बूढ़ी काकी कहती है-‘‘बुढ़ापा तो आना ही है। सच का सामना करने से भय कैसा? क्यों हम घबराते हैं आने वाले समय से जो सच्चाई है जिसे झुठलाना नामुमकिन है।’’.

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Thursday, January 21, 2010

ठिठुरन और मैं

जब मैं घर लौटा तो रात के आठ बजे थे। मैं ठिठुरता हुआ पहुंचा था। मोहित प्रोजेक्ट तैयार कर रहा था। उसी सिलसिले में उसे मेरी मदद की जरुरत थी। ये आजकल के बच्चे भी न, मेहनत उतनी करना चाहते नहीं, बातें बड़ी-बड़ी करते हैं। कुछ फोटो मैंने उसे सीडी में करवाये ताकि बाद में घर जाकर उनका प्रिंट आउट निकाला जा सके। हमें काफी देर हो चुकी थी। करीब एक घंटा होने जा रहा था। वह निश्चिंत था, मैं नहीं। जिस रुम में हम बैठे थे वहां का तापमान सामान्य था। हमारे अलावा भी वहां कई लोग थे जो काफी बिजी लग रहे थे, बिल्कुल हमारी तरह। गूगल पर सर्च मैं कर रहा था, बता मोहित रहा था।

  हम जैसे ही वहां से बाहर निकले, मैंने अपने हाथों को जेबों में सुरक्षित किया। हमारे आगे एक व्यक्ति ऐसे जा रहा था, जैसे सैर पर हो। पता नहीं कुछ लोगों को ठंड में भी ठंड क्यों नहीं लगती। उस व्यक्ति के बराबर में जो महिला थी, उसने शाल ओढ़ रखा था। दोनों पति-पत्नि मालूम पड़ते थे। मैंने अपनी चाल तेज+ की, जबकि मोहित ऐसा लगता था जैसे मोबाइल अंकल की बातें सुनने में इंटीरेस्टिड हो। मैंने कहा,‘घर नहीं चलना क्या?’ वह हल्का मुस्कराया, फिर कदमों को गति दी।

  कंधों को लगभग सिकोड़ चुका मैं चाउमीन वाले ठेले के पास से गुजरा। उसपर कोई ग्राहक नहीं था। उसकी नजरें आने-जाने वालों पर टिकी थीं। सरसरी निगाह से मैंने उसे देखा, उसमें थोड़ी आस जगी कि शायद मैं कुछ खरीदूंगा लेकिन मैं आगे बढ़ गया। मुझे पता है कि वह रोज शाम को उसी स्थान पर खड़ा मिलेगा क्योंकि यह सब वह कमाने के लिए करता है ताकि उसका परिवार पल सके। शायद उसके अपने बच्चों ने कभी चाउमीन का स्वाद ढंग से चखा हो। उसके ठेले से कुछ दूरी पर जगमगाहट इतनी है कि वहां हर किसी की नजर गुजरते हुए जरुर फिसल जाती है। वहां चेहरों को स्पष्ट पहचाना जा सकता है, जबकि उसका चेहरा उतना साफ नहीं।

  ‘गुड नाइट’ कहकर मोहित घर चला गया। मैंने कदमों को और गति दी। ठंड से मेरी टांगें अकड़ सी गयी थीं। अंधेरे में अंदाज लगाकर मैं आगे बढ़ता रहा। सड़क पर सवारियां बीच-बीच आतीं तो रास्ता नजर आ जाता। मैंने एक मोड़ पर आकर यह सोचा कि मैंने खुद को इतना ढक रखा है, फिर भी कांप रहा हूं। उन लोगों का क्या जिनके तन पर कपड़े नहीं।   

-harminder singh
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coming soon1
कैदी की डायरी......................
>>सादाब की मां............................ >>मेरी मां
बूढ़ी काकी कहती है
>>पल दो पल का जीवन.............>क्यों हम जीवन खो देते हैं?

घर से स्कूल
>>चाय में मक्खी............................>>भविष्य वाला साधु
>>वापस स्कूल में...........................>>सपने का भय
हमारे प्रेरणास्रोत हमारे बुजुर्ग

...ऐसे थे मुंशी जी

..शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय काम था मुंशी जी का

...अपने अंतिम दिनों में
तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?

सम्मान के हकदार

नेत्र सिंह

रामकली जी

दादी गौरजां

कल्याणी-एक प्रेम कहानी मेरा स्कूल बुढ़ापा

....भाग-1....भाग-2
सीधी बात नो बकवास

बहुत कुछ बदल गया, पर बदले नहीं लोग

गुरु ऐसे ही होते हैं
युवती से शादी का हश्र भुगत रहा है वृद्ध

बुढ़ापे के आंसू

बूढ़ा शरीर हुआ है इंसान नहीं

बुढ़ापा छुटकारा चाहता है

खोई यादों को वापिस लाने की चाह

बातों बातों में रिश्ते-नाते बुढ़ापा
ऐसा क्या है जीवन में?

अनदेखा अनजाना सा

कुछ समय का अनुभव

ठिठुरन और मैं

राज पिछले जन्म का
क्योंकि तुम खुश हो तो मैं खुश हूं

कहानी की शुरुआत फिर होगी

करीब हैं, पर दूर हैं

पापा की प्यारी बेटी

छली जाती हैं बेटियां

मां ऐसी ही होती है
एक उम्मीद के साथ जीता हूं मैं

कुछ नमी अभी बाकी है

अपनेपन की तलाश

टूटी बिखरी यादें

आखिरी पलों की कहानी

बुढ़ापे का मर्म



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>>मेरी बहन नेत्रा

>>मैडम मौली
>>गर्मी की छुट्टियां

>>खराब समय

>>दुलारी मौसी

>>लंगूर वाला

>>गीता पड़ी बीमार
>>फंदे में बंदर

जानवर कितना भी चालाक क्यों न हो, इंसान उसे काबू में कर ही लेता है। रघु ने स्कूल से कहीं एक रस्सी तलाश कर ली. उसने रस्सी का एक फंदा बना लिया

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वृद्धग्राम पर पहली पोस्ट में मा. होराम सिंह का जिक्र
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वृद्धों की सेवा में परमानंद -
डा. रमाशंकर
‘अरुण’


बुढ़ापे का दर्द

दुख भी है बुढ़ापे का

सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य गिरीराज सिद्धू ने व्यक्त किया अपना दुख

बुढ़ापे का सहारा

गरीबदास उन्हीं की श्रेणी में आते हैं जिन्हें अपने पराये कर देते हैं और थकी हड्डियों को सहारा देने के बजाय उल्टे उनसे सहारे की उम्मीद करते हैं
दो बूढ़ों का मिलन

दोनों बूढ़े हैं, फिर भी हौंसला रखते हैं आगे जीने का। वे एक सुर में कहते हैं,‘‘अगला लोक किसने देखा। जीना तो यहां ही है।’’
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इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल
प्रताप महेन्द्र सिंह कहते हैं- ''लाचारी और विवशता के सिवाय कुछ नहीं है बुढ़ापा. यह ऐसा पड़ाव है जब मर्जी अपनी नहीं रहती। रुठ कर मनाने वाला कोई नहीं।'' एक पुरानी फिल्म के गीत के शब्द वे कहते हैं-‘‘इक दिन बिक जायेगा, माटी के मोल, जग में रह जायेंगे, प्यारे तेरे बोल।’’

...............कहानी
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किशना- एक बूढ़े की कहानी
(भाग-1)..................(भाग-2)
ये भी कोई जिंदगी है
बृजघाट के घाट पर अनेकों साधु-संतों के आश्रम हैं। यहां बहुत से बूढ़े आपको किसी आस में बैठे मिल जायेंगे। इनकी आंखें थकी हुयी हैं, येजर्जर काया वाले हैं, किसी की प्रेरणा नहीं बने, हां, इन्हें लोग दया दृष्टि से जरुर देखते हैं

अपने याद आते हैं
राजाराम जी घर से दूर रह रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले घर को अलविदा कह दिया है। लेकिन अपनों की दूरी अब कहीं न कहीं परेशान करती है, बिल्कुल भीतर से

कविता.../....हरमिन्दर सिंह .
कभी मोम पिघला था यहां
इस बहाने खुद से बातें हो जायेंगी
विदाई बड़ी दुखदायी
आखिर कितना भीगता हूं मैं
प्यास अभी मिटी नहीं
पता नहीं क्यों?
बेहाल बागवां

यही बुढापा है, सच्चाई है
विदा, अलविदा!
अब कहां गई?
अंतिम पल
खत्म जहां किनारा है
तन्हाई के प्याले
ये मेरी दुनिया है
वहां भी अकेली है वह
जन्म हुआ शिशु का
गरमी
जीवन और मरण
कोई दुखी न हो
यूं ही चलते-चलते
मैं दीवाली देखना चाहता हूं
दीवाली पर दिवाला
जा रहा हूं मैं, वापस न आने के लिए
बुढ़ापा सामने खड़ा पूछ रहा
मगर चुप हूं मैं
क्षोभ
बारिश को करीब से देखा मैंने
बुढ़ापा सामने खड़ा है, अपना लो
मन की पीड़ा
काली छाया

तब जन्म गीत का होता है -रेखा सिंह
भगवान मेरे, क्या जमाना आया है -शुभांगी
वृद्ध इंसान हूं मैं-शुभांगी
मां ऐसी ही होती है -ज्ञानेंद्र सिंह
खामोशी-लाचारी-ज्ञानेंद्र सिंह
उम्र के पड़ाव -बलराम गुर्जर
मैं गरीबों को सलाम करता हूं -फ़ुरखान शाह
दैनिक हिन्दुस्तान और वेबदुनिया में वृद्धग्राम
hindustan vradhgram ब्लॉग वार्ता :
कहीं आप बूढ़े तो नहीं हो रहे
-Ravish kumar
NDTV

इन काँपते हाथों को बस थाम लो!
-Ravindra Vyas WEBDUNIA.com