बूढ़ी काकी कहती है-‘‘बुढ़ापा तो आना ही है। सच का सामना करने से भय कैसा? क्यों हम घबराते हैं आने वाले समय से जो सच्चाई है जिसे झुठलाना नामुमकिन है।’’.

LATEST on VRADHGRAM:

Monday, June 8, 2009

गधे की सवारी

हम कई लड़के इकट्ठे होकर कई बार उलजलूल योजनायें बना चुके थे। सफलता एक बार भी हाथ नहीं लगी। लेकिन हाथ-पैर को हिला-डुलाने में कई बार तकलीफें महसूस अवश्य कीं। खैर, अबकी बार किसी जानवर पर सैर करने का प्लान मेरे सहपाठियों ने तैयार कर लिया। योजना मंडली में केवल चार ही बंदे रह गये थे, क्योंकि बाकी ‘रिस्क’ लेना नहीं चाहते थे। उनका कहना था,‘‘अभी और जीना है।’’ हमने भी साफ कह दिया था,‘‘अगर सही सलामत रहे तो फिर मिलेंगे।’’ वैसे इतना खतरनाक काम हम करने नहीं जा रहे थे।

अंत में कुत्ते के नाम पर सबने सहमति जता दी। कुत्ते की सवारी करने का प्लान बहुत महंगा साबित होने वाला था। गधे के बारे में सोचा था, लेकिन एक दोस्त ने ऐसी कहानी सुनाई की हमारे रोंगटे खड़े हो गये। वह और उसका एक मित्र मोहल्ले के बाहर चरने वाले एक छोटे-से गधे के बच्चे को उल्लू बनाकर उसकी पीठ पर बैठना चाहते थे। जब तक उन्हें उसकी दुल्लती का ज्ञान नहीं था। दोपहर के समय तपती गरमी में अकेले गधे के पास भी पहुंच गये। साथ में एक हल्की कुर्सी भी थी, ताकि आसानी से सवार हुआ जा सके। एक पीठ पर बैठ गया, गधा शांत खड़ा था। दोनों बड़े खुश थे। तभी गधे की मां कहीं से आ गयी। बच्चा अपनी मां को देखकर दौड़ने लगा। एक मित्र जोकि गधे पर सवार था डर गया। दूसरा मित्र गधे की पूंछ पकड़ कर उसे रोकने लगा। गधा रुक गया, लड़के ने जैसे ही पूंछ छोड़ी, गधे ने इतनी तेज अपनी पिछली लात से प्रहार किया कि वह लड़का कई दिन तक घर से बाहर नहीं निकला। लात उसके जबड़े पर लगी थी। वहां कुछ दांत जरुर बिखरे थे। गधे के ऊपर बैठा लड़का सैर न कर सका। आज भी वह क्षण उसे याद आता है। ‘‘शायद मैंने सवारी गलत चुनी थी।’’ वह अपना मुंह खोल टूटे दांतों की ओर इशारा करते हुए कहता है।

मोहल्ले में सभी मित्र आ गये। मैंने उन्हें एक कुत्ते के बारे में बताया था। उसे प्यार से ‘टाइगर’ कहते थे। वह सीधा-सादा था, लेकिन ‘टाइगर’ बिल्कुल नहीं। पास ही एक बाग पड़ता था। वहां से रास्ता होकर सड़क तक जाता था। वह रास्ता खाली रहता। टाइगर को एक रोटी का टुकड़ा देकर वहां आसानी से ले जाया जा सकता था। हमने वही किया। पहले मैंने अपनी बहादुरी का परिचय देने का फैसला किया। मैं टाइगर के ऊपर सवारी के लिए तैयार था। अपने को जकड़ कर रस्सी से बांध लिया। कुत्ते के आगे मेरा मित्र रोटी का टुकड़ा लिए भागा। टाइगर ने दौड़ना शुरु किया। मैं वजन में हल्का था। मैं सवार था एक कुत्ते पर। पर यह क्या, मेरा संतुलन बिगड़ गया। मेरे पैर रस्सी से कस कर बंधे थे। टाइगर आगे-आगे दौड़ रहा था, मैं उसके पीछे घिसट रहा था। मेरी कमर घर्षण से तप चुकी थी। काफी देर बाद मेरे मित्रों ने टाइगर पर काबू पाया। सवारी करने की यह योजना भी फ्लाप हो गयी।

अगले दिन स्कूल में मित्रों ने योजना बनाई की क्यों न गधे की ही सवारी की जाये। अपने मित्र की सुनी कहानी और कुछ लागों के गधों के साथ घटे खटटे अनुभवों से मैंने इस योजना से हाथ खींच लिया। मेरे तीन मित्र इसपर अड़े हुए थे। मैंने कह दिया कि गधे की लात का वार बड़ा खतरनाक होता है, बच के रहना। शाम को मोहल्ले के मैदान में एक गधा उन्हें मिल गया। दो जने उसपर सवार हो गये, तीसरा मेरे पास खड़ा था। उन्हें मजबूती से रस्सी से बांध दिया गया ताकि गिर न सकें। मैंने एक डंडे से उसे हांक दिया। गधे पर सवार मित्रों ने कहा,‘‘अबकी बार जरा तेज से डंडा मारना।’’ मैंने पूरे जोश में आकर गधे की टांगों पर डंडा जमा दिया। गधे की चीख निकल गयी। ढेंचू-ढेंचू कर गधे ने दौड़ लगा दी। हमें पता नहीं चला कि गधा फिर उन्हें लेकर कहां गया। काफी इंतजार कर हम घर लौट गये।

अगली सुबह वे दोनों मित्र स्कूल नहीं आये। पता चला कि अस्पताल में भर्ती हैं। ‘‘हो गया वही जिसका डर था।’’ मैंने कहा। उन दोनों के हाथ उठ नहीं रहे थे, टांगों पर भी सफेद पट्टी बंधी थी। उनकी कथा कारुणिक थी। उन्होंने एक ही बात को कहा,‘‘पता नहीं कहां-कहां घसीटे गये। अगर बंधे न होते तो बच जाते।’’

आज भी जब उन्हें कहीं कोई गधा मिलता है, वे उसके आगे हाथ जोड़कर निकल जाते हैं।

-हरमिंदर singh

1 comment:

Blog Widget by LinkWithin
coming soon1
कैदी की डायरी......................
>>सादाब की मां............................ >>मेरी मां
बूढ़ी काकी कहती है
>>पल दो पल का जीवन.............>क्यों हम जीवन खो देते हैं?

घर से स्कूल
>>चाय में मक्खी............................>>भविष्य वाला साधु
>>वापस स्कूल में...........................>>सपने का भय
हमारे प्रेरणास्रोत हमारे बुजुर्ग

...ऐसे थे मुंशी जी

..शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय काम था मुंशी जी का

...अपने अंतिम दिनों में
तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?

सम्मान के हकदार

नेत्र सिंह

रामकली जी

दादी गौरजां

कल्याणी-एक प्रेम कहानी मेरा स्कूल बुढ़ापा

....भाग-1....भाग-2
सीधी बात नो बकवास

बहुत कुछ बदल गया, पर बदले नहीं लोग

गुरु ऐसे ही होते हैं
युवती से शादी का हश्र भुगत रहा है वृद्ध

बुढ़ापे के आंसू

बूढ़ा शरीर हुआ है इंसान नहीं

बुढ़ापा छुटकारा चाहता है

खोई यादों को वापिस लाने की चाह

बातों बातों में रिश्ते-नाते बुढ़ापा
ऐसा क्या है जीवन में?

अनदेखा अनजाना सा

कुछ समय का अनुभव

ठिठुरन और मैं

राज पिछले जन्म का
क्योंकि तुम खुश हो तो मैं खुश हूं

कहानी की शुरुआत फिर होगी

करीब हैं, पर दूर हैं

पापा की प्यारी बेटी

छली जाती हैं बेटियां

मां ऐसी ही होती है
एक उम्मीद के साथ जीता हूं मैं

कुछ नमी अभी बाकी है

अपनेपन की तलाश

टूटी बिखरी यादें

आखिरी पलों की कहानी

बुढ़ापे का मर्म



[ghar+se+school.png]
>>मेरी बहन नेत्रा

>>मैडम मौली
>>गर्मी की छुट्टियां

>>खराब समय

>>दुलारी मौसी

>>लंगूर वाला

>>गीता पड़ी बीमार
>>फंदे में बंदर

जानवर कितना भी चालाक क्यों न हो, इंसान उसे काबू में कर ही लेता है। रघु ने स्कूल से कहीं एक रस्सी तलाश कर ली. उसने रस्सी का एक फंदा बना लिया

[horam+singh.jpg]
वृद्धग्राम पर पहली पोस्ट में मा. होराम सिंह का जिक्र
[ARUN+DR.jpg]
वृद्धों की सेवा में परमानंद -
डा. रमाशंकर
‘अरुण’


बुढ़ापे का दर्द

दुख भी है बुढ़ापे का

सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य गिरीराज सिद्धू ने व्यक्त किया अपना दुख

बुढ़ापे का सहारा

गरीबदास उन्हीं की श्रेणी में आते हैं जिन्हें अपने पराये कर देते हैं और थकी हड्डियों को सहारा देने के बजाय उल्टे उनसे सहारे की उम्मीद करते हैं
दो बूढ़ों का मिलन

दोनों बूढ़े हैं, फिर भी हौंसला रखते हैं आगे जीने का। वे एक सुर में कहते हैं,‘‘अगला लोक किसने देखा। जीना तो यहां ही है।’’
[old.jpg]

इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल
प्रताप महेन्द्र सिंह कहते हैं- ''लाचारी और विवशता के सिवाय कुछ नहीं है बुढ़ापा. यह ऐसा पड़ाव है जब मर्जी अपनी नहीं रहती। रुठ कर मनाने वाला कोई नहीं।'' एक पुरानी फिल्म के गीत के शब्द वे कहते हैं-‘‘इक दिन बिक जायेगा, माटी के मोल, जग में रह जायेंगे, प्यारे तेरे बोल।’’

...............कहानी
[kisna.jpg]
किशना- एक बूढ़े की कहानी
(भाग-1)..................(भाग-2)
ये भी कोई जिंदगी है
बृजघाट के घाट पर अनेकों साधु-संतों के आश्रम हैं। यहां बहुत से बूढ़े आपको किसी आस में बैठे मिल जायेंगे। इनकी आंखें थकी हुयी हैं, येजर्जर काया वाले हैं, किसी की प्रेरणा नहीं बने, हां, इन्हें लोग दया दृष्टि से जरुर देखते हैं

अपने याद आते हैं
राजाराम जी घर से दूर रह रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले घर को अलविदा कह दिया है। लेकिन अपनों की दूरी अब कहीं न कहीं परेशान करती है, बिल्कुल भीतर से

कविता.../....हरमिन्दर सिंह .
कभी मोम पिघला था यहां
इस बहाने खुद से बातें हो जायेंगी
विदाई बड़ी दुखदायी
आखिर कितना भीगता हूं मैं
प्यास अभी मिटी नहीं
पता नहीं क्यों?
बेहाल बागवां

यही बुढापा है, सच्चाई है
विदा, अलविदा!
अब कहां गई?
अंतिम पल
खत्म जहां किनारा है
तन्हाई के प्याले
ये मेरी दुनिया है
वहां भी अकेली है वह
जन्म हुआ शिशु का
गरमी
जीवन और मरण
कोई दुखी न हो
यूं ही चलते-चलते
मैं दीवाली देखना चाहता हूं
दीवाली पर दिवाला
जा रहा हूं मैं, वापस न आने के लिए
बुढ़ापा सामने खड़ा पूछ रहा
मगर चुप हूं मैं
क्षोभ
बारिश को करीब से देखा मैंने
बुढ़ापा सामने खड़ा है, अपना लो
मन की पीड़ा
काली छाया

तब जन्म गीत का होता है -रेखा सिंह
भगवान मेरे, क्या जमाना आया है -शुभांगी
वृद्ध इंसान हूं मैं-शुभांगी
मां ऐसी ही होती है -ज्ञानेंद्र सिंह
खामोशी-लाचारी-ज्ञानेंद्र सिंह
उम्र के पड़ाव -बलराम गुर्जर
मैं गरीबों को सलाम करता हूं -फ़ुरखान शाह
दैनिक हिन्दुस्तान और वेबदुनिया में वृद्धग्राम
hindustan vradhgram ब्लॉग वार्ता :
कहीं आप बूढ़े तो नहीं हो रहे
-Ravish kumar
NDTV

इन काँपते हाथों को बस थाम लो!
-Ravindra Vyas WEBDUNIA.com