बूढ़ी काकी कहती है-‘‘बुढ़ापा तो आना ही है। सच का सामना करने से भय कैसा? क्यों हम घबराते हैं आने वाले समय से जो सच्चाई है जिसे झुठलाना नामुमकिन है।’’.

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Thursday, June 17, 2010

क्रोध

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मुझे गुस्सा आता है तो मैं उसे शांत करने की कोशिश करता हूं। बहुत सी चीजें आसान नहीं हो सकतीं और हम उनसे अछूते भी नहीं रह पाते। वे हमारे साथ जुड़कर चलती हैं। मैं अकेला नहीं हूं।

क्रोध किसी को भी सुकून नहीं पहुंचाता। कुछ लोगों के अंदर क्षमता होती है कि वह इसे सहन कर जायें। कुछ ऐसे होते हैं जिनकी मजबूरी बन जाता है गुस्सा पीना। कुछ ऐसे हैं जो अपने अंदर के उबाल को काबू नहीं कर पाते। इसका परिणाम बहुत बार उनके हित में नहीं होता।

हम स्वयं को बदलने की कोशिश करते हैं, लेकिन कर नहीं पाते। मैंने क्रोध को शांत करने की कला को सादाब से सीखा। उसने मुझसे कहा था कि वह पहले काफी गुस्सेवाला था। अब वह खुद को उसके वश में नहीं करता। वह कहता है कि उसने प्रण किया है कि वह गुस्सा नहीं करेगा। उसका मानना है कि क्रोध इंसान को बेहतर जीवन जीने से रोकता है।

हम इतना तो मानते हैं कि क्रोध हमारी बुद्धि को प्रभावित करता है। मैंने सादाब से कहा कि तुम इतने शांत कैसे हो सकते हो? वह केवल मुस्कराया। मैंने उसकी मुस्कान को ही उसका उत्तर मान लिया, मगर कुछ समय के लिए।

हमें कभी-कभी कुछ लोगों पर इतना भरोसा हो जाता है कि हम उनकी प्रत्येक बात को सच मान लेते हैं। सादाब पर मैं बहुत अधिक भरोसा करने लगा हूं। इस घनिष्ठता का मतलब तलाशने की कोशिश करना मैं समय बर्बाद करना ही समझता हूं।

अदृश्य डोर जो हमें जोड़े है वह और मजबूत हो रही है। जीवन मानो अब अधूरा उतना नहीं लगता।

सादाब ने कहा कि वह शांत नहीं है। उसका हृदय उथलपुथल कर रहा है। पर उसे पता है कि वह दिमाग से ज्यादा, दिल से कम सोचने लगा है। दिल की धड़कन कभी बढ़ती है, तो कम होकर भी इंसान को परेशान करती है। उसने जीना सीख लिया क्योंकि हालातों से सामना करने की उसे आदत हो गयी। जीवन के सूनेपन को वह छिपा नहीं रहा, बल्कि सूनापन खुद ढकता जा रहा है। मैंने उससे कहा कि मैं ऐसा कर रहा हूं, पर कई बार निराश हो जाता हूं कि मेरी स्थिति बहुत कमजोर इंसान सी हो जाती है।

गुस्सा आता है मुझे अपने पर। धिक्कार आती है। मन करता है कि बस.........।

मैं कहना नहीं चाहता, क्या फायदा? मेरे अंदर ज्वाला की धधक शायद उतनी नहीं। ऊफान का दौर शांत भी तो हो जाता है।

-to be contd....

-harminder singh

Monday, June 14, 2010

बदल गया बहुत कुछ

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जिस दिन न अधिक खुशी हो, न अधिक दुख वह मेरे लिए मिलाजुला है। वैसे आज कई मायने में मैं खुश था क्योंकि मुझे लगा कि सादाब की अम्मी और बहन उससे मिलने आयेंगे। वह लगभग पूरे दिन चुप बैठा रहा। उसकी आदत को देखकर मैं कभी-कभी नहीं कई बार हैरत में पड़ जाता हूं। वह मुझे अनोखा लगता है, पर वह उतना अजीब भी तो नहीं।

मुस्कराने का मायना उसने मुझे बताया। वह शायद मुझे प्रभावित करता है। मैं उसके हौंसले की कद्र करता हूं। वह इतना थक कर भी जीवन से हारा नहीं। मैं यदि उसकी जगह होता तो कब का टुकड़े-टुकड़े हो गया होता। उसने ऐसा नहीं किया।

मैं अब कई बार चहक उठता हूं। मुझे यह बुरा नहीं लगता। हां, पहले ऐसा लगता था। वक्त ने बहुत कुछ तब्दील कर दिया, खुद भी बदल गया। बीती बातें उतनी हृदय को चुभती नहीं। क्या यह सब सादाब की वजह से है? शायद ऐसा हो।

जब से उससे मुलाकात हुई है, मैं पहले के कुछ नीरस तरीकों को छोड़ चुका.  मैं चुप रहने को महत्व देता था, अब ऐसा नहीं है। हंसना तो दूर किसी और की मुस्कराहट को भी शत्रु समझता था। लोगों से दूर रहने की कोशिश करता था।

आजकल मेरी सोच में परिवर्तन हो रहा है। मैं बदलता जा रहा हूं। दुनिया को खुशनुमा समझने की बात को मैं नकारता आया था, पर अब नहीं।

मेरा संसार सलाखों के पीछे जरुर है, मैं उसे उसी जगह सुन्दर बनाना चाहता हूं। सादाब मुझे मिल गया है। फिक्र को गंभीरता से न लेने की आदत को मैं अपनाने की कोशिश कर रहा हूं।
contd....

-harminder singh

Sunday, June 6, 2010

अपनेपन की तलाश

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मेरी कहानी बहुत पहले शुरु हुई थी। उसमें मेरा अनुभव है जिसे शब्दों के धागों से बांधकर मैंने कोरे पन्नों पर उकेरा है। मेरे साथ इस सफर में कई लोग जुड़े, मगर अब्दुल और सादाब से मुझे बेहद लगाव है। अब्दुल तो कब का चला गया, सादाब पता नहीं कितने दिन और मेरे साथ रहेगा। उसकी मां से मैं मिलना चाहता हूं। मुझे काफी अच्छा लगेगा।

जब हम दुनिया से दूर होते हैं, तब हमें अपनेपन की तलाश रहती है। कुछ लोग इस बीच ऐसे ही मिल जाते हैं। उनसे ढेर सारी बातें होती हैं। बातें इतनी की वक्त कब गुजर गया पता ही नहीं चलता। उनमें अपनापन ढूंढने की जरुरत महसूस नहीं होती क्योंकि हम उन्हें अपना पहले ही मान चुके होते हैं। उनकी एक पल की मुस्कराहट जानें कितने जनमों की थकान दूर कर देती है। उनकी मुस्कराहट हमारे मन को हरा कर जाती है। उनकी एक मुस्कराहट हमारी ऊर्जा को कई गुना बढ़ा जाती है। उनकी हल्की मुस्कराहट जीवन जीने का तरीका बदल जाती है। उनकी मुस्कराहट हमें सुकून पहुंचाती है।

हमारी दुनिया बदल जाती है और हम अलग संसार के मीठे पलों में जीना शुरु कर देते हैं। हम उन लोगों को अपना मान कर उन्हें अपना हाल सुनाते हैं। हम विश्वास करने लग जाते हैं कि हमारी दुनिया का वे भी एक हिस्सा हैं। उनकी जिंदगी के उतार-चढ़ावों को महसूस करते हैं। उनके गमों की झोली का भार हम उन्हें बांटकर कम कर लेते हैं।

जीने का मतलब समझ आने लगता है। ऐसा बहुत कुछ हमारे मन को लगता है जिससे हम एक तरह की संतुष्टि का अनुभव करते हैं। दिल की बातों को उनसे छिपाने का साहस नहीं होता। लगभग विचारों के एक समागम का प्रारंभ हो रहा होता है जिससे दो अजनबियों के बीच की दूरियां सिमट रही होती हैं। हम अनजान होकर भी अनजान नहीं होते। इससे वास्ता हमारे जीवन को है। तन्हाईयों को कम कर वक्त में कई पल की खुशियां खालीपन को भी सिमेती हैं। अपनापन क्या होता है यह तब पता लगता है। अपनों का सुख कैसा होता है, इसका एहसास भी तभी होता है।

मुझे अपने नहीं मिले क्योंकि मैं एक वीरान, नीरस और उधड़े हुए संसार में रहने वाला एक कैदी हूं, जिसे लोग हत्यारा कहते हैं। यादों का बसेरा धीरे-धीरे बिखर रहा है जिसके तिनके इधर-उधर छिटक कर टूटे फर्श पर फैल गये हैं। स्मृतियों का मौसम पतझड़ में बदल गया है। उनका धुंधलापन समय की देन है। समय की ताकत अद~भुत है। कितना संभल कर इंसान क्यों न चले समय का मामूली थपेड़ा उसे हिला कर रख देता है।

contd....

-harminder singh

Tuesday, May 25, 2010

मन कहता है

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आज सुबह से सादाब का चेहरा रुखा नहीं लग रहा। उसने मुझे बताया कि उसकी अम्मी ने उसे हौंसला रखने को कहा है। वह उसे अच्छी तरह याद रहता है, लेकिन वक्त उसका हौंसला तोड़ता है। वक्त से लड़ने की ताकत किसी में नहीं। सादाब ने कई जबाव मुस्कराहट के साथ दिये।

ऐसा क्यों होता है कि किसी की मुस्कान आपके चेहरे की खोई रौनक लौटा देती है। हमें एहसास करा देती है कि हम अभी भी खिल सकते हैं। उन लोगों के साथ मित्रता किसी के जीवन को बदल सकती है जो सुख-दुख में एक समान रहते हैं। वे हर छोटी उपलब्धि का जश्न मनाने से नहीं चूकते। उन्हें लगता है कि हंसी-खुशी जीवन को बेहतर बना सकती है। ऐसा ही होता है जब हम उन लोगों से मुखातिब होते हैं जो हमें मुस्कराहट का मतलब बताते हैं।

मैं खुद को देखता हूं तो पाता हूं कि क्या मैं जीना भूल गया? क्योंकि मैं हंसना भी भूल गया।

जीवन तो जीवन है। यह आया है जाने के लिए। एक हवा का झोंका आया और हम वहां नहीं थे। पता नहीं क्यों नीरसता पीछा नहीं छोड़ती?

मन को उग्र और शांत करने के तरीके हमारे पास मौजूद हैं। हम उनका कितना उपयोग कर पाते हैं, यह हम स्वयं नहीं जानते। यह लिखते हुए सहज लगता है कि मन बैरागी हो गया। यह कहते हुए सहज लगता है कि हम कुंठा से पार पा सकते हैं। मेरा विचार है कि खुद की ऊर्जा को अच्छी तरह पहचाना जाए ताकि हर परेशानी का हल निकल सके। लेकिन मैं ऐसा करने में असमर्थ हूं। यह उतना आसान भी तो नहीं। अक्सर कुछ चीजें देखने में अच्छी लगती हैं, कहने में भी, लेकिन जब करने की बारी आती है तो उनसे पीछा छुड़ाने का मन करता है।

मन ये कहता है, मन वह कहता है। मन का काम ही कहना है। उसकी मान मानकर इंसान क्या से क्या हो जाता है। मेरी सोच यह कहती है मन के आगे हम बेबस हैं। यह बिल्कुल गलत नहीं है। मन की गलतियां इंसान को भुगतनी पड़ती हैं। आखिर हम इतने बेबस क्यों बनाए गए हैं? हमारे भीतर का इंसान कभी कमजोर है, तो कभी ताकतवर बन जाता है। यह अजीब ही तो है।

बाहर का प्रभाव हमें अंदर तक प्रभावित करता है। वह वक्त किसी भी तरह से उतना बेहतर नहीं कहा जा सकता।


-to be contd....

-harminder singh

Saturday, April 24, 2010

मामा की मौत

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सादाब ने बताया कि जब वह घर लौटा तो उसके होश उड़ गये। रुखसार ने सबसे पहले अम्मी को संभाला। हाथ-पैर खोले तथा पानी पिलाया। रुखसार और जीनत दोनों अम्मी से लिपटकर बहुत रोयीं। सादाब इतने गुस्से में था कि मामा को ढूंढने निकल पड़ा। रुखसार ने उसे रोकना चाहा, पर वह रुका नहीं।

सादाब को क्रोध इसका अधिक था कि उसका मामा बिल्कुल बदला नहीं था। कुछ पैसों के लिए अपने ईमान को खराब कर गया। उसके लिए पैसा ही सबकुछ है। कितना गिरा हुआ इंसान है वह? तमाम विचार सादाब को और उत्तेजित करते रहे। तिराहे की एक पान की दुकान पर आकर वह रुका। उसने देखा सामने सड़क पर एक आदमी गठरी लेकर जा रहा है। सादाब उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।

सड़क किनारे रोशनी नहीं थी, रात हो चुकी थी। चंद्रमा की चांदनी उतनी साफ नहीं थी। वह आदमी सादाब को अपने मामा की तरह लग रहा था। सादाब ने कदमों को तेज किया। वह आदमी शायद भांप गया था। उसकी चाल भी तेज हो गई। अचानक वह दौड़ने लगा।

सादाब चिल्लाया,‘मामा रुक जाओ।’

सादाब भी दौड़ पड़ा। सादाब को पक्का यकीन हो गया था कि वह मामा ही था। वह व्यक्ति नजदीक के रेलवे स्टेशन की ओर भागने लगा। सादाब ने तेज दौड़कर उसे पीछे से पकड़ लिया। उसने गठरी सादाब के मुंह पर मारी और भागने लगा। लेकिन सादाब उसका पीछा कहां छोड़ने वाला था। वह कंधे पर गठरी टांग मामा के पीछे दौड़ा।

मामा पटरियां-पटरियां दौड़ रहा था, सादाब उसके पीछे। जैसे-जैसे कदम तेज हो रहे थे, थकान बढ़ती जा रही थी और सांस तेज। मामा को ठोकर लगी। वह गिर पड़ा। उसका चेहरा पत्थरों पर लगने से बुरी तरह छिल गया। सादाब ने मामा को उठाना मुनासिब न समझा। गठरी को किनारे रख दिया। उसे कहीं से एक लोहे का सरिया हाथ लगा।

क्रोध की सीमा जब पार हो जाती है तो इंसान एक अलग रुप में नजर आता है। सादाब के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था। उसने मामा पर सरिये से प्रहार शुरु कर दिया। मामा अपने भांजे से दया की भीख मांगता रहा। अपने पापों को कुबूल करता रहा। अपनी बेटियों की दुर्गति की जिम्मेदारी भी उसने ली। लेकिन सादाब उस जड़ को ही खत्म करने का इरादा किये था।

मामा चीखता रहा पर सादाब रुका नहीं। लोगों की भीड़ जमा हो गयी। जबतक पुलिस आई तबतक मामा अंतिम हिचकी ले चुका था।

कुछ समय पहले की दौड़ निर्णायक मोड़ पर आकर समाप्त हो गयी। एक चलता पुर्जा अब लाश में तब्दील हो चुका था। न वह बोल सकता था, न सुन सकता था, न देख सकता था जबकि उसके चारों ओर जो भीड़ जमा थी, वह यह सब कर सकती थी, तभी वह शांत था और लोग अशांत।

मामा के पापों की कहानी उसी के साथ समाप्त हो गयी। सादाब को हत्या के जुर्म में जेल में डाल दिया गया।

’वे कहते थे कि मैंने एक निर्दोष की हत्या की है। जबकि मैं जानता हूं कि मेरा मामा कितना नीच था। उसे न मारा जाता तो वह कई पाप और करता। जिसने पत्नि, सगी बेटियों, बहन को दुख दिया हो, वह जीने के काबिल नहीं।’ यह कहकर सादाब चुप हो गया।

मेरा मन कर रहा था कि मैं उसे सांत्वना दूं, लेकिन मैं रुक गया।

हम दूसरों को देखकर कई बार खुद दुख महसूस करने लगते हैं। इंसान होेने और न होने में यही फर्क है। हमारा संसार जैसा भी रहा हो दूसरों के संसार को संवारने की कोशिश मेरे जैसे लोग करते हैं। मुझे एहसास हुआ कि दर्द को सीने में दफन करना उतना आसान नहीं। कभी न कभी वह उभर ही आता है। परेशान आदमी फिर दिल को खोलकर रख देता है। मेरी कहानी का सच आना बाकी है। मैं फिलहाल चुप हूं। मैं नहीं चाहता कि मेरे जख्मों को हवा लगे। दुखती रग पर हाथ जाने से सब डरते हैं। मुझे थोड़ी खुशी इसकी है कि कोई तो मिला जो वास्तविकता को बता गया मुझपर भरोसा कर।

to be continued..........

-harminder singh

Tuesday, March 23, 2010

मामा की चाल

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सादाब का मामा उनके घर ज्यादा आने लगा था। उसकी अम्मी खर्च चलाने के लिए पड़ौस के एक घर में चौका-बरतन करने लगी थी। यह उनकी मजबूरी थी।

सादाब के पिता ने जैसे-तैसे कर मिट~टी की ईंटों से चार दीवारें खड़ी की थीं। बाप की जमीन का उतना ही टुकड़ा बचा था जिसपर दीवारें खड़ी थीं।

मामा की नीयत में खोट आता जा रहा था। उसकी नजर गिद्ध की तरह थी। सादाब की अम्मी तीन बच्चों के साथ जहां गरीबी से जंग लड़ रही थी वहीं मामा झपट~टा मारने की बाट जो रहा था। उसमें उतनी चपलता नहीं थी, लेकिन पाशों को फेंकने में वह माहिर था। उसकी आंखें बिल्ली की तरह थीं। सुना जाता है कि ऐसे लोग मौका मिलते ही वार करने से नहीं चूकते। फिर वहां तो शिकार काफी कमजोर व असहाय था। मामा सोच रहा था कि बिना लाठी तोड़े काम बन जाए।

सादाब की अम्मी अपने भाई पर हद से ज्यादा भरोसा करती थी। शौहर की मौत के बाद मजलूम बेवा की तरह जी रही थी वह। अनपढ़ थी, अंगूठा लगाना जानती थी। मामा ने उसे किसी तरह राजी कर लिया। वह उन्हें अपने घर ले आया। कुछ दिन उसने खूब खातिरदारी की, लेकिन एक रात वह घर आधी रात आया। दो आदमी उसको सहारा दे रहे थे। वह नशे में इतना चूर था कि उसकी आवाज उसी की तरह लड़खड़ा रही थी। पास पड़ी चारपाई पर उसे डाल दिया गया। उसकी जेबों से नोट बाहर बिखर गये। बहन ने भाई का ऐसा रुप पहले देखा नहीं था। सादाब की अम्मी घबरा गयी।

रोज का सिलसिला यही होता रहा। अब घर में शाम को जुए और जाम की महफिल सजने लगी। भाई की हरकतों से आजिज आकर सादाब की मां ने साफ कह दिया कि वह उसकी जमीन के सारे रुपये लौटा दे। वह कहीं भी जाकर अपनी और बच्चों की गुजर-बसर कर लेगी। इसपर मामा तन गया। उसने कहा कि रुपये तो खर्च हो गए। जो बचे हैं वह ले सकती है। सादाब की मां मजबूर थी, इसलिए वह कुछ हजार रुपये अपने साथ लेकर बच्चों सहित भाई के घर से निकल गयी।

ऐसा होता है बुरा वक्त जिसका तमाशा जिंदगी को वीरान कर देता है। पति मरा, भाई ने धोखा दिया, और आसरा..........वह भी न रहा। तीन औलादों की किसी तरह परवरिश करनी थी।

उस मां ने किसी तरह ईंट-पत्थर-गारा ढोया, मजदूरी की। बच्चे बड़े होते रहे। मां का हाथ बंटाते रहे। मजदूरी उन्होंने भी की। सादाब ने कई जगह काम किया, मेहनत कर पैसा कमाया। कुछ गज जमीन पर एक कमरा बना लिया। उसकी अम्मी बीमार रहने लगी थी। दोनों बहनों की उम्र शादी को पार कर चुकी थी।

कहीं से अचानक मामा को उनका पता लग गया। वह अपनी बहन को दुखड़ा सुनाता रहा। बीमार बहन को फिर भाई पर दया आ गई। सादाब ने अपने मामा को देखा तो वह बहुत गुस्सा हुआ, लेकिन अम्मी की तबीयत उसका साथ नहीं दे रही थी। अपनी मां के कहने पर सादाब ने मामा को छोटा-मोटा काम दिलवा दिया। सुबह जाकर मामा शाम को आता।

रुखसार की शादी का इंतजाम सादाब कर रहा था। उसके ब्याह के लिए लड़के की तलाश जारी थी। संयोग से योग्य लड़का मिल गया। वह काफी भला था और अच्छा कारीगर भी। कमाऊ और मेहनती दामाद मिल जाने की आस कब से दिल में लिए थी सादाब की अम्मी। सपना पूरा होने जा रहा था।

कभी-कभी जिन घटनाओं का हम खूब इंतजार कर रहे होते हैं उनमें खलल पड़ जाने की टीस बड़ी होती है। सादाब की अम्मी की तबीयत बिगड़ रही थी। इलाज से कोई फायदा मिलता नहीं दिख रहा था। एक चारपाई पर वह पड़ी रहती। उसकी खांसी कम नहीं हो रही थी। उसके कदम धीरे-धीरे ही सही, ऐसा लगता था जैसे मौत की ओर बढ़ रहे हैं।

सादाब रुखसार को बाजार से कपड़ा दिलाने गया था। जीनत ने जाने की जिद की। मामा ने कहा कि वह घर पर ही रहेगा। उसने यह भी कहा कि अपनी बहन की उसे बहुत फिक्र है। यदि वह पानी या दवा मांगेगी तो वह उसके पास होगा। अपनी बहन के लिए वह एक दिन काम पर नहीं गया कोई पहाड़ थोड़े ही टूट जायेगा। पहले बहन है, बाद में उसका काम।

तीनों के जाने के बाद मामा की खुराफात शुरु हो गई। उसने सामने रखी संदूक पर नजर दौड़ाई। उसपर ताला लटका था। अपनी बहन से उसने चाबी मांगी। बहन ने इंकार कर दिया। मामा ने जबरदस्ती करनी चाही। मामा ने उसके चेहरे पर आवेश में आकर एक तमाचा जड़ दिया। सादाब की मां बेहोश हो गयी। मामा ने पूरे घर में सामान उलट-पुलट दिया। एक-एक कपड़े को झाड़कर देखा, चाबी कहीं नहीं मिली। बाहर से ईंट का टुकड़ा लाकर उसने संदूक का ताला तोड़ दिया। सादाब ने कुछ हजार रुपये और सामान उसमें रखा था। मामा ने एक गठरी में सब भर लिया। सादाब की अम्मी को होश आ चुका था। वह उठ तो नहीं सकती थी, लेकिन देख सब रही थी। हल्की आवाज में उसने गठरी बांध रहे भाई से कहा कि अल्लाह की शर्म करो। सादाब ने जैसे-तैसे कर रुपये इकट~ठा किये हैं, रुखसार के हाथ पीने होने से रह जायेंगे। बिरादरी सामने उनकी क्या इज्जत रह जायगी?

मामा ने गठरी बांध ली। उसे डर था कहीं उसकी बहन शोर न मचा दे। उसने उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया और हाथ-पैर चारपाई से बांध दिये। सारा सामान लेकर चला मामा चला गया। बहन की आंखों से आंसू झरझर बह रहे थे। इसके अलावा वह कर भी क्या सकती थी?

लोग कितने मतलबी होते हैं। दुनिया में रिश्तों का खून अक्सर होता रहता है। कोई किसी का अपना नहीं, सब मतलब के यार हैं। रिश्ते निभाना कौन जानता है? कोई भी तो नहीं। जिसका बस चलता है, वह काबिज होने की कोशिश करता है। कमजोर को जितना अधिक कुचला जाए, उतना कम है। भाई के लिए बहन केवल कहने के लिए हैं। सादाब का मामा सही मायने में भ्रष्ट और क्रूर इंसान था। उसे सिर्फ खुद से वास्ता था।

-to be contd.......

-harminder singh

Tuesday, February 23, 2010

जिंदगियों का सौदा

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सादाब को काफी गुस्सा आ गया था। उससे मैंने कहा कि अब उसे आराम करना चाहिए। उसकी कहानी तसल्ली से किसी दिन सुन लेंगे।

पता नहीं क्यों वह जैसे मुझे सबकुछ बताना चाह रहा था। उसने आगे बताना शुरु किया,‘‘मामा की छोटी बेटी शायना मुश्किल से छह साल की थी और बड़ी फरीदा नौ की। वह रात को देर से आता था। घर में जुआ खेलता। कई लोगों को साथ लाता। बेटियों से उनके लिए चाय-पानी मंगवाता और रात का खाना बनवाता। कहा न मानने पर उनके सामने ही बाल पकड़कर अपनी बेटियों को बेरहमी से पीटता। बच्चियां थीं, मासूम थीं, अंजान भी, इसलिए बाप की मर्जी को बेचारी आंसू पोंछते-पोंछते मान लेतीं। एक कसाई से कम नहीं था हमारा मामा।’’

‘‘शायना और फरीदा ने कभी मेरी अम्मी से यह नहीं बताया। अम्मी को अपने सगे भाई की असलियत पता नहीं थी। एक रोज मामा शाम को हमारे घर रोता हुआ आया। उसने कहा कि शायना का सुबह से पता नहीं चला। सारा मोहल्ला छान मारा वह मिली नहीं। इसपर अम्मी परेशान हो गयी। लड़कियों की उन्हें बहुत फिक्र रहती थी। शायना फिर कभी नहीं लौटी। मालूम पड़ा कि मामा ने उसे जुए में दांव पर लगाया था। दांव हार जाने पर शायना को उस खूसट जमील को सौंप दिया। जमील उस रात मामा के यहां से नागपुर जा रहा था जहां वह जूते बनाने की एक कंपनी में काम करता था। वहां शायना का क्या हुआ होगा मुझे पता नहीं। लेकिन मामा अच्छा नहीं कर रहा था। अब उसकी नियत यह थी कि किसी तरह फरीदा से भी छुटकारा पा ले।’’

‘‘वह फरीदा को मेला दिखाने ले गया। फरीदा अंजान थी। मेला एक बहाना था। फरीदा का कुछ हजार में पहले ही सौदा किया जा चुका था। सौदेबाज तैयार थे। भीड़ में फरीदा का हाथ छूट गया। उसे किसी ओर ने थामा। कुछ पलों में फरीदा की जिंदगी का फैसला हो चुका था। उसकी दुनिया उजड़ चुकी थी। वह बिक चुकी थी। और ऐसे लोगों के हाथ में थी जिनके लिए वह केवल मांस का लोथड़ा भर थी, कोई मामूली खरीदी हुई वस्तु जिसकी कीमत चुकायी जा चुकी थी।’’

सादाब का दर्द और गहरा होता जा रहा था। मैं उसकी पीड़ा समझ सकता था। एक व्यक्ति कितना गिर सकता है, मैंने सोचा नहीं था। कितना दुख होता है जब कोई आपका अपना आप पर भरोसा करे और अपने स्वार्थ के लिए आप उसे ऐसे लोगों के हवाले कर दें जो जिंदगियों का सौदा करते हैं। उनके यहां मरी हुई आत्माओं का बाजार सजता है जिनके खरीददार होते हैं। छी है ऐसे इंसानों पर जिनके लिए इंसान मंडी की सजावट से अधिक कुछ नहीं। मैं इसके आगे इसपर लिखना नहीं चाहूंगा।

लोगों की चमड़ी एक सी होती है, फर्क रंग का होता है। लोग एक से होते हैं, यहां भी फर्क रंग का होता है। रंग बदलते देर नहीं लगती। गिरगिट को ही देख लें। जिस जगह बैठा, वैसा उसका रंग हो जाता है।

इंसानों की कला जानवरों से कई गुना शक्तिशाली और अनोखी है। वह जितनी अजीब है, उतनी भयानक भी।

सादाब ने बताया कि उसका मामा अम्मी के सामने फूट-फूटकर रोया। मेले की झूठी कहानी गढ़ दी। उसकी अम्मी को मामा पर यकीन आ जाता था।

to be contd.......

-harminder singh

Wednesday, February 10, 2010

सादाब का मामा

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सादाब से मैंने कहा,‘जिंदगी को शायद यही मंजूर था कि वह एक बसी-बसाई दुनिया को पल भर में उजाड़ दे।’

वास्तव में हम ऐसे मौकों पर कुछ कर नहीं सकते। करने की क्षमता का ह्रास हो चुका होता है।

सादाब बोला,‘वक्त की मार से कुछ भी हो सकता है। हमारे मामा की इकलौती बहन हमारी अम्मी उससे मिलना चाहती थी। मामा सही आदमी नहीं था। उसकी मोहल्ले में रोज मारपीट होती थी। उसने कई बार चोरी की तथा रंगें हाथों पकड़ा जा चुका था। हराम का माल खाने की जैसे उसे आदत पड़ गयी थी। मोहल्ले के लोग कहते थे कि उसने अपनी पत्नि जेबा को जलाकर मार दिया था। जेबा के परिवार वाले काफी गरीब थे, इसलिए उसकी दो बच्चियों की खातिर उसके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट नहीं की। उनका कहना था कि बाप उनसे अच्छी तरह बच्चियों की देखभाल कर लेगा। मामा पूरा ढोंगी था। वह जेबा के घरवालों के सामने गिड़गिड़ाया और बोला कि वह दोनों लड़कियों को जान से ज्यादा मोहब्बत करेगा। जेबा को उसने बताया कि खाना बनाते समय खौलते तेल की कड़ाही उसके ऊपर गिर गई, जबकि वह जमीन पर रखे ईंटों के चूल्हे पर रोटी बनाती थी। शिकायत के लिए सबूत चाहिए था। मोहल्ले वालों को कोई मतलब न था। एक औरत ही तो मरी थी। बच्चे बाहर खेल रहे थे और घर में मामा जेबा से उसकी जिंदगी छीन रहा था। कारण क्या था यह मुझे आजतक पता नहीं चल सका। जेबा कुछ पल के लिए छटपटाई होगी। फिर उसकी सांसों को विराम लग गया होगा। अक्सर मौत से पहले जिंदगी इसी तरह छटपटाती है। मेरा खून खौल जाता है यह सब कहकर, लेकिन मैं कहता हूं। अभी तक मैं चुप रहा, सोता रहा। चुप्पी कब तक मेहमानों की तरह रहती, उसे टूटना था। तुमने पूरी हकीकत अभी जानी कहां है? मामा का असली रंग अभी बाकी था। अपनी मौत का कारण वह खुद था। इंसान शायद अपनी मौत का रास्ता खुद चुनता है, वह भी इंसान ही था जो हैवान से कम नहीं था। उसकी मौत न होती तो वह न जाने और क्या करता?’

--to be contd.

-harminder singh

Friday, January 22, 2010

सादाब के अब्बा की मौत



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सादाब की कहानी की अभी शुरुआत भर थी। उसके शब्दों को मैं आंखों के आगे तैरता पाता हूं। उसकी बताई हर एक घटना मानो साक्षात हो रही थी। उसके अब्बा ऐसे ही सड़क के किनारे पड़े रहते यदि पड़ोस में रहने वाला हरप्रसाद उन्हें न देखता। हरप्रसाद एक रिक्शावाला था। उसने उन्हें पहचान लिया। रिक्शा पर लादकर उन्हें घर पहुंचाया।

खून से लथपथ परिवार का मुखिया बेहोशी की हालत में एक चारपाई पर डाल दिया जाता है। सादाब की अम्मी चीख पड़ी। शौहर की हालत को देखकर वह गश खाकर गिर पड़ी। हरप्रसाद ने तुरंत सादाब की अम्मी को संभाला। रुखसार और जीनत भी पास खड़े रो रहे थे। जीनत ने अम्मी को पानी पिलाया। उधर उनके अब्बा को होश आ चुका था।

सादाब ने कहा,‘मुझे हैरानी हो रही थी कि यह सब क्या हो रहा है। सब रो क्यों रहे हैं? अब्बा-अम्मी अजीब से हो रहे हैं। मैं अब्बा के हाथ से चिपक कर उनकी चारपाई के नजदीक बैठ गया। उनका हाथ खून से सना था। जख्मों पर घर में रखा थोड़ा सरसों का तेल लगा दिया। हमारे पास इतने पैसे कहां थे? रोज की कमाई कितनी होती होगी। अगर ऐसा होता तो अब्बा खुद का रिक्शा न खरीद लेते। ईद दो दिन बाद थी। हमारे लिए सब दिन एक-से थे, सारी रातें सूनी थीं। फीका जीवन जीते-जीते हम जायका भूल चुके थे। जीनत और रुखसार बार-बार आंसू पोछ रही थीं। बीच-बीच में हिचकी लेती थीं। कितनी दुखी थी वे दोनों और अम्मी। घर में सब सुबक रहे थे, तो मैं भी वैसा ही कर रहा था। अब्बू मेरी तरफ देखकर कुछ बोलना चाह रहे थे। उनके होंठ केवल फड़फड़ा रहे थे, कह नहीं पा रहे थे। चेहरे पर कई चोटें थीं जिनसे उनका चेहरा सूज गया था। अम्मी ने जीनत से कहा कि हमें सुला दे। उस रात पता नहीं क्यों में अम्मी के बिना सोया था। सुबह उठा तो देखा कि अम्मी दहाड़े मार-मार रो रही थी। मेरे अब्बू........मेरे अब्बू चल बसे थे। हम आधे यतीम हो गये थे। जब कमाने वाला चला जाए तो परिवार के लोगों के फाके से भी बदतर हालात हो जाते हैं। अम्मी बेसुध सी हो गयी थी। वह पागलों की तरह बड़बड़ाती रही। कुछ देर चुप होकर रोनी लगती, फिर बड़बड़ाना शुरु कर देती। जनाजे में कम लोग थे क्योंकि कोई बड़ा आदमी थोड़े ही मरा था, एक मामूली रिक्शावाले की मौत हुई थी। मगर हमारे लिए अब्बा मामूली नहीं थे। बहुत चाहते थे हम सबको। ईद हम कैसे मना सकते थे। यहां रंज था, वहां खुशियां राज कर रही थीं। अब्बा का सफर बस इतना ही था। जन्नत के दरवाजे ऐसे लोगों के लिए हमेशा खुले रहते हैं। दोजख में वे लोग जाएंगे जिन्होंने अन्याय किया है। अब्बा के साथ अच्छा नहीं हुआ। उन जालिम पुलिसवालों को शायद नरक में भी जगह नसीब न हो। भटकेंगे तमाम जिंदगी दुख में और मरने के बाद भी। जाने कितने परिवारों को तबाह किया होगा उन लोगों ने। खुद चैन की नींद न सो पायेंगे। दूसरों का दर्द उनके लिए तमाशा होता है। हंसते हैं वे हमारे जैसों पर। गरीबी का फायदा उठाते हैं। कमजोर को और कमजोर करते हैं। बनते हैं कानून के रखवाले। ऐसे रखवालों से अच्छा है, हमें पैदा होते ही उठा ले। कम से कम उनके जुल्मों से तो निजात मिलेगी।

 ----to be contd.

-harminder singh

Sunday, December 20, 2009

बर्दाश्त करने की हद

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मैंने सादाब से पूछा कि उसके अब्बा को पुलिसवालों ने कब तक थाने में रखा। इसपर सादाब का चेहरा लाल हो गया, वह बोला,‘‘कमबख्तों ने बहुत मारा अब्बा को। गालियां दीं, जो जी में आया वह कहा। पुलिसवाले शराब पीते रहे, सिगरेट सुलगाते रहे। अब्बा के बालों को पकड़कर एक सिपाही बोला कि अब खुश है तू। अब्बा के मुंह से खून बह रहा था। उनकी पीठ चमड़े की बेल्ट की चोट से छिल गयी थी। ऐड़ियां सूज गयी थीं और पैर की तलियां खून से लथपथ थीं। ऐड़ी से खून पैर के किनारे होता हुआ अंगूठे के सहारे जमीन पर टपक रहा था। अब्बा बेहोश हो चले थे। पुलिसवालों ने अब्बा की पीठ पर शराब की आधी बोतल उडेल दी। अब्बा तिलमिला उठे। फिर बेहोश हो गये। शायद वह समय कठिन था। कठिन इतना कि सहना मुश्किल था। हम बर्दाश्त करते हैं, लेकिन हर किसी की हद होती है। हद तक उतना खराब नहीं रहता। हद पार होने पर बहुत कुछ बदल जाता है। अब्बा को सड़क किनारे बेहोशी की हालत में फेंक दिया गया। अम्मी बेखबर थी। अब्बा रात में रिकशा चलाते थे। दिन में कुछ घंटे मजदूरी करते थे। परिवर का पेट पालने के लिए क्या नहीं कर रहे थे हमारे अब्बा।’’

सादाब की बातें दिल को झकझोर रही थीं। मैं भावुक हो गया था। सादाब के परिवार को कितना कष्ट हुआ होगा। कष्ट हमें जीवन से रुसबा होने पर विवश कर देते हैं। आंखों के गीलेपन में एक गहराई थी जिसे मैं देख रहा था। फिर कई बूंदें छलकीं जिनसे कुछ तसल्ली मिली। अक्सर घने दर्द के बाद इसी तरह राहत मिलती है। हृदय की वेदना सिमटी रहती है- उसका बाहर आना जरुरी है। पिघलती हुई कोई चीज बूंद बनकर ही तो गिरती है। विचार पिघलते हैं ताकि मन हल्का हो सके, हृदय का भार कम हो सके।

-harminder singh

to be continued........

Wednesday, December 9, 2009

पुलिस की बेरहमी




सादाब की कहानी अभी पूरी कहां हुई थी। यह उसके जीवन का सच था जो शब्दों के द्वारा बयान किया जा रहा था। उसके एक-एक शब्द को मैंने सहेज कर रखा है ताकि उन्हें अपनी यादों के साथ मिला सकूं। सादाब ने आगे कहा,‘‘उस समय मैंने सोचा था कि मैं बड़ा आदमी बनूंगा। अब्बा रिक्शा चलाते थे। जितनी मेहनत, जितनी सवारियां, उतने पैसे नसीब होते। गरीबों का जीवन दुश्वारियों से भरा होता है। गरीब होना संसार का सबसे बड़ा दुख है। एक-एक पैसे की कीमत कितनी होती है, यह भला गरीब से ज्यादा कौन जान सकता है। हम भूखे कई बार सोये हैं। अम्मी ने हम बच्चों को गोद में बिठाया, कहानी सुनाई, थपका और सो गये। आदत हो गयी थी भूख से लड़ने की भी। भूख संघर्ष करना सिखाती है, जीवन से लड़ना सिखाती है, हताशा और निराशा को अपनाना सिखाती है। हम भी धीरे-धीरे सीख रहे थे।’’

आज रात बहुत हो गई। मैं बहुत कुछ लिख चुका हूं। मन करता है सादाब के बारे में उसका कहा और लिखूं। उसने कहा,‘‘पुलिस वालों ने मेरे अब्बा को एक बार बहुत मारा था। अम्मी उस रात अब्बा के पास बैठी रही थी। अब्बा से एक पुलिस वाले ने माचिस मांगी। उनके पास नहीं थी। वे बीड़ी-सिगरेट-शराब से दूर रहते थे। पांच वक्त की नमाज छोड़ते नहीं थे। लोग उन्हें सच्चा मुसलमान कहते। अब्बा से उस पुलिसवाले ने कहा कि सामने पान की दुकान से माचिस लेकर आ। सीधे-स्वभाव वे एक माचिस ले लाए। फिर उसने कहा कि सिगरेट कौन लाएगा? उसने एक भद्दी गाली दी। अब्बा बोले कि तुमने माचिस को कहा था। इसपर उस पुलिसवाले ने उनके एक चांटा जड़ दिया। अब्बा कमजोर थे, पीछे के बल गिर पड़े। कुछ देर बाद रिक्शा का हैंडल पकड़ उठ खड़े हुए। नीचे मुंह कर रिक्शा ले जाने लगे। पुलिसवाले ने उनकी पीठ पर हाथ मारकर कहा कि अब सिगरेट लेकर आ। अब्बा ने इंकार कर दिया। वे ऐसी नशे की चीजों को हाथ नहीं लगाते थे। न ही उन लोगों के पास बैठते थे जो नशा करते। उस पुलिसवाले ने अब्बा का रिक्शा एक किनारे खड़ा करवा दिया। अब्बा के मुंह पर जोर का थप्पड़ फिर जड़ दिया। अबकी बार अब्बा खड़े रहे। उनका चेहरा लाल हो गया था। उन्हें भी बहुत गुस्सा आ रहा था। उन्होंने अपनी दोनों मुट्ठियां भींच ली थीं। अब जैसे ही पुलिसवाले ने उनपर हाथ उठाया उन्होंने उसे रोक लिया। पुलिसवाला सन्न रह गया। तभी पुलिस की जीप वहां आकर रुक गयी। अब्बा वैसे ही खड़े रहे। पुलिसवाले ने जीप के अंदर झांका और थोड़ी देर बात की। अब्बा उन्हें देखते रहे। कुछ देर में अब्बा को पुलिसवाले जबरदस्ती जीप में डालकर ले गये। आखिर वर्दी के सामने एक गरीब आदमी कर ही क्या सकता है? थाने में ले जाकर उन्हें एक बड़ी टेबल पर उलटा लिटा दिया गया। उनके हाथ-पैर कस कर बांध दिये गये। अब्बा बार-बार उनसे रहम की भीख मांगते रहे। मगर जालिम हंसते रहे, ठहाके लगाते रहे। वे चार पुलिसवाले थे। उनके चेहरे को अब्बा कभी नहीं भूल सकते थे। यह गरीब की किस्मत थी कि वह मजबूर था। इंसान की मजबूरी का कुछ इंसान ही फायदा उठा रहे थे। कैसी बीत रही होगी अब्बा पर? मुझे उस वाकये को अपनी अम्मी से सुनकर बड़ा गुस्सा आता था। अम्मी कई बार अब्बा के बारे में हमें बताती थी।’’

जारी है....

-harminder singh

Wednesday, November 18, 2009

खुशी का मरहम


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मैंने खुद को अनेक बार समझाया कि बहुत हो चुका। दूसरों को देखकर मैंने खुद को बदला है। सादाब ने मुझे समझाया और कहा,‘‘तुम मन को बीच में लाते हो। इसलिए हर बार हार जाते हो। तुम सोचते बहुत हो, इसलिए निराश हो जाते हो। मैं कई दिन उदास रहा, अब भी हूं। मगर इससे फायदा कुछ मिला नहीं, सो मुस्कराना पड़ा। कम से कम गम तो कम होंगे। दुखों से जितना बचने की कोशिश करोगे, वे उतना तुम्हें जकड़ेंगे। सही यह है कि उनपर खुशी का मरहम लगाओ।’’

उसकी बातों को मैंने ध्यान से सुना। उनका असर कितना होगा, यह मालूम नहीं। इतना कहना चाहूंगा कि कुछ फर्क तो होगा, शायद धीरे-धीरे ही सही।

लोगों का असर हम पर होता है। हम खुद को बदल भी देते हैं। लेकिन कहीं न कहीं उनकी तरह हो नहीं पाते। कुछ अंतर जरुर रहता है। यह इसलिए ताकि सब एक जैसे न हों। यदि ऐसा होता तो फर्क का मतलब क्या रह जायेगा?

मुझे साफ तौर पर याद नहीं लेकिन सादाब ने इतना बताया कि उसे धोखा दिया गया है। वह चोट खाया है। उसके इस समय के जिम्मेदार उसका कोई अपना है। लेकिन वह बाद में चुप हो गया था। उसका मन भीतर ही भीतर दुखी था। उसकी और मेरी बातें उतनी लंबी नहीं चलतीं। वह कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाता है। ऐसा अक्सर बहुत कम लोग कर पाते हैं।

धोखा इंसान खाता है। उसकी परेशानी वह ही जान सकता है। विश्वास की अहमियत जीवन में बहुत है। रिश्तों की नींव ही भरोसे पर टिकी होती है। एक मामूली दरार रिश्तों को भरभराकर ढहने पर मजबूर कर देती है। तब इंसान केवल मूक-दर्शक की तरह तमाशा देखता है। ऐसी स्थिति में आखिर वह कर भी क्या सकता है? अपने नसीब को खोटा कह सकता है। भगवान को कोस सकता है। वक्त को गाली दे सकता है। कौन रोक सकता है भला उसे ऐसा करने से? कोई भी तो नहीं, कोई नहीं। यहां तक की वह खुद भी नहीं खुद को रोक सकता। मैंने पता नहीं धोखा खाया है, लेकिन कभी-कभी गुस्से में बहुत कुछ ऐसा बोल जाता हूं जिससे दूसरों को लगता है कि मैंने धोखा झेला है।

मेरी आंख लगने को हो रही है। मैं फिर भी लिखे जा रहा हूं। इसका कारण मेरे विचार हैं। लिखना नहीं चाहते हुए लिखता जा रहा हूं। यह अजीब है न कि मैं पहले नींद का इंतजार करता था। आजकल ऐसा होता नहीं।

कोई हमें अपने मित्र की तरह समझता और समझाता हो, तो हम कई प्रकार से सुकून में हैं। कम से कम कुछ पल उसके साथ बिताने को मिल जायेंगे।

जारी है.......

-harminder singh

Wednesday, November 4, 2009

अहिस्ता-अहिस्ता जुड़ते हैं भाव



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मैंने सादाब से कहा कि तुम हंसना बंद कर दो। हालांकि यह एक मजाक की तरह था। इसपर वह मुस्कराया। सुबह शायद मैं उससे खुलकर बात करने की कोशिश करुं कि वह चुप क्यों है? अब यह मैं उसपर छोड़ता हूं कि वह क्या उत्तर दे। हम सवाल तो पूछ लेते हैं, मगर उत्तर का रुप मालूम नहीं होता। जिंदगी में सवाल इतने हैं कि जिंदगी कम पड़ जायेगी। नीरसता एक अधूरेपन का अहसास कराती है। हम चुपचाप रहते हैं, केवल सोचते हैं। मन में एक कशमकश उठ गिर रही होती है। यहीं हम एक आंतरिक लड़ाई लड़ रहे होते हैं। इस समय जंग का मैदान हम स्वयं ही होते हैं। अजीब दौर से गुजर रहे होते हैं और मन में एक घबराहट भी होती है।

  मेरे साथ कई बार ऐसा हुआ है कि मैं बहुत घबरा गया हूं। मैं खुद को पराजित व्यक्ति नहीं कहना चाहता। यह अलग बात है कि मैं मन को निराशा से बचाने की कोशिश करता हूं, पर हर बार हार जाता हूं। साथ ही हारता है मेरा मन भी। सादाब को देखता हूं तो लगता है कि वह बहुत कुछ कहना चाहता है। उसकी एक-एक बात मैं ध्यान से सुनता हूं। वह सोचता बहुत है, ऐसा उसका चेहरा बताता है। उसकी आंखें थकी जरुर हैं, लेकिन उसके हंसने पर वे भी हंसती हैं। उसे मैं पहले अच्छी तरह जानता था, लेकिन अब धीरे-धीरे वह मुझसे कई बातें कर जाता है। शायद उसे लगता है कि वह मुझे समझता है और मैं उसे। फिर भी वह कई बातें खुलकर नहीं बता पाता क्योंकि ऐसा करना उसे उचित नहीं लगता।

  मुझे काफी प्रसन्नता हुई कि सादाब फिर से मुझसे बातें करने लगा। उसके पास उलझनें बहुत हैं, और वह उनका हल ढूंढता रहता है। मैं शायद ऐसा कम ही कर पाता हूं।

  कुछ लोग हम पर प्रभाव डालते हैं, हम प्रभावित होते हैं और एक दिन ऐसा भी आता है जब प्रभाव का असर होता है। अच्छे लोग हमारी दुनिया को बदल देते हैं। धीरे-धीरे हम उनसे जुड़ाव महसूस करने लगते हैं।

  सादाब ने मुझसे कई बार कहा कि वह वक्त आने पर सब कुछ बता देगा। उसकी बातें मुझे सच लगती हैं। ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि मुझे उससे लगाव हो गया है। यह रिश्ता मामूली है, पर मायने वाला है। इसकी गांठ दिन-ब-दिन मजबूत होती जा रही है। मुझे मालूम नहीं कब मैंने उसे अपना कह दिया। यह हमारे भावों से जुड़ा है कि किस तरह हम दूसरों में अपनापन तलाशते हैं। यह एक प्रक्रिया की तरह जान पड़ता है- सच पूछा जाए तो मेरा जीवन शायद कुछ बदल जाए।

  अहिस्ता-अहिस्ता भाव जुड़ते हैं। मन का खाली कोना चुपके से भर जाता है। हम शायद अंजान रहते हैं और अचानक बहुत कुछ बदल जाता है। बदल जाता है हमारा संसार, हम और दूसरे भी हमें अलग नजर आने लगते हैं।   

-harminder singh

Tuesday, October 27, 2009

वाकई जीना उतना आसान नहीं



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मैं आज फिर से उदास हूं। मेरा एक साथी कैदी सादाब चुप सा रहने लगा है। पिछले कई दिनों से पता नहीं क्या हुआ कि वह मायूस रहता है। उसका चेहरा काफी शांत लगता है। मैंने उससे पूछा नहीं, लेकिन लगता है कि वह अंदर ही अंदर दुखी है। ऐसा होता है जब हम हृदय से अधिक सोचना शुरु कर देते हैं। हमारा मन कुछ सोचता है, दिमाग कुछ। तब अजीब सी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। मैं उसके हृदय को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता। इसलिए मैंने उससे बिल्कुल नहीं पूछा कि वह उदास क्यों है? हम ऐसा करते भी नहीं क्योंकि हर किसी का अपना व्यक्तिगत जीवन होता है जिसके बारे में हर कोई बताना भी तो नहीं चाहता।

सादाब काफी हंसता था। हालांकि वह खुश नहीं था, मगर वह हंस देता था। शायद इससे उसका दुख कम हो जाता था। उसकी एक मुस्कराहट से मुझे भी काफी राहत मिलती थी। ऐसा अक्सर होता था। कोई बात होती तो गंभीरता से उसपर वार्तालाप होता। जब कुछ अधिक गहरापन आ जाता तो वह अपनी हंसी को बीच में लाकर उसमें उथलापन ला देता। उसके विचार मुझे प्रभावित करते हैं। मैं सोचता हूं कि वह पहले मुझसे काफी कुछ कहता आया है, फिर कुछ दिनों से क्यों अपनी व्यथा नहीं बताना चाहता। मैं किसी को दुखी नहीं देखना चाहता।

इंसान इसलिए इंसान कहलाता है क्योंकि उसमें इंसानियत है और इंसानियत कहती है कि दूसरों की जरुरत पड़ने पर जहां तक हो सके मदद करो। उन्हें यदि किसी चीज की जरुरत है उसे उपलब्ध कराओ। मैं चाहता हूं कि वह इस तरह गुमसुम न रहे। उसने मुझे कई बार हौंसला दिया है। मैं भी कम हताशा से भरा नहीं, बल्कि अपने आसपास कई लोगों के कारण कभी-कभी बहुत कमजोर हो जाता हूं। इंसान कमजोर नहीं होता, उसे लोग ऐसा बना देते हैं। कुछ बातों का असर होता है, कुछ स्थितियों का, लेकिन हम खुद को विचारों से लड़ता हुआ असहाय पाते हैं। फिर कहते हैं कि जीना उतना आसान नहीं। वाकई जीना उतना आसान नहीं। शायद मरना भी कठिन है।

-harminder singh

Tuesday, October 20, 2009

स्वयं से लड़ना बहुत मुश्किल है


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यह सच है कि जीवन एक कहानी की तरह है। कहानी की शुरुआत होती है और वह समाप्त भी हो जाती है। यही सब तो हमारे साथ होता है। वे लोग ही आपस में मिलते हैं जिनकी कहानी एक तरह की होती है। वे लोग ही मित्र होते हैं जिनके विचार एक जैसे हों। अगर मित्र दुखी है तो वह हमारे दुख को अपना मानकर हमारा साथ देगा।

जो लोग मुझे मिले, जिन्हें मैंने अपने हृदय का हाल बताया वे सब मेरी ही तरह टूटे हुए और असहाय थे। वे मुझसे कहीं अधिक कष्टकारी समय को बर्दाश्त कर रहे थे, लेकिन उनकी ताकत क्षीण नहीं हो रही थी क्योंकि वे जीवन से हारना नहीं चाहते थे। उनके लिए जीवन संघर्ष का मैदान है। ‘इंसान वही होता है जो लड़ता हुआ मरे। संघर्ष करने की क्षमता हमारे भीतर मौजूद है। तुम कर कर तो देखो।’ अब्दुल ने मुझसे कहा था। शायद कुछ लोग कहकर कर जाते हैं, कुछ केवल कहते रह जाते हैं। अब्दुल ने तबाही का दर्द झेला। उसने खुद को संभाला। यह उसका संघर्ष था क्योंकि स्वयं से लड़ना बहुत मुश्किल है।

-harminder singh

Monday, October 19, 2009

जिंदगी कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है


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मैं ‘बेचारा’ कहलाना नहीं चाहता। इस शब्द से मुझे नफरत है। लोग कहते हैं कि मजबूर की मदद करो। मुझे लगता है कोई मजबूर नहीं। सब हालातों के हाथ कठपुथली हैं। इस हिसाब से सारा संसार किसी न किसी मौके बेचारा है। फिर मैं भी एक बेचारे से कम नहीं, लेकिन मैं खुद को बेचारा नहीं कहना चाहता। मैं हौंसले से जीवन की सच्चाई का मुकाबला करना चाहता हूं। पर यह कठिन लगता है। मैं अपनों से बहुत दूर हो कर भी उनके पास हूं, पर उनकी याद के सहारे धुंधले पड़ गए हैं। मेरा संसार रुका हुआ सा हो गया है, उधड़ा हुआ सा हो गया है। एक अजीब सी कशमकश फिर से उभरी है। शायद उभरती रहेगी टीस बनकर।

सहारे की तलाश जीवन भर रहती है। इंसान सहारा चाहता है। बिना सहारे के शायद जीवन अधूरा है। अपनों का सहारा मिलता है तो बहुत बेहतर होता है। मेरे पास कोई नहीं जो संभाल सके। जब हम निराश होते हैं, दुखी होते हैं तब हमें ऐसे व्यक्ति की तलाश रहती है जो हमें हौंसला दे सके और हमारे दर्द को समझ सके। मुझे कई लोग ऐसे मिले जो मेरे काफी करीब आये, लेकिन वे मुझसे दूर चले गये। उनकी कहानी भी मेरी ही तरह थी। जब कभी अधिक निराश होता हूं तो इस गीत को गुनगुनाता हूं-

‘जिंदगी कुछ भी नहीं,
तेरी मेरी कहानी है।’

-harminder singh

Tuesday, October 13, 2009

मुरझाये चेहरों का सूखा हिस्सा

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केवल मुरझाये चेहरों का सूखा हिस्सा बनने में ही फिलहाल बेहतर मालूम होता है। इसके अलावा इस घुटन में कुछ खास नहीं। कल की बातों को सोचना बेवकूफी लगती है। उनका समय बीत चुका। पुरानी कोई भी चीज हो, वह नयी कभी दिख नहीं सकती। वह हंस नहीं सकती, मुस्करा नहीं सकती, गुनगुना नहीं सकती। हां, अपने साथ घटने वाला तमाशा चुपचाप देख जरुर सकती है।

दूसरों को आपका दर्द मालूम नहीं होता। वे केवल उपहास करते हैं। मुझे चिढ़ाया जाता है। ऐसा कई बार हुआ है। कई कैदियों ने शाम के भोजन के समय मुझसे खींचातानी भी की। मैंने कुछ नहीं कहा। खामोशी कई बार हमें रोकती है। मैं किसी से कुछ कहना नहीं चाहता। मैं उन लोगों से अलग रहता हूं। वैसे मैं अच्छी तरह जानता हूं कि कुछ लोग दूसरों को दुखी करकर सुकून महसूस करते हैं। यह उनका आनंद है।

-harminder singh

Friday, October 9, 2009

हालातों के हाथ मजबूर

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हालातों को करीब हम खुद लाते हैं। हालात हमसे नहीं कहते कि हमें अपने साथ लेकर चलो। सोचने दो, मुझे बहुत कुछ सोचना है अभी। शायद पूरी जिंदगी सोचता ही रह जाऊं। काश, काश मैं कुछ कर पाता। अब क्या हो सकता है? नये जेलर ने मुझे घूरा था। उसने मुझे दो बेंत भी मारे। मेरी डायरी के पन्ने उलट-पुलट किये। फिर डायरी को एक कोने में फेंक दिया। मैंने इसका विरोध किया। उसने मेरा दो दिन का खाना रोक दिया। मैं गुस्से में हूं। हालातों के हाथों मजबूर इंसान भला कर भी क्या सकता है। हां, मैं यहां इतना अदना सा हो गया हूं, कुछ भी तो नहीं कर सकता। दीवारें हैं, इंसान हैं। उनके बीच में अंजानों की तरह नियति को कोस रहा हूं। चुप हूं क्योंकि यहां चुप रहने में ही भलाई है, सहने में ही भलाई है। एकांत नहीं है, मन शांत नहीं है। कठोरता और क्रूरता की आदत को रोकना नामुमकिन है। इन्हें मुस्कराना, प्रेम से पेश आना किसी ने नहीं सिखाया। जेलर के व्यवहार से मैं काफी निराश हूं क्योंकि मैं विवश भी हूं। विवशता में इंसान बंधे हुए हाथों का हो जाता है। उसका हौंसला सिर्फ चिल्लाता रह जाता है, बौखलाता रह जाता है, लेकिन अंदरुणी फड़फड़ाहट को सुनने वाला कोई नहीं होता है। केवल हम स्वयं ही सह जाते हैं, सहते रह जाते हैं। एकटक निहारते रह जाते हैं, इतना कुछ कहना चाहते हैं, कह नहीं पाते। मन घुटता रहता है और इसका निदान कहीं नजर नहीं आता। उपाय ढूंढते हुए..................बस कुछ हासिल नहीं हो पाता।

-harminder singh

Saturday, October 3, 2009

तन्हाई कुछ कहती है

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सवाल जिंदगी में बहुत होते हैं। तमाम जीवन यही सोचने में लगता जाता है- यह हल है या वह। भ्रम की स्थिति बड़ी रोचक होती है। सवालों का घेरा निरंतर बढ़ता रहता है। हम सोचते बहुत हैं, करते उतना नहीं। जीवन एक बड़ा सवाल है। अपना जीवन तबाह होते हुए कौन देखना चाहेगा? मैं कभी ओरों को उनकी उलझनों से बाहर करता था। आज खुद उलझनों में उलझ कर रहा गया हूं। सवालों को हल करते-करते सब कुछ मिट जायेगा, मगर न सोच थमेगी, न सवाल, बेशक सांसें थम जायेंगी।

वीरानी को देखकर अजीब से सन्नाटे का अहसास होता है। मुझे लग रहा है सन्नाटा चारों ओर पसरा है। सब कुछ जैसे शांत हो गया है। मेरे आसपास कोई नहीं है, कोई भी तो नहीं। मैं अकेला हूं, सिर्फ अकेला। इस अकेलेपन में मेरे साथ कोई कैसे हो सकता है, क्योंकि जब इंसान अकेला पड़ जाता है तो उसका साया भी उससे दूर भागता है। हां, यही सब हो रहा है। सब मेरा साथ छोड़ गए। मुझसे मिलने आखिर कौन आया?

मेरा जीवन सूख सा गया है। तन्हाई अक्सर मुझपर हंसती है, कहती है,‘‘चलो हमारी दोस्ती लंबी चलेगी। ऐसे कम ही होते हैं जिनके पास इतना वक्त बिताना पड़े। तुम मिले हो, अच्छा है। तुम्हें किसी की तलाश थी और मैं खाली थी। अब सोच रही हूं, यहीं डेरा जमा लूं। मुझे तुम भा रहे हो। तुमसे लगाव हो गया लगता है। चेहरे से, और वैसे भी भले ही लगते हो। तुम प्रसन्न रहोगे तो मैं रुठ जाउंगी। तुम ऐसा नहीं करोगे। मुश्किल से कोई तुम्हारी इतनी कद्र करने की सोच रहा है, उसे दूर नहीं जाने दोगे। मन को छोड़ो, संसार को भूल जाओ। मुझसे नाता जोड़ो। कितना सुकून है मेरे साथ रहने में। कोई तुमसे रिश्ता नहीं रखता। एकदम शांत हो गये हो तुम। नीरसता तुम में समा गयी है। मेरी मानो मुझसे इतनी पक्की मित्रता कर लो कि तुम मुझसे कभी अलग न रह सको। भूलना भी चाहो, तो भूल न सको। विश्वास से कहती हूं, तुम इसपर गौर जरुर करोगे। मैं भी अकेली हूं, तुम भी। इंसानों के साथ रहने का अपना आनंद है। वास्तव में संसार को छूना और मुझे न जानना, ऐसा होता नहीं। मैं अकेलेपन की साथी हूं। तुम्हारा मेरा साथ इतना लंबा रहे कि तुम्हें मुझसे लगाव हो जाए। मैं यही चाहती हूं।’’

-harminder singh

Tuesday, September 29, 2009

कैदी से नींद कुछ कहती है

थक सा गया हूं, बिल्कुल. अंधेरा मुझे घेरने की कोशिश कर रहा है। पता नहीं कहीं से कोई किरण उजाला ला देती है। मगर वह कुछ समय का होता है। हां, कुछ समय की छटपटाहट कम हो जाती है। कम होता है दर्द, कराहट और उलझनें। करवटें बदलकर रात भर जागने की आदत हो चुकी। खुद में सिमट कर रह गया हूं। पहले नींद कहती थी,‘मैं तुम्हारे पास आना नहीं चाहती। तुम पापी हो, हत्यारे हो। किसी के खून से तुमने हाथ लाल किये हैं। किसी को दर्द दिया है तुमने। तुम कैसे चैन में रह सकते हो? तुम्हें माफ नहीं किया जाना चाहिए। मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकती। मैं ऐसा करना भी नहीं चाहती क्योंकि तुम्हारा व्यक्तित्व मैं पहचान चुकी हूं। तुम स्वयं को भगवान समझते हो। किसी की जान लेकर तुम बहुत खुश हुए। तुम सोच रहे होगे कि तुमने पुण्य का काम किया। नहीं, नहीं, बिल्कुल नहीं। संसार को ऐसे लोगों से घृणा करनी चाहिए। मैं करती हूं। मैं ऐसे बुरे इंसानों से दूर रहना बेहतर समझती हूं। पापी कहीं के।........अब बैठो तन के और अपनी बहादुरी का परिचय दो। किसी की चीखों को तुमने कैसे अनसुना कर दिया? उसकी पत्नि अपने पति को बचाने की जद्दोजहद कर रही थी और तुम..........। ..............और तुम उसे अंधों की तरह चाकू मार रहे थे। उसका खून टिप-टिप कर गिर रहा था और तुम्हारा खून उबाल ले रहा था। वह तड़प रहा था, तुम मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे। रक्त के छींटे जमीन को लाल कर रहे थे। तुम्हारा चेहरा आवेश में सुर्ख था। एक जिंदगी धीरे-धीरे मर रही थी। तुम उसे हाथ-पांव मारता देख रहे थे। तब तुम्हें दर्द नहीं हुआ। उसकी पत्नि उससे लिपट कर तुम्हें कोस रही थी। जानते हो एक सुहागिन की टीस कितनी पैनी होती है। हीरे की परत तक को छलनी कर देती है। उस स्त्री की चूड़ियां टूट कर बिखरी थीं। यहीं से उसके अरमान भी बिखर गये। उसका सिंदूर पोंछ दिया गया। कभी गहनों से लदी वह, कोरी मूरत लगती थी जिसके रंग छिन गये हों। दुखी थी वह, खूब रोयी थी वह। उसकी तो दुनिया तुमने एक क्षण में लूट ली थी। वह निर्जन वन का सूख पेड़ हो चुकी थी। उसकी हाय से क्या तुम बच सकते हो? नारी का प्रेम जानते हो, घृणा नहीं। वह जितनी नम्र है, उतनी कठोर भी। तुम उसकी पीड़ा को अब जान रहे हो या नहीं, लेकिन करनी को भुगतना पड़ता है। तुम इंसान होते ही ऐसे हो। संवेदनाओं की बात करते हो, दूसरों का दर्द तुम्हारे लिए बेमतलब का है। अपनी पत्नि का दुख जानोगे तो पता लगेगा। मोह का अर्थ कितना गहरा है, तुम क्या जानो? जब अपने बिछुड़ते हैं तब आंसुओं की कतार लंबी होती है। लंबा होता है वक्त क्योंकि तब कोई अपना हमसे रुठकर चला गया होता है।’

‘बहुत पीड़ा होगी तुम्हें। शायद बहुत पछतावा भी। तुम पापी हो। पाप तो हो चुका। ईश्वर पर दोष देने से कोई लाभ होने वाला नहीं क्योंकि उसे धोखा दिया नहीं जा सकता। सभी इंसान स्वार्थी हैं, तुम भी। आवेश तन कर खड़ा हो गया तो उसके हो लिए। कैसी मानसिकता है तुम्हारी? मुझे तुम पर दया नहीं आयेगी। भला हत्यारे पर दया किस मोल की? तुम जैसे इंसान दूसरों की रोशनी छीनकर उन्हें अंधेरे में रहने को मजबूर करते हो। अंधेरा काला होता है। सबको भय लगता है जब जीवन का एक किनारा सिकुड़ जाए। तुम्हें दब कर जीना होगा, घुट कर जीना होगा। यह इंसाफ ही तो होगा। फल भुगतने की बारी सबकी आती है- कुछ देर से, कुछ जल्दी हलाल होते हैं। तुम्हारी तड़पन देखने लायक होगी। समझ चुके हो शायद अपने वक्त की कहानी का अंजाम। घिसट-घिसट कर जीवन चलेगा। इसकी रगड़ तुम्हें अंदर तक छील देगी और दर्द इतना अधिक होगा कि रो भी न सकोगे। पीड़ा का अहसास खुद करने पर वास्तविकता का पता चलता है। पीड़ा को करीब से देखे स्वत: ही कराह उठोगे। भीतर छिपे शैतान को अपना दर्द दूर करने के लिए अब पुकारो। क्यों, असहाय हो गए न। लोग अक्सर भूल कर जाते हैं कि उनका किया सब सही है। तुमने यही किया- भगवान खुद को मान बैठे। एक स्त्री को विधवा बनाया। उसके बच्चों से उनका प्यारा पिता छीन लिया और पत्नि से उसका पति। क्या मिला, आखिर हासिल क्या हुआ? ओरों को भी तड़पाया स्वयं भी कष्टों को समेटा। यह भुगतना पड़ेगा। अपने जब दूर हो जाते हैं तब कष्ट इतना भारी होता है कि दुख समेटे नहीं सिमटता। इसे दुखों के पहाड़ से बड़ा कहते हैं। जिंदगी छीनना आसान है, उसे निभाना कठिन। तुमने खुद को ऐसे हालातों का मोहताज बना दिया कि अब सिवाय दुखों के कुछ नहीं। जियोगे, जरुर जियोगे, तुम्हें जीना पड़ेगा। भला तुम्हारे जैसा इंसान इतनी आसानी से मर कैसे सकता है? देखोगे वह जो पहले नहीं देखा, सहोगे वह जो नहीं सहा। हर जगह गमों का जाला होगा जो जकड़ कर रखेगा तुम्हें। उजाला ढूंढते फिरोगे, हाथ नहीं आयेगा। सवेरे की तलाश अधूरी रहेगी। उजड़े दिनों की शुरुआत हो चुकी। तैयार रहो, काले बादल कब आ जायें। यह होना ही चाहिए। बुराई का नाश किसी भी कीमत पर होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होगा तो बुराई सिर उठायेगी, चटकारा लेकर अच्छाई का उपहास करेगी। बुरों को उनके किए के परिणामों को तुरंत दिया जाये जिससे ऐसे दुष्टों का संहार हो सके। जीवन को तुम्हारे जैसे लोग खराब बना देते हैं। केवल आवेश को हल समझते हैं। तड़पो और तड़पो। जियो, अब पता लग जाएगा कि किसी को मारकर कैसे जिया जाता है। सच से कब तक भागते रहोगे। दौड़ कितनी भी लंबी क्यों न हो वह अंजाम तक जरुर पहुंचती है। तुम दौड़े हो, बहुत चले हो। अब पिंजरे में हो। जैसे एक पंछी कभी जिसकी उन्मुक्तता उसे कुछ भी करने की इजाजत देती थी, आज उसके दिन बदल गये हैं। वह दया का पात्र बनकर रह गया है। कोठरी में बंद एक निर्जीव सी वस्तु जिसकी चीखें अभी उतनी नहीं, आगे और बढ़ेंगी। पंखों की फड़फड़ाहट किसी काम की नहीं।’

‘आज वक्त ने तुम्हें भिखारी सा बना दिया है। कुछ क्या, कुछ भी तो नहीं है तुम्हारे पास। कटोर फैलाते हो कोई भीख तक नहीं देता। भिखारी, बेसहारा, मोहताज कहीं के। सूखी टहनियांे को अपना दुखड़ा रो सकते हो। वे हरी थीं, तभी सुनती थीं। जमाना तुमसे बचने की कोशिश कर रहा है। एक हत्यारे से मेल कौन करना चाहेगा? कौन दो शब्द कहना चाहेगा? कौन यह चाहेगा कि इसे हम कभी जानते थे? कौन तुमसे बात करेगा? कोई नहीं। शांत, मृत दीवारों से मित्रता नहीं की जाती। क्या करोगे? दीवारों से सिर पटक कर कुछ हासिल नहीं होगा। माथे को लहूलुहान करके देखो, पीड़ा कितनी होगी। खून का एक कतरा बहने पर कष्ट कितना होता है यह जानोगे। हृदय की हालत क्या होती है, यह भी जानोगे। पर तुम क्यों जानोगे, तुम्हें दूसरे का दर्द मालूम ही नहीं। मुझे घृणा है तुमसे, तुम्हारे इरादों से।’

लेकिन नींद अब उतना दिक्कत नहीं करती। उसे वास्तविकता का मैं अहसास करा चुका। लेकिन उसे अभी भी संशय है। शायद जिसका हल न उसके पास है, न मेरे।

-harminder singh
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कैदी की डायरी......................
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घर से स्कूल
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...ऐसे थे मुंशी जी

..शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय काम था मुंशी जी का

...अपने अंतिम दिनों में
तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?

सम्मान के हकदार

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कल्याणी-एक प्रेम कहानी मेरा स्कूल बुढ़ापा

....भाग-1....भाग-2
सीधी बात नो बकवास

बहुत कुछ बदल गया, पर बदले नहीं लोग

गुरु ऐसे ही होते हैं
युवती से शादी का हश्र भुगत रहा है वृद्ध

बुढ़ापे के आंसू

बूढ़ा शरीर हुआ है इंसान नहीं

बुढ़ापा छुटकारा चाहता है

खोई यादों को वापिस लाने की चाह

बातों बातों में रिश्ते-नाते बुढ़ापा
ऐसा क्या है जीवन में?

अनदेखा अनजाना सा

कुछ समय का अनुभव

ठिठुरन और मैं

राज पिछले जन्म का
क्योंकि तुम खुश हो तो मैं खुश हूं

कहानी की शुरुआत फिर होगी

करीब हैं, पर दूर हैं

पापा की प्यारी बेटी

छली जाती हैं बेटियां

मां ऐसी ही होती है
एक उम्मीद के साथ जीता हूं मैं

कुछ नमी अभी बाकी है

अपनेपन की तलाश

टूटी बिखरी यादें

आखिरी पलों की कहानी

बुढ़ापे का मर्म



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>>मेरी बहन नेत्रा

>>मैडम मौली
>>गर्मी की छुट्टियां

>>खराब समय

>>दुलारी मौसी

>>लंगूर वाला

>>गीता पड़ी बीमार
>>फंदे में बंदर

जानवर कितना भी चालाक क्यों न हो, इंसान उसे काबू में कर ही लेता है। रघु ने स्कूल से कहीं एक रस्सी तलाश कर ली. उसने रस्सी का एक फंदा बना लिया

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वृद्धग्राम पर पहली पोस्ट में मा. होराम सिंह का जिक्र
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वृद्धों की सेवा में परमानंद -
डा. रमाशंकर
‘अरुण’


बुढ़ापे का दर्द

दुख भी है बुढ़ापे का

सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य गिरीराज सिद्धू ने व्यक्त किया अपना दुख

बुढ़ापे का सहारा

गरीबदास उन्हीं की श्रेणी में आते हैं जिन्हें अपने पराये कर देते हैं और थकी हड्डियों को सहारा देने के बजाय उल्टे उनसे सहारे की उम्मीद करते हैं
दो बूढ़ों का मिलन

दोनों बूढ़े हैं, फिर भी हौंसला रखते हैं आगे जीने का। वे एक सुर में कहते हैं,‘‘अगला लोक किसने देखा। जीना तो यहां ही है।’’
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इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल
प्रताप महेन्द्र सिंह कहते हैं- ''लाचारी और विवशता के सिवाय कुछ नहीं है बुढ़ापा. यह ऐसा पड़ाव है जब मर्जी अपनी नहीं रहती। रुठ कर मनाने वाला कोई नहीं।'' एक पुरानी फिल्म के गीत के शब्द वे कहते हैं-‘‘इक दिन बिक जायेगा, माटी के मोल, जग में रह जायेंगे, प्यारे तेरे बोल।’’

...............कहानी
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किशना- एक बूढ़े की कहानी
(भाग-1)..................(भाग-2)
ये भी कोई जिंदगी है
बृजघाट के घाट पर अनेकों साधु-संतों के आश्रम हैं। यहां बहुत से बूढ़े आपको किसी आस में बैठे मिल जायेंगे। इनकी आंखें थकी हुयी हैं, येजर्जर काया वाले हैं, किसी की प्रेरणा नहीं बने, हां, इन्हें लोग दया दृष्टि से जरुर देखते हैं

अपने याद आते हैं
राजाराम जी घर से दूर रह रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले घर को अलविदा कह दिया है। लेकिन अपनों की दूरी अब कहीं न कहीं परेशान करती है, बिल्कुल भीतर से

कविता.../....हरमिन्दर सिंह .
कभी मोम पिघला था यहां
इस बहाने खुद से बातें हो जायेंगी
विदाई बड़ी दुखदायी
आखिर कितना भीगता हूं मैं
प्यास अभी मिटी नहीं
पता नहीं क्यों?
बेहाल बागवां

यही बुढापा है, सच्चाई है
विदा, अलविदा!
अब कहां गई?
अंतिम पल
खत्म जहां किनारा है
तन्हाई के प्याले
ये मेरी दुनिया है
वहां भी अकेली है वह
जन्म हुआ शिशु का
गरमी
जीवन और मरण
कोई दुखी न हो
यूं ही चलते-चलते
मैं दीवाली देखना चाहता हूं
दीवाली पर दिवाला
जा रहा हूं मैं, वापस न आने के लिए
बुढ़ापा सामने खड़ा पूछ रहा
मगर चुप हूं मैं
क्षोभ
बारिश को करीब से देखा मैंने
बुढ़ापा सामने खड़ा है, अपना लो
मन की पीड़ा
काली छाया

तब जन्म गीत का होता है -रेखा सिंह
भगवान मेरे, क्या जमाना आया है -शुभांगी
वृद्ध इंसान हूं मैं-शुभांगी
मां ऐसी ही होती है -ज्ञानेंद्र सिंह
खामोशी-लाचारी-ज्ञानेंद्र सिंह
उम्र के पड़ाव -बलराम गुर्जर
मैं गरीबों को सलाम करता हूं -फ़ुरखान शाह
दैनिक हिन्दुस्तान और वेबदुनिया में वृद्धग्राम
hindustan vradhgram ब्लॉग वार्ता :
कहीं आप बूढ़े तो नहीं हो रहे
-Ravish kumar
NDTV

इन काँपते हाथों को बस थाम लो!
-Ravindra Vyas WEBDUNIA.com