आया, बोलीं,‘‘तेरी याद आ रही है।’’ मां की आवाज भर्रायी थी। मैं मां को कठोर हृदय समझता था, लेकिन मां के हृदय की वेदना समझने में युग बीत जाएं, वह भी कम हैं। जितने दिन मैं गांव में रहा, मां मुझे रोज फोन करतीं। शायद मां का प्यार ऐसा ही होता है।

-harminder singh



अगले अंक में पढ़िये:
दुलारी मौंसी

Thursday, December 3, 2009

गर्मी की छुट्टियां

कक्षा में शोर मच रहा था। मैं विनय से बातों में मग्न था। तभी शोर थम गया, मैंने ध्यान दिया। विनय अपनी सीट पर जाकर बैठ गया। मैं सिर झुकाये बोले जा रहा था। अचानक मेरे गाल पर किसी ने तमाचा जड़ा। सामने प्रिंसिपल खड़ी थीं। मैंने गाल पर हाथ लगाया और सकपकाया खड़ा रहा।

  ‘मेरे आफिस आओ।’ प्रिंसिपल ने कहा।

  मैं पीछे-पीछे चल दिया। अबतक गाल काफी लाल हो चुका था। प्रिंसिपल ने मुझे खरी-खरी सुनाई। कर क्या सकता था,  चुपचाप सुनता रहा। घर में माता-पिता की डांट, स्कूल में भी डांट।

  विनय ने पूछा,‘क्या कहा प्रिंसिपल ने?’

  ‘मम्मी-पापा को बुलाकर लाना होगा।’  मैं बोला।

  ‘फिर तो समस्या हो गई।’

  ‘घर में पता लगेगा, खैर नहीं आज मेरी।’

  ‘मैं तेरे घर जाकर अंकल-आंटी को समझाने की कोशिश करुं।’

  ‘नहीं रहने दे। मैं खुद संभाल लूंगा।’

  रास्ते भर मैं यही सोचता रहा कि कल मां को बहुत गुस्सा आ रहा था। पिताजी भी कम नाराज नहीं थे। लगता है आज खाने के भी लाले पड़े जाएं। ऊपर से पिताजी की पिटाई का डर बराबर सता रहा था। चिंता ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा था। बस में नेत्रा मुझसे पूछती रही,‘तुम घबराये हुए क्यों लग रहे हो भईया?’ उसने मेरा गाल देखा जो हल्का सूजा था। मैंने बहाना कर दिया कि खेलते हुए गिर गया था। मगर घबराने की वजह नहीं बताई। मैं चाहता नहीं था कि नेत्रा को मालूम पड़े क्योंकि वह घर तक हजार सवाल पूछ लेगी। दो दिन बाद गर्मी की छुटिट्यां होने जा रही थीं। जब मैं छुटिट्यों का विचार अपने दिमाग में लाता तो प्रसन्न हो जाता। लेकिन प्रिंसिपल की बात बार-बार मुझे चिंतित करती जा रही थी। दो चीजें एक साथ हो रही थीं- एक मैं सोच कर मुस्करा रहा था और दूसरा, मैं सोचकर इतना ही दुखी हो रहा था।



घर से स्कूल-3
बचपन की मजेदार कहानियां


 
  शाम को नेत्रा सहेलियों संग खेलने चली गयी। पिताजी अभी आये नहीं थे। मां सब्जी काट रही थीं।

  मैंने कहा,‘स्कूल में आपको और पिताजी को बुलाया है।’

  मैंने कह तो दिया, लेकिन मन में अजीब सी उथुलपुथल हो रही थी कि कहीं मां को क्रोध न आ जाए। मां ने मेरी तरफ देखा और बोलीं,‘क्यों, क्या हुआ?’

  मैंने पूरी कहानी एक सांस में बता दी।

  ‘तू नहीं सुधरेगा।’ मां गुस्से में बोलीं।

  ‘इसमें मेरी कोई गलती नहीं है। वो अचानक प्रिंसिपल आ गयीं। मैं क्या करता?’ मैंने सफाई देनी चाही।

  मां पर कोई असर नहीं होता दिख रहा था। वह तमतमाई हुई थी।

  ‘मुझे लगता है तुझे स्कूल में पढ़ना ही बंद कर देना चाहिए। लगातार दो दिन से स्कूल में सजा मिल रही है।’ मां ने कहा।

  ‘आने दे तेरे पापा को। आज तेरा फैसला करेंगे।’ मां ने कहा।

  ‘पर मैं तो......।’ मैं आगे बोला।

  मां ने सब्जी काट ली थी। तभी नेत्रा भी आ गयी। उसने मुझे मां की डांट खाते सुन लिया था।

  वह बोली,‘भईया आज बस में परेशान था। मैंने पूछना चाहा तो इतना ही बताया कि खेलते हुए गिर गया था। गाल पर मामूली सूजन थी।’

  ‘गाल पर सूजन।’ मां को हैरानी हुई। ‘लगता है बुरी तरह पिटा है नालायक।’ मां का पारा बढ़ता जा रहा था।

  तभी नेत्रा बोली,‘मां, पानी लाऊं।’

  ‘रहने दे। इसने मेरा जीना मुहाल कर दिया है।’ लंबी सांस लेते हुए मां बोली। ‘तू मन लगाकर पढ़ रही है और यह निकम्मा....बस क्या कहूं.....कुछ नहीं।’

  ‘अब बैठा हुआ यहां क्या कर रहा है? जाकर पढ़ ले।’ मां ने कहा।

  मैंने प्रण किया कि पढ़ाई में मेहनत करुंगा। नेत्रा की तरह स्कूल से आकर पहले अपना होमवर्क समाप्त करुंगा। सभी विषयों का टाइम-टेबल बनाकर पढ़ा करुंगा। इन छुटिट्यों में आधा कोर्स निबटा कर ही चैन आयेगा मुझे। विचारों की पुड़िया खुल चुकी थी। पर मैंने ऐसा पहले भी अनेकों बार सोचा है। मेरी योजनायें अमल में आने से पूर्व ही धराशायी हो गयीं। यह मैं अच्छी तरह जानता था। पर इस बार मैंने निश्चय किया कि मैं पीछे नहीं हटने वाला।

  पिताजी थके हुए घर आये। उनके चेहरे पर गुस्सा था। मेरी हालत पतली हो गई। मुझे काटो तो खून नहीं। मां ने पिताजी को कदम रखते ही कहानी बतानी शुरु कर दी। फिर क्या था, पिताजी ने मुझे कमरे में बुलाया। मैं रात भर करवट बदलता रहा। शरीर दुख रहा था। टांगों में उतना दर्द नहीं था क्योंकि दो बार ही वहां छड़ी घूमी थी। नेत्रा ने मेरी पीठ पर ‘बाम’ मसला था। वह बातें कैसी भी करती हो, पर है मेरी सबसे प्यारी बहन। हम प्रेम के बल पर ही एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। रिश्ते वाकई मायने रखते हैं और खून के रिश्ते ऐसे ही होते हैं।

  छुटिट्यां होने में अब एक दिन शेष था। पिताजी ने प्रिंसिपल से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि आगे से यदि मेरी कोई हरकत आती है तो मुझे बिना झिझक के स्कूल से निकाल दें। मुझे पिताजी से यह उम्मीद नहीं थी। शायद उनके कहने की वजह यह थी कि उन्हें भी मुझसे कोई उम्मीद नहीं थी। दोनों तरफ उम्मीदों का खेल था।

  मैडम मौली ने कहा,‘छुट्टी में मौज-मस्ती होगी, मगर पढ़ाई को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। रोज गणित के सवाल करने हैं। इससे अभ्यास बना रहेगा।’

  आखिरी दिन मैं काफी प्रसन्न नजर आ रहा था। मैंने कुछ दिनों से चिंतित मन को ठीक खुद ही कर लिया था।

  मैडम मौली ने एक बार कहा था,‘खराब बातों को याद नहीं रखना चाहिए। उन्हें भुलाना ही बेहतर है। अच्छी बातें जिंदगी भर भी याद रह जाएं तो कोई बुराई नहीं।’ मैंने उन पक्तियों को दिमाग में बैठा रखा था।

  विनय स्कूल के गेट के बाहर खड़ा मेरा इंतजार कर रहा था। वह बोला,‘तुमने बड़ी देर लगा दी। कहां रह गये थे?’

  वह चौंककर बोला,‘अरे! यह क्या? तुम्हारे चेहरे को क्या हुआ? फिर किसी टीचर ने तुम पर हाथ उठाया क्या?’

  ‘कुछ मत पूछ।’ मैं दुखी मन से बोला।

  ‘तेरी नाक से खून बह रहा है। ला साफ कर दूं।’ विनय ने रुमाल निकालते हुए कहा।

  ‘मैं पानी पी रहा था कि पीछे से किसी ने जोर का धक्का दिया। मेरा मुंह पानी की टोटी पर जाकर लगा।’ मैंने बताया। ‘लेकिन घर जाकर मां-पिताजी का फिर लेक्चर सुनने को मिलेगा।’ मेरी चिंता बढ़ गयी।

  ‘लगता है इस बार पूरी छुटि~टयां बेकार जाने वाली हैं।’ मैंने कहा।

  ‘मैं शिमला जा रहा हूं।’ विनय बोला।

  तभी पीछे से विमल ने मेरे कंधे पर हाथ मारकर कहा,‘छुटिट्यों में किधर घूमने का इरादा है?’

  ‘’शायद इस बार नहीं।’ मैंने कहा।

  विमल ने मेरी नाक देखकर कहा,‘यह तुम्हारी नाक लाल हो गयी है। किसी टीचर की बुरी नजर लग गयी क्या?’

  मैं चुप रहा। कंधे पर बस्ता टांग बस में चढ़ गया। मैं नाक पर हाथ लगाकर खिड़की की तरफ बैठा था। तभी नेत्रा ने कहा,‘तुम्हें काफी होमवर्क मिला होगा। मुझे तीन प्रोजेक्ट दिये हैं। साइंस में नदियों के प्रदूषण के बारे में प्रोजेक्ट तैयार करना है। तुम मेरी इस बार मदद कर देना। हरबेरियम फाइल के लिए पत्ते जमा खुद कर लूंगी।’

  नेत्रा नन्हीं सी जान और इतने काम। हद है स्कूल वालों से भी है। कम से कम छुटिट्यां तो चैन से मनाने दें।

  ‘नेत्रा, तुम्हें लगता नहीं कि तीसरी क्लास के हिसाब से इतने प्रोजेक्ट कुछ ज्यादा हैं।’ मैंने कहा। तबतक मैंने खिड़की की तरफ मुंह किया हुआ था।

  ‘लेकिन यह मुझे लंबी छुटिट्यों के लिए कम लगता है। मैं फिर बोर हो जाऊंगी’ नेत्रा गंभीर होकर बोली।

  उसने आगे कहा,‘तुम्हारे क्या प्रोजेक्ट हैं, बताओगे।’

  आखिर कब तक मुंह छिपाने की कोशिश करता। गर्दन में भी दर्द शुरु हो गया था। नेत्रा की ओर देखकर कहा,‘घर जाकर बात करना।’

  ‘पर भईया तुम्हारी नाक कितनी लाल हो रही है।’ वह बोली हैरानी से।
  ‘कुछ नहीं, बस ऐसे ही मामूली चोट है।’ मैंने कहा।
  वह नीचे मुंह कर मुस्करा रही थी।

-harminder singh

-अगले अंक में पढ़िये- खराब समय

Saturday, November 21, 2009

मैडम मौली



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मैडम मौली की बड़ी-बड़ी आंखों को देखकर सभी घबराते थे। उनकी आवाज की आहट भर से ही पूरी क्लास में शांति छा जाती। मुझे, सच कूहूं, सबसे अधिक भय मैडम मौली से लगता था। उनका हैयर-स्टाइल समय-समय पर बदलता रहता। उनके माथे की बड़ी बिंदिया का रंग रोज बदलता था। साथ ही वे घड़ियों की शौकीन थीं। लेकिन कंगन या गहना पहनती नहीं थीं।

  उन्होंने ब्लैक-बोर्ड पर एक सवाल किया। मैं अगली सीट पर बैठा था। वे मेरे ठीक सामने खड़ी थीं। उन्होंने मेरी तरफ उंगली दिखाई और कहा,‘‘तुम, यह सवाल हल करो।’’ मैं एकदम घबरा गया।

  मैं हल करुं तो कैसे? सवाल मुझे आता ही नहीं। मैडम मौली ने मुझे घूरा। मैं सोचने का बहाना करने लगा। वह बोलीं,‘‘क्या सोच रहे हो। सवाल करो।’’

  मैं नीचे मुंह कर खड़ा रहा।

  ‘‘इधर आओ।’’ मैडम मौली ने कहा।

  उन्होंने मुझसे आगे कहा,‘‘मैं कुछ मदद करुं।’’

  मैं कुछ नहीं बोला। मैं सोच में पड़ गया कि आखिर मैडम इतनी नम्र कैसे हो गयीं?
 
  बच्चों में खुसर-पुसर शरु हो गयी थी।

  तभी मैडम मौली ने कठोर शब्दों में कहा,‘‘चुप, किसी की आवाज आई तो खैर नहीं।’’ क्लास में सन्नाटा छा गया।

  मैं कांप रहा था। मुझे डर था कहीं मेरे चांटा न लग जाए। मेरी इज्जत न उतर जाए।

  ‘‘तुम।’’ मैडम मौली ने मेरी तरफ देखकर कहा। ‘‘सीट पर जाकर खड़े हो जाओ।’’

  ‘‘विनय इधर आकर सवाल करो।’’ मैडम मौली ने कहा। विनय ने सवाल को झट से कर दिया। उसके बाद मैडम ने मुझसे कहा,‘‘देखो कितना आसान था। समझ गए तुम।’’

  मैंने ‘हां’ में सिर हिला दिया। मगर मेरी समझ में सवाल बिल्कुल नहीं आया था। मैंने जल्दी से सवाल कोपी में हल सहित उतार लिया।

  मैडम मौली ने एक-एक बच्चे को पहाड़े सुनाने के लिए खड़ा किया। मेरी बारी आ गयी थी।

  ‘‘तेरह का पहाड़ा सुनाओ।’’ मैडम मौली ने कहा। मैं फिर मुंह नीचे कर खड़ा था।

  ‘‘यह तुम्हारा दूसरा साल है न।’’ उन्होंने कहा। ‘‘होमवर्क दिया गया था, किया नहीं।’’

  मैं भीतर-भीतर घबरा रहा था कि कहीं मैडम मौली मुझे कड़ी सजा न दें। जिसका डर था वही हुआ। उन्होंने मेरा कान पकड़ लिया और मुझे क्लास के बाहर खड़ा कर कहा,‘‘छुट्टे से पहले क्लास में मत आना। इंटरवेल में भी बाहर इसी तरह खड़े रहकर पहाड़े याद करोगे।’’

  मुंह पर किताब लगाये मैं दीवार से सटा खड़ा रहा। मेरी टांगे जबाव दे गयीं। नेत्रा ने मुझे देख लिया था।

  घर पहुंचकर नेत्रा ने माता-पिता को बताया दिया। मैंने सफाई देने की कोशिश की।
 
  मां ने कहा,‘‘पढ़ाई करते तो क्लास के अंदर बैठते।’’ पिताजी बोले,‘‘यह लड़का दिन-ब-दिन नालायक होता जा रहा है। बस टी.वी. और खेल में ध्यान है साहब का।’’

  नेत्रा कहां पीछे रहने वाली थी। वह बोली,‘‘मुझे भईया पढ़ने को मना करते हैं। कल मेरे सिर पर किताब भी मारी थी।’’

  ‘‘ये नहीं सुधरेगा।’’ पिताजी बोले। ‘‘अबकी बार भी उसी क्लास में रहेगा। पढ़ता नहीं, ठाठ देखो कैसे हैं।’’

  ‘‘मैं कहती हूं, इसे होस्टल में भर्ती करवा दो। अक्ल ठिकाने आ जाएगी।’’ मां गुस्से में बोली।

  मैंने अपने कान बंद करने चाहे, मगर मैं ऐसा कर न सका। मैंने मन ही मन सोचा कि आगे से शिकायत का मौका नहीं दूंगा। बहुत हो गयी डांट।

-harminder singh

Saturday, November 14, 2009

घर से स्कूल


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नेत्रा को मैंने कई बार कहा कि इतना पढ़ाई न किया करे। पर वह मेरी ओर ध्यान ही नहीं देती। उसे एक ही धुन सवार है,‘सबसे अधिक नंबर आने चाहिएं।’ हर बार वह क्लास में पहला स्थान प्राप्त करती है, तो बहुत खुश होती है।

  मैंने उसे समझाया,‘अभी चश्मे लगे हैं। बाद में बैठे रहना अंधी बनकर।’

  वह स्कूल से आते ही होमवर्क करने बैठ जाती है। बेचारी लगती है वह मुझे।

सुबह से लगातार कई घंटे अपना दिमाग थका देती है। उसमें दो-तीन घंटें और जोड़ देती है।

  मैंने उससे कहा,‘इतना पढ़ोगी तो पागल हो जाओगी।’

  ‘हो जाने दो।’ वह बोली। ‘बिना पढ़े से पागल भली।’

  उसकी बातों का मुझे बुरा नहीं लगता, लेकिन कभी-कभी झुंझला जाता हूं।

आखिर मैं उसका इकलौता भाई और वह मेरी इकलौती बहन जो ठहरी।

  ‘मेरा मानो, थोड़ा आराम कर लो। होमवर्क बाद में कर लेना।’ मैंने कहा।


मेरी बहन नेत्रा




  ‘भाई मैं ऐसा नहीं कर सकती।’ नेत्रा ने कहा। उसका ध्यान पेंसिल छीलने में था। ‘बिना होमवर्क करे मुझे चैन नहीं आता। काम खत्म करने के बाद फ़्री हो जाती हूं। फिर सहेलियों संग खेलना भी तो है।’

  ‘तुम नहीं समझोगी। मेरी तरह बनो। रिलैक्स वाला बंदा। उतना ही चलता हूं, जितनी जरुरत है।’ मैं बोला।

  ‘मुझे नहीं बनना रिलैक्स वाली बंदी।’ उसने किताब का अगला पन्ना पलटा। ‘तुम्हारी तरह एक क्लास में दो साल नहीं गुजारने मुझे। तुम ही रिलैक्स करो उसी क्लास में। चौथी के फेलियर। देखना आठवीं से पहले मैं तुम्हें पछाड़ दूंगी।’

  मेरी बोलती बंद हो गयी। नेत्रा ने मुझे मेरी औकात याद दिला दी। उसकी तरफ मैंने पीठ कर ली और कुछ सोचने लगा। नेत्रा तीसरी क्लास में है, मैं चौथी में। मुझे डर लग रहा है कि कहीं इस बार लुढ़क गया तो माता-पिता घर से ही न निकाल दें। उफ! तब क्या होगा? इसलिए मैंने अपना बस्ता खोला और गणित की किताब निकाली। गर्दन घुमाकर नेत्रा को देखा। काम में वह इतनी तल्लीन थी कि उसे पता नहीं लगा कि एक मधुमक्खी उसके सिर पर बैठी है। मैंने उसे बिना बताए, फुर्ती से किताब की सहायता ली और मधुमक्खी को उड़ा दिया। तभी नेत्रा चीख पड़ी।

  ‘क्या किया भैया? किताब क्यों मारी?’ वह झल्लाई।

  मैंने बताया कि मधुमक्खी उसके बालों पर थी। उसे यकीन नहीं हुआ।

  उसने चेहरा लाल कर कहा,‘झूठ बोलते हो। मुझे पढ़ने नहीं देना चाहते।’

  ‘ऐसा नहीं है नेत्रा। मैं तो मक्खी को हटा रहा था। धोखे से किताब लग गयी होगी।’ मैंने सफाई देनी चाहिए।
  वह फिर किताब में खो गयी। उसने मेरी तरफ ध्यान नहीं दिया। उसकी यह विशेषता मुझे अच्छी लगती है कि वह जब पढ़ रही होती है, तब ज्यादा बोलती नहीं। एक-आध बार झगड़ चुकी है, बस।

  उसकी सहेली पिंकी मुझसे चिढ़ती है। मैं कई बार पिंकी की लंबी चोटी खींच चुका हूं। उसी तरह स्मिता जो पिंकी और नेत्रा की सहेली, जो बिल्कुल काले रंग की है, जो चपटी नाक की है और जो लड़कों जैसे बाल रखती है, उसे मैं ‘सैम’ कहकर चिढ़ाता हूं।

  दरअसल ‘सैम’ एक पात्र है जो टी.वी. पर दिखता है। वह कभी लड़की का भेष बना लेता है, कभी बूढ़ा हो जाता है। उसका रंग और स्मिता का रंग तथा नाक एक-जैसे हैं। स्मिता एक बार नेत्रा के साथ घर के बाहर खड़ी थी। मैंने चुपके से उसपर पानी की बोतल उडेल दी और छिप गया। यह किस्से काफी पुराने हैं- यही कोई दो साल पहले के। उस दिन पिताजी ने मुझे दो चाटें लगा दिये थे। अगले दिन जब मैं स्कूल गया तो स्मिता ने मेरा गाल देखा और खिल्ली उड़ायी, बोली,‘गाल है कि टमाटर।’

  खैर, काफी देर हो चुकी थी। मेरा मन गणित के सवाल करते-करते ऊब गया था। इस विषय से मुझे पहली कक्षा से ही चिढ़ हो गयी थी। वास्तव में उस समय सवाल आकार में बड़े होने लगे थे। गणित की टीचर मुझे कभी भाये नहीं। इसमें बहुत हद तक सच्चाई है। पहाड़े, उफ! बड़ा सिरदर्द है।

  मेरी बहन ने मुझसे पूछा,‘तुम इतनी देर से गणित की किताब खोलकर बैठे हो। हल कुछ कर नहीं रहे।’

   ‘जब तुम चौथी क्लास में आओगी, पता लग जायेगा।’ मैं बोला। ‘तीसरी क्लास की भी कोई पढ़ाई है। छोटे-छोटे मामूली सवाल। चुटकियों का खेल है।’

  नेत्रा लिखाई करने लगी। टीचर ने मुझे पहाड़े याद करने के लिए दिये थे। क्लास में जब पहाड़े सुनाने की याद आती, मुझे सांप सूंघ जाता। दो का पहाड़ा याद करने में मुझे काफी मशक्कत करनी पड़ी थी।

  तभी नेत्रा मुझसे बोली,‘भाई, मुझसे पहाड़े सुन लो।’

  मैंने यूं ही कह दिया,‘चलो सुनाओ।’

  उसने पहले दो का पहाड़ा सुनाया। मैं हां-हां-हूं-हूं करता रहा। तीन का पहाड़ा सुनाया। मैंने फिर हां-हां-हूं-हूं किया। नेत्रा को लग रहा था मैं बड़े गौर से सुन रहा हूं। उसे पता नहीं था कि आज मैं क्लास में इसलिए बैंच पर खड़ा किया गया था क्योंकि मुझे तीन का पहाड़ा याद नहीं था। बहुत ग्लानि का अनुभव किया था मैंने। सारी क्लास मुझपर हंसी थी। यहां तक की विनय जो मेरा सबसे अच्छा मित्र है, भी अपनी हंसी न रोक पाया। दूसरी-तीसरी क्लास के बालकों को पांच तक पहाड़े याद होते हैं। मेरा चौथी क्लास में दूसरा साल है।

  ‘भाई पांच का पहाड़ा पहले सुन लो।’ नेत्रा बोली।

  ‘मुझे नींद आ रही है।’ मैं बोला। ‘तुम्हें मालूम नहीं, कितना काम कर चुका हूं।’

  ‘थोड़ी देर ही तो बात है।’ नेत्रा ने कहा।

  मैं तकिया लगाकर लेट गया। सोने का बहाना करने लगा। मुंह पर एक कपड़ा डाल लिया।

  नेत्रा ने मेरे पैर पर जोर से हाथ मारा और बड़बड़ाती हुई कमरे से बाहर चली गयी। उसके जाते ही मैं खुद से बोला,‘बला टली।’

  पहाड़े की किताब नेत्रा के बस्ते से निकाली और याद करने बैठ गया।

-harminder singh
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coming soon1
कैदी की डायरी......................
>>सादाब की मां............................ >>मेरी मां
बूढ़ी काकी कहती है
>>पल दो पल का जीवन.............>क्यों हम जीवन खो देते हैं?

घर से स्कूल
>>चाय में मक्खी............................>>भविष्य वाला साधु
>>वापस स्कूल में...........................>>सपने का भय
हमारे प्रेरणास्रोत हमारे बुजुर्ग

...ऐसे थे मुंशी जी

..शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय काम था मुंशी जी का

...अपने अंतिम दिनों में
तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?

सम्मान के हकदार

नेत्र सिंह

रामकली जी

दादी गौरजां

कल्याणी-एक प्रेम कहानी मेरा स्कूल बुढ़ापा

....भाग-1....भाग-2
सीधी बात नो बकवास

बहुत कुछ बदल गया, पर बदले नहीं लोग

गुरु ऐसे ही होते हैं
युवती से शादी का हश्र भुगत रहा है वृद्ध

बुढ़ापे के आंसू

बूढ़ा शरीर हुआ है इंसान नहीं

बुढ़ापा छुटकारा चाहता है

खोई यादों को वापिस लाने की चाह

बातों बातों में रिश्ते-नाते बुढ़ापा
ऐसा क्या है जीवन में?

अनदेखा अनजाना सा

कुछ समय का अनुभव

ठिठुरन और मैं

राज पिछले जन्म का
क्योंकि तुम खुश हो तो मैं खुश हूं

कहानी की शुरुआत फिर होगी

करीब हैं, पर दूर हैं

पापा की प्यारी बेटी

छली जाती हैं बेटियां

मां ऐसी ही होती है
एक उम्मीद के साथ जीता हूं मैं

कुछ नमी अभी बाकी है

अपनेपन की तलाश

टूटी बिखरी यादें

आखिरी पलों की कहानी

बुढ़ापे का मर्म



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>>मेरी बहन नेत्रा

>>मैडम मौली
>>गर्मी की छुट्टियां

>>खराब समय

>>दुलारी मौसी

>>लंगूर वाला

>>गीता पड़ी बीमार
>>फंदे में बंदर

जानवर कितना भी चालाक क्यों न हो, इंसान उसे काबू में कर ही लेता है। रघु ने स्कूल से कहीं एक रस्सी तलाश कर ली. उसने रस्सी का एक फंदा बना लिया

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वृद्धग्राम पर पहली पोस्ट में मा. होराम सिंह का जिक्र
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वृद्धों की सेवा में परमानंद -
डा. रमाशंकर
‘अरुण’


बुढ़ापे का दर्द

दुख भी है बुढ़ापे का

सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य गिरीराज सिद्धू ने व्यक्त किया अपना दुख

बुढ़ापे का सहारा

गरीबदास उन्हीं की श्रेणी में आते हैं जिन्हें अपने पराये कर देते हैं और थकी हड्डियों को सहारा देने के बजाय उल्टे उनसे सहारे की उम्मीद करते हैं
दो बूढ़ों का मिलन

दोनों बूढ़े हैं, फिर भी हौंसला रखते हैं आगे जीने का। वे एक सुर में कहते हैं,‘‘अगला लोक किसने देखा। जीना तो यहां ही है।’’
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इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल
प्रताप महेन्द्र सिंह कहते हैं- ''लाचारी और विवशता के सिवाय कुछ नहीं है बुढ़ापा. यह ऐसा पड़ाव है जब मर्जी अपनी नहीं रहती। रुठ कर मनाने वाला कोई नहीं।'' एक पुरानी फिल्म के गीत के शब्द वे कहते हैं-‘‘इक दिन बिक जायेगा, माटी के मोल, जग में रह जायेंगे, प्यारे तेरे बोल।’’

...............कहानी
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किशना- एक बूढ़े की कहानी
(भाग-1)..................(भाग-2)
ये भी कोई जिंदगी है
बृजघाट के घाट पर अनेकों साधु-संतों के आश्रम हैं। यहां बहुत से बूढ़े आपको किसी आस में बैठे मिल जायेंगे। इनकी आंखें थकी हुयी हैं, येजर्जर काया वाले हैं, किसी की प्रेरणा नहीं बने, हां, इन्हें लोग दया दृष्टि से जरुर देखते हैं

अपने याद आते हैं
राजाराम जी घर से दूर रह रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले घर को अलविदा कह दिया है। लेकिन अपनों की दूरी अब कहीं न कहीं परेशान करती है, बिल्कुल भीतर से

कविता.../....हरमिन्दर सिंह .
कभी मोम पिघला था यहां
इस बहाने खुद से बातें हो जायेंगी
विदाई बड़ी दुखदायी
आखिर कितना भीगता हूं मैं
प्यास अभी मिटी नहीं
पता नहीं क्यों?
बेहाल बागवां

यही बुढापा है, सच्चाई है
विदा, अलविदा!
अब कहां गई?
अंतिम पल
खत्म जहां किनारा है
तन्हाई के प्याले
ये मेरी दुनिया है
वहां भी अकेली है वह
जन्म हुआ शिशु का
गरमी
जीवन और मरण
कोई दुखी न हो
यूं ही चलते-चलते
मैं दीवाली देखना चाहता हूं
दीवाली पर दिवाला
जा रहा हूं मैं, वापस न आने के लिए
बुढ़ापा सामने खड़ा पूछ रहा
मगर चुप हूं मैं
क्षोभ
बारिश को करीब से देखा मैंने
बुढ़ापा सामने खड़ा है, अपना लो
मन की पीड़ा
काली छाया

तब जन्म गीत का होता है -रेखा सिंह
भगवान मेरे, क्या जमाना आया है -शुभांगी
वृद्ध इंसान हूं मैं-शुभांगी
मां ऐसी ही होती है -ज्ञानेंद्र सिंह
खामोशी-लाचारी-ज्ञानेंद्र सिंह
उम्र के पड़ाव -बलराम गुर्जर
मैं गरीबों को सलाम करता हूं -फ़ुरखान शाह
दैनिक हिन्दुस्तान और वेबदुनिया में वृद्धग्राम
hindustan vradhgram ब्लॉग वार्ता :
कहीं आप बूढ़े तो नहीं हो रहे
-Ravish kumar
NDTV

इन काँपते हाथों को बस थाम लो!
-Ravindra Vyas WEBDUNIA.com