बूढ़ी काकी कहती है-‘‘बुढ़ापा तो आना ही है। सच का सामना करने से भय कैसा? क्यों हम घबराते हैं आने वाले समय से जो सच्चाई है जिसे झुठलाना नामुमकिन है।’’.

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Wednesday, November 12, 2008

खाकी का रंगः पर सारा तालाब मैला नहीं

खाकी का समय-दर-समय रंग बदला है, असर भी। आज खाकीवाले बदनाम हैं। तालाब का पानी कहीं मैला है, तो कहीं मटमैला। कुछ मछलियां उसे गंदा करने पर तुली हैं, बाकी उन्हीं की तरह न होते हुये भी, उन्हीं के जैसी लग रही हैं



आप
वरदी वाले हैं तो कुछ भी कर सकते हैं। आपका एक रौब है, बस डंडा घुमाने की देरी है। रिक्शेवाला आपसे डरता है क्योंकि थप्पड़ की ताकत वह जानता है और खाकी की भी।

वरदी की कीमत शायद आजकल पुलिस से जुड़े लोग भूल चुके हैं। वरदी की आड़ में घिनौने काम करने में इन्हें शर्म महसूस नहीं होती। कसूर को बेकसूर साबित करने की जैसे यहां होड़ लगी और धन बटोरने की भूख।

कितनी बद्दुआओं को अपने में समेटे है खाकी। कितने दागों, राजों को छिपाये, एक मामूली इंसान को ताकत बख्शती है खाकी।

नाम काफी है बदनामी के कारण। काफी वक्त पहले लोग एक पुलिसवाले को सलाम करते थे, कुछ इज्जत थी। समय बदला, लोग भी, पुलिस भी। अब पुलिसवाला गुजरता है तो सलाम नहीं होता, कई की नजरों में हिकारत जरुर होती है। सलाम करने वाले गिने-चुने होते हैं।

खाकी का समय-दर-समय रंग बदला है, असर भी। आज खाकीवाले बदनाम हैं। तालाब का पानी कहीं मैला है, तो कहीं मटमैला। कुछ मछलियां उसे गंदा करने पर तुली हैं, बाकी उन्हीं की तरह न होते हुये भी, उन्हीं के जैसी लग रही हैं।

एक पहलू यह भीः वरदी वालों की कहानी दो तरह से चलती है। एक मुखौटा नकली लगता है कभी-कभी और कई बार बहुत बदला हुआ सा। जैसा भी वे करते हैं, रोकना नामुमकिन हैं क्योंकि ऐसा करने और सिखाने वाले हम ही तो हैं। उन्हें रिश्वत देता कौन है? उन्हें राजनीतिक दबाव में दबाता कौन है? उनके तबादले करवाता कौन है?
यह हकीकत है कि चौबीसों घंटें खाकी कुछ इंच की गोली के निशाने पर रहती है। कब किस पुलिसवाले का सीना चीरती हुई यह पार हो जाये किसे पता। सोने की फुर्सत हमें तो है, लेकिन एक सिपाही सोता कितना है यह जानने की कोशिश कितनों ने की होगी? एक पुलिस वाले का जबाव था,‘हम जागते हैं ताकि आप तसल्ली से सो सकें।’

एक बात कही जा सकती है कि पुलिस का अस्तित्व न होता तो शायद स्थिति कहीं कुछ और अधिक भयावह और खतरनाक होती। चलो काफी हद तक इस वजह से हम सेक्योर हैं।

हां, कई स्याह पन्ने जरुर हैं जब वरदी दागदार होती है, लेकिन उसको करता तो एक मामूली इंसान ही है, जिसकी वजह वरदी की ताकत होती है।

-हरमिन्दर सिंह

2 comments:

  1. एक बात कही जा सकती है कि पुलिस का अस्तित्व न होता तो शायद स्थिति कहीं कुछ और अधिक भयावह और खतरनाक होती। चलो काफी हद तक इस वजह से हम सेक्योर हैं।
    " ye bhee shee kha hai, ab hr sikke ke do pehlu to hotyn he hain...accha lga pdh kr"

    regards

    ReplyDelete
  2. harminder singh(vradhgram)November 14, 2008 at 12:26 PM

    khaki samay ke sath badal rahi hai aur aisa lagta hai ki aage isme aur badlab ayenge.

    ReplyDelete

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युवती से शादी का हश्र भुगत रहा है वृद्ध

बुढ़ापे के आंसू

बूढ़ा शरीर हुआ है इंसान नहीं

बुढ़ापा छुटकारा चाहता है

खोई यादों को वापिस लाने की चाह

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ऐसा क्या है जीवन में?

अनदेखा अनजाना सा

कुछ समय का अनुभव

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कहानी की शुरुआत फिर होगी

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दोनों बूढ़े हैं, फिर भी हौंसला रखते हैं आगे जीने का। वे एक सुर में कहते हैं,‘‘अगला लोक किसने देखा। जीना तो यहां ही है।’’
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इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल
प्रताप महेन्द्र सिंह कहते हैं- ''लाचारी और विवशता के सिवाय कुछ नहीं है बुढ़ापा. यह ऐसा पड़ाव है जब मर्जी अपनी नहीं रहती। रुठ कर मनाने वाला कोई नहीं।'' एक पुरानी फिल्म के गीत के शब्द वे कहते हैं-‘‘इक दिन बिक जायेगा, माटी के मोल, जग में रह जायेंगे, प्यारे तेरे बोल।’’

...............कहानी
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किशना- एक बूढ़े की कहानी
(भाग-1)..................(भाग-2)
ये भी कोई जिंदगी है
बृजघाट के घाट पर अनेकों साधु-संतों के आश्रम हैं। यहां बहुत से बूढ़े आपको किसी आस में बैठे मिल जायेंगे। इनकी आंखें थकी हुयी हैं, येजर्जर काया वाले हैं, किसी की प्रेरणा नहीं बने, हां, इन्हें लोग दया दृष्टि से जरुर देखते हैं

अपने याद आते हैं
राजाराम जी घर से दूर रह रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले घर को अलविदा कह दिया है। लेकिन अपनों की दूरी अब कहीं न कहीं परेशान करती है, बिल्कुल भीतर से

कविता.../....हरमिन्दर सिंह .
कभी मोम पिघला था यहां
इस बहाने खुद से बातें हो जायेंगी
विदाई बड़ी दुखदायी
आखिर कितना भीगता हूं मैं
प्यास अभी मिटी नहीं
पता नहीं क्यों?
बेहाल बागवां

यही बुढापा है, सच्चाई है
विदा, अलविदा!
अब कहां गई?
अंतिम पल
खत्म जहां किनारा है
तन्हाई के प्याले
ये मेरी दुनिया है
वहां भी अकेली है वह
जन्म हुआ शिशु का
गरमी
जीवन और मरण
कोई दुखी न हो
यूं ही चलते-चलते
मैं दीवाली देखना चाहता हूं
दीवाली पर दिवाला
जा रहा हूं मैं, वापस न आने के लिए
बुढ़ापा सामने खड़ा पूछ रहा
मगर चुप हूं मैं
क्षोभ
बारिश को करीब से देखा मैंने
बुढ़ापा सामने खड़ा है, अपना लो
मन की पीड़ा
काली छाया

तब जन्म गीत का होता है -रेखा सिंह
भगवान मेरे, क्या जमाना आया है -शुभांगी
वृद्ध इंसान हूं मैं-शुभांगी
मां ऐसी ही होती है -ज्ञानेंद्र सिंह
खामोशी-लाचारी-ज्ञानेंद्र सिंह
उम्र के पड़ाव -बलराम गुर्जर
मैं गरीबों को सलाम करता हूं -फ़ुरखान शाह
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hindustan vradhgram ब्लॉग वार्ता :
कहीं आप बूढ़े तो नहीं हो रहे
-Ravish kumar
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