पूरी तरह तो याद नहीं कि जैस्सी जी ने हमारी क्लास कब ज्वाइन की थी। जब वे हमारी क्लास में पहली बार आईं थीं तो हम ज्यादातर बच्चों ने उन्हें अजीब समझा था। वे दक्षिण भारतीय पृष्ठभूमि से नाता रखती हैं। साइंस की क्लास में उनका घंटा शुरु होते ही उतनी फुर्ती से आना कई बार आगे बैठे लोगों का बैंड बजा देता था। मेरा पाला वैसे उनसे कम ही पड़ा। वैसे भी मेरा नेचर कुछ शर्मीला था। मैं शायद टीचरों से बचने में ही समझदारी समझता था। क्या पता कब कौन सा सवाल दाग दें और आपसे न बात बने, न सवाल उचरे। मतलब रोटी गले में ही अटकी रह जाये। फिर पानी पीने को अंधों की तरह ग्लास ढूंढते फिरो।
जब जैस्सी जी का घंटा आता तो मैं थोड़ा बेआराम महसूस करता। पता नहीं स्टूडेंट्स के साथ ऐसा क्यों होता है? टीचर के सामने चूहे और बाद में शेर। वैसे मुझे न ही गुर्राना आता था और न ही दुम दबा कर भाग जाना। और हां,...न ही मैं अपने समय में खरगोश हुआ करता था। वैसे मेरे कुछ साथी खुद को चीता समझते थे, पर बाद में वे भी भीगी बिल्ली बन गये थे। जैस्सी जी क्लास में प्रवेश बाद में करतीं सवाल का प्रहार पहले शुरु हो जाता। मेरे कुछ साथी कलम या पैंसिल गिराकर छिपने की असफल कोशिश करते। क्योंकि टीचर की निगाह से वे बच नहीं पाते थे। एक टीचर के सामने सारे बच्चे शायद चूहे की तरह ही होते हैं, जिन्हें एक कुर्सियों और मेजों वाले शानदार फर्श वाले बिल में कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाता है। लेकिन ऐसा मुझे कभी लगा नहीं। आज जब मैं पुराने दिनों को याद करता हूं तो पाता हूं कि वाकई वे दिन शानदार थे। शिक्षकों की एक-एक बात आज बिल्कुल साफ हो रही है। शायद वे हमारे भविष्य के लिए हमें बिल में बंद किये थे। वैसे बिल में पंखे भी लगे थे। अरे हां...खिड़िकयां तो मैं भूल ही गया। लेकिन अगर किसी ने खिड़की का कांच जानबूझकर या धोखे में तोड़ दिया तो जुर्माना देने के लिए प्रिसिंपल तैयार हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई जानबूझकर खिड़की का कांच तोड़ेगा।
एक बात बहुत महत्व रखती है कि आप खुद पर कितना भरोसा करते हैं। हम कहते हैं कि आत्मविश्वास भी कोई चीज होती है। जैस्सी जी में वह आज भी उतना ही बरकरार है। मुझे उनके विषय में सुनने को मिल जाता है। वे उस दिन मेरे पास से मुस्कराते हुए गुजरी थीं। कमाल है न कि हम कई बार ऐसे हो जाते हैं कि पता ही चलता कि कहां हैं? इतने सालों बाद मुलाकात करने जा रहे हैं उन लोगों से जिनसे आपने जिंदगी के पायदान पर चलना सीखा। उनके सामने आने पर आप उनसे चंद शब्द नहीं कह पाये। क्या मुस्कराकर आप उनका उधार चुकता कर सकते हैं? शायद नहीं, लेकिन उस समय मैं शायद खुद को कुछ ज्यादा ही भावुक कर बैठा था।
कैमिस्ट्री मुझे उतनी बेहतर कभी नहीं लगी। मगर जैस्सी जी ने हमारी क्लास में बच्चों में एक उत्साह जगाने की कोशिश की। एक तरह की एनर्जी का संचार करने की कोशिश की गयी। कुछ बातें जो उन्होंने बताई थीं शायद ही कोई मेरा साथी भूला होगा। कैमिकल्स से दोस्ती करना हमें आ ही गया था। एक बात ओर मेरे दसवीं में सांइस में सर्वाधिक नंबर आये थे। बायोलोजी के एक्सपैरिमेंट भी उन्होंने कई कराये थे।
एक बार की बात है हमें बायो लैब ले जाया गया। हमें आनियन पील (प्याज की छील) को माइक्रोस्कोप से देखना था। जैस्सी जी ने पहले हमें खुद करके दिखाया कि किस तरह माइक्रोस्कोप को सैट किया जाता है, बगैरह, बगैरह। स्लाइड को किस तरह तैयार किया जाता है, यह भी हमने सीखा। उन्होंने साथ में यह भी हिदायत दी कि स्लाइड को तोड़ मत देना। मैं खासकर काफी उत्साहित था। मेरे तमन्ना थी कि जो मैंने किताबों में देखा है, उसे आज वास्तव में देखने का मौका मिल रहा था। था न अजीब अहसास। हमने स्लाइड तैयार कर ली थी। माइक्रोस्कोप से एक्सपैरिमेंट को किया भी। मेरे पास के एक लड़के ने पता नहीं कैसे अपनी स्लाइड चटका दी और धोखे से मेरी जगह रख दी। मुझे सब पता था पर यह वह जानता था या मैं या फिर भगवान जिसके किसी अदालत में कभी बयान नहीं लिये गये। मैं मन की मन डर रहा था कि अगर जैस्सी जी को पता लग गया तो मैं तो गया काम से। उन्होंने शायद ही मुझे कभी डांटा था। मगर डर तो सबको लगता है। यहां उस समय माउंटन ड्यू नहीं थी जो कह सकता कि डर से मत डरो, डर के आगे जीत है।
घबराहट सिमटने का नाम नहीं ले रही थी। तभी जैस्सी जी की नजर चटकी हुई स्लाइड पर पड़ गयी। उन्हें लगा कि मैंने स्लाइड को तोड़ दिया। उन्होंने यह कहा,‘हरमिन्दर यह क्या कर दिया?’। आसपास के सभी बच्चे मेरी तरफ देख रहे थे। जब नजरें घूरती हैं भरी महफिल में तो कैसा एहसास होता है, यह हम जानते हैं। मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। आज भी मेरे वह बात याद है और शायद जिंदगी भर याद रहे। शुभांगी और सुमित को मैंने यह एक बार बताया भी था। बाद में क्लास में आकर भी उन्होंने उस बात को दोहराया कि बच्चे अपना एक्सपैरिमेंट ढंग से नहीं कर सकते। ऐसा आगे से नहीं हो। मैं क्या कह सकता था? मैंने उनसे कहा भी कि मैंने ऐसा नहीं किया। कोई गवाह भी तो नहीं था। अब भगवान को तो उनके सामने पेश नहीं किया जा सकता था। जो देखा था, वह दिख गया था। मेरा पूरा दिन खराब ही गया होगा और क्या? अब मैं उनसे कभी मिलूंगा तो इस बात को जरुर बताउंगा कि आपने मुझे धोखे में ऐसा कह दिया था। उस समय तो बुरा लगा मगर आज समझ आता है कि उनका कहना सही था। जो उन्होंने देखा कहा और उनकी जिम्मेदारी बनती थी लैब के रखरखाव की। आगे उन्हें जबाव देना था, हमें नहीं।
वक्त के साथ काफी कुछ धुंधला पड़ जाता है। लेकिन कुछ लोग फिर भी उसी तरह कभी न कभी याद आ ही जाते हैं। हम उनसे बहुत कुछ सीखे थे और उनकी सीखें शायद ही कभी भूल पायें। जैस्सी जी से आप कुछ सीख सकते हैं तो वह बिना थके पढ़ना। उनमें समझाने की एक अलग तरह की खूबी है जिसे मैं समझता हूं कि विज्ञान के शिक्षकों में होना बहुत जरुरी है। मुझे पता है कि हम उनकी क्लास में कभी बोर नहीं हुए, हां कई बार सहम जरुर गये। वैसे वे आपको डराती नहीं, आप खुद घबरा जाते हैं। भई उनके मुताबिक जो सही है, वह तो सही ही है। कुछ खरी बातें कह देंगी, लेकिन उनसे पढ़ाई बेहतर ही होगी क्योंकि वे बातें आपके भले के लिए ही होंगी। उन्होंने मुझे काफी प्रभावित किया। यही कारण था कि कुछ शिक्षकों को मैं कभी भूल नहीं सकता। वे किसी न किसी तरह जेहन में रहेंगे ही।
मैं चाहता हूं कि एक दिन उनकी क्लास में बैठकर फिर से पुराने दिनों को याद करुं। शायद इसी बहाने कुछ पहले जैसा हो जाये। स्कूल के दिन तो स्कूल के ही होते हैं। पता नहीं क्यों जब हम उन्हें जीते हैं तो उतने अच्छे नहीं लगते, जबकि याद करने पर बड़े ही शानदार लगते हैं। यकीनन।
वैसे जैस्सी जी के बारे में एक बात कहना चाहूंगा-‘‘सीधी बात नो बकवास।’’
-harminder singh
Showing posts with label jaissey. Show all posts
Showing posts with label jaissey. Show all posts
Saturday, May 29, 2010
सीधी बात नो बकवास
Tuesday, February 9, 2010
बहुत कुछ बदल गया, पर बदले नहीं लोग
हम इतने समय बाद जब उन लोगों से मिलते हैं जो कभी हमारे लिये काफी अहम रहे हों तो काफी बेहतर लगता है। मुझे इतने समय बाद काफी सुखद एहसास हुआ। दरअसल अचानक ही ऐसा कुछ हुआ कि मैं अपने स्कूल पहुंच गया।
इतने समय में कितना बदल गया मेरा स्कूल -सैंट मैरी कान्वेंट। कालेज बन सेकेंडरी स्कूल कहा जाने लगा है। पहले जैसा कुछ था तो वह थे मेरे टीचर, खासकर मैडम डोगरा और मोहनचंद्रा जी। इसके अलावा मैं श्रीमान जगवीर सिंह का भी जिक्र करना चाहूंगा। सबसे पहले मेरी मुलाकात उनसे ही हुई। हालांकि उनका शरीर पहले से कुछ बदल गया, लेकिन उनका अंदाज वही पुराना था। शायद कुछ लोग हमेशा अपनी कुछ न कुछ खासियतों के साथ उसी तरह रहते हैं।
डोगरा जी को मैं कभी नहीं भूलना चाहूंगा क्योंकि वे ही एकमात्र ऐसी शिक्षिका हैं जिनसे मैं बहुत ही अपनेपन से मिला हूं। फोन पर भी उनसे काफी देर बात की थी तो मैं भावुक हो गया था। एक इंसान जो पहले से ही उसी तरह का हृदय रखता हो, उसे हम आसानी से भुला नहीं सकते और न ही मैं चाहूंगा कि मैं भूलूं। यह हममें खूबी नहीं नेमत है कि हम दूसरों को देखकर बहुत बार इतना खुश हो जाते हैं कि उनकी तारीफ करने लगते हैं। पर यहां मामला अलग है। मैंने मुलाकात की उन लोगों से जो शायद उससे भी ऊपर हैं। उनकी तारीफ नहीं की जा सकती। वे हमारे श्रद्धेय हैं। हमने उनका अनुसरण किया है ताकि हम कुछ हासिल कर सकें। और हमने बहुत कुछ हासिल भी किया है।
मैडम डोगरा को चौथी क्लास से जानता हूं। जब वे शुरु में आयीं तो हमें अजीब लगा। उन्होंने हमें मैथ्स पढ़ाया। गणित की सबसे बेहतरीन टीचर मैं उन्हें आज भी मानता हूं। अपने पड़ौस के बच्चों से मैं उनके बारे में अक्सर मौका मिलने पर बात करता हूं।
वे स्टाफ रुम से बाहर आ रही थीं तो मुझसे काफी दूरी पर थीं। उनके साथ मैडम कुमकुम और मैडम जैस्सी भी थीं। डोगरा जी की नजर जैसे ही मुझ पर पड़ी तो मैं छोटा बच्चे जैसे बन गया। मुझे काफी खुशी हुई और वे भी कम खुश नहीं थीं। उन्होंने मेरा हालचाल पूछा और मैंने उनका। खड़े-खड़े कितनी बातें होती हैं, वे सब हम कर पाये। थोड़े समय में इतना कुछ कह गयीं वे कि मैं उनका आभार व्यक्त करता हूं। सबसे पहले उनके शब्द थे,‘‘देखो कितना बदल गया है।’’ पास में मोहनचन्द्रा जी भी खड़े मुस्करा रहे थे। सबसे मेहनती व्यक्ति मोहनजी को कहा जा सकता है। वे साधारण दिखते जरुर हैं लेकिन कालेज की कई अहम जिम्मेदारियों को वे बखूबी निभाते हैं। उनकी खासियत उनके स्वभाव में साफ झलकती है।
खैर, डोगरा जी से मिलकर मुझे पुराने दिनों की याद ताजा हो गयी। उनका व्यवहार आंका नहीं जा सकता। कुछ लोग शायद होते ही ऐसे हैं कि वे जब भी आपसे मिलते हैं, आपको उनमें अपनापन नजर आता है। वे आपकी फिक्र करते हैं, ठीक एक बेटे की तरह। या फिर ऐसे जैसे आप उनके खुद के परिवार के हों। यह हमें इंसानों की उस खूबी का ज्ञान कराता है कि हम सब प्रेम भाव से कितने गदगद हो जाते हैं। यह बहने वाली भावना है जो हमारे हृदय को कितना सुकून पहुंचाती है, यह हम ही जान सकते हैं। और शायद वे भी जो हमें यह अनुभूति कराते हैं। कितना अच्छा हो, अगर हम सभी एक-दूसरे को इस तरह समझें। प्रेमपूर्ण व्यवहार की हवायें हमेशा इसी तरह चलती रहीं।
मैं आजतक कुछ इंसानों को समझ नहीं पाया। एक वे जो ‘स्पेशल’ हैं और एक वे जो हमसे प्रेम करते हैं। ये दोनों व्यक्तित्व ही ऐसे हैं जिनकी दुनिया थोड़ी अलग है आम इंसान से। इन्हें एक भाषा पक्की आती है और वह है रिश्तों के अपनेपन की। ऐसा ये करते हैं क्योंकि ऐसा करना इन्हें अच्छा नहीं, मेरे ख्याल से बहुत ही अच्छा लगता है।
मेरी तबीयत थोड़ा इस लेख को लिखते समय ठीक नहीं है। पर मैं उन पलों को जीवित रखना चाहता हूं जो मैंने जिये।
गुरप्रीत जी से मेरी मुलाकात पहले कभी नहीं हुई थी। वह केवल मेरे लेख पढ़ते थे। जब उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया तो उनके शब्द थे,‘‘जिस इंसान को मैं मिलने की उम्मीद कर रहा था, उससे आज मुलाकात हो गयी।’’ इससे खुशी की बात क्या हो सकती है कि कोई व्यक्ति दिल से आपकी कद्र करता है। ये ऐसे लोग होते हैं जो भी शायद हम कभी भूल सकते हों। ये ऐसे लोग होते हैं जिनका कद उनसे मिलने के बाद हमारी नजरों में और बढ़ जाता है। उन्होंने एक बात और कही,‘‘पंजाबियों के दिल तो हर किसी से मिल जाते हैं।’’
एक और व्यक्ति से मेरी मुलाकात हुई। वे थे वहां के मैथ्स के टीचर श्रीमान रिंकू सक्सेना। उनके बारे में कहा जाता है कि वह अपने विषय के महारथी हैं। सीबीएसई के ग्रेडिंग सिस्टम पर उनसे बात हुई तो उनका कहना था इससे स्टूडेंट पता नहीं कितना फायदा होगा।
कुछ वक्त बिता कर मुझे लगा कि मैं बरसों पहले के समय में पहुंच गया। हम अक्सर ऐसा अनुभव करते हैं जब हम लंबे समय बाद यादों को ताजा करने की कोशिश करते हैं। वैसे ऐसा स्वत: ही हो जाता है।
मेरी निगाह उस मैदान पर थी जहां हम कभी गिने-चुने मित्रों की टोली के साथ बतियाते हुए घूमते थे। उन बच्चों को देखकर मुझे पुराने दिन याद आ गये जो बास्केटबाल कोर्ट। मेरे कुछ साथी बास्केटबल के शौकीन थे। एक-आध बार मैंने भी गेंद को हाथ लगाया, लेकिन इतना साहस नहीं हुआ कि नैट में गेंद फेंक सकता।
आकाश आज भी वैसा ही है। हालांकि उससे मेरी मुलाकात काफी समय से नहीं हुई। वह नहीं बदला, दुनिया बदल गयी। जैसे ही मैं कालेज के गेट पर पहुंचा, उसने मेरे पैर छुए। वह खुश कुछ अधिक ही था। लेकिन मैं पता नहीं क्यों उससे अधिक देर बात नहीं कर सका। मेरे साथ अक्सर ऐसा हो जाता है कि मैं कई मायनों में एक तरह से ‘रुखा’ किस्म का इंसान हो जाता हूं। मैं ऐसा नहीं चाहता मगर हो जाता है। घर लौटकर मैंने इस विषय में सोचा तो पाया कि मुझे उससे तसल्ली से बात करनी चाहिए थी।
डोगरा जी से भी उतना देर नहीं बात कर सका। मैं बस उनकी सुनता रहा। कुछ शब्द ही मैं कह पाया। उस समय मैं एक तरह से अजीब सा हो गया था। यह वक्त की वजह से हुआ था, या लिख लिख कर मैं ऐसा बन गया- रुखापन लिए एक आम इंसान। वैसे रंजना दूबे जी से मुझे मलाल है नहीं मिलने का । उनसे मैंने कितना कुछ सीखा है। उनके व्यवहार को आप उनसे मिलकर अच्छी तरह जान सकते हैं। बाहर से आप उन्हें थोड़ी सख्त समझ सकते हैं, लेकिन उनका हृदय उतना ही कोमल भी हो जाता है। उनकी ‘सीरीयसनेस’ का मैं आभारी हूं। आज भी जब मैं सुमित या शुभांगी से उनका जि्क्र करता हूं तो यह बात जरुर कहता हूं कि उनके सामने जब हम पढ़ते तो हम केवल पढ़ते ही थे। विषय से संबंधित जो बातें होती थीं, वे रंजना जी इस तरह से समझाती थीं कि हम उन्हें शायद ही कभी भूल पायें। हिन्दी पढ़ाने का तरीका उनका अपना है और आप बोर तो बिल्कुल नहीं हो सकते। जिंदगी की बारीकियों को चैप्टर के साथ उनसे अच्छा भला कौन समझा सकता है? शायद ऐसे शिक्षकों की वजह से ही मैं इतना कुछ लिख पाया हूं। वे आभार योग्य हैं।
-harminder singh
Subscribe to:
Posts (Atom)
|
| हमारे प्रेरणास्रोत | हमारे बुजुर्ग |
..शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय काम था मुंशी जी का ...अपने अंतिम दिनों में | तब एहसास होगा कि बुढ़ापा क्या होता है? सम्मान के हकदार नेत्र सिंह रामकली जी दादी गौरजां |
![]() >>मेरी बहन नेत्रा >>मैडम मौली | >>गर्मी की छुट्टियां >>खराब समय >>दुलारी मौसी >>लंगूर वाला >>गीता पड़ी बीमार | >>फंदे में बंदर जानवर कितना भी चालाक क्यों न हो, इंसान उसे काबू में कर ही लेता है। रघु ने स्कूल से कहीं एक रस्सी तलाश कर ली. उसने रस्सी का एक फंदा बना लिया |
|
|
सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य गिरीराज सिद्धू ने व्यक्त किया अपना दुख बुढ़ापे का सहारा गरीबदास उन्हीं की श्रेणी में आते हैं जिन्हें अपने पराये कर देते हैं और थकी हड्डियों को सहारा देने के बजाय उल्टे उनसे सहारे की उम्मीद करते हैं |
| ![]() |
|
|
अपने याद आते हैं राजाराम जी घर से दूर रह रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले घर को अलविदा कह दिया है। लेकिन अपनों की दूरी अब कहीं न कहीं परेशान करती है, बिल्कुल भीतर से |
| दैनिक हिन्दुस्तान और वेबदुनिया में वृद्धग्राम |
| ब्लॉग वार्ता : कहीं आप बूढ़े तो नहीं हो रहे -Ravish kumar NDTV | इन काँपते हाथों को बस थाम लो! -Ravindra Vyas WEBDUNIA.com |


![[ghar+se+school.png]](https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhXxMSBNX5uceENhGZSCkr9K6RgrHLnyt2OdN48UC0OfEkO31AiMxFQ3Cj4Ce5NVMkXy4EVeQ4L9_vl5EnSKVHYVxFbgARWZcaqyPiN3tLN8HPFFow0JfI9YuE0yBZsJPpKFq6vPl9qczLO/s1600/ghar+se+school.png)
![[horam+singh.jpg]](https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh9jaEMBObfs4x2vNEaMGdvezya9ahQ-ir1sQsXJmDvJRQhnYYhku9TotkXKoxBNPyfE05g2NzvuQ3ge53ZLo8n0edVjkr9kymMw7TgXhNZjnLIdoMTcPDfbMmtKQ12dOgLwzbk-dynUzHl/s1600/horam+singh.jpg)
![[ARUN+DR.jpg]](https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg6QLlVFzl_UZ3_qJSh-_gOGe8D1k_HKnbomppy4Quj9l7tIM84poHpgZHiEVW8WkWTlYKFo0YGZY9Wn7-GP5vZeAZvUhDj58fIC0myIOaGF5jcIX3WCpFH6MIzUl-DAI1QGTG6cB4p0RAe/s1600/ARUN+DR.jpg)
![[old.jpg]](https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi6SiDZJDdaDGKCs08mVeQJcMgoCS_GYpLboAfQoKnmP4GJd56RzmOhD2j1hKSqQQ8GpFTbrZ6rb99WkSmPQOatB_O1ZeSEsXedARhvo_pKkCpD1yGUBDe0NqxjXZIjMZtxhCNnoZQjjBII/s1600/old.jpg)
![[kisna.jpg]](https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjIFS4TmPavnVX-YGEZp-Mgxs9CLpoYi1_65Y8wn2XpbhxLEqVSgK9ClUjNemCCCLttADcOJXOlWKGFqqPnYf2HOuMaZNlu5_i80iXbOnSPShdd7cKdpErPKFWuNTu3MsIH_JnDcZtIGjSC/s1600/kisna.jpg)
![[vradhgram_logo_1.png]](https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi2SMrQ5CiFzhP0WV95VylZWDhq8q002kir5m-nLr3mxZRylb7gLvGEsOApIdueOSJ0NbAqET2DrI_phyphenhyphenLIeOB4wdFeJQdEVprFfskWf2CSDKCtE2RY7m7Ip3IcSSMqcStYcZhmuQdH4gM/s1600/vradhgram_logo_1.png)

![[boodhi+kaki+kehete+hai_vradhgram.jpg]](https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhaMiIGvGsM4Ffib4Uxba3yZMgxmDF3BsconmXFFcIwtPxL9GY3vN8TxOD3ZLVhVKUNWQamp2ezCUT2V_dfB1CYjOHkWzG5sEi3uOTtCupUNv7gwQMRHdekh0zltLQdaNCw5bKyhEjJvMY0/s1600/boodhi+kaki+kehete+hai_vradhgram.jpg)

![[NIRMAL+SINGH.jpg]](https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjFUf8ZX7JJmU7Es2AfrE1M9DwfAfOF2cF8yqh21vzUpxM9wHMoGTvBEl4Nl1odpHtdIo_nSNbQyOW9vTDw19KumVr-YeCCjTow7PFWDvOy0bnX1JEAP0aPpMCv-5nxv6RXTQtgkV2og1d_/s1600/NIRMAL+SINGH.jpg)
![[jail+diary.jpg]](https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgZZbbSj57vkBz0Nm8fKyppCyrZjadXaOcRAQThdiWfXxO19vzz-HFrjMtnyCwCVpUi6pSsOYOA4KKADao3HptLdNR3pnqRD7xbbDVWvYD-gD-JnxcZddlvDouvMplacu6gyvR-_Q8c_TPy/s1600/jail+diary.jpg)