बूढ़ी काकी कहती है-‘‘बुढ़ापा तो आना ही है। सच का सामना करने से भय कैसा? क्यों हम घबराते हैं आने वाले समय से जो सच्चाई है जिसे झुठलाना नामुमकिन है।’’.

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Wednesday, February 24, 2010

संबंधों के दायरे में

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कभी-कभी काकी को लगता है कि वह मुझसे घृणा क्यों नहीं करती?

उसे यह अटपटा लगता है। काकी को मुझसे लगाव है, यह मैं जानता हूं। उसकी बातों को मैंने बारीकी से समझाया और पाया कि वाकई बुढ़ापा अनुभव लिए होता है।

समय के साथ-साथ बूढ़ी काकी का मोह मेरे प्रति बढ़ता गया। उम्र के फासले को मोह ने छोटा बना दिया। मैं उसकी थकी जिंदगी को नजदीक से देखता हूं तो पाता हूं कि इन आंखों ने जिंदगी को कितने करीब से देखा है।

बूढ़ी काया है, फिर भी काकी को एहसास नहीं कि वह कब अलविदा कह दे, क्योंकि उससे संवाद करते समय ऐसा बिल्कुल नहीं लगता। उसने हमेशा मुझे मुस्कराकर कई बातों से अवगत कराया है। यह मोह के कारण उपजी स्थिति है या कुछ ओर।

मुझे यह सोचने पर विवश करता है कि बूढ़े लोग लगाव इतना क्यों करते हैं? क्यों वे प्रेम की एक छींट से खुद को भिगो देते हैं? क्यों उनका प्रेम उनकी सूखी आंखों से छलकता है? क्या बुढ़ापा प्रेम का भूखा होता है? वृद्धों का मन क्यों मामूली बात पर पिघल जाता है?

काकी ने कहा,‘‘मन का क्या, वह तो बहता है। प्रेम की चाह किसे नहीं। मन को बंधना नहीं आता और प्रेम को रुकना। दोनों ही इंसान के संगी हैं। तुमने बचपन में मां-बाप का दुलार देखा। उन्होंने तुम्हें कितना कुछ दिया। सबसे बड़ी बात यह कि उन्होंने तुम्हें जीवन दिया। इस संसार में तुम उन्हीं की वजह से हो। तुमने उनसे घृणा की होगी, लेकिन वे तुम्हें सदा दुलार ही करते रहेंगे। बूढ़ों को अपने ही छोड़ जाते हैं, जबकि बूढ़े लोग तमाम जिंदगी उनके मोह में जकड़े रहते हैं। औलाद का सुख क्या होता है, यह वे ही जानते हैं।’’

‘‘मेरी जिंदगी अधूरी है, यदि मैं अपने माता-पिता से दूरी बना लूं।’’ मैंने कहा।

इसपर काकी बोली,‘‘बिल्कुल इंसान इंसान के बिना पूरा नहीं। हम संबंधों के दायरे में जीते हैं। यह किसी ने सिखाया नहीं, स्वत: है। जरुरतें मिलजुलकर पूर्ण होती हैं। इंसानियत सिखाती है कि जुड़कर चलो। रिश्ते यहीं उत्पन्न होते हैं। रिश्ते टूटते जरुर हैं, लेकिन उनका अंत नहीं होता। इंसान को जीना यही सिखाते हैं। इसलिए जीवन को पूर्ण करने के लिए कुछ बंधनों में रहना पड़ता है। माता-पिता या उन्हें तुमसे लगाव है, उनकी भावनाओं को समझना जरुरी है।’’

‘‘रही बात घृणा कि तो उसकी उपज भी इंसान ही करते हैं। जहां प्रेम नहीं, वहां घृणा मंडराती है। इंसान को इंसान से ही समस्या है। जबकि लगाव करके हम अपनों में रहना सीखते हैं। बुढ़ापे में बहुत कुछ बदल जाता है। मोह बढ़ता जाता है, क्योंकि वक्त कम होता है। उतने में अपनों का साथ पाने की इच्छा होती है. शायद उनका सुख आसानी से हमें संसार छोड़कर जाने दे। शायद हौंसला दे जाए, ताकि शेष वक्त को उनके सहारे बिता सकें। मन की गहराई को बुढ़ापा जानता है। उसे मालूम है कि कितना कुछ हासिल कर चुका। उसे यह भी पता है कि बहुत कुछ पाकर, जीवन अभी तक प्यासा है।’’

काकी ने खिड़की से खुले आसमान को निहारा। वह काफी देर तक सफेद बादलों की चमक में खोई रही। उसने पलकों को नीचे किया, आंखों को थोड़ा आराम दिया।

मैंने सोचा कि बुढ़ापा समय को पढ़ रहा है। शनै: शनै: जीवन की अंतिम उड़ान की तैयारी कर रहा है। यहां पलकों को भिगोने की जरुरत है, मन भरा जरुर है, लेकिन खुशी उस बात की है कि बुढ़ापे को सब्र बहुत है।

-harminder singh

Saturday, January 31, 2009

मां का दिल ऐसा ही होता है

मेरी मां को मेरी फिक्र रहती है। हम कहते हैं,‘माओं के दिल ही ऐसे होते हैं।’ एक मां को चाहिये ही क्या, उसके बच्चे सुखी रहें और परिवार भरा-पूरा रहे। हम अपनों की चिंता शायद न भी करते हों, लेकिन उन्हें पल-पल हमारी चिंता रहती है।

मां की बात में सुनता हूं, पर मुस्करा जाता हूं। दिन भर किताबें, अखबार, अपने विचारों को घंटों कम्प्यूटर में फीड करना, बगैरह-बगैरह। शाम को करीब एक-दो घंटा कुछ न कुछ लिखना। ऐसा करने से मेरी भावनाएं अक्षरों के बहाने कोरे कागजों पर उकरती रहती हैं। इससे पैन से लिखने की कला को भी आप अपने साथ संजोये रखते हैं। हाल ही मैं दो नई कविताओं की रचना की है। कुछ कहानियां धीरे-धीरे लिख रहा हूं। खुद को व्यस्त रखने में एक अलग तरह का आनंद है। किताबों में खोना चाहता हूं, लेकिन ऐसा होता नहीं। एक बच्चे ने मुझे ‘क्रेजी’ भी कहा था। उसे लगता है जितनी किताबों के ढेर मैंने अपने घर के कोने में सजा रखे हैं, शायद वे हद से ज्यादा है। हाल ही मैं कुछ नई किताबें लाया हूं, जिनमें कई नये और कुछ पुराने रचनाकार हैं। किताबें हमारा मार्गदर्शन सबसे अच्छी तरह करती हैं।

अधिक व्यस्तता आपको थकान कर सकती है। दिमाग थकने पर हमें नुक्सान हो सकता है। हाल ही में मैं चोट खा गया। मुझे ‘बैंड-एड’ लगानी पड़ी। माथे पर मामूली सूजन आयी। हुआ यह था कि मुझे नींद आनी शुरु हो गई थी। मैं अक्सर मध्यरात्रि के आसपास ही सोता हूं। मुझे याद है मैं अद्र्धनिंद्रा की अवस्था में दरवाजे के बाहर गया था। अचानक मुझे लगा कि मेरी आंख अब लगी। मेरा मन बेचैन सा हो गया, हृदय की कंपन इतनी तेज थी कि मैं सहम गया। फिर मुझे लगा कि मैं सपने में हूं। मैं जमीन से उठा। मैं सोच में पड़ गया कि मैं गिरा कैसे? थोड़ा आगे चला तो पाया कि मेरे पैर मैं एक ही चप्पल है। पीछे देखा तो चप्पल वहां पड़ी थी। मुंह में लगा कि मिट्टी है। चेहरे पर हाथ फेरा तो पाया कि मैं चेहरे के बल गिरा था। यह सब इतनी जल्दी हुआ था कि मैं आज भी हैरान हूं कि मैं गिरा कैसे?

मैंने सुना था कि लोग बेहोश हो जाते हैं या असंतुलन में गिर जाते हैं, लेकिन मैंने उस स्थिति में खुद को पाया तो अजीब लगा। एक बार स्कूल में सुबह की प्रार्थना के समय धूप में मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया और पसीने से लथपथ हो गया। तब मैंने खुद को संभाल लिया था।

मां को इसपर टेंशन हो गयी। उन्होंने हैरानी में कहा कि कहीं कुछ ऐसा-वैसा न हो। मैं समझ गया। मैं एक बात बताना चाहूंगा कि हमारे परिवार में अंधविश्वास के बारे में बात करते हैं तो बुरा माना जाता है। मैं स्वयं कहता हूं कि जो लोग अपना भला नहीं कर सकते, वे दूसरों को नुक्सान पहुंचाने की युक्तियां सुझाते रहते हैं या फिर दूसरों पर टोटका करवाते रहते हैं। यही कारण है कि मैं ताबीज जैसे चीज को हमेशा नकाराता हूं। मुझे दो तरह के लोगों से नफरत महसूस होती है-एक मांसाहारी और दूसरे अंधविश्वासी। खैर, मां की सोच कुछ समय के लिये अंधविश्वासी मान सकता हूं क्योंकि उस समय वह काफी परेशान थी। हम जानते हैं जितना दुख हमें होता है, उससे कई गुना दुखी वे होती हैं जो हमसे स्नेह रखते हैं। परेशानियां हमें इधर-उधर की बातें काफी कुछ सोचने पर विवश करती हैं। मैंने मां को समझाया कि इतनी मामूली चोट के लिये क्यों फिक्र करती हो, मुझे कुछ नहीं हुआ है।

दुनिया भर की मांओं को लगता है कि उनसे अधिक प्यार अपने बच्चों को कोई नहीं कर सकता। यह सही ही है। वे अपने बच्चों के लिये कुछ भी कर सकती हैं।

मां और बेटीः मैंने एक मां को उसकी बेटी के साथ टहलते देखा है। वे दोनों अक्सर धूप निकलने के समय घूमती देखी जा सकती हैं। मां के हाथ में उसकी शादी-शुदा बेटी का हाथ होता है। कैसा दृश्य होता है जब एक मां अपनी बेटी को सहारा दे कर चलाती है जो चलने-फिरने-बोलने में लाचारी महसूस करती है। उस लड़की का पति उसे अपने घर नहीं ले जाना चाहता क्योंकि वह एक लाचार को अपनी पत्नि नहीं बनाना चाहता। जबकि शादी के समय वह बिल्कुल स्वस्थ थी। उसके मां-बाप ने उसकी शादी में दिल खोल कर जो उनसे बन पड़ा किया। पता नहीं क्या हुआ कि शादी के कुछ दिन बाद ही लड़की का शरीर सुन्न सा हो गया। उसकी मानसिक स्थिति खराब हो गयी। वह न चल सकती थी, न बोल सकती थी। यह दुख का विषय था। ससुराल वालों ने उसे उसके मायके भेज दिया। काफी मिन्नतों के बाद भी उसे उसका पति अपने घर ले जाने को राजी नहीं हुआ। लड़की को पता नहीं कि उसके आसपास क्या घट रहा था। उसके बाप को इतना दुख नहीं था, लेकिन एक मां का अपनी बेटी का दुख देखकर हृदय कितना रो रहा था, यह एक मां ही जान सकती है। बाप मजदूर है, जितना कमाते हैं, उतना खाते हैं। मां के पास इतने पैसे नहीं कि अपनी बेटी का इलाज करा सके। किसी ने उससे बताया कि वह अपनी लड़की को रोज नंगे पैर धूप में चलाये तो कुछ फर्क आ सकता है। पिछले एक साल से अधिक वह उसका सहारा बन रही है। रोज-रोज अंदर-अंदर घुट रही है। बेटी खिलखिलाती है, उसे संसार का पता नहीं। वह लड़खड़ा कर चलती है, फिर खिलखिलाती है। उसकी मां दुखी है, शायद यह संसार का सबसे बड़ा दुख है।

-Harminder Singh

Monday, October 6, 2008

मां ऐसी ही होती है



मां किस्मत वालों को मिलती हैं। वे किस्मत वालें हैं जिनके पास उनकी मां है। जो लोग अपनी मां को खो चुके हैं, वे शायद दुखी हैं और कभी-कभी बहुत दुखी भी। उनकी आंखों में आंसू हैं क्योंकि कोई अपना उन्हें छोड़ कर चला गया


मां होती ही ऐसी है। बच्चा हंसता है, तो मां हंसती है। वह रोता है, तो मां भी रोती है। मां की ममता को पहचाना बहुत कम लोगों ने है। उसके लिये हम हमेशा छोटे ही हैं, दुलारे भी हैं और प्यारे भी। उसके जाने के बाद उसकी याद हमें आयेगी, यह हम जानते हैं। वह कभी न लौट कर आने के लिये हमसे केवल एक बार विदाई लेगी। यह विदाई अंतिम होगी।

हम कहते हैं कि मां किस्मत वालों को मिलती हैं। वे किस्मत वालें हैं जिनके पास उनकी मां है। जो लोग अपनी मां को खो चुके हैं, वे शायद दुखी हैं और कभी-कभी बहुत दुखी भी। उनकी आंखों में आंसू हैं क्योंकि कोई अपना उन्हें छोड़ कर चला गया। उसके अंतिम पल में कई अपनी मां के पास थे और कई को पता ही नहीं कि उनकी भी कभी कोई मां थी। पाने से ज्यादा खोने का गम होता है। और पीड़ा तब अधिक बढ़ जाती है, जब आप उसे खो देते हैं जिसे आप बहुत चाहते हैं, शायद बहुत ज्यादा। यह सब इतना अचानक हो जाता है कि आपको पता ही नहीं चलता कि कोई आपसे कब का रुठ कर चला गया। ऐसी जगह जहां से लौटना हर किसी के लिये नामुमकिन रहा है। मेरी आंखें नम हो गयी हैं जब मैं यह लिख रहा हूं क्योंकि मेरे पास भी ऐसा कुछ घटा है जिसके बाद यह लिख सका हूं। एक बच्चा कभी पहले बहुत खुश हुआ करता था। उसकी हंसी रोके नहीं रुकती थी। वह हंसता हुआ अच्छा लगता था। बातें बनाना कोई उससे सीखे। मुझे उसने प्रभावित किया था। वह अब दुखी है और उसका दुख कभी न खत्म होने वाला है। उसका कोई उसे छोड़ कर चला गया और वह एकदम अकेला पड़ गया। उसकी आंखें किसी को खोजती होंगी, वह अब उसके सामने नहीं है। वह रोता है और जी भर कर रोता है। भला एक 12 साल का बच्चा कर भी क्या सकता है। ऐसे मौकों पर रोया ही तो जाता है। उसकी मां अब रही नहीं। उसकी यादें हैं बस, जिनको ध्यान कर सिर्फ रोना आता है। वह प्यार अब नहीं रहा, दुलार पीछे छूट गया।

किसी को भूला इतनी आसानी से नहीं जा सकता। इसलिये कहा गया है-
It takes only a minute to get a crush on someone, an hour to like someone, and a day to love someone but it takes a lifetime to forget someone.

यह सच है कि अपनों से दूरी और बहुत लंबी दूरी जिंदगी भर का दर्द दे जाती है। हम उन्हें खुशी पता नहीं कितने दे पाते हैं लेकिन उनके दूर चले जाने पर रोते बहुत हैं। यह हमारी कमजोरी है कि हम भावनाओं में आसानी से बह जाते हैं। यह लगाव अदृश्य होता है, लेकिन मजबूती से जुड़ा हुआ। इसकी डोर कभी कमजोर नहीं पड़ती और शायद समय-दर-समय और मजबूत होती जाती है। यही जीवन का सच है। रिश्तों की डोरी हमें जोड़े रखती है, नहीं तो हम कब के बिखर गये होते।

मां के लिये यह गीत गुनगुनाया जा सकता है-
‘तेरी उंगली पकड़ के चला,
ममता के आंचल में पला,
मां ओ मेरी मां, मैं तेरा लाडला।’

-harminder singh

Friday, June 13, 2008

मां ऐसी ही होती है

एक मां को बेटा याद कर रहा है. इन यादों के तिनकों को उसने एक-एक कर समेटा है. यह उसके ह्रदय की आवाज है. मां होती ही ऐसी है. बच्चा हंसता है, तो मां हंसती है. वह रोता है, तो मां भी रोती है. मां की ममता को पहचाना बहुत कम लोगों ने है. उसके लिये हमेशा छोटे ही हैं, दुलारे भी हैं और प्यारे भी. वह उमरदराज हो गई, उसने बीमारी से भी जान-पहचान की. कब अलविदा कह गई, पता ही नहीं चला.

ज्ञानेंद्र जी की माता जी काफी समय से बीमार थीं. कुछ समय पूर्व उनका देहांत हो गया. मां की याद में उन्होंने एक कविता लिखी है.
-हरमिन्दर सिंह
आप भी पढें-


मां

निस्वार्थ भाव से जना, एक अंकुरित बीज,
रोपा उसे संचित कर धरा पर, बढ़ने को पेड़ विशाल,

कोई जंगली कुचल न डाले, नन्हें उगते पौधे को,
ताड़-बाड़ बन बैठी वह, नन्हें के चारों ओर,

किया नींद का परित्याग, पेट को भी दिया अल्पहार,
लगी रही पालन-पोषण में, नित दिन-नित रात,

बनाया खून का पानी, छाती से कराया दुग्धपान,
नन्हें के खिलने पर खिली वह, मुरझाने पर मुरझायी,

पौधा बने न किसी पर आश्रित, बने न जीवन में लाचार,
शिक्षा-दीक्षा देकर, बढ़ाया मनोबल उसका अपार,

भटके न जीवन-पथ पर, बाधक न हो दुष्ट चट्टान,
नैतिकता का पाढ़ पढ़ाकर, किया भविष्य को तैयार,

हर घर में जाने को, भगवान बने जब लाचार,
‘मां’ की सृष्टि कर डाली, जानकर विल्पित आधार,

पेड़ बना जब विशाल, फल-फूलों को लदा-भरा,
जड़ में हुयी वह समाहित, देने को खाद-संस्कार,

कर्तव्य-दर-कर्तव्य निभाती वह, बात न हुई अधिकार की,
अनंत तक बनी रही प्रतिभूति, त्याग, तपस्या, सहृदयता, सद्भावना की,

उस कार्यकुशलता, महानता की प्रतिभूति को,
मैं भी करता नतमस्तक होकर, कोटि-कोटि प्रणाम।

-GYAN PRAKASH SINGH NEGI 'gyanender'
TEVA API (INDIA) Ltd.
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coming soon1
कैदी की डायरी......................
>>सादाब की मां............................ >>मेरी मां
बूढ़ी काकी कहती है
>>पल दो पल का जीवन.............>क्यों हम जीवन खो देते हैं?

घर से स्कूल
>>चाय में मक्खी............................>>भविष्य वाला साधु
>>वापस स्कूल में...........................>>सपने का भय
हमारे प्रेरणास्रोत हमारे बुजुर्ग

...ऐसे थे मुंशी जी

..शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय काम था मुंशी जी का

...अपने अंतिम दिनों में
तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है?

सम्मान के हकदार

नेत्र सिंह

रामकली जी

दादी गौरजां

कल्याणी-एक प्रेम कहानी मेरा स्कूल बुढ़ापा

....भाग-1....भाग-2
सीधी बात नो बकवास

बहुत कुछ बदल गया, पर बदले नहीं लोग

गुरु ऐसे ही होते हैं
युवती से शादी का हश्र भुगत रहा है वृद्ध

बुढ़ापे के आंसू

बूढ़ा शरीर हुआ है इंसान नहीं

बुढ़ापा छुटकारा चाहता है

खोई यादों को वापिस लाने की चाह

बातों बातों में रिश्ते-नाते बुढ़ापा
ऐसा क्या है जीवन में?

अनदेखा अनजाना सा

कुछ समय का अनुभव

ठिठुरन और मैं

राज पिछले जन्म का
क्योंकि तुम खुश हो तो मैं खुश हूं

कहानी की शुरुआत फिर होगी

करीब हैं, पर दूर हैं

पापा की प्यारी बेटी

छली जाती हैं बेटियां

मां ऐसी ही होती है
एक उम्मीद के साथ जीता हूं मैं

कुछ नमी अभी बाकी है

अपनेपन की तलाश

टूटी बिखरी यादें

आखिरी पलों की कहानी

बुढ़ापे का मर्म



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>>मेरी बहन नेत्रा

>>मैडम मौली
>>गर्मी की छुट्टियां

>>खराब समय

>>दुलारी मौसी

>>लंगूर वाला

>>गीता पड़ी बीमार
>>फंदे में बंदर

जानवर कितना भी चालाक क्यों न हो, इंसान उसे काबू में कर ही लेता है। रघु ने स्कूल से कहीं एक रस्सी तलाश कर ली. उसने रस्सी का एक फंदा बना लिया

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वृद्धग्राम पर पहली पोस्ट में मा. होराम सिंह का जिक्र
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वृद्धों की सेवा में परमानंद -
डा. रमाशंकर
‘अरुण’


बुढ़ापे का दर्द

दुख भी है बुढ़ापे का

सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य गिरीराज सिद्धू ने व्यक्त किया अपना दुख

बुढ़ापे का सहारा

गरीबदास उन्हीं की श्रेणी में आते हैं जिन्हें अपने पराये कर देते हैं और थकी हड्डियों को सहारा देने के बजाय उल्टे उनसे सहारे की उम्मीद करते हैं
दो बूढ़ों का मिलन

दोनों बूढ़े हैं, फिर भी हौंसला रखते हैं आगे जीने का। वे एक सुर में कहते हैं,‘‘अगला लोक किसने देखा। जीना तो यहां ही है।’’
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इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल
प्रताप महेन्द्र सिंह कहते हैं- ''लाचारी और विवशता के सिवाय कुछ नहीं है बुढ़ापा. यह ऐसा पड़ाव है जब मर्जी अपनी नहीं रहती। रुठ कर मनाने वाला कोई नहीं।'' एक पुरानी फिल्म के गीत के शब्द वे कहते हैं-‘‘इक दिन बिक जायेगा, माटी के मोल, जग में रह जायेंगे, प्यारे तेरे बोल।’’

...............कहानी
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किशना- एक बूढ़े की कहानी
(भाग-1)..................(भाग-2)
ये भी कोई जिंदगी है
बृजघाट के घाट पर अनेकों साधु-संतों के आश्रम हैं। यहां बहुत से बूढ़े आपको किसी आस में बैठे मिल जायेंगे। इनकी आंखें थकी हुयी हैं, येजर्जर काया वाले हैं, किसी की प्रेरणा नहीं बने, हां, इन्हें लोग दया दृष्टि से जरुर देखते हैं

अपने याद आते हैं
राजाराम जी घर से दूर रह रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले घर को अलविदा कह दिया है। लेकिन अपनों की दूरी अब कहीं न कहीं परेशान करती है, बिल्कुल भीतर से

कविता.../....हरमिन्दर सिंह .
कभी मोम पिघला था यहां
इस बहाने खुद से बातें हो जायेंगी
विदाई बड़ी दुखदायी
आखिर कितना भीगता हूं मैं
प्यास अभी मिटी नहीं
पता नहीं क्यों?
बेहाल बागवां

यही बुढापा है, सच्चाई है
विदा, अलविदा!
अब कहां गई?
अंतिम पल
खत्म जहां किनारा है
तन्हाई के प्याले
ये मेरी दुनिया है
वहां भी अकेली है वह
जन्म हुआ शिशु का
गरमी
जीवन और मरण
कोई दुखी न हो
यूं ही चलते-चलते
मैं दीवाली देखना चाहता हूं
दीवाली पर दिवाला
जा रहा हूं मैं, वापस न आने के लिए
बुढ़ापा सामने खड़ा पूछ रहा
मगर चुप हूं मैं
क्षोभ
बारिश को करीब से देखा मैंने
बुढ़ापा सामने खड़ा है, अपना लो
मन की पीड़ा
काली छाया

तब जन्म गीत का होता है -रेखा सिंह
भगवान मेरे, क्या जमाना आया है -शुभांगी
वृद्ध इंसान हूं मैं-शुभांगी
मां ऐसी ही होती है -ज्ञानेंद्र सिंह
खामोशी-लाचारी-ज्ञानेंद्र सिंह
उम्र के पड़ाव -बलराम गुर्जर
मैं गरीबों को सलाम करता हूं -फ़ुरखान शाह
दैनिक हिन्दुस्तान और वेबदुनिया में वृद्धग्राम
hindustan vradhgram ब्लॉग वार्ता :
कहीं आप बूढ़े तो नहीं हो रहे
-Ravish kumar
NDTV

इन काँपते हाथों को बस थाम लो!
-Ravindra Vyas WEBDUNIA.com